रविवार, 19 अप्रैल 2015

खबर कहती है

आकाश चुप है
धरती चुप

जंगल चुप है
समंदर चुप

खेत भी चुप हैं, बाग भी
महल भी और किले भी हैं चुप

हवा भी चली चुपचाप ही
चुप्पी साधे बर्फ भी पिघल रही है न जाने कब से

मगर खबरों में बहुत शोर है इस चुप्पी का

खबर कहती है- जंगल कट रहे हैं
फिर जंगल से चीखने की आवाज क्यों नहीं आती

खबर कहती है- समंदर मैला हो रहा है
फिर समंदर क्यों नहीं छीन लेता हमसे उसे देखने का सुकून

खबर कहती है- धरती बंजर हो रही है, खेत सूख रहे हैं
फिर मिट्टी इनकार क्यों नहीं कर देती बीज को अपनाने से

खबर कहती है- महल और किलों की दीवार रंगी जा रही है अपशब्दों और अश्लील चित्रों से
फिर क्यूं नहीं कर देते ये महल और किले एलान-ए-जंग

खबर कहती है- हवा में घुल रहे हैं हानिकारक तत्व
फिर हवा चल क्यों रही है
मना क्यों नहीं कर देती चलने से

फिर क्यूं...
आकाश चुप है
धरती भी चुप

क्यों
जंगल चुप है
समंदर चुप

क्यों
खेत और बाग चुप हैं
और क्यों महल किले चुप

क्यों
हवा भी चुपचाप चले जा रही है और
क्यों
बर्फ की चुप्पी टूटती नहीं

क्यों?