मंगलवार, 3 अगस्त 2010

बाइते का जाना और खबर का देर से आना

अपने व्यवहार और संस्कारों के ठीक उल्ट आज की पत्रकारिता से जुडऩे का नादान फैसला जब लिया था तब इस नादानी के पैमाने को मैं समझी नहीं थी। पढऩे, समझने और लिखने के बावजूद भी कुछ नादान सवाल गाहे-बगाहे मन में उठते रहते थे। ऐसा क्यों होता है, ये क्यों लिखा जाता है, वो तो कहीं छपा ही नहीं वगैर-वगैरह। मेरी मां जो सामाजिक शास्त्र की टीचर हैं, उनसे मैं अक्सर पूछा करती थी कि मम्मी असम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुुर, ये जो जगह हैं क्या यहां कभी कुछ नहीं होता। यहां की कोई खबर ही नहीं आती कभी। और फिर एक मासूम भ्रम मन में पाल लेती थी कि ये छोटे राज्य हैं। यहां सब कुछ ठीक ही रहता होगा। लेकिन आज अखबारों से जूझते हुए जब जनसत्ता के एक कॉलम पर नजर पड़ी तो मेरा भ्रम टूटा या कहूं कि चकनाचूर हुआ। क्योंकि टूटना तभी शुरू हो गया था जब पिछले दिनों मणिपुर में घट रही घटनाओं को हमारे अखबारों नें एक कॉलम की जगह दी और चैनलों ने शायद एक बुलेटिन में सिर्फ  शाॉट-बाईट ही चलाया। राहुल महाजन का उसकी दूसरी बीवी से झगड़ा और उसका विश्लेषण हमारे मीडिया और ऐसे मीडिया को टीआरपी देने वाले दर्शकों के लिए ज्यादा जरूरी था। मैं यहां दर्शकों का भी जिक्र कर रही हूं क्योंकि हमेशा सिर्फ मीडिया को ही कोसा जाता है लेकिन ऐसे घटिया स्तर के मीडिया को पालने-पोसने का काम तो ये दर्शक ही करते हैं न। जो देश के एक अहम हिस्से की घटनाओं को जानने में दिलचस्पी तक नहीं दिखाते और एक नाकुछ इंसान की शादी और तलाक को नजरे गड़ाकर देखते और कान खड़े करके सुनते हैं। खैर मीडिया भी मोटापा बढ़ाने वाली इस टीआरपी रूपी मलाई का मोह छोड़कर अपने दायित्वों को याद रखते हुए सेहतमंद दूध रूपी वास्तविक न्यूज दे तो शायद बेहतर हो। पर इस बीच जो बेहद दुख भरा लगा वो है इंफाल में दूरदर्शन के समाचार संपादक राबर्ट बाइते की मौत की खबर का मीडिया में उनके अंतिम सांस लिए जाने के 52 दिन बाद आना। अमिताभ बच्चन को अगर किसी सूदूर आईलैंड पर खांसी भी आ जाए तो बड़ी खबर हो जाती है। कुछ लोगों पर इतनी पैनी नजर और कुछ लोगों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिए जाना। कुछ शहरों में धूप निकलना भी खबर और कुछ राज्यों में तबाही मच जाना भी बात से नदारद। खबरों की दुनिया का ये विरोधाभास बेचैन कर देता है। सवाल सिर उठाते हैं और फिर जवाब कहीं देर से ही सही लेकिन छप सके किसी कॉलम में मिलते हैं। जैसे आज मिले और मैं लिखने की इस नाकाफी सी कोशिश को करने से खुद को रोक न सकी। और बाइते के संदभॆ में खास बात ये भी है कि वो खुद मीडिया से जुड़े थे न सिफॆ खानापूरती के लिए बल्कि उन परदों को उठाने के लिए जिनके पीछे से आता शोर तो सबको सुनाई देता है लेकिन कोई उन्हें उघाड़ कर ये देखने की कोशिश नहीं करता कि इस शोर की वजह क्या है। उनकी मौत से जो सन्नाटा पसरा है उसके बाद पीछे छूट गए उस शोर को सुनने का साहस अब कौन दिखाएगा? कब मीडिया में सरोकारों का दौर वापस आयेगा? कब?? ये सवालों का केवल एक सिरा है। पूरी की पूरी एक रस्सी पड़ी है जिसके दूसरे सिरे तक सिफॆ सवाल है सवाल।

3 टिप्‍पणियां:

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

यह रस्‍सी दुनिया की तरह गोल है, जिसका सिरा नहीं मिलेगा, हो सकता है, हो ही न। हम उस दौर में आगे बढ़ रहे हैं जहां पर इस तरह के सरोकारों पर चिंतित तो सब होते हैं पर उससे आगे ... सब बेबस हो जाते हैं।
एक प्रहसन का जिक्र करना चाहता हूं जो कि मेरे विचार से प्रासंगिक है। पत्नियां बनाते समय भगवान ने कहा कि अच्‍छी और समझदार पत्नियां दुनिया के हर कोने में मिलेंगी और फिर भगवान ने दुनिया गोल बना दी।
तो सरोकारों के संबंध में कुछ ऐसी ही गोलीय स्थिति हो गई है।

neeshoo ने कहा…

avinashji se sahmat hun ..........

सचिन .......... ने कहा…

अविनाश जी की स्त्रीविरोधी बात पर कुछ नहीं, लेकिन अपनी मां से ही पूछिये। समाजशास्त्रियों ने भेडचाल पर बहुत अध्ययन किया है। राबर्ट जेफ्री को भी याद कर लीजिए। मासूमीयत अच्छी चीज है। मासूमीयत हमें प्यारा इंसान बनाती है। लेकिन सिर्फ मासूमीयत से कुछ नहीं बदलता। ये हालात अगर बुरे लगते हैं तो इन्हें बदलने की ठोस कार्रवाई बनाइये। जब तक उस कार्रवाई का मसौदा तैयार नहीं कर लेती तब तक पैंच औ खम देखती रहिए। इसी विरोधावास के बीच कहीं वह कडी है, जिस पर चोट करनी है। रोने की तरकीबें बहुत हैं, लेकिन सिर्फ रोने वालों ने बस शोर ही फैलाया है रोकर आपका दुख बाहर तो आ सकता है, हालात नहीं बदल सकते।