मंगलवार, 29 नवंबर 2011

तेरे बारे में



दुनिया की इस भीड़ में
जब मैं कहीं खो सी जाती हूँ
सिर्फ तुम्हारे ख्याल भर से
खुद ही खुद को
ख़ास जताती हूँ
...
देर शाम
दफ्तर से घर लौटते वक़्त
जब कुछ मनचले
मैली सी  नजरों से
झांकते है मेरे भीतर
तुम्हारे अहसास भर से
मैं खुद को ताकत दे पाती हूँ
...
जब कभी शून्य में
समा जाती हैं मेरी सारी सोच
और मैं तनहा हो जाती हूँ
तब खुद को जगाने के लिए
तुम्हारे कुछ ख्वाब सजाती हूँ
...
दिमाग, दिल और देह तक
जब बिक रही है हर चीज
और खरीददार खड़े हैं बाजार में
मैं खुद को
तुम्हारी अमानत समझकर बचाती हूँ
...
घर के बड़े कहते हैं बड़ी सयानी हूँ मैं
...
दोस्त कहते है दीवानी हूँ मैं
...
मुझे लगता है कुछ नहीं हूँ
तुम्हारी हिमानी हूँ मैं

सोमवार, 28 नवंबर 2011

मजबूर कवि

दिन उगे से नौकरी और शाम ढले तक चाकरी
के बाद
रात की खामोशी में चीखें मारते हैं कुछ शब्द
जो नहीं बन पाए कविता
एक कवि इतना मजबूर कभी था क्या

...



मंगलवार, 22 नवंबर 2011

प्रेम - कुछ सवाल(२)

बुरा होना बहुत जरुरी है
क्योंकि अच्छा बनकर
आप वो नहीं रह जाते
जो आप हो या होना चाहते हो
लेकिन जब आप बुरे होते हो
तो कितने लोग  ये समझ पाते हैं
कि अब वास्तव में आप अच्छे हो
कम से कम
सच्चे तो हो
....................................................................
मैं कहूँ कि बहुत बुरा महसूस हुआ मुझे
जब तुमने मेरे हाथों को
लोगों की उस महफ़िल में
अपने हाथों में लिया
जबकि
प्यार का
खामोश सा इजहार भी
हो चुका  है हमारे बीच
मुझे नहीं लगता प्यार में छूना
एक नैतिक जिम्मेदारी या परम्परा है
मुझे नहीं लगता कि
छुए बिना आगे नहीं बढ़ सकता प्यार
मुझे लगता है
इतना प्यार है हमारे दरम्यान
कि दरो दीवार की ये दूरियां
उसे कभी नहीं मिटा पाएंगी
वो एहसास
जब तुमने छू लिया था
मेरे दिल को गहरे तक
वो कभी धुंधला नहीं पड़ सकता
मेरी आँखों में
कभी मैला नहीं हो सकता
उससे मेरा आंचल
पर मैं बुरी हूँ तुम्हारी नजरों में
क्योंकि मैंने अपनी भावनाओ का भी ख्याल रखा
तुम्हारे प्यार को सहेजने और समझने के साथ
कह बैठी मैं तुमसे अपने दिल की बात
भूल गई उस शिक्षा को
जो अक्सर माँ को कहते सुना था
मर्दों से हर बात नहीं बाटनी चाहिए
मैं बुरी हूँ
क्योंकि मैं तुम्हे कोसना नहीं चाहती थी बाद में
मैं बुरी हूँ क्योंकि
मैं कुछ पलों के लिए नहीं
ताउम्र के लिए चाहती थी तुम्हारा साथ
..................................
एक लड़की है
जो मुझे लगता है कि
तुमसे थोड़ा  ज्यादा समझती है मुझे
मैं उसे पढ़वा  सकता हूँ अपनी प्रेम कवितायेँ
जिन्हें पढ़ना  तुम्हे नहीं है पसंद
या कि
तुम नहीं समझ पाओगी
कि तुम्हारे ख्यालों में खोकर ही
लिख बैठा था मैं
तुम ढूंदोगी  उनमे
किसी और का अक्स
मैं कहूँ कि
एक लड़की है
जो मुझे अपने जैसी लगती है
जिससे घंटों बातें करते वक़्त
मैं भूल जाता हूँ
वक़्त के बारे में सोचना
तब क्या करोगी तुम
मेरी प्रेयसी 
तुम खुद को कटघरे में खड़ा कर दोगी
या उठा दोगी मेरे चरित्र पर सवाल
..............................................


( ये दो अलग अलग बातें हैं .
एक में प्रेमिका अपने प्रेमी से संवाद कर रही है
और दूसरे में एक पति अपनी पत्नी से जिससे वो बेहद प्यार करता है.
अब सवाल ये है की प्रेम भरे इन रिश्तों के बीच  ये सवाल दीवार बनकर क्योंकर उठ खड़े हुए है क्या इनका कोई जवाब है या फिर ... एक वक़्त पर हर अहसास हर जज्बात इसी तरह खोखला हो जाता है ??? )



रविवार, 20 नवंबर 2011

तलाक

आँखें आसमान पर 
पाँव जमीं पर 
एक शरीर 
दो हिस्से 
दो रास्ते एक मंजिल
तलाक भी होता होगा 
कुछ यूँ ही 
शौहर मुशायरे में 
बेगम दूर महफ़िल से
 दो जिस्म 
एक जान
एक जिंदगी 
दो आरजू

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

प्रेम पत्र


प्रेत  आएगा
किताब से निकाल ले जाएगा प्रेम पत्र
गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा

चोर आएगा तो प्रेम पत्र चुराएगा
जुआरी प्रेम पत्र पर ही दांव लगाएगा
ऋषि आएंगे तो दान में मागेंगे प्रेम पत्र

बारिश आएगी तो
प्रेम पत्र ही गलाएगी
आग आएगी तो जलाएगी प्रेम पत्र
बन्दिशें प्रेम पत्र पर ही लगाई जाएंगी

साँप आएगा तो डँसेगा प्रेम पत्र
झींगुर आएंगे तो चाटेंगे प्रेम पत्र
कीड़े प्रेम पत्र ही काटेंगे

प्रलय के दिनों में
सप्तर्षि, मछली और मनु
सब वेद बचाएंगे
कोई नहीं बचाएगा प्रेम पत्र

कोई रोम बचाएगा
कोई मदीना
कोई चाँदी बचाएगा, कोई सोना
मैं निपट अकेला
कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेम पत्र ।              
                                                ................. बद्रीनारायण