शनिवार, 23 अप्रैल 2011

रात चाँद मैं और रेल

रात, चाँद, मैं और रेल
रास्तों का शोर, सूनी पड़ी सड़कें, बेवफा नींद और तेरी यादों का खेल
भूल बैठी थी कि अब तक याद है मुझे
वो बात वो साथ 

वो अनकहे से रिश्ते की 
अनजाने ही बढती गई एक अमरबेल
रात, चाँद, मैं और रेल
ख्वाबों की जगह यादों ने ले ली है
एक कोने में जा खड़े हुए हैं ख्वाब
खुश है देखकर
रोतें रोते यूँ  

एक दूसरे से लिपटती यादों को
जैसे बरसों बाद मिली हों  मुझसे
आज ख़त्म हुई हो जेल
रात, चाँद, मैं और रेल
इन अंधेरों के बीच 
गलती से जला रह गया
पीली रौशनी वाला एक बल्ब
तुम हो जैसे
और मेरा किरदार टुब्लाईट जैसा
बुझ बुझ कर जलने वाला
कैसे हो सकता है
और
कैसे हो सकता था ये मेल
रात, चाँद, मैं और रेल

इस गाड़ी की एक पटरी  थी
जिससे ये उतर जाती तो
हादसा हो जाता है 
इस लड़की की एक परिपाटी है
जिस पर चलती है तो फासला हो जाता है
अब न उड़ान को तालों में बंद कर सकती हूँ
न कस सकती हूँ आसमान की ऊंचाई पर नकेल
रात, चाँद, मैं और रेल
अपनी सी, अनजानी सी रात.. खो गई
चाँद पर पड़ गया बादलों का पर्दा
गर्म चाय समोसे की आवाज ने बताया
सुबह हो गई
अब आगे का रास्ता सूना था
और सड़कों पर था  शोर
अब न रात है न चाँद न रेल 





गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

मैनेजमेंट कला के फेर में बेचारा दिन और बेचैन रातें





मेरी शक्ल पर कुछ मुरझाए बादल और माथे पर टेड़ी-मेड़ी घटाएं देखकर एक दिन यूं ही मुझसे कहा गया था चीजों को मैनेज करना सीखो। चीजे मसलन,  सुख और दुख का मैनेजमेंट।  हंसी और आसूंओं का मैनेजमेंट।  इच्छाओं और कुंठाओं का मैनेजमेंट। प्रेम और नफरत का मैनेजमेंट।   शरीर और आत्मा का  मैनेजमेंट। 
 बेचारा दिन और बेचैन रातें
ये हंसी इसके सामने नहीं। इस इच्छा को यहीं अभी मार दो। इससे प्रेम करना अच्छा है और इससे सिर्फ दोस्ती रखो जब तक कि तुम्हे जरूरत है। शरीर की फिक्र करो अब आत्मा को कोई नहीं पूछता। गोया आत्मा कोई शादी कर चुकी अभिनेत्री हो। और प्रेम या नफरत कोई नहाने का साबुन जिसे कोई खूशबू के लिए खरीद रहा है तो कोई रंग गोरा करने के लिए। खैर, चीजों को मैंनेज करने के इस सुझाव पर अंदरखाने तो मैंने बहुत शोर मचाया लेकिन  बाहर से पड़ रहे बदलाव के दबाव ने मुझे बिना इतलाह के ही बदलना शुरू कर दिया है। जहां एक बड़ी चिल्लाहट दर्ज कर सकती थी अब वहीं एक गहरी खामोशी को इस तरह ओड़ लेती हूं जैसे शब्दों से ही अनजान हूं मैं। और इस खामोशी के बाद खुद से खफा भी हो जाती हूं। दरअसल दुनियावी होने में मुझे भी गुरेज नहीं लेकिन aमैं मायावी नहीं होना चाहती। सवालों का एक झंझावत सा मन में शोर मचा रहा है और मेेरे पास उन सवालों को दबा देने की मजबूरी के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। हर गहराती रात के साथ ये सवाल मुझे मुझसे मिलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन दिन की रोशनी में मेरी आंखे ऐसे चौंधिया जाती है कि फिर इन सवालों के जिक्र से भी कोफ्त होने लगती है। इस बदलाव के बाद क्या कुछ बचा रह जाएगा। सिवाए रात को सोने और दिन को खोने के। या फिर रात भी बेचैन रहेगी और दिन भी बेचारा सा।