शनिवार, 29 दिसंबर 2012

लड़की 'हो' ना

जब इस बात का अहसास होना शुरू हुआ कि मैं लड़की हूं, तब सब कुछ इतना बुरा नहीं था। मगर जिन दिनों से उन नियमों ने मेरे दिमाग में जगह बनाई, जिन पर चलने की सीख मुझे दी जाने लगी, क्योंकि मैं एक लड़की थी, तब से सब कुछ काफी बुरा लगने लगा। यहां तक कि तब से मुझे अपना लड़की होना ही बुरा लगने लगा। उन दिनों के बाद से दुनिया भर के हसीन ख्वाबों और ख्यालों के बीच एक ख्वाहिश मेरे दिल में हमेशा कसमसाती रहती थी कि काश! मैं लड़का होती।
लड़का होती तो दादी ने मां के साथ बुरा व्यवहार न किया होता।
लड़का होती तो घर वालों के मन में एक अजीब सी असुरक्षा की भावना न होती।
लड़का होती तो मां को भविष्य इतना धुंधला और कमजोर न दिखता।
लड़का होती तो देर तक बाहर घूमती।
लड़का होती तो बिना बताए घर से चली जाती।
लड़का होती तो शराब के हर एक घुंट के साथ जिंदगी को आसान बना लेती।
लड़का होती तो सिगरेट के कश भरती और हर फिक्र को धुएं में उड़ा देती।
लड़का होती तो ऑफिस से घर जाने की जल्दी न करनी पड़ती।
लड़का होती तो नाइट रिपोर्टिंग करती।
लड़का होती तो रेड लाइट एरिया में जाकर उनकी जिंदगी करीब से देख सकती।
लड़का होती तो इस बात का इंतजार न करना पड़ता कि कोई लड़का आएगा और मेरी जिदंगी की हर तकलीफ को कम कर देगा हर पहेली को सुलझा देगा।
लड़का होती तो ये.... लड़का होती तो वो....
आज भी बेशक मैं लड़की होने पर फक्र नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे अंदर की लड़की कहीं घुट रही है।
मगर मैं अब कभी लड़का नहीं होना चाहती।
अगर लड़का होने का मतलब लड़की होने के असित्त्व को बार-बार तार-तार करना रह गया है तो मैं कभी लड़का नहीं होना चाहती।
अगर कभी बाप, कभी भाई, कभी बेटे और कभी किसी मनचले के रूप में लड़कों की मर्दानगी का मतलब लड़कियों की मौत के तौर पर ही सामने आता है तो मैं कभी लड़का नहीं होना चाहती।
और  ये जानते-समझते हुए भी कि हर शख्स एक जैसा नहीं होता, हालात बार-बार मुझे झकझोर रहे हैं, मजबूर कर रहे हैं कि मैं किसी मर्द पर भरोसा न करूं और अपने विश्वास को फौरन हर आदमी पर से चलता कर दूं.......
या फिर मैं नहीं समझ पा रही कि उसकी कुर्बानी का मोल किस तरह अदा करूं
आखिर में मैं एक लड़की हूं औऱ नहीं चाहती कि अपनी जिंदगी में फिर कभी किसी लड़की की ऐसी कुर्बानी की साक्षी बनूं। 

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

फांसी फांसी फांसी


 24 साल के इस सफर में ज‌िंदगी ने कई बार उलझाया। कई बार हालात के दलदल में फंसाया। कई मरतबा ऐसा हुआ ‌क‌ि सोचने और समझने की ताकत नहीं रही। ‌फ‌िर भी बीते कुछ द‌िनों में मेरे सामने आने वाली चीजें न जाने क्यों मुझे हर बीती हुई मुश्क‌िल से भी ज्यादा कठ‌िन लगी। हाथ में कागज, कलम, लेपटॉप कुछ नहीं था और मन में शब्दों का तेज ज्वार भाटा। मैंने क‌िसी दोस्त का फोन नहीं ल‌िया, क‌िसी से बात नहीं की। न टीवी, न रेड‌ियो, न अखबार कुछ नहीं था पास। कुछ मालूम नहीं था क‌ि दुन‌िया में हो क्या रहा है। द‌िख रहा था तो बस इतना क‌ि ज‌िंदगी में जो हो रहा है वो नहीं होना चाह‌िए। हो रहा है तो उसका हल म‌िलना चाह‌िए। मगर कुछ नहीं म‌िला। ज‌िस पटरी पर चलते-चलते गाड़ी रुक गई थी, उस पर बहुत देर रुकी रहने के बाद फ‌िर से घ‌िसटने लगी। अब कोई सोचे क‌ि ऐसा भी क्या मामला था तो इस बारे में मैं कुछ नहीं ल‌िख सकती। मुझे हमेशा से लगता आया है क‌ि अपनी न‌िजी ज‌िंदगी और पार‌िवार‌िक मसलों के बारे में दूसरों से ज्यादा बातचीत नहीं करनी चाह‌िए। लगता आया है या मां की सीख का असर है शायद। मैं इतना सब भी नहीं ल‌िखती... अगर तीन बाद अखबार देखते ही मेरे सामने दर‌िंदगी की वो घटना न आई होती। 
मैं स्तब्ध थी पढ़कर। 
नहीं महसूस कर सकती क‌ि वो कैसी होगी सहकर।  
मैं बहुत भावुक हूं। बहुत कुछ ल‌िखती व‌िखती रहती हूं, ले‌क‌िन मेरे अंदर उठ रहा शब्दों का सारा ज्वार भाटा अचानक आकाश और धरती के बीच ही कहीं अपनी जगह बनाकर रुक गया है। 
जैसे बचपन में हम दोस्तों को स्टेच्यू बोलकर कई देर के ल‌िए ज्यों का त्यों छोड़ देते थे। 
मेरी भावनाएं ऐसे सूख गई हैं जैसे उड़ीसा के कालाहांडी का अकाल। 
न मैं कैंडल मार्च कर सकती हूं। 
न हाथ में पोस्टर लेकर च‌िल्ला सकती हूं। 

मेरा कुछ भी ल‌िखना या करना इस स्थ‌ित‌ि के ल‌िए शायद क‌िसी काम का नहीं है। 
मगर इतना कहना जरूरी लगता है क‌ि 
प्रताड़ना के इस शोर के बीच क्या अपराध‌ियों को सजा की मांग या उससे जु़ड़ी क‌िसी च‌िल्लाहट की गुंजाइश बचती है?
क्या चोट पहुंचाने वाले से पूछने के बाद उसे मारा जाता है?
क्या इस देश में ज‌िसे भारत कहते हैं स‌िर्फ खोखली भावनाओं का लबादा ओढ़ने की ताकत है या फ‌िर वो ह‌िम्मत भी ज‌िसके दम पर क‌िसी को इंसाफ म‌िल सके और दु्न‌िया को सबक।
मेरी आंखों के सामने ऐसे कई सवालों का बहुत बड़ा घेरा है। ऐसे सवाल, ‌ज‌िनके जवाबों पर पुल‌िस, पार्टी, पॉल‌‌िट‌िक्स और प्रशासन की न जाने क‌ितनी मकड़‌ियां बैठी हैं।
मगर मैं अब स‌िर्फ एक लाइव सीन देखना चाहती हूं। 
ज‌िसमें लाइट कैमरा और एक्शन बोलेत ही अपराधी के पैरों के नीचे से जमीन खींच ली जाए। फंदा उसके गले के ऊपरी छोर को छूकर बाहर न‌िकलने की कोश‌िश करे, मगर न‌िकल न पाए।  

रविवार, 2 दिसंबर 2012

दो रूठे हुए मुल्कों की हंसी ठ‌िठोली


21 नवंबर की जिस सुबह पूना की जेल में कसाब ने खुदा से अंतिम माफी मांगी,ठीक उसी दोपहर दिल्ली में प्रगति मैदान के व्यापार मेले में पाकिस्तान के उस्मान रियाज ने कहा,'' हिंदुस्तान के लोग पाकिस्तान के लोगों के मुकाबले ज्यादा जहीन हैं'' एक मुल्क, एक मजहब लेकिन मकसद बदलते हैं तो जिंदगी का रवैय्या भी बदल जाता है। कसाब आतंक का व्यापारी था,उस्मान रियाज रेशमी रूमाल लेकर व्यापार मेले में आया था। एक के पास नफरत की पूंजी और दूसरे के पास महीन कारीगरी की एक ऐसी मिसाल, जिसे चाहने वाले उधर भी हैं और इधर भी। दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में पाकिस्तान के सौदागरों के चेहरे पर एक दर्द था तो उनसे सौदा खरीदने आए कई लोगों पर भी उसी दर्द की छाप थी। दो मुल्कों के एक से दर्द की यह कहानी नई तो नहीं, लेकिन 65 साल पहले दुनिया के भूगोल पर खिंची गई रेखा बीतते वक्त के साथ मिट नहीं रही, और पुख्ता हो रही है-"क्या अलग है, मैडम? एक जैसा कल्चर है। एक जैसी भाषा है। नेताओं ने दूर कर दिया है बस। दोनों मुल्क एक ही हैं, क्या हिंदुस्तान और क्या पाकिस्तान।"पाकिस्तानी से आए रफीक लखानी ने बिभाजन का वक्त तो नहीं देखा, लेकिन बाद की पीड़ा को जरूर महसूस किया है। कुछ दिन पहले ही हिंदुस्तान आए रफीक ने कराची से सटे अपने गांव में लोगों को अपने रिश्तेदारों के लिए रोते देखा है, जो बिभाजन में इधर आ गए। अपने सामानों को वेचते हुए वे व्यापारी जिस गर्मजोशी से मिल रहे थे, उससे कहीं नहीं लगता था कि ये सौदेबाजी ऐसे लोगों के बीच हो रही है, जिनके मुल्कों के बीच लंबे समय से तनाव है। युद्ध हो चुके हैं और जब भी संबंध सामान्य होने की बात आती है, कसाब जैसा आतंक का कोई न कोई सौदागर रंजिश की आग को भड़का देता है। कसाब को हिंदुस्तान में फांसी दी गई तो यह तल्खी और बढ़ गई। ठीक ऐसे वक्त में पाकिस्तान से आए 25 साल के उस्मान रियाज से पूछा था कि यहां के लोगों से मिलकर कैसा लगता है तो जवाब हैरान नहीं, परेशान करने वाला था। "हिंदुस्तान के लोग पाकिस्तान के लोगों के मुकाबले ज्यादा जहीन हैं। अब सवाल अपने ही मन में उठने लगे थे कि आखिर ये कैसे पाकिस्तानी हैं? क्या ये उसी मुल्क से आए हैं, जिसके नाम के साथ
आतंकपर्यायवाची की तरह जुड़ चुका है। अगर उस तरफ अदब की तारीफ अफजाई हो रही थी, तो इस तरफ भी अपनापे का जोर कम असरदार नहीं था। इसका असर 50 की उम्र पार कर चुकी दिल्ली के लाजपत नगर की मीना जैसवाल में नजर आया। मीना ने बताया हर साल यहां जरूर आती हूं। पाकिस्तान की गोटा-पत्ती, नक्काशी, क्रोशिए, काजल और सुरमें का कोई सानी नहीं है।मीना के पति इस बात पर थोड़े खफा से थे। बोले, दिल्ली की चांदनी चौक में क्या नहीं मिलता, लेकिन इन्हें तो लाहौर और कराची के आगे कुछ नहीं भाता।मियां-बीवी की नोंक-झोंक में दो रूठे हुए मुल्क जैसे हंसी-ठिठोली कर रहे थे। फिर मुस्कुराते हुए जब कराची से आए तकरीबन 70 साल के लईक अहमद ने अपनी बात कही तो कई और सरहदें टूटीं। बोले, मैं तो यहीं रामपुर का हूं। विभाजन के बाद सब कराची जाकर बस गए, मगर मिट्टी से रिश्ता थोड़े ही टूटता है।" लेकिन अपनी जड़ों से उखड़ने का दर्द बहुत गहरा होता है। इस वेदना को या तो डाल से टूटा पत्ता समझ सकता है या नीड से बेदखल कोई परिंदा लईक हर साल यहां आते हैं और अपनी मिट्टी के अहसास को साथ लेकर जाते हैं।ब्लूचिस्तान में निकलने वाले एक खास तरह के ओनेक्स पत्थर से बनी चीजों के बीच बैठे थे लईक। पत्थर की खासियत पूछने पर उन्होंने एक फूलदान की तरफ इशारा करते हुए बताया, "इस पत्थर पर जो भी रोशनी पड़ती है वो आर-पार होकर दिखाई देती है। बिल्कुल पारदर्शी पत्थर है, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है।" पत्थर के उस फूलदान से रोशनी कुछ इस तरह आरपार हो रही थी जैसे कह रही हो कि तिरे चिराग अलग हो और मेरे चिराग अलग, मगर उजाला कभी जुदा नहीं होता।यह जगह थी दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे व्यापार मेले का हॉल नंबर 22। हॉल के बाहर बेशक पाकिस्तान के नाम का बोर्ड लगा था, लेकिन यहां कोई सरहद नहीं थी। था तो सिर्फ प्यार, अपनापा और एक चाहत।