गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

क्या मैं नास्तिक हो गई हूँ

कभी तुम्हे देखा नही था मैंने
न कभी देखने की जरुरत ही दिखी '
मेरे मन में तुम्हारे लिए नमन था
कब से मैं नही जानती
माँ की दिया- बाती में मुझे
तुम्हारी रौशनी दिखती थी
मंदिर की घंटियों में मैं
तुमसे कुछ कहने की धून सुनती थी
सारे मंत्रो और श्लोको को
रट लेना चाहती थी , तुम्हे खुश करने की खातिर मैं 
मेरी दुआओं की बढती फेहरिस्त में से 
तुम कुछ भी हटा न दो 
ये भी मेरी एक दुआ थी तुमसे 
नियम , धर्म, व्रत, उपवास 
सब करती रही 
सारे तर्कों को भुलाकर मैं 
तुम्हारी निराकार सत्ता को 
सिहासन पर बिठाये 
निरंतर प्रयास में लगी थी 
की जीवन की गुत्थी सुलझ जाये 
मगर बिन खटकाये कब 
वो निराकार सत्ता 
एक अंधकार में समा गई 
मैं नही जान पाई 
आस्था के टुकड़े 
और उम्मीद की टोकरी लिए 
निर्जन से वन में अकेली रह गई थी
एक सवाल के साथ
.
.
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.
.
.
क्या मैं नास्तिक हो गई हूँ
या फिर
उस निराकार शक्ति का अस्तित्व न होना ही
एक सच
है

11 टिप्‍पणियां:

neeshoo ने कहा…

शानदार और ससक्त लेखन ।।।।भाव और विषय दोनो को अच्छे से शब्दो के मध्यं से उतारा है ।।।। शुभ्वर्त्मान

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahut shandar rachna

bahut khub

shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

or ab wahi purani shikayat aap se ki aap ne abhi tak nahi hataya शब्द पुष्टिकरण

koi bat nahi @@@@@@@@@@

kunwarji's ने कहा…

swachchh lekhan ke liye shubhkaamnaaye swikaar kare....

kunwar ji,

Rajey Sha ने कहा…

ये महज कवि‍ता नहीं होना चाहि‍ये बात और गहरी जाये तो मजा ..........

दिलीप ने कहा…

bahut hi khoob...sab kuch maanne ke baad nakarna bada khalta hai....

M VERMA ने कहा…

बहुत गहराई तक उतरती कविता
सुन्दर भाव
सुन्दर संयोजन

Suman ने कहा…

nice

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

कुश ने कहा…

आस्था डेवलप ही ऐसे होती है.. हम जब पैदा होते अहि तो कुछ नहीं जानते धीरे धीरे हामरे मन में आस्था पैदा की जाती है.. दरअसल सब कुछ हमारे मानने पर निर्भर है.. है और नहीं या यु कहू विश्वास और अविश्वास के द्वन्द को सही शब्दों में बयां किया है अपने.. बहुत खूब!

संजय ग्रोवर Sanjay Grover ने कहा…

sambhav ho to ye post padheN:

(नास्तिकता सहज है)

http://samwaadghar.blogspot.com/2010/07/blog-post_09.html

raman ने कहा…

bahut dino se Indo-Nepal ki sima pe ghum raha tha or shayad duniya ko bhulane ki koshish bhi kr raha tha lekin tum mujhe hamesa yaad aati rahi...
Shayad isliye hi vapas aate hi mujhe blog padhana pada....
yaar mujhe to tumhari bahut fikr ho rahi hai. kitna sochati ho or kya kya likhati ho...
mujhe to aisa lg raha hai ki tum bhavishya ki Tasalima ho...
Great Work...
Keep It UP.....