सोमवार, 20 दिसंबर 2010

घर, शहर, दिल, दिल्ली और हम यानि मैं


अँधेरी रातों में चमचमाते चेहरे, भीड़ के बीच का एक शांत सा शोर, ठहर जाने की चाहत संजोये भागते दोड़ते लोग....पिछले तीन दिन मैं दिल्ली में थी. मैं दिल्ली की हूँ या दिल्ली मेरा शहर इस बात का फैसला अभी नही हो पाया है क्योंकि अक्सर आखिर में आकर चीजे रोजी रोटी से जुड़ जाती हैं ..जो मेरे लिए  दिल्ली में मुकम्मल नही हो  पाई...खैर एक महीने बारह दिन बाद वापस आकर अपने किराये की घर को दीवारों को महसूस कर, करीने से सजे बिस्तर को सलवटों से सराबोर कर न चाहते हुए भी अच्छा ही लगा...घर की बात, माँ के प्यार भरे हाथ और पापा के अचानक उमड़ पड़े दुलार की बात ही कुछ अलग होती है शायद..दूरिया प्यार बढा देती है ये बात भी प्रमाणिक होती नजर आने लगी है ..लेकिन कितनी अजीब बात है प्यार पाने और जताने के लिए उन्ही से दूर होना पड़ता है जिनसे दूर होने का सोचना भी कभी गवारा नही हुआ करता था...निरे बचपने से निकलकर नीरी समझदारी की बातें करना आसान नही होता....बताना कितना मुश्किल होता है ये अहसास कभी नही हुआ क्योंकि  माँ बाप दोस्त की तरह हमेशा कंधे और सर दोनों पर हाथ धरे रहे है ..छिपाना कितना मुश्किल होता है ये अब पता चला क्योंकि हर बात बताई नही जा सकती कुछ बात बताने लायक नही है और कुछ बता कर भी कुछ फायदा नही है...जिंदगी अपने से ही रंगों में रंगती जा रही है जहाँ मुझे हर रंग में मिलावट नजर आती है और सामने वाले को हर दृश्य सुनहरा प्रतीत हो रहा है...तीन सौ पैसठ दिन उस शहर में रहकर शब्दों का ऐसा आलोडन कभी नही रहा जैसा तीन दिनों के एक भाग दोड़ भरे सफ़र में हो रहा है .....जैसे तीन घंटे की एक पूरी फिल्म बन सकती है ..दिल्ली से लुधियाना की बस पर बैठने के वक़्त से न्यूज़ रूम में आकर ख़बरों से उलझने के दरम्यान कितनी ही बातें दिमाग में आती जाती रही ... जब छिपाया जाता है या यूँ कहूँ की बताया नही जाता है तो बहुत कुछ होता है कहने के लिए जिसे एक ख़ामोशी के साथ लिख देना ही बेहतर होता है .......पर क्या कीजे जब वक़्त कम हो और बात बड़ी औरत उलझी उलझी ...सब घर जाने की तयारी कर रहे है एक बजने वाला है मुझे  भी जाना है तबियत अब भी नासाज है ...बस घर पर ही ठीक रही थी घर की बात ही कुछ अलग है .......................हालाँकि घर अपना नही है किराये का है ...पर घर है 

रविवार, 12 दिसंबर 2010

एक चैन चाहतों की


  चाहतों की एक चैन सी है
हर पल में पलती बढती बिगडती 
प्रेम कहानिओ के बीच
तुम मुझे चाहते हो
और मैं जिसे चाहूंगी
वो शायद 
चाहता होगा किसी और को
उफ़ ! 
ये दफ़न होती जाती
अधूरी दासताएँ
ये बढ़ता अँधेरा
और सिमटते कोहरे में
दुबकती छिपती
अकेली रातें
और
ये सुबह भी मांग लाइ है जैसे
रात से कुछ सन्नाटा उधार
भरी दुपहरी में जैसे
सूरज को भी आ गई है नींद
शाम से कुछ उम्मीदें लगाये बैठे थे कि
सूरज मियां कि आँख खुली
और शब्बा खैर कहके
वो भी चलते बने
फिर क्या
फिर वही रात मिली
चंचल, अल्हड, महोश, मदमस्त, दीवानी सी
तारों की  महफ़िल में भी वीरानी सी
ये चाहतों की  चैन
तेरे मेरे दरम्यान ही नही है बस
दूर ऊपर भी कहीं 
चल रहा है चाहतों का 
अधुरा सा एक सिलसिला
चाँद चाहता है चांदनी को
चांदनी आसमान को
और आसमान निहारता है धरती को एकटक