सोमवार, 20 दिसंबर 2010

घर, शहर, दिल, दिल्ली और हम यानि मैं


अँधेरी रातों में चमचमाते चेहरे, भीड़ के बीच का एक शांत सा शोर, ठहर जाने की चाहत संजोये भागते दोड़ते लोग....पिछले तीन दिन मैं दिल्ली में थी. मैं दिल्ली की हूँ या दिल्ली मेरा शहर इस बात का फैसला अभी नही हो पाया है क्योंकि अक्सर आखिर में आकर चीजे रोजी रोटी से जुड़ जाती हैं ..जो मेरे लिए  दिल्ली में मुकम्मल नही हो  पाई...खैर एक महीने बारह दिन बाद वापस आकर अपने किराये की घर को दीवारों को महसूस कर, करीने से सजे बिस्तर को सलवटों से सराबोर कर न चाहते हुए भी अच्छा ही लगा...घर की बात, माँ के प्यार भरे हाथ और पापा के अचानक उमड़ पड़े दुलार की बात ही कुछ अलग होती है शायद..दूरिया प्यार बढा देती है ये बात भी प्रमाणिक होती नजर आने लगी है ..लेकिन कितनी अजीब बात है प्यार पाने और जताने के लिए उन्ही से दूर होना पड़ता है जिनसे दूर होने का सोचना भी कभी गवारा नही हुआ करता था...निरे बचपने से निकलकर नीरी समझदारी की बातें करना आसान नही होता....बताना कितना मुश्किल होता है ये अहसास कभी नही हुआ क्योंकि  माँ बाप दोस्त की तरह हमेशा कंधे और सर दोनों पर हाथ धरे रहे है ..छिपाना कितना मुश्किल होता है ये अब पता चला क्योंकि हर बात बताई नही जा सकती कुछ बात बताने लायक नही है और कुछ बता कर भी कुछ फायदा नही है...जिंदगी अपने से ही रंगों में रंगती जा रही है जहाँ मुझे हर रंग में मिलावट नजर आती है और सामने वाले को हर दृश्य सुनहरा प्रतीत हो रहा है...तीन सौ पैसठ दिन उस शहर में रहकर शब्दों का ऐसा आलोडन कभी नही रहा जैसा तीन दिनों के एक भाग दोड़ भरे सफ़र में हो रहा है .....जैसे तीन घंटे की एक पूरी फिल्म बन सकती है ..दिल्ली से लुधियाना की बस पर बैठने के वक़्त से न्यूज़ रूम में आकर ख़बरों से उलझने के दरम्यान कितनी ही बातें दिमाग में आती जाती रही ... जब छिपाया जाता है या यूँ कहूँ की बताया नही जाता है तो बहुत कुछ होता है कहने के लिए जिसे एक ख़ामोशी के साथ लिख देना ही बेहतर होता है .......पर क्या कीजे जब वक़्त कम हो और बात बड़ी औरत उलझी उलझी ...सब घर जाने की तयारी कर रहे है एक बजने वाला है मुझे  भी जाना है तबियत अब भी नासाज है ...बस घर पर ही ठीक रही थी घर की बात ही कुछ अलग है .......................हालाँकि घर अपना नही है किराये का है ...पर घर है 

रविवार, 12 दिसंबर 2010

एक चैन चाहतों की


  चाहतों की एक चैन सी है
हर पल में पलती बढती बिगडती 
प्रेम कहानिओ के बीच
तुम मुझे चाहते हो
और मैं जिसे चाहूंगी
वो शायद 
चाहता होगा किसी और को
उफ़ ! 
ये दफ़न होती जाती
अधूरी दासताएँ
ये बढ़ता अँधेरा
और सिमटते कोहरे में
दुबकती छिपती
अकेली रातें
और
ये सुबह भी मांग लाइ है जैसे
रात से कुछ सन्नाटा उधार
भरी दुपहरी में जैसे
सूरज को भी आ गई है नींद
शाम से कुछ उम्मीदें लगाये बैठे थे कि
सूरज मियां कि आँख खुली
और शब्बा खैर कहके
वो भी चलते बने
फिर क्या
फिर वही रात मिली
चंचल, अल्हड, महोश, मदमस्त, दीवानी सी
तारों की  महफ़िल में भी वीरानी सी
ये चाहतों की  चैन
तेरे मेरे दरम्यान ही नही है बस
दूर ऊपर भी कहीं 
चल रहा है चाहतों का 
अधुरा सा एक सिलसिला
चाँद चाहता है चांदनी को
चांदनी आसमान को
और आसमान निहारता है धरती को एकटक

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

सवाल

पहले मैं एक सवाल पर खड़ी थी 
अब फिजा भर में एक सवाल है 
सारी कायनात जो 
एक वक़्त 
जुट गई थी मिलन
की साजिश में 
आज उसने 
बिछोह का जाल रचा है 
और मैं पूछना चाहती हूँ 
क्यों 
क्यों 
और क्यों 
शायद हवाओं से लेकर 
उस एक कोने तक 
आज यही एक सवाल है
जहाँ हवा का एहसास भी नही पहुचता 
शायद 
बारिश की हर एक बूँद के साथ से लेकर
आज हर उस तालाब तक
यही सवाल है जो बरसों से सुखा पड़ा है 



रविवार, 21 नवंबर 2010

आज चाँद पूरा है फलक पर



चाँद 
हर दिन के साथ बढ़ता हुआ 
हर दिन के साथ घटता हुआ  
जिंदगी के उतार चढावो को 
अपनी चांदनी से सराबोर कर 
तीस दिनों में एक बार आकर ही 
महीने भर की हर 
टीस को सहला जाता हो जैसे
हर दाग के पीछे छिपी ख़ूबसूरती को 
दिखा जाता हो जैसे 
जैसे कहता हो कि
रात कि ख़ूबसूरती को पहचान 
ऐ राही 
ये रात ही जिंदगी के हर दिन का फलसफा है 


जाने क्यों चाँद देखते वक़्त शब्दों के अकाल आयर भावनाओ का एक आलोडन सा उमड़ पड़ा है 
एक एक शब्द कहना सागर से मोती चुनने सरीखा लग रहा है 
फिलहाल इतना ही 
उस चाँद के लिए जो आज फिर से पूरा है फलक पर 



शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

खोल दो (पुरस्कृत कविता)


खोल दो का आग्रह
फिर मेरे सामने  है
क्योंकि अब वो मुझे
अपनी जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं
मेरी उड़ान मंजूर है उन्हें
मगर वो उसकी दिशा बदलना चाहते है
मेरी आहटों का जिक्र भी भाता है उन्हें
और मेरे कदम बढ़ाने पर भी वो ऐतराज जताते है
उनकी मीठी सी बातों में एक तीखा सा पन है
छलकती सी आँखें छल का दर्पण है
सब कुछ छिपा कर जाने क्या बताना चाहते हैं
मेरे जवान दिल में बैठे बचपने को
वो हर रोज बहकाना चाहते है
मेरी बातों की तफसील से मतलब नहीं उन्हें
मेरे बदन की तासीर को आजमाना चाहते हैं
जो नाम हिमानी है
उसमे वो क्या आग जलाएंगे
बर्फ की इस नदी को कितना पिघलायेंगे
बारिश तो ठीक है मगर
बाढ़ का कहर क्या वो सह पाएंगे
सवाल उनके भी हैं सवाल मेरे भी
मैं विश्वास करने में यकीं रखती हूँ
उनके सवालों में है शक के घेरे भी
देखें अब हम
भाग खड़े होंगे वो
या इन हालातों को सुलझाएंगे???


गुरुवार, 11 नवंबर 2010

प्यार, दोस्ती, आकर्षण या अटैचमैंट


तैतीस करोड़ देवी देवता , चार धाम, चार पुराण, ग्यारह उपनिषद, और भी न जाने कितना कुछ. माने तो सब कुछ यही न माने तो कुछ भी नही.लेकिन मेरे ख्याल से ९० फिसद लोग मानते हैं और जो नही मानते वो कमसे कम इस ९० फिसद के शोर में काफी बातें जानते हैं. जानकारी हो भी क्यों न. धारावाहिक बन चुके हैं, फिल्मे बन चुकी है. किताबे तो है ही. एक नाम आप ने भी जरूर सुना होगा  दरअसल  नाम तो दो हैं लेकिन दोनों इस तरह जुड़े हैं की उन्हें एक ही कहा जाता हैं ..... राधाकृष्ण. मेरा मुद्दा भगवान् या उनके अस्तित्व पर चर्चा करने का नही था लेकिन कुछ दिन पहले बातों बातों में एक ऐसी बात निकाली की उसने बात करने के लिए उत्साहित किया ... राधा कृष्ण का नाम एक अमर प्रेम कहानी की पहचान है. दो लोग जो एक ही थे, जो मिलकर भी जुदा रहे. जो एक दुसरे के बिना अधूरे है जो अलग है लेकिन जिन्हें सब एक दुसरे के साथ से ही जानते हैं. आज के ज़माने में तो ऐसी हकीकत की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है ..और अगर ये कल्पना कही सच होती नजर आये तो यक़ीनन इबादते गौर है ...लेकिन इबादत के इस रिश्ते पर  एक जवान दिल ने सवाल उठाया है. जाने क्यों मुझे ये अजीब भी लगा, नागवार भी फिरभी लग रहा है की इस समय के किसी जवान दिल का ये सबसे जमीनी सवाल है ..सवाल था 
राधा कृष्ण का ये रिश्ता 
प्यार था 
???????
दोस्ती थी 
????????
आकर्षण था
या फिर
????????
अटैचमैंट
????????

प्रश्न चिन्ह लग चूका है ?
जवाब आप भी दे सकते है और आप भी यानि वो भी जो मानते है और वो भी जो सिर्फ जानते है 
लेकिन  जवाब दीजियेगा जरूर. बहुत सारे जवान दिलों का सवाल है ........जवाब के इन्तजार में ....हिमानी
 

रविवार, 31 अक्तूबर 2010

एक चुप सौ सुख

एक चुप सौ सुख
मगर इतना आसान भी नही है 
यूँ चुप रह जाना 
कितना भी हो 
थोडा या ज्यादा
लेकिन , मुश्किल तो है ही 
शब्दों को पी जाना 
होंटों को सी जाना 
कशमकश है कि
कह दूं तो 
शायद 
रातें खफा हो जाएँगी
ख़ामोशी से भी वैसी दोस्ती नही है मेरी
रहूंगी खामोश गर तो 
बातें जुदा हो जाएँगी
कैसे चुप रहूँ
इस मौन को तोड़ने के शोर के बीच
कैसे रहूँ स्तब्ध 
झंझावातों के इस दौर के बीच
मैं बोलती हूँ तो 
बोलने को वो मेरा कसूर बताता है
चुप रहने पर
चुप चाप ही जाने कौन
चुप रहने की सजा सुना जाता है
मैं अपनी जनम  कुंडली में 
खुद जो बना रही हूँ जिंदगी के निशाँ 
तो जमाना जिरह पाले है मुझसे 
मेरी हर बात ही पर एतराज जताता है 

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

परख

परख 
पलक झपकते ही जो बादल देते हैं कारवां
उनकी परख
प्रेम नाम के पर्यायवाची
भरे पड़े हैं जिनके शब्दकोष में
जान, जानम, जानेमन और  जिंदगी
जो कहते हैं अपनी हर महबूबा को 
उनकी परख
हर रात होना चाहते हैं 
जो हम बिस्तर 
चोरी छिपे
हर उस लड़की के साथ
जिसने मान लिया हैं
उनके शब्दों को पर ब्रह्म
या फिर वो 
जिसे नही है कोई परवाह लोकलाज की
जो खुद भी मिटाना चाहती हैं महज जिस्मानी भूख
इस जगमगाहट के जरिये
उनकी परख
रोजी रोटी और मकान के बाद
या इन तीनो से पहले एक और 
मूलभूत जरुरत है हमारे बीच
देह
देह की भूख
देह की मुक्ति
देह का समर्पण
जो देते हैं इस तरह के प्रवचन
उनकी परख
जो स्त्री को करना चाहते है स्वतंत्र समाज की  बेड़ियों से
और वही 
जो नही देख सकते 
अपनी बहिन, बेटी या माँ को 
किसी पुरुष के ख्वाब ख्याल
संजोते हुए भी
उनकी परख
जस्बातों के दरम्यान पनपती
जरुरत से प्रेम को बचाने के लिए
शायद  परख जरुरी है 


शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मासूम सी मुश्किलें

कदम दर कदम मेरे साथ रहती है
कुछ मासूम सी मुश्किलें
जैसे जानती हो
वो मुझे हमेशा से
मालूम चल जाता हो उन्हें मेरी हर आहट  का पता
मेरे हर मकसद की वजह

सुकून के एक छोटे से पल में
भी इनके आने का ही शोर रहता है
हर ख़ुशी से हो जाती हूँ मैं अनमनी   सी
मुश्किलों की उस सनसनी में 
फिर कौन साथ देता है 

अपना पराया तो महज दो शब्द हैं विरोधाभास के 
आखिर तो हर आदमी में एक आदमी रहता है
प्यार, वफा, नफरत, धोखा 
कहने को तो किस्से हजारों है 
मगर सब एक इन्तजार में हैं
चुप है यहाँ
की देखे कौन पहले कहता है 

जिक्र हो उठा कहीं उनकी कहानी का पहले तो फिर होगा ये सितम
की शब्द ढाएँगे जुलम
कहेंगे देखो भई 
उस शराफत के पैमाने में ही तो नशे का सारा चिलम रहता है 

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

चलो हम काफ़िर ही सही.

मुझे जानने और समझने वाले कुछ लोग अक्सर कहते है कि..हिमानी तू किताबों और कहानिओं की दुनिया में रहती है. तू सच देखकर भी शतुरमुर्ग  की तरह आँख बंद किये हुए है. कहानिओं वाला प्यार , किताबों के विचार ऐसा कुछ भी तो नही है दुनिया में आज फिर क्यों इन ख्यालों में खो कर अपनी जिंदगी के अहम् पल ख़राब कर रही है . छोड़ दे किताबे पढना और ख्वाब गढ़ना, बाहर निकाल. दुनिया को देख और उसकी सचाई को भी. 
ये आज की बात नही है जो भी,    जैसा भी,   जहाँ भी मिला,   उससे मुझे यही मशविरा मिला...और मैं ????  मैं आज तक हू ब हू ..ज्यों की त्यों ..वैसी की वैसी ...और और मशविरे सुनती जा रही हूँ ...और और ख्वाब बुनती जा रही हूँ. ऐसा नही है  कि मैंने कभी बदलने की कोशिश नही की. जब जब जिंदगी ने झटका दिया तब तब मैंने बदलने की प्रतिज्ञा ले डाली है. एक दिन बदली रही दो दिन बदली रही ...मगर बादल हैं आखिर कब तक न बरसेंगे ?  मशविरे की धूप सर पर खड़ी रही और मेरे मन के बादल अपनी जिद पर अड़े रहे. बारिश होती रही. धूप में भी मैं भीगती रही अपने ही पानी से मैंने खुद को पानी पानी कर लिया. कभी देखा है बादलों को खुद को भिगोते हुए..मेरे साथ कुछ ऐसा ही होता रहा..भीगना यूँ भी बहुत भाता है .. तो बारिश कहाँ से आई है ये कभी सोचा ही नही. बहरहाल मेरे बदलने की नाकाम कोशिशे जारी है आज भी ..
मगर....मगर एक सवाल जो ये सब सोचते हुए कोंधा है दिमाग में. मैं किताबों की दुनिया में हूँ , कहानिओं पर यकीं करती हूँ . चाहती हूँ ये कहानियां सच हो. कुछ को सच करने में मैं भी योगदान दे सकूँ ...किताबों में दर्ज मोहब्बतें , मासूमियत, मतवालापन, सपनो को पूरा करने की जिद, मन से मन का मिलना ...अगर ये सब कुछ झूठ है और हमें किताबें पढना छोड़ देना चाहिए. शामिल हो जाना चाहिए भली बुरी सी दो चेहरों वाली इस दुनिया में तो फिर ..शेष क्या बचा... आज कमसकम किताबें तो है ख्याल संजोने और सपने बोने के लिए. आने वाले समय में हम क्या पढ़ाएंगे आने वाली पीढ़ियों को. क्या मिलेगा किताबों में उन्हें नफरत, धोखा, स्वार्थ, हर शख्स एक सामान सा,  हर रिश्ता एक व्यापार सा ...और हर मकसद के पीछे एक राजनितिक षड़यंत्र ..
हम किताबों को छोड़ना चाहते है या किताबों का कलेवर ?? हम इतने  व्यावहारिक हो गए है कि भावनाए  महज एक बेवकूफी के कुछ और मायने ही नही रखती हमारे लिए. हम महफिलों में जाना चाहते है और मधुशाला में भी. हम मोहब्बत भी करना चाहते है और मिलन भी. हमारे मकसद भी हैं और मंजिलों की आरजू भी. ........मगर हम हर काम को शातिरता से करना चाहते है. चालाकी के सारे पैमानों से भी ज्यादा चालाक बनकर . किताबों में जो कल्पना है उसे तो कबिर्स्तान पहुंचा दियाक गया है कब का. सब आँखे खोल कर जी रहे है ..जो आँखों का इस्तेमाल उस कल्पना और कल्पना के कमरों में घूमकर अपने लिए घर बनाने के लिए कर रहे है उन्हें काफ़िर समझा जा रहा है काफ़िर मतलब नास्तिक  होता है लेकिन यहाँ जब श्रधा अपने स्वार्थ के लिए ही बची है तो ऐसे में किताबों की कल्पना में खोया रहने वाला काफ़िर ही हुआ ..................चलो हम काफ़िर ही सही. 

बुधवार, 29 सितंबर 2010

एक नूर से सब जग उपज्या



मुझे कल गाजिअबाद अपने घर आना है, लेकिन नही आ पाऊँगी शायद, कारण अयोध्या मुद्दे पर फैसला आने वाला  है. पता नही क्या फैसला होगा.फैसले के बाद क्या होगा. दंगे, शांति, सुलह या एक नए रस्ते की तलाश या फिर हमारी कल्पनाओ से परे कुछ. सब आपस में बतिया रहे है क्या होना चाहिए  ???
सब अपने अपने ख्याल जता रहे है , यहाँ किसी ने कहा की मेरे ख्याल से वहां एक स्कूल बना दिया जाना चाहिए. उसमे हिन्दू मुस्लिम दोनों के बच्चे पढ़ सकेंगे. दूसरी आवाज आई बेशक बाकी जगह कुछ भी हो रहा हो लेकिन इस वजह से कई दिनों  से घर में बेरोजगार बैठे यु पी के कुछ होम गार्ड  काम पाकर राहत  महसूस कर रहे है. बातों के बीच से टी वी पर नजर दौड़ाई तो अवध और अयोध्या से  भाईचारे की मिसाल पेश करती कहानिया दिखाई जा रही थी. जैसे वहां तो लोग हिन्दू मुस्लिम और कौम नाम की बातों को जानते ही नही है. सिर्फ अयोध्या और अवध ही क्यों देश भर में ऐसी कई मिसाले है जहाँ लोगों ने हिन्दू मुस्लिम के बीच की खाई को पाट कर अपनी अलग पहचान बनाई है.
हम आपस में बात करते हुए भी लोगो से यही सुनते है कि क्या रखा है मंदिर और मस्जिद में. कोई  कबूतर से पूछे कि कौमी एकता क्या है कभी मंदिर पे बैठा होगा कभी मस्जिद पे. ऐसे मिस्रो और मिसालों की कमी नही है जो हमें ऐसी सोच से दूर रहने के लिए कहते है जहाँ दो धर्मो के बीच दुश्मनी पनपे उनमे कोई भी बैर हो ...जहाँ तहां सून रही हूँ अधिकतर लोग चाहते है कि मामला सुलझ जाये और फिर जो आग बुझ सी गई है उसे अब चिंगारी दिखा कर राख लेने का क्या मतलब. 
पूरा देश डर के सायें में है और मुद्दा सिर्फ इतना है कि एक जगह पर मंदिर बनाया जाये या मस्जिद. मेरा एक मासूम सा सुझाव है अगर कोई पढ़ ले तो एक ऐसा निर्माण किया जाये जहाँ भगवान् के नाम का हर चिन्ह मौजूद हो. ईसामसीह, राम, कृष्ण, खुदा की इबादत, गुरबानी.
सवाल ये भी है कि जब कोई हम आप मैं चाहते ही नही कि कोई विवाद हो दंगा हो तो कौन लोग हैं हमारे ही बीच से जो खा म खा चिंगारियां भड़का  रहे है. क्या राजनीती  की लौ में तेल डालने के लिए महानुभाव देश को जला डालना चाहते है .
सवाल बहुत सारे है जवाब शायद एक कि

 एक नूर से सब जग उपज्या.............


 

शनिवार, 25 सितंबर 2010

ताकि छोटा न हो शब्दों का आंचल

शब्दों से हमारा रिश्ता बहुत ख़ास होता है . लेकिन इस रिश्ते का महत्व तब तक एक रहस्य बना रहता है जब तक की कोई ऐसी परिस्थिति न आन पड़े कि  हमारे पास भावनाए हो और शब्द न मिले. वो एक अनमना सा पल जब अचानक शब्द गले तक पहुँच कर फिसल जाये जुबान तक आ ही न पाए. कितनी तकलीफ से भर जाता है मन ,  मन की बात कहने को जुबान व्याकुल सी हो जाती है लेकिन दिमाग है कि एक भूलभुलैया में खो जाता है . शब्दों की भुलभुलिया . जहाँ अपनी भावनाओ को सही शब्द दे पाना एक मुश्किल से भरा फैसला होता है.


ये बातें मैं किसी प्रेम प्रसंग या किसे कहानी के वश में होकर नही लिख रही हूँ, बल्कि पिछले कुछ दिनों से एक अखबार के दफ्तर में काम करते हुए, हुआ एक अनुभव है , जहाँ शब्दों के लिए शब्दों के ही बीच में हर रोज एक  जंग सी होती है. सभी के सुझाये गए शब्दों की अपनी एक वजह है. उनकी बोली, उनका परिवेश,उनकी पढाई .....और फिर हर शब्द के साथ काम करने वाली उनकी निजी सोच. मगर उस एक वक़्त जरुरत होती है हर तरह से फिट एक अदद शब्द की. शब्द मिलने के बाद उसकी लिखावट पर चर्चा. कहीं छोटा उ कही बड़ी ई. हालाँकि हर अखबार की अपनी एक स्टाइल शीट होती है लेकिन फिर भी हिंदी के अख़बारों में भाषा गत शुद्धता को लेकर बहुत सारा विरोधाभास है ....पढाई के दिनों में हमें अच्छी अंग्रेजी के लिए द हिन्दू पढने को कहा जाता था लेकिन वही हिंदी को लेकर हम अपनी अशुधता को दूर कर सके उसके लिए किसी एक भी अखबार का नाम ध्यान नही आता . ख़बरों की अपनी अलग पहचान के साथ अखबार या चैनल की पहचान उसकी भाषागत शैली के साथ भी जुडी है.मीडिया में हर बढ़ते दिन के साथ नए नए प्रयोग हो रहे है अलग तरह के कोलुम्न्स ले आउट लेकिन भाषा को लेकर सिर्फ एक निजी सोच और समझ  है वास्तव में सही क्या है इसका फैसला एक बड़ी बहस का बाद भी न निकले शायद. कुछ आगे बढ़कर कहीं कहीं तो हिंदी लिखने के साथ भी अजीब गरीब आसान नुस्खे अपनाये जा रहे है. एक तर्क ये होता है की वही लिखना है जो पाठक  को समझ में आये. लेकिन समझाने का ये कौन सा तरीका है की शब्द की बनावट ही अपने हिसाब से तय कर ली जाये. और फिर आम भाषा बोलचाल की भाषा और अखबार और चैनल की भाषा में कुछ तो फर्क होता है न . मुझे लगता है कि यंग इंडिया का मीडिया बनने से पहले शायद इंडिया का मीडिया बनना ज्यादा जरुरी है क्योंकि यंग इंडिया भी इंडिया को खोना नही चाहता वो अपने जुगाड़ करना अच्छे से जानता है उसके लिए इंडिया की भाषा, संस्कृति को idiotik  बनाना सही नही होगा.
शब्द भी बाकी चींजों कि तरह हमारी अनमोल धरोहर है उस एहसास से ही मन मायूस हो जाता है कि कहीं कोई शब्द खो गया है
प्रोयोगों के इस दौर में झांक के देखेंगे तो एक गहरी खाई है जिसमे बहुत सारे शब्द गिरा दिए गए है उन्हें वापिस लाने की कोशिश करनी चाहिए .............ये कोशिश कामयाब होना भी निहायत जरुरी है ताकि शब्दों के आंचल में हमेशा हमारी भावनाओ की बयाँ करने के लिए जगह रहे

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

अंग्रेजी से चल रहा है एक्स्ट्रा marrital affair

उसका आयोजन ख़बरों में छाया हुआ है. कहीं एक दिवस. कहीं सप्ताह .कहीं पूरा पखवाडा. कोई एक शब्द कह रहा है. कोई कई वाक्य, और कोई दे रहा है पूरा भाषण. १४ सितम्बर हिंदी दिवस है. हिंदी हमारी ये, हिंदी हमारी वो. हिंदी के लिए हमें ये करना चाहिए, हिंदी के लिए हमें वो करना चाहिए. 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे'. पूरा साल क्या होता है हम जानते है.
अभी कुछ दिन पहले जो हुआ वो बताती हूँ
एक बच्चे से बात कर रही थी मेरा सवाल हिंदी में था उसका जवाब अंग्रेजी में सवाल था , कौन सी क्लास में पढ़ते हो?  जवाब दिया फिफ्थ ए.
बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ? जवाब दिया 
आई वांट  बिकेम मैथ्स टीचर. 
सुनकर हंसी आ गई और साथ ही आई एक सोच भी. क्या पढ़ रहे है बच्चे ?? कैसे बढ़ रहे है बच्चे ?? न हिंदी बोलना चाहते है न अंग्रेजी बोल पाते है. उर्दू और संस्कृत की तो भनक तक नही है उन्हें. शायद ही वो जानते हो कि ये भी दो भाषाएँ है. बच्चे प्रेमचंद को नही जानते उनकी कहानी ईदगाह को पढ़ भी ले तो वो चीमटा  क्या होता है , ये ही नही समझ पाएंगे. वो नही समझ पाते जब उनसे कहा जाता है कि पुनजब में धान उगाया जाता है उन्हें बताना पड़ता है कि धान मेंस राईस होता है यानि चावल.
एक समय था जब हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद  करते थे अब बच्चों को हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करके बताना पड़ता है. वो अपने आस पास के शब्द ही नही समझते. उनकी सेब शब्द को सुनने समझने कि शक्ति उतनी नही है जितना वो एप्पल को समझते है. बच्चों की बात तो ये है कि वेह स्कूल में अंग्रेजी बोलने कि जबरदस्त बाध्यता से बंधे है और घर का देसी माहौल उन्हें उस सीखे पढ़े को उस तरह अप्लाई नही करने देता जिस तरह वो सीख रहे है. नतीजा टूटी फूटी अंग्रेजी और आधी अधूरी हिंदी.
अब अगर बात अपनी, यानि हर रोज हिंदी लिखने पढने वालों,  हिंदी की रोटी खाने वाले लोगों की करें तो सुकून और कम हो जाता है
हर दिन शब्दों में उलझना, उन्हें समझना.  एक अजनबी की तरह तमाम शब्दों से रोज मुलाकात होती है.  कुछ शब्द ऐसे जो समझ आते है लिखावट में नासमझी हो जाती है . कुछ लिखे देते है लेकिन वो शब्द कहीं सुने हुए नही लगते. हर दिन की  अलग कहानी है. 
आखिर इस कहानी की वजह क्या है,पढाई का कमजोर ढांचा या पढने में हमारी कमजोरी?????
एक वजह तो भाषा गत बाध्यता भी है हम अंग्रेजी से कुछ ज्यादा ही प्यार कर रहे है हिंदी से शादी हुई  और अब ये एक्स्ट्रा मरिटल अफ्फैर अंग्रेजी के साथ कुछ ज्यादा ही लम्बा हो रहा है और ज्यादा ही संजीदा भी. 
अब हम मनाते रहे हिंदी दिवस. हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाडा एक दिन जब ये हिंदी रूठ कर उन अग्रेजों के देश चली जाएगी तब शायद उसकी कीमत पता चलेगी.ये धमकी नही है न हीमैन धमकी देने की हैसियत रखती हूँ शायद क्योंकि मैंने भी अंग्रेजी सीखी है बोली है पढाई है पर इतना कहना काफी होगा की हिंदी भाषाओँ में मेरा पहला प्यार है.


शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

दिल का कचरा



बेशर्म ख्वाब 
बेअदब ख्वाइशें
बगावती ख्याल 
ख़ाली से इस दिल में 
कितना कचरा भरा है 

हकीकी से रु ब रु 
हुक्म की तामील करता 
हदों में रहता 
हर शख्स 
उपरोक्त कचरे से दूर
कितना साफ़ सुथरा दिखता है 

आदतों में शुमार अदब 
तहजीब से लदा 
तरकीबों से अलहदा 
ये हुस्न मुझे मगर 
नागँवार लगता है 

अब चाहती हूँ इस जिस्म में भी नूर हो 
शर्मों ह्या की इस चाशनी में 
शरारत का तड़का 
तवे सी रोटी के सुरूर में तंदूरी नान सा गुरूर हो 

दिल में थोडा कचरा होना भी 
जीने के लिए जरूरी है 



बुधवार, 25 अगस्त 2010

कैसे हो हल 'हिमानी' ??





जुनून को किनारा मिल जाता तो
जिंदगी को सहारा बनाता कौन ??
 
हम भी राहों में तुम भी दूर मंजिल से
कोई एक भी अगर कुछ पा जाता तो
एक दूजे को फिर रास्ता बताता कौन ??
 
कहने को है ढेर सारा गम इकट्ठा
इस दिल में
सुनने बैठ जाता गर कोई
तो फिर तन्हाई मे तकिए तले
बुझे हुए मन की लौ जलाता कौन ??
 
कागज, कलम हाथ में
शब्दों का एक सिलसिलां हमेशा साथ में
हर बार ही बन जाती उम्दा गजल तो
फिर गैरों की शायरी को सीने से लगाता कौन ??
 
यहां कुछ कहना मना है
वहां सुननें में सुकून नहीं मिलता दोस्तों को
गर आसान होती कहा-सुनी इतनी तो
किसी को दुश्मन बनाता कौन ??
 
जब हिज्र बनने लगी है हकीकत
तो सारे ख्वाब अब हिजाब में हैं
हर आरजू का पूरा होना मुनासिब नहीं
सब मान ही जाता खुदा तो
मन्नतें मनाता कौन ??
 
वो इब्तिदा और ये इंतहा
इस बीच एक मैं अकेली सी पहेली
कैसे हो हल  'हिमानी'  ??

 सवालों का ये काफिला टूट जाता गर
तो फिर जवाबों का मोल चुकाता कौन ??



शनिवार, 21 अगस्त 2010

पेड न्यूज - पत्रकारिता के फूल पर मंडराता भंवरा

फूल की महक और खुबसूरती की बात हो तो भंवरे का जिक्र भी आ ही जाता है। हाल-ए-पत्रकारिता भी कुछ ऐसा ही हो गया है। इसके आकार और सरोकार की चाशनी पर मंडराते पेड न्यूज रुपी भँवरे की मेहरबानी के चलते पत्रकारिता में मुद्दों की चर्चा के बजाए आजकल पत्रकारिता स्वयं में एक चर्चित विषय हो गया है। ताजा बात से शुरु करते हैं।
हाल ही में बिहार और झारखंड के पत्रकारों ने पेड न्यूज को रोकने की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप करने की गरज से एंटी पेड न्यूज फोरम का गठन किया है। ये संगठन पेड न्यूज के कारोबार पर नजर रखेगा और इस तरह की तमाम गतिविधियों को लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करेगा। संगठन में कोई भी पद नहीं रखा गया है। केवल एक कोर कमेटी होगी, जो सबसे सलाह-मशवरा करके काम करेगी। इस महीने की 28 तारीख को इस फोरम के तहत सम्मेलन भी किया जाएगा। इस सम्मेलन में देश के ऐसे पत्रकार भी शिरकत करेंगे जो पेड न्यूज की प्रणाली को पत्रकारिता पर कलंक मानते हैं।
अब से कुछ दिन पहले भी पत्रकारिता की पनाह में पलते पेड न्यूज की अवैध संपति पर हो हल्ला हुआ था। मौका था रामनाथ गोयनका अवार्ड समारोह। चर्चा हुई। पत्रकारों ने एक सुर में पेड न्यूज को पत्रकारिता के लिए घातक करार दिया। और फिर सब अपने-अपने घर लौट गए। पेड न्यूज जहां थी वहीं रही। ये बात भी ध्यान देने की है कि  प्रेस परिषद ने पेड न्यूज की जांच के लिए कमेटी भी गठित की थी जिसकी रिपोर्ट इसी वर्ष 26 अप्रैल को आनी थी लेकिन वह भी अब तक नहीं आई है। जब से यह मुद्दा उठा है तब से पत्रकार और मीडिया टाइकून अलग-अलग अवसरों पर इस विषय पर अपनी राय देते रहे हैं।

इसकी एक बानगी मैंने तमाम अवसरों पर दिए गए कुछ बयानों को खोज बीन कर तैयार की है-

पेड न्यूज सिर्फ वही नहीं, जो पैसे लेकर छापी जाती है। किसी विचारधारा के तहत लिखी गयी खबर भी पेड न्यूज जितनी ही गलत है।
आशुतोष,  मैनेजिंग एडीटर, आईबीनएन-7।

खराब अखबार निकालने का दोष मालिकों पर मढऩा ठीक नहीं है। पत्रकारों को ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिससे पाठकों में उसकी इमेज खराब हो। किसी भी कानून से ज्यादा जनता और पाठक की नजर हालात को सही करने में अपनी भूमिका निभा सकती है। कानून बन जाएगा तो पेड न्यूज का सिलसिला दूसरे रास्तों से शुरु हो जाएगा।
श्रवण गर्ग, दैनिक भास्कर।

मीडिया पर हमेशा से दबाव रहा है। जब हमने नवभारत टाइम्स में पशुपालन घोटाला की खबर छापी तो लालू यादव ने हमारे ऑफिस में आग लगवा दी थी। हमारा काम खबर छापना है, हमें हर हाल में इस काम को जारी रखना होगा। आज ही नहीं पहले भी मीडिया पूंजीपतियों के हाथों में रहा है। ऐसी भी घटनाएं हैं जब मालिकों से अलग हटकर चलने पर संपादकों (बीसी वर्गीज और एचके दुआ) को सड़कों पर ही बर्खास्त किया जाता रहा है।  अखबार का मालिक अखबार चलाने के लिए कहां से पैसा लाता है, सम्पादक को इससे कोई मतलब नहीं होता।
आलोक मेहता, संपादक, नई दुनिया।

कॉरपोरेट जगत को माइनस करके अखबार और चैनल नहीं चलाए जा सकते। हमारे एक चैनल ने एक कॉरपोरेट घराने के खिलाफ कैम्पेन चलाई। इसके नतीजे में उस कॉरपोरेट ने हमारे सभी नेटवर्क के चैनलों से अपने विज्ञापन वापिस ले लिए।
राजदीप सरदेसाई,  सीएनएन-आईबीएन।

सरोकारों का संसार सिमट रहा है या फिर सरोकार ही बदल गए हैं ये कहना मुश्किल है लेकिन पेड न्यूज पर चर्चा करने वाले इन सभी पत्रकारों की बात से जो निष्कर्ष निकलता जान पड़ता है वो यही है कि पत्रकारिता को पूंजी के बिना देखना अंसभव हैं । ऐसे में भला मीडिया उन सत्ततर प्रतिशत लोगों की बात क्यों करे, जो रोजाना पन्द्रह से बीस रुपए रोज पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर हैं। उन्हें मरते हुए किसान विज्ञापन नहीं देते। इसलिए मीडिया को कॉरपोरेट जगत के हितों की बात करनी ही होगी। इसे उनकी मजबूरी भी कहा जा सकता है और मनमानी भी। फैसला आप पर है। आप क्या कहेंगे?

ब्ला ब्ला ब्ला... आखिर ये बला क्या है????
साल 2009 के अप्रैल-मई महीने में पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव हुए। इन चुनावों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए प्रेस काउंसिल की तरफ से सरकारी अधिकारियों और प्रेस दोनों के लिए गाइडलाइन्स तय कर दी गई थी। लेकिन चुनावों के दौरान इसकी अनदेखी हुई।  जिसके परिणाम में एक नया ट्रेंड देखने को मिला। चुनाव में खड़े प्रत्याशियों का अपने प्रचार के लिए मीडिया कंपनियों को पैसे देकर खबर छपवाने का ट्रेंड। ऐसी खूब खबरें छपी जिनमें खबर कहीं थी ही नहीं, खबर के रूप में पूरा इश्तिहार था। इस नए ट्रेंड को मशहूरी मिली  पेड न्यूज के नाम से। यानि पैसे लेकर प्रकाशित की जाने वाली खबर। ये बात पिछले साल की है, विरोध भी पिछले साल से ही शुरू हो गया था और आज तक हो रहा है।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

हो गई अनसुनी हर दुआ अब मेरी


गला सूख रहा है
लबों पर जो बातें हैं
उन्हें बोलने मे जुबां साथ नहीं दे पा रही
अचानक ही हुआ या
 धीरे-धीरे चूसा जा रहा था
कई दिनों से मेरे  जेहन की नमीं को
गले का सूखना
बातों का जुबां पर ही रुकना
ये प्यास काफी बड़ी लगती है।
ये जज्बात जो यूं जन्में हैं
इनकी जड़ें कहीं नजर नहीं आती।
जख्मों की टहनियां सी हैं बस
जिनसे मवाद रिस रहा है।
गहरे घाव और
दवा-दारु की खोई खिदमत नहीं
फिर अचानक दुआओं का अनसुना
हो जाना भी तय हो गया है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

नाम भर की आजादी के नाम बस कुछ शब्द

अगस्त का महीना आजादी का त्योहार। हर साल हर बार। तिरंगा, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत। बचपन में आजादी के दिवस का एक उद्देश्य स्कूल में मिलने वाले बूंदी के लड्डू थे। बड़े होकर ऐसा कोई उद्देश्य भी नहीं रहा। एक जानी-पहचानी बोरियत की गुलामी में ही कट जाया करता है आजादी का ये तथाकथित दिन।  कभी पिछले कुछ सालों से जब मन आजादी के मायने ढूंढने लगा है तो नजर पड़ जाती है उन जंजीरों पर जिनमें एक स्वाभाविकता के साथ हम सब, मैं, आप जकड़े हुए हैं। बोलते वक्त अगर इस शब्द को महसूस कर लिया जाये तो एक अजीब सा खालीपन हाथ लगता है। क्योंकि आजादी का अर्थ तो हमारे साथ है ही नहीं। कहीं। देश में दरारे पड़ रही हैं हर तरफ। कहीं विचारों में। कहीं व्यवहारों में और कहीं 63 साल पुरानी रंजिशें इस तरह ताजा हैं जैसे वक्त बीता ही नहीं। देश 63 साल पहले आजाद हुआ। खुशहाली और तरक्की के सपने देखे गए। तब सोचकर देखा होगा तो 63 साल बाद के भारत को बेहद खुबसूरत और उन्नत, बैर भाव से मुक्त पाया होगा लोगों ने। लेकिन आज पूरे नक्शे पर उकेरा जाए तो एक राज्य ऐसा नहीं मिलेगा जो किसी बड़ी समस्या से न जूझ रहा हो।
समाज में न जाने कितनी पीढिय़ा गई और नई आ गई लेकिन पुरानी बेडिय़ा आज तक नहीं हटी। कहीं बातों का हिस्सा हैं कहीं बहस का। समाज के ताने बाने भी कहां बदले। वही बात हुई कि घर की दीवारों पर नया रंग तो हो गया लेकिन घर की आबोहवा अब भी वैसी ही है।
अब हालात ऐसे लगते हैं कि इन पर कविता भी नहीं लिखी जाती। जी करता यूं कि छोड़ दे लिखना कविताएं। कम से कम कविता न लिखी जाए आजादी पर। न कहा जाए इस मौके को जश्न-ए-आजादी। न आजादी असलियत है फिजाओं की। न ही जश्न मनाएं जाने सरीखा मौका। जरा बैंठे कुछ देर हर रोज की तरह इस दिन भी। जैसे मंडली में गप्पे हांकने बैठ जाते है। और सोचें, विचारें, बात करें अपनी आजादी की। मिट्टी के चूल्हों से उठते धुएं से चिमनियों के धुएं निकलने तक के इस सफर में हम क्या कुछ नहीं खो चुके। उम्मीदों के जोश की मुठ्ठी भींचे क्या कुछ लिए आगे बढ़ें थे और आज क्या कुछ बचा है हाथ में। या फिर पूछो जरा खुद से कि क्या बचा है? आखिर बचा क्या है? दिखावे वाला कितना कुछ और देखा जा सकने वाला कुछ भी नहीं। अंग्रेंजों से आजादी की लड़ाई यों खत्म हुई कि आज अपना भी बस नहीं चलता खुद पर। नौकरियों में मालिक और मैनेजमेंट का जोर है तो बाकी जगह अपने अपने कैरेक्टर लिए हर शख्स टोकाटाकी को मुंह बांये खड़ा है। हम सब जगह गुलाम से हैं। फिर जब आजाद होने का मन करता है तो ये आजादी भी किसी और को गुलाम बनाकर हासिल की जा रही है। शायद वही एक जरिया रह गया। फूड चेन की तरह की एक प्रक्रिया पूरे जोरशोर से चल रही है। सब एक दूसरे को पकाकर खा जाना चाहते हैं। बहुत कुछ का जिक्र मुझे भा नहीं रहा क्योंकि इतना सा ही लिखकर घुटन होने लगी है। अब क्या लिखूं। फिर लिखने-पढऩे से भी डर लगने लगता है। लिखने की भी कहां आजादी है।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

बाइते का जाना और खबर का देर से आना

अपने व्यवहार और संस्कारों के ठीक उल्ट आज की पत्रकारिता से जुडऩे का नादान फैसला जब लिया था तब इस नादानी के पैमाने को मैं समझी नहीं थी। पढऩे, समझने और लिखने के बावजूद भी कुछ नादान सवाल गाहे-बगाहे मन में उठते रहते थे। ऐसा क्यों होता है, ये क्यों लिखा जाता है, वो तो कहीं छपा ही नहीं वगैर-वगैरह। मेरी मां जो सामाजिक शास्त्र की टीचर हैं, उनसे मैं अक्सर पूछा करती थी कि मम्मी असम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुुर, ये जो जगह हैं क्या यहां कभी कुछ नहीं होता। यहां की कोई खबर ही नहीं आती कभी। और फिर एक मासूम भ्रम मन में पाल लेती थी कि ये छोटे राज्य हैं। यहां सब कुछ ठीक ही रहता होगा। लेकिन आज अखबारों से जूझते हुए जब जनसत्ता के एक कॉलम पर नजर पड़ी तो मेरा भ्रम टूटा या कहूं कि चकनाचूर हुआ। क्योंकि टूटना तभी शुरू हो गया था जब पिछले दिनों मणिपुर में घट रही घटनाओं को हमारे अखबारों नें एक कॉलम की जगह दी और चैनलों ने शायद एक बुलेटिन में सिर्फ  शाॉट-बाईट ही चलाया। राहुल महाजन का उसकी दूसरी बीवी से झगड़ा और उसका विश्लेषण हमारे मीडिया और ऐसे मीडिया को टीआरपी देने वाले दर्शकों के लिए ज्यादा जरूरी था। मैं यहां दर्शकों का भी जिक्र कर रही हूं क्योंकि हमेशा सिर्फ मीडिया को ही कोसा जाता है लेकिन ऐसे घटिया स्तर के मीडिया को पालने-पोसने का काम तो ये दर्शक ही करते हैं न। जो देश के एक अहम हिस्से की घटनाओं को जानने में दिलचस्पी तक नहीं दिखाते और एक नाकुछ इंसान की शादी और तलाक को नजरे गड़ाकर देखते और कान खड़े करके सुनते हैं। खैर मीडिया भी मोटापा बढ़ाने वाली इस टीआरपी रूपी मलाई का मोह छोड़कर अपने दायित्वों को याद रखते हुए सेहतमंद दूध रूपी वास्तविक न्यूज दे तो शायद बेहतर हो। पर इस बीच जो बेहद दुख भरा लगा वो है इंफाल में दूरदर्शन के समाचार संपादक राबर्ट बाइते की मौत की खबर का मीडिया में उनके अंतिम सांस लिए जाने के 52 दिन बाद आना। अमिताभ बच्चन को अगर किसी सूदूर आईलैंड पर खांसी भी आ जाए तो बड़ी खबर हो जाती है। कुछ लोगों पर इतनी पैनी नजर और कुछ लोगों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिए जाना। कुछ शहरों में धूप निकलना भी खबर और कुछ राज्यों में तबाही मच जाना भी बात से नदारद। खबरों की दुनिया का ये विरोधाभास बेचैन कर देता है। सवाल सिर उठाते हैं और फिर जवाब कहीं देर से ही सही लेकिन छप सके किसी कॉलम में मिलते हैं। जैसे आज मिले और मैं लिखने की इस नाकाफी सी कोशिश को करने से खुद को रोक न सकी। और बाइते के संदभॆ में खास बात ये भी है कि वो खुद मीडिया से जुड़े थे न सिफॆ खानापूरती के लिए बल्कि उन परदों को उठाने के लिए जिनके पीछे से आता शोर तो सबको सुनाई देता है लेकिन कोई उन्हें उघाड़ कर ये देखने की कोशिश नहीं करता कि इस शोर की वजह क्या है। उनकी मौत से जो सन्नाटा पसरा है उसके बाद पीछे छूट गए उस शोर को सुनने का साहस अब कौन दिखाएगा? कब मीडिया में सरोकारों का दौर वापस आयेगा? कब?? ये सवालों का केवल एक सिरा है। पूरी की पूरी एक रस्सी पड़ी है जिसके दूसरे सिरे तक सिफॆ सवाल है सवाल।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

आंखों का एक कसूर


उजालों के दरम्यान क्या खूब बनाए थे ख्वाबगाह।
इल्म ही नहीं था
अंधेरों के कारवां में
एक दरगाह भी नहीं मिलेगी
मन्नत के लिए।।
न रहमत
न किस्मत
साथ।
जवाब भी नहीं मिल रहे
हर रास्ते पर खड़े हैं सवालात।।
फिर जिक्र इन सपनों का।
फिर जंग उस सच के साथ।।
सपनों वाली इन आंखों को क्या दिया मैंने??
लेकिन इन आंखों ने क्या न दिया मुझे??
सपने भी।
और आंसूओं का सैलाब
भी साथ।।
काश कि ये आंखे मेरी
हंसी पर भी
होंठो के साथ मुस्कुराती।
काश कि ये आंखें
सपनें न दिखाती।।
काश कि ये आंखे देख पाती
कुछ पूरे ख्वाब।
सुन पाती
आधूरे जज्बात।।
महसूस हो पाता इन्हें
उस टूटन का अहसास।।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

ब्लास्ट फरोम द पास्ट (1) - दोस्ती

दिल चाहता है हम न रहें कभी यारों के बिन, पुरानी जींंस और गिटार, यारों दोस्ती बड़ी हसीन है..दोस्ती से जुड़े ऐसे न जाने कितने गीत और फिल्में हैं जिनसे अपनी दोस्ती के दिनों की ताजगी को हम फिर से महसूस कर सकते हैं। ब्लास्ट फरोम द पास्ट में इस बार हम आपकों दोस्ती के ऐसे सफर पर ले चलते हैं जहां आपको ताजगी के साथ ही दोस्ती के मायनों की महक भी मिलेगी। पास्ट से इस बार का ब्लास्ट कर रही है 1964 में आई फिल्म दोस्ती। ये फिल्म न सिर्फ सिनेमा की सफलता के लिहाज से बेहतरीन रही बल्कि दोस्ती नाम के रिश्ते को भी इसने बखूबी बयां किया। राजश्री फिल्मस के बैनर तले बनी इस फिल्म के निर्देशक थे सत्येन बोस। दो दोस्तों के  किरदार को इस फिल्म में जीवंत बनाया अभिनेता सुशील कुमार और सुधीर कुमार ने। इस फिल्म से बहुत सी ऐसी खास बातें जुड़ी हैं जिन्हें जानकर आपको हैरानी होगी। ये बॉलीवुड की पहली ऐसी हिट फिल्म थी जिसमें कोई हिरोइन नहीं थी। फिल्म की कहानी का आधार था दोस्ती। ऐसी दोस्ती जो आजकल की हाय, हैलो वाली फ्रेंडशिप परंपरा से बिल्कुल अलग थी। कहानी के किरदार दो ऐसे दोस्त थे जो न सिर्फ  एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बनते हैं बल्कि एक दूसरे की शारीरिक कमियों को भी पूरा करते हैं। दरअसल इस कहानी में एक दोस्त की आंखों की रोशनी नहीं है और दूसरा पैरों से लाचार है। फिल्म के आखिरी सीन में उनकी दोस्ती की मिसाल को फिल्मांकन भी शानदार तरह से किया गया है। बरबस ही वो दृश्य जिसमें एक दोस्त दूसरे को अपने कंधे पर बिठाए बाढ़ से निकल रहा है और दूसरा उसे रास्ता दिखा रहा है दर्शकों को अपनी ओर न सिर्फ आकर्षित करता है बल्कि दोस्ती के इस दर्जे को सलाम करने पर भी मजबूर करता है। आजकल के दौर में जहां जितनी जल्दी 'दुआ सलाम' होता है उतनी ही जल्दी बात 'सलाम नमस्ते' तक भी पहुंच जाती है वहां दोस्ती का ये नजरिया फ्रेंडशिप डे के मौके पर किसी नजराने से कम नहीं है। दरअसल दोस्ती का रिश्ता तो आज भी उतना ही अहम है जितना हमेशा रहा है लेकिन बदलते दौर ने इसकी अहमियत को बहुत सी दूसरी चीजों से जोड़ दिया है। ऑरकुट, फेसबुक और टिवटर के युग में सिर्फ चटर-पटर ही बाकी रह गई दिखती है दोस्तों की चहल-पहल और दोस्ती की चहक अब बहुत लंबी नहीं होती। हालात बदलते जाते हैं, दोस्त भी और दोस्ती भी। लेकिन सेल्यूलाइड सिर्फ सपने नहीं दिखाती समाज के सच को दिखाती और बनाती भी है। इस समय का सच बेशक ये है कि दोस्ती टाइम पास रह गई है लेकिन उस वक्त की ये फिल्म आज भी इस खास रिश्ते की गहराई को दिलों में उतार सकती है। इस ब्लास्ट को इस बार फ्रेंडशिप के बूम में बदल कर क्यूं न दोस्ती का नया बेस बनाया जाए।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बारिश की शोख अदाएं अब सिर्फ सुर्खियां

 बारिश की वो शोखियां सड़कों के ट्रैफिक और नालों से बाहर आते पानी के बीच कहीं खो गई हैं। इन्हें ढूंढने का वक्त किसी के पास नहीं है क्योंकि हर कोई जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता है। और घर पहुंच कर पहला वाक्य निकलता है आफत आ जाती है बारिश में। पता नहीं कब जाएगी ये बारिश। और यहां हम सोचते हैं कि  मेघा बरसते ही रहें। बूंदे झरती ही रहे। और मिट्टी से वो सौंधी महक आती ही रहे हमेशा। चारो पहर।
                                        

बारिश...इस शब्द के होठों पर आते ही रुमानियत का जो अहसास दम भरने लगता है उसमें खुशी और ग़म दोनो रंग होते है। मौसम की पहली बारिश जाने क्या कुछ समेट लाती है अपने साथ। कुछ बीती बातें कुछ मीठी यादें या फिर एक नई याद कुछ नए जज्बात। साफ-सुथरे मौसम का यूं सीला सा हो जाना और सूखे से पत्तों का यूं गीला सा हो जाना।  एक बारिश और दो दृश्य।  एक के  बाद अगला। पहले बादलों की साजिश और बूंदो का झरना और फिर गीले से उन पत्तों से बूंदो का टपकना।  सोचती हूं तमाम लोगों को यूं अपनी ही दुनिया में मग्न कर देना भी तो कहीं आकाश की कोई चाल नही। चुपके से वो जो कहना चाहता है धरती से उसमें शायद उसे किसी का दखल पसंद नही है इसलिए ऐसा समां बांधता है कि हर कोई अपने ही मिलन और जुदाई के जोड़-घटा, गुणा-भाग में उलझ जाता है। हालांकि बारिश के बारे में काफी कुछ कहा जा सकता है और इसमें फीलिंगस आर मोर एंड वर्डस आर फ्यू वाली स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन बादल, बिजली,घटाएं और बारिश के अलावा कहने और सहने वाली बात ये है कि बेसब्री से जिस बारिश का हम इंतजार करते हैं जिसके बरसने से जेहन और जिंदगी में इतना कुछ घटित होने लगता है उसकी टीआरपी और ब्रांडिंग पर अव्यवस्थाओं का ऐसा असर होता है कि बारिश से लोग घबराने लगे हैं, कतराने लगे हैं। शायद भारत ही एक ऐसा देश है जहां बारिश सिर्फ आसमान से पानी गिरना भर नहीं है। उत्सव, गीत, कथाएं, हरियाली बहुत से पहलू यहां बारिश से जुड़ते हैं। कभी बारिश की भी अपनी शोखियां थी लेकिन अब बारिश सिर्फ अखबारों और चैनलों की सुर्खियां हैं। यहां बारिश आने से इतने लोगों की मौत और यहां बारिश से बाढ़ का खतरा।                                  

बुधवार, 21 जुलाई 2010

मैनेजमेंट कला के फेर में बेचारा दिन और बेचैन रातें

मेरी शक्ल पर कुछ मुरझाए बादल और माथे पर टेड़ी-मेड़ी घटाएं देखकर एक दिन यूं ही मुझसे कहा गया था चीजों को मैनेज करना सीखो। चीजे मसलन,  सुख और दुख का मैनेजमेंट।  हंसी और आसूंओं का मैनेजमेंट।  इच्छाओं और कुंठाओं का मैनेजमेंट। प्रेम और नफरत का मैनेजमेंट।   शरीर और आत्मा का  मैनेजमेंट। 
 बेचारा दिन और बेचैन रातें
ये हंसी इसके सामने नहीं। इस इच्छा को यहीं अभी मार दो। इससे प्रेम करना अच्छा है और इससे सिर्फ दोस्ती रखो जब तक कि तुम्हे जरूरत है। शरीर की फिक्र करो अब आत्मा को कोई नहीं पूछता। गोया आत्मा कोई शादी कर चुकी अभिनेत्री हो। और प्रेम या नफरत कोई नहाने का साबुन जिसे कोई खूशबू के लिए खरीद रहा है तो कोई रंग गोरा करने के लिए। खैर, चीजों को मैंनेज करने के इस सुझाव पर अंदरखाने तो मैंने बहुत शोर मचाया लेकिन  बाहर से पड़ रहे बदलाव के दबाव ने मुझे बिना इतलाह के ही बदलना शुरू कर दिया है। जहां एक बड़ी चिल्लाहट दर्ज कर सकती थी अब वहीं एक गहरी खामोशी को इस तरह ओड़ लेती हूं जैसे शब्दों से ही अनजान हूं मैं। और इस खामोशी के बाद खुद से खफा भी हो जाती हूं। दरअसल दुनियावी होने में मुझे भी गुरेज नहीं लेकिन aमैं मायावी नहीं होना चाहती। सवालों का एक झंझावत सा मन में शोर मचा रहा है और मेेरे पास उन सवालों को दबा देने की मजबूरी के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। हर गहराती रात के साथ ये सवाल मुझे मुझसे मिलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन दिन की रोशनी में मेरी आंखे ऐसे चौंधिया जाती है कि फिर इन सवालों के जिक्र से भी कोफ्त होने लगती है। इस बदलाव के बाद क्या कुछ बचा रह जाएगा। सिवाए रात को सोने और दिन को खोने के। या फिर रात भी बेचैन रहेगी और दिन भी बेचारा सा। 

रविवार, 18 जुलाई 2010

जाति संग सब सून

जीने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है
पानी या शराब?
रोटी या कबाब?
पैसा या व्यापार?
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जाति या समाज?
नही जानती कि जाति के मामले में मेरी जानकारी का स्तर क्या है? मैंने वर्णव्यवस्था को कितना समझा है? मैं समाज के विभिन्न धर्मो और वर्गो के बारे में कितना जानती हूं? लेकिन इसके बावजूद भी ये सब कुछ ठीक से न समझने को कहीं न कहीं मैं अपना सौभाग्य मानती हूं। ये आधा-अधूरा ज्ञान मुझे पूरा हक देता है हर किसी से बात करने का, हर किसी के साथ खाना खाने का और वो सब कुछ करने का जो समाज में रहते हुए आम व्यवहार में हम एक दूसरे के साथ करते हैं। काश कि कोई भी न जानता होता इस वर्ण व्यवस्था के बारे में । इस बारे में कि फलाना इंसान दलित है और फलाना ऊंची जाति का है। ये एक निरी कल्पना है जिसका साकार होना निरा मुश्किल भी है। लेकिन जाति के नाम पर जो कुछ समाज में होता आया है और हो रहा है उसकी कल्पना करना भी तो निहायत कठिन है। कल की ही खबर है कि उत्तर प्रदेश के कन्नौज में मीड डे मील में दलित महिला के खाना बनाने को लेकर वहां के लोगों ने हंगामा किया। और अब फिर वही सवाल कि जीने के लिए जाति ज्यादा जरुरी है या बराबरी का समाज। ये जात वो बिरादरी। इसके साथ खाना ,उसके साथ मत घूमना। इसका झूठा मत खाना, उसके बर्तन भी मत छूना। अपने आस-पास के लोगों से हर वक्त इस तरह की दूरियां बनाने में न जाने कितना दिमाग और वक्त खर्च कर देते हैं लोग। कहने को भारतीय संस्कृति बहुत कुछ है लेकिन दूसरा सच ये है कि आज हम सभ्यता के उस मुहाने पर खड़े हैं जहां जाति गालियों में शुमार एक ऐसा दस्तावेज है जिसकी परते जब खुलती हैं तो इसंान का अस्तित्व ही मैला नजर आता है। अबे चमार कहीं के, अरे वो तो ब्राहम्ण कुल का है। जाति सूचक ये शब्द इस तरह इंसान का दर्जा तय कर देते हैं कि एक तबका तो जाति के बोझ तले ही दब जाता है और दूसरा जाति की छत्रछाया में अपने महल बना लेता है। छठवीं शताब्दी में उपजी समूह व्यवस्था ने जाति को सामाजिक संरचना से लेकर आर्थिक और राजनीतिक हर स्तर पर एक मुख्य पहचान और पुख्ता हथियार बना दिया। परिणाम हमारे सामने है अनेकता में एकता वाला भारत टूट रहा है और बिखर रहा है। एक इमारत में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों से लेकर एक प्रदेश में जीवन यापन करने वाले अलग-अलग जातियों के लोगों में आपस में दिली तौैर पर इतनी दूरियां पैदा कर दी गई हैं कि लोग अपनी जाति पर आधारित एक अलग प्रदेश चाहते हैं। समाज में पैठी ये दूरियां सत्ता में बैठे लोगों के लिए भी एक हथियार बन चुकी हैं। जाति बनाने वाले बनाकर चले गए शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि आने वाली पीढिय़ां इस बनावट को इतनी शिद्दत से निभाएंगी। लेकिन अब इस पीढ़ी को ये प्रथा तोडऩी होगी, बरसों पुरानी शिद्दत को तिलांजलि देनी होगी, छोडऩा होगा एक ऐसे बंधन को जो सिर्फ एक हथकड़ी है हमारे और आपके बीच में। छठवी शताब्दी की शुरूआत को भूलकर एक ऐसा प्रारंभ इक्कीसवी सदी में करना होगा जिससे ये सारे भेद मिट जाए। जाति का वो पिरामिड जिसमें सबसे ऊपर के माले पर ब्राहम्ण का सिंहासन है और दलित की झोपड़ी जमीन में धंसी हुई है, उस पिरामिड की व्यवस्था और विचारधारा को बदलना बहुत जरुरी है।
ये सब लिख्रते हुए मैं इस बात से भी पूरा सरोकार रखती हूं कि भारतीय समाज की व्यवस्था में जाति गहरे पैठी हुई है इसका त्याग करना इतना आसान नही होगा उन लोगों के लिए जिन्होंने तथाकथित नीच जाति के लोगों से कभी बात करना भी गंवारा नहीं किया लेकिन अगर वही लोग घर में भात की जगह मैगी को दे सकते हैं तो विचारधारा का ये बदलाव भी लाजंमी है जिससे जिंदगी की वास्तविक नफासत वापस आ सकती है।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

पत्रकार प्रहार और प्रतिरोध


मीडिया में तमाम विषयों को लेकर जितनी चर्चा होती है खुद मीडिया भी उतना ही चर्चित विषय है। लोकतंत्र का ऐसा चौथा स्तंभ है जिसे उखाडऩे के लिए तमाम प्रयास किए जाते हैं बिना ये सोचे कि इसके हटने पर जो छत गिरेगी उसमें कोई भी दब सकता है। प्रेस, प्रहार और प्रतिरोध की चिंगारियां गाहे-बगाहे भड़कती ही रहती है। सवाल उठते हैं कि क्या मीडिया को किसी लक्ष्मण रेखा की जरुरत है? क्या मीडिया के लिए भी कुछ सख्त मापदंड बनाए जाने चाहिए? इसी तरह के कई सवालों के बीच ये धुंधली तस्वीर उभरती है उस शख्स की जिसे पत्रकार कहा जाता है, जो मीडिया नामक संस्था का प्रहरी होता है। मीडिया की आजादी पर उठने वाले सवालों से इतर अब इतफाकन या प्रायोजित तरीके से एक पत्रकार की आजादी पर हमला किया जाने लगा है। सरकार और गैरकानूनी साजिश रचने वाले दोनों ही पत्रकार पर दबाव बनाते हैं और इन दबावों के बीच वह पत्रकार अपनी जगह किस तरह बनाए ये उसके लिए एक बड़ी चुनौती हो जाता है। सच को सामने लाने के लिए निकले पत्रकार पर हमले के कई हालिया संस्करण हैं जिन्होंने इस विषय को यहां सूचीबद्घ किया है।


मणिपुर के पत्रकार पिछले दिनो हड़ताल पर रहे और वहां दो दिनों तक कोई अखबार नहीं छपा। वजह थी कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी  से जुड़े आतंकवादी पत्रकारों को उनके खिलाफ खबर छापने पर जान से मारने की धमकी देते हैं। पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर में कम से कम 25 पत्रकारों की हत्या हुई और 30 से अधिक को आतंकवादियों को मदद देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। मणिपुर जैसे कई राज्यों में आतंकवादियों ने मीडिया को वास्तव में बंधक बना लिया है। असम में 20 और मणिपुर में पांच पत्रकारों की हत्या हुई, लेकिन किसी को भी इस संबंध में गिरफ्तार नहीं किया गया. आतंकवादियों के साथ ही राज्य प्रशासन भी मीडिया का उत्पीडऩ करता है।
महाराष्ट्र में 5 जुलाई को भारत बंद के दौरान नागपुर के वेरायटी चौक पर कवरेज के लिए गए मीडियाकर्मियों पर भी पुलिस द्वारा लाठीचार्ज  किया गया। 
लखनऊ में क्वीन्स ूबेटन की कवरेज में गए पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी की गई। लाइव कवरेज करने वाले पत्रकारों को रोका गया और जब पत्रकारों ने विरोध किया तो अधिकारियों ने अफरातफरी का माहौल बनाते हुए कई पत्रकारों को जबरिया पुलिस के वाहनों में बैठा लिया। इसके बाद यहां से करीब एक दर्जन पत्रकारों को बलपूर्वक वाहन मे ठूंसकर मोहनलालगंज थाने को भेज दिया गया। इसके अलावा बेटन के साथ चल रहे लोगों को भी चौराहे पर घण्टों धूप व उमस भरी गर्मी में रोके रखा गया।
नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज के साथ हाल ही में नंदीग्राम पुलिस ने ऐसा बरताव किया जैसे वह कोई आतंकवादी हों।
कश्मीर में जिस तरह से स्थानीय पत्रकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है उससे भी तमाम लोग वाकिफ हैं।
पत्रकार के प्रतिकार का एक छोटा सा हालिया नमूना ये भी है
सिरसा और फतेहाबाद में बाढग़्रस्त, इलाकों का जायजा लेने पहुंचे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा एक पत्रकार के सवाल पर बुरी तरह झल्ला गए और उसे पत्रकार काांफ्रेस से बाहर निकल जाने का हुक्म सुना दिया। पत्रकार ने मुख्यमंत्री हुड्डा से पूछा था कि केंद्र सरकार ने बाढ़ से बचाव के लिए हरयिाणा को 75 करोड़ रूपए दिए हैं, लेकिन अकेले रोहतक को ही 23 करोड़ रूपए क्यों दे दिए गए। राज्य के बाकी जिलों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों। पत्रकार का यह सवाल हुड्डा का नागवार लगा और उन्होंन झल्लाते हुए पहले तो उससे उसके अखबार का नाम पूछा और बाद में उसे बाहर निकल जाने कह दिया। ज्ञात रहे मुख्यमंत्री हुड्डा रोहतक से ताल्लुक रखते हैं।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

एक साल और बीत गया ( जन्मदिन पर )


एक साल और बीत गया
एक तारीख के साथ
वक्त न जाने कितना कुछ जीत गया
मेरे पास जो बाकी रहा
वो हैं कुछ बीते लम्हों की तस्वीर बस
नहीं जानती उमर ही बीती या फिर
बहुत कुछ रीस गया
मासूमियत, मतवालापन और मिट्टी की वो सौंधीं महक
जिसके साथ मन
आकाश हो जाता है
चुनर का वो धानी रंग
जिसे गुलाबी करने के बारे में
उमर के इस बरस से सोचा जाता है
मन में हर बार जश्न होता है इस दिन पर
पर हर बार जश्न से मन खुश नहीं हो पाता है
न जाने ये मन कितनी खुशियां चाहता है
किसी तारीख को ऐसा नहीं होता
पर इस तारीख पर ही क्यों
तमन्नाओं का आंचल दूर तक लहरा आता है
दुआएं,  उपहार और आशीरवाद
काफी नहीं है क्या
जाने ये मन और क्या चाहता है
बुहत कुछ बदला बदला है इस तारीख पर
मेरे कपड़ो का रंग कुछ नया है
फोन बार बार बज रहा है
दिल न जाने किससे मिला है
पर हाथ कई लोगों से मिल रहा है
मिल बांट यू भी कई बार मुंह झूठा किया है
पर आज उत्सव का माहौल बन रहा है
 भीड़ भरे इस माहौल में भी
मन मेरा तन्हा ही भटक रहा है
कुछ सपनों को पूरा करने की ख्वाहिश में
कुछ अपनों को अपना करने की ख्वाहिश में
ये तारीख तो हर साल आयेगी
काश कि कुछ ऐसा हो
साल की हर तारीख मुकम्मल हो जाए
और इस तारीख पर
मेरा मन भी
मेरे जन्म का जश्न मनाएं




सोमवार, 12 जुलाई 2010

एक अभागी लड़की ....(पुरस्कृत कविता)



बच्ची से बड़ी होती है वो
सीखती है घर के काम-काज
रोटियां बेलना
तवे पे डालना
तरकारी छीलना
पकाना 
अक्सर
ऊँगली जल जाती है
कट जाती है
पर बात
आग और चाकू से आगे  निकलकर
उसके ग्रहों की चाल पर चल जाती है

छत पर सूखते कपड़ों में
जब सब लत्ते रहते है अपनी जगह पर
और बस उसकी ही चुनरी उड़ जाती है
तो बात हवा के झोंको और तेज आंधी
को छोड
उसके  नसीब के पन्नो को पलट आती है

वो भी बढाती है  कदम आगे
फांसला  कम भी हो जाता है मंजिलों का
मगर जब उसके  ही रस्ते में हरे भरे बूढ़े हो चुके
किसी पेड़ की शाख गिर जाती है तो
ये बात किसी प्रख्यात  पंडित 
तक पहुँच जाती है

सोलह, सात और एक सौ आठ 
हर संख्या के उपवास रख चुकी है वो 
अपनी पहुँच से पैर बाहर निकालकर 
न जाने कितने मंदिरों की सीडियां 
चढ़ चुकी है वो 
मगर जब उसकी ही मन्नत अधूरी रह जाती है 
तो बात भगवान् के कच्चे कानो का नजर अंदाज  कर 
उसके कर्मों को कोस आती है

मौसम  बदलते है हर बरस
मगर जब पतझड़ ही बस
उसके  आँगन में रुक जाता है तो
बात मौसम से बदलकर
 मुक़दर की तरफ मुड़ जाती है

फिर जब कभी किसी  दिन सखियों के बीच
जिक्र  होता है
उसकी प्रेम कहानी का तो
दिल की देहलीज से निकलकर
बात  उसके हाथ की लकीरों तक पहुँच जाती है

एक लड़की 
जब लड़की होने के साथ 
एक अभागी लड़की बन जाती है 
तब जिंदगी के सारे धागों में जैसे कोई 
गिरह  पड़
जाती है........
न कोई अदालत 

न वकील 
न सबूत 
न गवाह
मुक़द्दर के इस मुक़दमे की सुनवाई 
में हर बार होता है एक एतिहासिक फैंसला 
और फिर
जीते जी मरने की सजा सुनाई जाती है


मंगलवार, 6 जुलाई 2010

कार्य प्रगति पर है ......!

   प्रधानमंत्री  
    उवाच.
      .... 

    भोपाल गैस त्रासदी मामले में सरकार कुछ नहीं छिपा रही है। एंडरसन की सुरक्षित रिहाई संबंधी दस्तावेज अब उपलब्ध नहीं हैं। मेरा मानना है कि जीओएम ने इस संबंध में तमाम कागजात देखे हैं, लेकिन उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे बिल्कुल स्पष्ट रूप से पता लगता कि रिहाई का जिम्मेदार कौन था?

27 जून 2010



                पेट्रोलियम पदार्थो की बढ़ाई कीमतों में रोल बैक नहीं होगा। पेट्रोल की तरह अब डीजल की कीमतों को भी सरकार के नियंत्रण से मुक्त किया जाएगा। ऐसा करना बहुत जरूरी है। सरकार पर मूल्य वृद्धि के लिए किसी तरह का कोई बाहरी दबाव नहीं था। केरोसिन तेल और रसोई गैस पर सब्सिडी उस स्तर पर पहुंच गई थी, जिसमें सुधार निहायत जरूरी हो गया था।

28 जून 2010 




                1984 के सिख विरोधी दंगे नहीं होने चाहिए थे। मैं देश से माफ़ी माँग चुका हूं। पीडि़तों के जख्मों को भरने के लिए हरसंभव क़दम उठाए जाएंगे। अब हमें इससे आगे बढऩे की ज़रूरत है।  लगातार 1984 के दंगों को याद करते रहने से सोच पर असर पड़ता है


29 जून 2010


                हमारी न्याय प्रक्रिया में वक्त ज्यादा लगता है। इसीलिए भोपाल गैस त्रासदी के अदालती फैसले में करीब 25 साल लग गए। यह हमारी न्यायपालिका की सबसे बड़ी समस्या है।Ó सिंह ने कहा, '1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में भी न्याय तंत्र से चूक हुई है। जिम्मेदार लोगों को सजा जरूर मिलनी चाहिए। सरकार न्याय तंत्र की इन खामियों को दूर करने के प्रयास कर रही है।

29 जून 2010





 माननीय प्रधानमंत्री जी के ये शब्द भविष्य की सारी उम्मीदों को ठेठ हिंदुस्तानी अंदाज में मरहम लगा रहे हैं।  ऐसा लगता हैं मानो कह रहे हों जो हुआ उसे भूल जाओ, जो हो रहा है वह हमारी मजबूरी है, और हम अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।  ऐसे समय में जब पूरे देश की जनता मंहगाई की महामारी से जूझ रही है, सत्ता के गलियारों में जनता की सुध कम और स्वार्थ सिद्घी का शोर अधिक सुनाई दे रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश के हर कोने से व्यवस्था के चरमराने की आवाजें आ रही हैं, प्रधानमंत्री इस बयानबाजी से अपना बचाव कर रहे हैं या जनता को बेवकूफ बनाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं?


 कश्मीर में बढ़ती हिंसा, पश्चिम बंगाल, छतीसगढ़, झारखण्ड में लगातार हो रहे माओवादी हमले, मणिपुुर में अलगाव से पनप रहा उग्रवाद, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र , कर्नाटक और उड़ीसा में किसानों की आत्महत्या और बदहाली के बढ़ते मामलों के अलावा, इस समय देश के हर राज्य में किसी न किसी तरह का संघर्ष दम भर रहा है। गौर करने की बात ये है कि संघर्ष की वजह वर्षो पुरानी हैं और उनके समाधान के नाम पर आज भी 'कार्य प्रगति पर हैÓ सरीखी मीठी गोलियां दी जा रही हैं। पिछले दिनों लगातार हो रहे नक्सली हमलों में अब तक 175 जवान मारे जा चुके हैं और न जाने कितनी निर्दोष जाने गई हैं लेकिन 'सरकार कार्यवाही कर रही हैÓ और 'नक्सलवाद देश की सबसे बड़ी समस्या हैÓ के बयान के अलावा अब तक कोई कदम नहीं उठाया जा सका। भोपाल की गैस त्रासदी जो पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है उस पर 25 साल बाद किस तरह का मरम लगाया गया है ये भी सभी देख रहे हैं। जिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर तीन हज़ार लोग मारे गए थे और मौतों का ये सिलसिला बरसों चलता रहा अब उसी सरकार ने ये बयान दिया है कि उस दोषी के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं मिल पाया जिसके दोषी होने की गवाही हर वो जख्म दे रहा है जो आज 25 साल बाद भी ताजा है। 1984 में हुए सिख विरोधी दंगे जो बेगुनाह लोगों की मौत और विध्वंस का सबब बन गये थे। जिनमें दस हज़ार से भी अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भी केवल दिल्ली में ही 2733 लोगों को मार डाला गया था। देश की राजधानी में तीन दिनों तक चले इस ख़ूनी खेल में तब पुलिस और प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और सबसे हैरान करने वाली बात कि आज 25 साल बाद भी इस घटना को अंजाम देनेवाले और उनके राजनीतिक संरक्षकों में से 99.9 प्रतिशत सज़ा से साफ बच गए हैं। ऐसे में खुद एक सिख होते हुए प्रधानमंत्री इन बातों को भूल कर आगे बढऩे की सलाह दे रहे हैं, जैसे ये कोई सच्ची घटना नहीं महज एक बुरा ख्वाब हो। मंदी में आई बेरोजगारी से अभी जनता उबरी नहीं थी कि उसे मंहगाई के बोझ ने मार दिया। बोझ भी ऐसा जो हर हफ्ते की दर से बढ़ता ही जा रहा है। पहले खाने का सामान मंहगा हुआ और अब बनाने का साधन। जनता जवाब मांगे तो एक ऐसा बयान दिया जाता है जिससे लोकतंत्र में तानाशाही होने की बू आने लगती है। देश ने चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से बहुत लड़ाईयां लड़ ली हैं और बहुत से संधि-समझौतों पर भी हस्ताक्षर हो चुके हैं लेकिन पानी को लेकर जो संग्राम छिडऩे वाला है वो शायद पानीपत की लड़ाई से भी ज्यादा खतरनाक होगा। मुद्दे कई है कुछ बहुत जोर-शोर से उठाए जा रहे है कुछ सतही स्तर पर हल्ला बोल रहे हैं, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश के कर्ता-धर्ता इस अवसर पर जो बोल रहे हैं क्या उससे समस्याओं के निदान का कोई सुराग मिलता है?