बुधवार, 25 अगस्त 2010

कैसे हो हल 'हिमानी' ??





जुनून को किनारा मिल जाता तो
जिंदगी को सहारा बनाता कौन ??
 
हम भी राहों में तुम भी दूर मंजिल से
कोई एक भी अगर कुछ पा जाता तो
एक दूजे को फिर रास्ता बताता कौन ??
 
कहने को है ढेर सारा गम इकट्ठा
इस दिल में
सुनने बैठ जाता गर कोई
तो फिर तन्हाई मे तकिए तले
बुझे हुए मन की लौ जलाता कौन ??
 
कागज, कलम हाथ में
शब्दों का एक सिलसिलां हमेशा साथ में
हर बार ही बन जाती उम्दा गजल तो
फिर गैरों की शायरी को सीने से लगाता कौन ??
 
यहां कुछ कहना मना है
वहां सुननें में सुकून नहीं मिलता दोस्तों को
गर आसान होती कहा-सुनी इतनी तो
किसी को दुश्मन बनाता कौन ??
 
जब हिज्र बनने लगी है हकीकत
तो सारे ख्वाब अब हिजाब में हैं
हर आरजू का पूरा होना मुनासिब नहीं
सब मान ही जाता खुदा तो
मन्नतें मनाता कौन ??
 
वो इब्तिदा और ये इंतहा
इस बीच एक मैं अकेली सी पहेली
कैसे हो हल  'हिमानी'  ??

 सवालों का ये काफिला टूट जाता गर
तो फिर जवाबों का मोल चुकाता कौन ??



शनिवार, 21 अगस्त 2010

पेड न्यूज - पत्रकारिता के फूल पर मंडराता भंवरा

फूल की महक और खुबसूरती की बात हो तो भंवरे का जिक्र भी आ ही जाता है। हाल-ए-पत्रकारिता भी कुछ ऐसा ही हो गया है। इसके आकार और सरोकार की चाशनी पर मंडराते पेड न्यूज रुपी भँवरे की मेहरबानी के चलते पत्रकारिता में मुद्दों की चर्चा के बजाए आजकल पत्रकारिता स्वयं में एक चर्चित विषय हो गया है। ताजा बात से शुरु करते हैं।
हाल ही में बिहार और झारखंड के पत्रकारों ने पेड न्यूज को रोकने की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप करने की गरज से एंटी पेड न्यूज फोरम का गठन किया है। ये संगठन पेड न्यूज के कारोबार पर नजर रखेगा और इस तरह की तमाम गतिविधियों को लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करेगा। संगठन में कोई भी पद नहीं रखा गया है। केवल एक कोर कमेटी होगी, जो सबसे सलाह-मशवरा करके काम करेगी। इस महीने की 28 तारीख को इस फोरम के तहत सम्मेलन भी किया जाएगा। इस सम्मेलन में देश के ऐसे पत्रकार भी शिरकत करेंगे जो पेड न्यूज की प्रणाली को पत्रकारिता पर कलंक मानते हैं।
अब से कुछ दिन पहले भी पत्रकारिता की पनाह में पलते पेड न्यूज की अवैध संपति पर हो हल्ला हुआ था। मौका था रामनाथ गोयनका अवार्ड समारोह। चर्चा हुई। पत्रकारों ने एक सुर में पेड न्यूज को पत्रकारिता के लिए घातक करार दिया। और फिर सब अपने-अपने घर लौट गए। पेड न्यूज जहां थी वहीं रही। ये बात भी ध्यान देने की है कि  प्रेस परिषद ने पेड न्यूज की जांच के लिए कमेटी भी गठित की थी जिसकी रिपोर्ट इसी वर्ष 26 अप्रैल को आनी थी लेकिन वह भी अब तक नहीं आई है। जब से यह मुद्दा उठा है तब से पत्रकार और मीडिया टाइकून अलग-अलग अवसरों पर इस विषय पर अपनी राय देते रहे हैं।

इसकी एक बानगी मैंने तमाम अवसरों पर दिए गए कुछ बयानों को खोज बीन कर तैयार की है-

पेड न्यूज सिर्फ वही नहीं, जो पैसे लेकर छापी जाती है। किसी विचारधारा के तहत लिखी गयी खबर भी पेड न्यूज जितनी ही गलत है।
आशुतोष,  मैनेजिंग एडीटर, आईबीनएन-7।

खराब अखबार निकालने का दोष मालिकों पर मढऩा ठीक नहीं है। पत्रकारों को ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिससे पाठकों में उसकी इमेज खराब हो। किसी भी कानून से ज्यादा जनता और पाठक की नजर हालात को सही करने में अपनी भूमिका निभा सकती है। कानून बन जाएगा तो पेड न्यूज का सिलसिला दूसरे रास्तों से शुरु हो जाएगा।
श्रवण गर्ग, दैनिक भास्कर।

मीडिया पर हमेशा से दबाव रहा है। जब हमने नवभारत टाइम्स में पशुपालन घोटाला की खबर छापी तो लालू यादव ने हमारे ऑफिस में आग लगवा दी थी। हमारा काम खबर छापना है, हमें हर हाल में इस काम को जारी रखना होगा। आज ही नहीं पहले भी मीडिया पूंजीपतियों के हाथों में रहा है। ऐसी भी घटनाएं हैं जब मालिकों से अलग हटकर चलने पर संपादकों (बीसी वर्गीज और एचके दुआ) को सड़कों पर ही बर्खास्त किया जाता रहा है।  अखबार का मालिक अखबार चलाने के लिए कहां से पैसा लाता है, सम्पादक को इससे कोई मतलब नहीं होता।
आलोक मेहता, संपादक, नई दुनिया।

कॉरपोरेट जगत को माइनस करके अखबार और चैनल नहीं चलाए जा सकते। हमारे एक चैनल ने एक कॉरपोरेट घराने के खिलाफ कैम्पेन चलाई। इसके नतीजे में उस कॉरपोरेट ने हमारे सभी नेटवर्क के चैनलों से अपने विज्ञापन वापिस ले लिए।
राजदीप सरदेसाई,  सीएनएन-आईबीएन।

सरोकारों का संसार सिमट रहा है या फिर सरोकार ही बदल गए हैं ये कहना मुश्किल है लेकिन पेड न्यूज पर चर्चा करने वाले इन सभी पत्रकारों की बात से जो निष्कर्ष निकलता जान पड़ता है वो यही है कि पत्रकारिता को पूंजी के बिना देखना अंसभव हैं । ऐसे में भला मीडिया उन सत्ततर प्रतिशत लोगों की बात क्यों करे, जो रोजाना पन्द्रह से बीस रुपए रोज पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर हैं। उन्हें मरते हुए किसान विज्ञापन नहीं देते। इसलिए मीडिया को कॉरपोरेट जगत के हितों की बात करनी ही होगी। इसे उनकी मजबूरी भी कहा जा सकता है और मनमानी भी। फैसला आप पर है। आप क्या कहेंगे?

ब्ला ब्ला ब्ला... आखिर ये बला क्या है????
साल 2009 के अप्रैल-मई महीने में पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव हुए। इन चुनावों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए प्रेस काउंसिल की तरफ से सरकारी अधिकारियों और प्रेस दोनों के लिए गाइडलाइन्स तय कर दी गई थी। लेकिन चुनावों के दौरान इसकी अनदेखी हुई।  जिसके परिणाम में एक नया ट्रेंड देखने को मिला। चुनाव में खड़े प्रत्याशियों का अपने प्रचार के लिए मीडिया कंपनियों को पैसे देकर खबर छपवाने का ट्रेंड। ऐसी खूब खबरें छपी जिनमें खबर कहीं थी ही नहीं, खबर के रूप में पूरा इश्तिहार था। इस नए ट्रेंड को मशहूरी मिली  पेड न्यूज के नाम से। यानि पैसे लेकर प्रकाशित की जाने वाली खबर। ये बात पिछले साल की है, विरोध भी पिछले साल से ही शुरू हो गया था और आज तक हो रहा है।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

हो गई अनसुनी हर दुआ अब मेरी


गला सूख रहा है
लबों पर जो बातें हैं
उन्हें बोलने मे जुबां साथ नहीं दे पा रही
अचानक ही हुआ या
 धीरे-धीरे चूसा जा रहा था
कई दिनों से मेरे  जेहन की नमीं को
गले का सूखना
बातों का जुबां पर ही रुकना
ये प्यास काफी बड़ी लगती है।
ये जज्बात जो यूं जन्में हैं
इनकी जड़ें कहीं नजर नहीं आती।
जख्मों की टहनियां सी हैं बस
जिनसे मवाद रिस रहा है।
गहरे घाव और
दवा-दारु की खोई खिदमत नहीं
फिर अचानक दुआओं का अनसुना
हो जाना भी तय हो गया है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

नाम भर की आजादी के नाम बस कुछ शब्द

अगस्त का महीना आजादी का त्योहार। हर साल हर बार। तिरंगा, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत। बचपन में आजादी के दिवस का एक उद्देश्य स्कूल में मिलने वाले बूंदी के लड्डू थे। बड़े होकर ऐसा कोई उद्देश्य भी नहीं रहा। एक जानी-पहचानी बोरियत की गुलामी में ही कट जाया करता है आजादी का ये तथाकथित दिन।  कभी पिछले कुछ सालों से जब मन आजादी के मायने ढूंढने लगा है तो नजर पड़ जाती है उन जंजीरों पर जिनमें एक स्वाभाविकता के साथ हम सब, मैं, आप जकड़े हुए हैं। बोलते वक्त अगर इस शब्द को महसूस कर लिया जाये तो एक अजीब सा खालीपन हाथ लगता है। क्योंकि आजादी का अर्थ तो हमारे साथ है ही नहीं। कहीं। देश में दरारे पड़ रही हैं हर तरफ। कहीं विचारों में। कहीं व्यवहारों में और कहीं 63 साल पुरानी रंजिशें इस तरह ताजा हैं जैसे वक्त बीता ही नहीं। देश 63 साल पहले आजाद हुआ। खुशहाली और तरक्की के सपने देखे गए। तब सोचकर देखा होगा तो 63 साल बाद के भारत को बेहद खुबसूरत और उन्नत, बैर भाव से मुक्त पाया होगा लोगों ने। लेकिन आज पूरे नक्शे पर उकेरा जाए तो एक राज्य ऐसा नहीं मिलेगा जो किसी बड़ी समस्या से न जूझ रहा हो।
समाज में न जाने कितनी पीढिय़ा गई और नई आ गई लेकिन पुरानी बेडिय़ा आज तक नहीं हटी। कहीं बातों का हिस्सा हैं कहीं बहस का। समाज के ताने बाने भी कहां बदले। वही बात हुई कि घर की दीवारों पर नया रंग तो हो गया लेकिन घर की आबोहवा अब भी वैसी ही है।
अब हालात ऐसे लगते हैं कि इन पर कविता भी नहीं लिखी जाती। जी करता यूं कि छोड़ दे लिखना कविताएं। कम से कम कविता न लिखी जाए आजादी पर। न कहा जाए इस मौके को जश्न-ए-आजादी। न आजादी असलियत है फिजाओं की। न ही जश्न मनाएं जाने सरीखा मौका। जरा बैंठे कुछ देर हर रोज की तरह इस दिन भी। जैसे मंडली में गप्पे हांकने बैठ जाते है। और सोचें, विचारें, बात करें अपनी आजादी की। मिट्टी के चूल्हों से उठते धुएं से चिमनियों के धुएं निकलने तक के इस सफर में हम क्या कुछ नहीं खो चुके। उम्मीदों के जोश की मुठ्ठी भींचे क्या कुछ लिए आगे बढ़ें थे और आज क्या कुछ बचा है हाथ में। या फिर पूछो जरा खुद से कि क्या बचा है? आखिर बचा क्या है? दिखावे वाला कितना कुछ और देखा जा सकने वाला कुछ भी नहीं। अंग्रेंजों से आजादी की लड़ाई यों खत्म हुई कि आज अपना भी बस नहीं चलता खुद पर। नौकरियों में मालिक और मैनेजमेंट का जोर है तो बाकी जगह अपने अपने कैरेक्टर लिए हर शख्स टोकाटाकी को मुंह बांये खड़ा है। हम सब जगह गुलाम से हैं। फिर जब आजाद होने का मन करता है तो ये आजादी भी किसी और को गुलाम बनाकर हासिल की जा रही है। शायद वही एक जरिया रह गया। फूड चेन की तरह की एक प्रक्रिया पूरे जोरशोर से चल रही है। सब एक दूसरे को पकाकर खा जाना चाहते हैं। बहुत कुछ का जिक्र मुझे भा नहीं रहा क्योंकि इतना सा ही लिखकर घुटन होने लगी है। अब क्या लिखूं। फिर लिखने-पढऩे से भी डर लगने लगता है। लिखने की भी कहां आजादी है।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

बाइते का जाना और खबर का देर से आना

अपने व्यवहार और संस्कारों के ठीक उल्ट आज की पत्रकारिता से जुडऩे का नादान फैसला जब लिया था तब इस नादानी के पैमाने को मैं समझी नहीं थी। पढऩे, समझने और लिखने के बावजूद भी कुछ नादान सवाल गाहे-बगाहे मन में उठते रहते थे। ऐसा क्यों होता है, ये क्यों लिखा जाता है, वो तो कहीं छपा ही नहीं वगैर-वगैरह। मेरी मां जो सामाजिक शास्त्र की टीचर हैं, उनसे मैं अक्सर पूछा करती थी कि मम्मी असम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुुर, ये जो जगह हैं क्या यहां कभी कुछ नहीं होता। यहां की कोई खबर ही नहीं आती कभी। और फिर एक मासूम भ्रम मन में पाल लेती थी कि ये छोटे राज्य हैं। यहां सब कुछ ठीक ही रहता होगा। लेकिन आज अखबारों से जूझते हुए जब जनसत्ता के एक कॉलम पर नजर पड़ी तो मेरा भ्रम टूटा या कहूं कि चकनाचूर हुआ। क्योंकि टूटना तभी शुरू हो गया था जब पिछले दिनों मणिपुर में घट रही घटनाओं को हमारे अखबारों नें एक कॉलम की जगह दी और चैनलों ने शायद एक बुलेटिन में सिर्फ  शाॉट-बाईट ही चलाया। राहुल महाजन का उसकी दूसरी बीवी से झगड़ा और उसका विश्लेषण हमारे मीडिया और ऐसे मीडिया को टीआरपी देने वाले दर्शकों के लिए ज्यादा जरूरी था। मैं यहां दर्शकों का भी जिक्र कर रही हूं क्योंकि हमेशा सिर्फ मीडिया को ही कोसा जाता है लेकिन ऐसे घटिया स्तर के मीडिया को पालने-पोसने का काम तो ये दर्शक ही करते हैं न। जो देश के एक अहम हिस्से की घटनाओं को जानने में दिलचस्पी तक नहीं दिखाते और एक नाकुछ इंसान की शादी और तलाक को नजरे गड़ाकर देखते और कान खड़े करके सुनते हैं। खैर मीडिया भी मोटापा बढ़ाने वाली इस टीआरपी रूपी मलाई का मोह छोड़कर अपने दायित्वों को याद रखते हुए सेहतमंद दूध रूपी वास्तविक न्यूज दे तो शायद बेहतर हो। पर इस बीच जो बेहद दुख भरा लगा वो है इंफाल में दूरदर्शन के समाचार संपादक राबर्ट बाइते की मौत की खबर का मीडिया में उनके अंतिम सांस लिए जाने के 52 दिन बाद आना। अमिताभ बच्चन को अगर किसी सूदूर आईलैंड पर खांसी भी आ जाए तो बड़ी खबर हो जाती है। कुछ लोगों पर इतनी पैनी नजर और कुछ लोगों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिए जाना। कुछ शहरों में धूप निकलना भी खबर और कुछ राज्यों में तबाही मच जाना भी बात से नदारद। खबरों की दुनिया का ये विरोधाभास बेचैन कर देता है। सवाल सिर उठाते हैं और फिर जवाब कहीं देर से ही सही लेकिन छप सके किसी कॉलम में मिलते हैं। जैसे आज मिले और मैं लिखने की इस नाकाफी सी कोशिश को करने से खुद को रोक न सकी। और बाइते के संदभॆ में खास बात ये भी है कि वो खुद मीडिया से जुड़े थे न सिफॆ खानापूरती के लिए बल्कि उन परदों को उठाने के लिए जिनके पीछे से आता शोर तो सबको सुनाई देता है लेकिन कोई उन्हें उघाड़ कर ये देखने की कोशिश नहीं करता कि इस शोर की वजह क्या है। उनकी मौत से जो सन्नाटा पसरा है उसके बाद पीछे छूट गए उस शोर को सुनने का साहस अब कौन दिखाएगा? कब मीडिया में सरोकारों का दौर वापस आयेगा? कब?? ये सवालों का केवल एक सिरा है। पूरी की पूरी एक रस्सी पड़ी है जिसके दूसरे सिरे तक सिफॆ सवाल है सवाल।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

आंखों का एक कसूर


उजालों के दरम्यान क्या खूब बनाए थे ख्वाबगाह।
इल्म ही नहीं था
अंधेरों के कारवां में
एक दरगाह भी नहीं मिलेगी
मन्नत के लिए।।
न रहमत
न किस्मत
साथ।
जवाब भी नहीं मिल रहे
हर रास्ते पर खड़े हैं सवालात।।
फिर जिक्र इन सपनों का।
फिर जंग उस सच के साथ।।
सपनों वाली इन आंखों को क्या दिया मैंने??
लेकिन इन आंखों ने क्या न दिया मुझे??
सपने भी।
और आंसूओं का सैलाब
भी साथ।।
काश कि ये आंखे मेरी
हंसी पर भी
होंठो के साथ मुस्कुराती।
काश कि ये आंखें
सपनें न दिखाती।।
काश कि ये आंखे देख पाती
कुछ पूरे ख्वाब।
सुन पाती
आधूरे जज्बात।।
महसूस हो पाता इन्हें
उस टूटन का अहसास।।