शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

क..ख..ग..घ..ड़.?????

से कोशिश होती है
मेरी कि
से खुश हो जाऊ
अक्सर नही तो
अमूमन ही सही ...ये सोचकर कि
दर्द दिए जिंदगी ने तो
कुछ  दोस्त भी दिए         
दिल कि देहलीज पर
दस्तक देते हुए
मगर फिर एक भय
एक संशय सामने आ जाता है
से अपने गम बाँट लूँ उनसे
तो कहीं
से वो घबरा कर
दूर न चले जाएँ
और फिर वर्णमाला के इस
अक्षर ड़ कि तरह
मेरे हाथ ..मेरा मन भी
खाली सा ही न
रह जाये

हाँ.... ये भी सच है


डूबता हुआ सूरज
सूखी हुई नदी
पिघलते पर्वत
उजड़ता जंगल
अब सब अपने से ही लगते है
.
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हाँ.... ये भी सच है
कि इन अपनों से पहले
सपनो वाली एक दुनिया में
सलाम किया करती थी मैं भी 
उगते सूरज को 
संग बह लेता था 
मेरा भी मन...
कल कल करती नदी के
आसमान को छुते पर्वत
और वनों का वो घनापन  
मुझे भी बेहद प्यारा हुआ करता था

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

लुप्त होते खेल और लिप्त होते खिलाडी

बचपन में मैंने गुड़े गुडिया और घर घर वाले खेल खूब खेले ...कोई भाई बहिन नही है और इस्कूल के दोस्त घर के बहुत नजदीक नही रहते थे इसलिए घर में ही किताबे पढ़कर वक़्त बीतता था. कहने का मतलब ये है की मैं outdoor खेल बहुत ज्यादा नही खेल पाई. क्रिकेट, फूटबाल वगैरह की कोई खासी जानकारी मुझे नही है ...आज जब कोई पसंद के खेल के बारे में पूछता है तो जवाब में मुझे जिंदगी नाम का शब्द ही ध्यान आता है ..जिंदगी से बड़ा कोई और खेल है भी तो नही ...............और इस बात से वो लोग बेहतर  तार्रुफ़ रखते होंगे जो ....खेल के अन्दर खेल कर जाते है जिंदगी के खेल को चालाकी से जीतने के लिए.ताजा मामला आई पी एल में हुई धान्द्ली का है. खेल सिर्फ क्रिकेट ही नही है ढेरो खेल है हमारे देश में ...शायद आज जो सामने है उसे देखने के आलावा हमारे पास आजू बाजु देखने का वक़्त  नही है ....खेलो की दशा भी पशुओं से कम नही है .....कुछ  खेल तो डायनासोर की तरह लुप्त हो चुके है कुछ बाघ और चीते की तरह संघर्ष के दौर में है ....जो राजा बन बैठे है वो उन पशुओ की माफिक है  जिनका  महत्व सिर्फ उनकी बाहरी ख़ूबसूरती और  खाल से होने वाली कमाई से है....
किसी गाव कसबे में कुश्ती.. रासकासी ..खो-खो या कोई और खेल दिख भी जाये बड़े इस्तर पर तो पैसे की तूती इस कदर बोल रही है की राष्टिर्ये खेल की भी कोई पूछ नही है ....
            एक तरफ वो खेल हैं जिनके खिलाडिओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी पैसा चंदे के मार्फ़त जुटाया जाता है और दूसरी तरफ वो खेल है जो लॉन या नेट की बजाये कुबेर के ढेर पर खेले जाते है ...और खिलाडी के  आलवा भी कई छुपे खिलाडी इन खेलों में शामिल हैं जो अपने दाव पेंच से हरी हुई बाजी को भी मुनाफे के गडित में तब्दील कर जश्न मनाते है .....
आई पी एल में हुआ खुलासा भी जंगल की आग की तरह ही है जो लगातार बढती जा रही है ......शशि थरूर की एक चेहचाहट ने बाकी सारे पक्षियों के पंखो को भी फदफदाना शुरू कर दिया है .....अब देखना ये है की ये फद्फदाहत उन्हें पिंजरे में कैद कर पायेगी या फिर .............मस्त गगन के ये पंछी यूँ ही दुसरे घोंसले से अंडा उठाकर अपना घर बसाते रहेंगे 



गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

क्या मैं नास्तिक हो गई हूँ

कभी तुम्हे देखा नही था मैंने
न कभी देखने की जरुरत ही दिखी '
मेरे मन में तुम्हारे लिए नमन था
कब से मैं नही जानती
माँ की दिया- बाती में मुझे
तुम्हारी रौशनी दिखती थी
मंदिर की घंटियों में मैं
तुमसे कुछ कहने की धून सुनती थी
सारे मंत्रो और श्लोको को
रट लेना चाहती थी , तुम्हे खुश करने की खातिर मैं 
मेरी दुआओं की बढती फेहरिस्त में से 
तुम कुछ भी हटा न दो 
ये भी मेरी एक दुआ थी तुमसे 
नियम , धर्म, व्रत, उपवास 
सब करती रही 
सारे तर्कों को भुलाकर मैं 
तुम्हारी निराकार सत्ता को 
सिहासन पर बिठाये 
निरंतर प्रयास में लगी थी 
की जीवन की गुत्थी सुलझ जाये 
मगर बिन खटकाये कब 
वो निराकार सत्ता 
एक अंधकार में समा गई 
मैं नही जान पाई 
आस्था के टुकड़े 
और उम्मीद की टोकरी लिए 
निर्जन से वन में अकेली रह गई थी
एक सवाल के साथ
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क्या मैं नास्तिक हो गई हूँ
या फिर
उस निराकार शक्ति का अस्तित्व न होना ही
एक सच
है

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

दिखावा न हो दरम्यां

मैंने बचपन में एक कविता पढ़ी थी चिड़िया वाली ...एकदम सही से तो नही याद लेकिन उसका मतलब कुछ इस तरह था कि चिड़िया का बच्चा जब घोंसले से बाहर निकाल कर देखता है तो उसका ये भ्रम टूट जाता है कि सारी दुनिया महज उसका ये घोंसला ही है ...कुछ इस तरह थी लाइन कि ....अब जाना मैंने कि कितन बड़ा है ये संसार .......बचपन में मैं खूब मस्त होकर सबको ये कविता सुनाया करती थी ...लेकिन आज बड़े होकर जाना की वाकये कुछ अलग नही हैं मेरी इस्थिति उस चिड़िया के बच्चे से . मुझे भी अभी पता चल रहा है कि हमारी सोच और समझ से  कितनी अलग और परे है ये दुनिया ..हमारी मासूम . सोच के उस घोंसले में तो कभी स्वार्थ और सिफारिश  का वो सामान दाखिल ही नही हुआ जिसकी इस दुनिया में सबसे ज्यादा जरुरत है . हम रिश्तों के साथ जीते है और दुनिया में शर्ते पनप रही है .......हम क़ाबलियत को तोल रहे थे यहाँ इस दुनिया में तो जुगाड़ का मोल भाव हो रहा है ...हम प्यार ढूँढ़ते रहे लोगों की नजरो में  और लोगों की  नजरे हमसे उस प्यार कि कीमत मांगती रही ......हम तो अकेले निकाल पड़े थे घर से इस जंग-ए मैदान में लेकिन मालूम चला की यूँ अकेले कीर्ति तो मिल जाएगी लेकिन जीत का ख्वाब देखना भी बेवकूफी होगी. मंजिल आँखों में है सफ़र भी बेहद सुहाना है लेकिन मोड़ कुछ ऐसे है जहाँ हर बार हजारों सवाल राह तकते मिल जाते है. जानती हूँ कुछ किताबी बातों में जी रही हूँ लेकिन किताबे भी किसी दूसरी दुनिया के प्राणी ने तो नही लिखी न ...जिसने भी लिखी कुछ महसूस करके लिखी ...उन पलों को जी कर या किसी को जीते हुए देखकर लिखी ...फिर क्यों लोग कतरा रहे है उन किताबी बातों को अजमाने में या मानने में जिनके विमोचन में वो खूब भाषण देकर और पेटपूजा कर के आते है...एक छोटा और सीधा सवाल ये है की इस दुनिया में इतना दिखावा क्यों है ......मुझे भूख लगी है .......इस छोटी सी बात को भी कई बार आपको कुछ इस तरह कहना होगा ......जीभ लपलपाते हुए कहना होगा आपने खाने में क्या बनाया है.......या फिर अपने खाना खा लिया क्या .......बहुत छोटा और रूटीन लाइफ का उद्धरण दिया है मैंने क्योंकि दिखावे की ये लम्बी दास्ताँ तो ऐसे ही छोटी-छोटी बातों से शुरू होती है .....माँ-पापा के सामने अलग ,,,,दोस्तों के सामने कुछ और .....प्रेमी के सामने कुछ अलग .....बॉस के सामने कुछ हटके ...........क्यों बिना पैसे के फ़ोकट  में सब इतनी एक्टिंग कर रहे है ........शायद इसलिए की असलियत बदनाम  कर देगी .......लेकिन उस दिखावे से भी नाम होने की गुंजाईश मुझे नही दिखती ......सच कडवा होता है .........अच्छा नही लगता ......दुःख भी देता है अक्सर .....सहा भी नही जाता हो ये भी हो सकता है लेकिन ........जो सुकून सच में है वो दिखावे या झूठ  में नही .......मैं कोई गाँधीवादी चिन्तक नही हूँ लेकिन ये बात बेशक हकीकत है ...आखिर थकहार कर जब कुछ सोचने बैठते है हम तो यही चाहते हैं की कोई अपना सा साथ हो ....लेकिन झूठ और दिखावे से भारी पड़ी इस दुनिया में जिसका एक हिस्सा आप और हम भी बनते जा रहे है कैसे ढूँढेंगे हम कोई अपना सा एक दम ओरिजनल .......लाख टके का सवाल है और जवाब भी हम सब जानते है


सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बस... किये जा रहे है

जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है की
हम सब अपनी जिंदगी की थर्ड क्लास कहानी को
फर्स्ट क्लास एंडिंग देने के लिए
सारे सेकंड क्लास काम किये जा रहे है
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ऐसे काम जो शायद हमें नही करने चाहिए या जो हम खुद भी करना नही चाहते

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

एक मुगालते में

एक मुगालते में
अब महफूज है मेरी खुशियाँ सब
की जिस ओर से जिस छोर तक                
जिस सड़क से जिस मोड़ तक
रास्ता है
वहीँ से निकलती चालू बस
मक़ाम मिलना यूँ भी
मुमकिन नही हर किसी को
कमसकम
ठहर जाने का गम  तो न हो

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

एक जगह



जनसत्ता में अभिव्यक्ति को मिली जगह  



जोश है जज्बा है जूनून है और है जुस्तजू भी
चाहिए तो बस वो जमीन जहाँ अपने लिए एक जगह बना सकू


गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

जंगल और जमीन से जुडी एक दुनिया

मेरा बच्चा मेरी बात ही नही मानता...दिन पे दिन बिगड़ता जा रहा है...इस पर इसके दोस्तों का ज्यादा असर हो रहा है जो वो कहते है वाही मान लेता है ..इसे सख्ती से लेना पड़ेगा...अब इसने ऐसी कोई हरकत कि तो सीधा डंडे से इसकी धुनाई होगी तभी मानेगा ये ...............................ये मेरा निजी अनुभव नही ...महज कल्पना है ऐसे अभिभावक के बारे में सोचकर जिनका बच्चा उनके गलत व्यवहार के कारन कहीं न कहीं भटक कर गलत सांगत में पड़ रहा है और माता पिता अब भी अपनी गलती समझने कि बजाये सख्ती से काम लेकर एक और गलती करना चाह रहे है ..................................................इस भूमिका का मकसद एक बेहद बड़ी और विकराल समस्या को साधारण भाव में इस्थापित करना था ................नक्सलवाद .......उस समस्या का नाम है ........जो कुछ राज्यों में है लेकिन पिछले कुछ दिनों से चल रहे घटनाक्रम ने देश भर में इसे चर्चा का विषय बना दिया है......इस विषय से मेरा शुरू से जुडाव रहा है ........इस भाव को लेकर कि आखिर विकास और समान धारा की मांग को लेकर कोई इतना उद्दंड और क्रूर कैसे हो सकता है ......पत्रकारिता को जूनून की हद तक प्यार करने वाली मैं अभी तक तो आँखों देखी हकीकत नही जान सकी लेकिन पढ़ा लिखा जो भी है उसी से कुछ बातें कहने की कोशिश कर रही हूँ
पिछले दिनों ऑपरेशन ग्रीन हंट के विषय पर सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती राय की प्रेस कांफेरेंस में जाने का मौका मिला वहां से जो विचार मिले वो ये की ये ऑपरेशन गलत है और माओवादी या नक्सलवादी की पहचान सरकार को खुद भी नही है outlook में छपे उनके लेख में भी उन्होंने लिखा है की  दंतेवाडा में पोलिसे सदी वर्दी पहनती है  और विद्रोही वर्दिया पहनते है कारागार अधीक्षक कारागार में है और कड़ी आजाद है. ये जानकारी उन्होंने अपने निजी अनिभव और वहां बिताये वक़्त के आधार पर दी है .....लेकिन एक सोच जो उन लोगो के दिमाग में जन्म लेती होगी जो हालाते से करीब से वाकिफ नही है वो ये की अपनी स्वार्थपरक नीतियों के बदोलत अपने ही देश में नक्सलवादी नाम के आतंकवदी दस्तों को जनम देने वाली हमारी सरकार बन्दूक चला कर किसका मुकाबला करना चाहती है .........अपने परिवार के उस सदय्सा का जो जनम से ही वनवास भुगत रहा है ..........अजीब ये भी है की अगर नक्सलवाद आतंकवाद जितना भयंकर और इसे ख़त्म करने के लिए हंट ऑपरेशन चलाया जाना जरुरी है तो क्या जो वास्तविक आतंक खुले आम पडोसी देश से हर वक़्त हमारे देश पर मंडराता रहता है उससे शांति वार्ताएं करना ठीक है ...क्यों न उसे भी सशस्त्र उखाड़ फैकने के ऑपरेशन चलाये जाये .........वहां हम अहिंसा प्रेमी क्यों बन जाते है ...........आज जिस ऑपरेशन के बल पर सरकार ये साबित करना चाह रही थी की वो नक्सलियों से ज्यादा ताकतवर है उसने कितने ही जवानो की बलि ले ली .......जहाँ तक सुरक्षा का सवाल है तो न तो नस्सली छेत्रो के लोग सुरक्षित है न पोलिसे के जवान तो पुख्ता सुरक्षा तो उन हुक्मरानों के ही पास है जो अधि अधूरी तयारी कर लड़ने चल पड़े है . इस सबमे सबसे बड़ी मार पड़ रही है उन आदिवासियों पर जिन्हें विकास के व् से भी सरोकार नही है जो संतुष्ट है जंगल और जमीन के बीच जिंदगी जीने में बशर्ते शांति और सुरक्षा का साया रहे 

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

मुस्कुराने की आदत

दर्द से कभी सिर्फ एक रिश्ता था
अब याराना हो गया है
हर रोज का ही आना जाना हो गया है
कभी आसुओं कि दवा मिल जाया
करती थी अब परहेज के तौर पर
आदत मुस्कुराना हो गया है

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

हंगामा नही इन्साफ करें .....रिश्तों के साथ

महफ़िल और तन्हाई..दोनों का ही अपना लुत्फ़ है कभी दुनियादार हो जाने को जी चाहता है तो कभी सारे बंधन तोड़कर अपनी सी अलग दुनिया बसाने का मन करता है..लेकिन समाज में रहते हुए कई अनकही सी सीमाओं से बंधकर हम अक्सर चाहतों को पूरी करने की बजाये सही और गलत के फेर में उलझ जाते है .....मेरी समझ से लिव इन रिलेशन का विचार भी ऐसे ही किन्ही दायरों में उलझ रहा है ....कानून कहता है की ये अपराध नही समाज कहता है कि  घोर अपराध है. अब भला जिंदगी कैसे बितायी जाये ये कानून और समाज कैसे तय कर सकते है और फिर एक सच ये भी है कि लिव इन रिलेशन नाम का ये तथाकथित अवतार तो अभी प्रगट हुआ है ....कितने लोग कब से यूँ ही बिना कानून और समाज की  परवाह के साथ रह रहे है कौन जानता है ? विवाह पूर्व सहजीवन के खिलाफ जो तमाम आवाजें उठ रही है दरअसल वो खुले आम इस बड़े बदलाव को स्वीकार नही करना चाहती... चोरी छुपे ये सब सभ्यता की शुरुआत से आज तक हो रहा है ये सर्वविदित है हर बात और जज्बात को कानूनी दायरे में नही बंधा जा सकता ...तर्क की बात क्कारें तो ये तथ्य माननीय है की ऐसे संबंधों से होने वाली संतान का वजूद सवालों के घेरे में आ जायेगा ...या फिर पत्नी के अधिकारों का पलीता हो जायेगा. लेकिन इन तथ्यों के साथ ही ये सवाल भी उठता है की क्या ऐसे सम्बन्ध बनाने वाले लोग दुध्मुहें बच्चे है जो इन परिणामों के बारे में नही सोच सकते....एक साधारण सी बात ये है की जब भ्रष्टाचार, बलात्कार,और ऐसे तमाम कृत्यों के खिलाफ कानून बने हुए है तो क्या ये काम नही होते है .......बल्कि ऐसे तमाम काम जोर शोर से होते है जिनके खिलाफ बने सख्त कानूनों का ज्ञान हर अदने से इंसान को भी है .........दरअसल कुछ काम या कहूँ कि हम जो काम करते है वो हमारी सोच पर निर्भर करते है समाज और कानून रूपी पहरों को बाद में प्राथमिकता दी जाती है. इसलिए ऐसी बातों पर हंगामा खड़ा करने से बेहतर होगा कि अपनी मान्यताओ के साथ इंसाफ किया जाये वो चाहे लिव इन रिलेशन में हो या पारम्परिक शादी कि रीति में ......मैं जानती हूँ कि इन्साफ का ये काम हंगामा करने से ज्यादा मुश्किल है इसलिए अधिकतर समाज इस पर ध्यान नही
देता ..........

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

शब्दों से भारी होते भाव

भाव कभी कभी शब्दों से ज्यादा भारी हो जाते है ...बयाँ ही नही हो पाते. शुन्य से शुरू होकर सोच शिखर तक पहुँच जाती है ....लेकिन सच कि परछाई वापस जमीं पर ले आती है...उन बातों को कैसे बयाँ करू जिनमे बंधन है ...बाधा है और ऐसी सरहदे है जो सिर्फ सपनो में ही पार की जा सकती है .....यही सोचकर बहुत कुछ मन में ही रह जाता है ...कागज पर नही आ पाता