शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

बस एक दिन

कुछ दिन पहले अलमारी की सफाई करते हुए अपनी पुरानी डायरियां पढ़ी
बहुत पुरानी, जब मैं ११ साल की थी
मैंने एक डायरी बनाई थी जिसमे मैं अपने मन की सारी बातें लिखती थी
जैसे आज स्कूल में क्या हुआ
मम्मी की तबियत खराब होने पर
या मेरी किसी प्रतियोगिता के बारे में 
और ऐसे बातें भी जो किसी किताब में पढ़कर
मुझे अच्छी लगती थी 
या कोई अच्छा सा गेम
क्योंकि मैं अक्सर कागज और कलम से खेले जाने वाले खेल ही खेलती थी  जैसे नेम, प्लेस, थिंग. या कोई लव गेम जैसे फ्लेमस... जिससे ये पता चल जाता था कि जिसके बारे में आपके मन में फीलिंग है उससे आपका रिश्ता क्या होगा, इन बातों को सोचती हूँ और डायरी में जब फिर से वही सब देखा सपनो का एक चंचल सा संसार तो लगा कि माँ के गर्भ से बाहर आने पर भी जब मैंने आंखे झोली होंगी तो मेरा कोई सपना ही टुटा होगा,  जिसकी भरपाई ये तमाम सपने भी मिलकर नही कर पा रहे. और मैं रात दिन- शाम दोपहर, हर पल नाजायज से ख्वाबों का बोझ पलकों में लिए घूम रही हूँ. वो पुरानी कवितायेँ  जो सवाल लेकर तब खड़ी थी वही सवाल आज वाली नई कवितायों में भी हैं. वही सवाल कि जिंदगी क्या
है, प्यार, दोस्ती, रिश्ते, अकेलापन, लक्ष्य, मंजिलें, रास्तें और वही सब. अब नफरत हो गई है इस वही सब से. जिंदगी इन्ही चीजों पर  घूम फिरकर लौटती रहती है...
कुछ ऐसी  बंदिशे हैं जिन्हें एक दिन के लिए ही सही लेकिन मैं तोड़ देना चाहती हूँ मरोड़ देना चाहती हूँ
जिंदगी के तमाम दिन गुजारते हुए
जिंदगी जीने के लिए एक दिन चाहती हूँ
बस एक दिन
लेकिन पता है !
परेशानी क्या है ?
पहली परेशानी तो यही है कि वो सारी डायरियां
ये सारी ब्लॉग पोस्ट
ये सब एक कसक का नमूना बनती जा रही हैं
जिसे मैं सहेजना भी चाहती हूँ
और
समेट भी लेना चाहती हूँ
और फिर उस एक दिन का जिक्र
जब जिंदगी
जिंदगी की तरह मिली
यूँ ही
हर हाल में
खुश रहने के
फलसफे की तरह नही



बुधवार, 4 जनवरी 2012

जब दो वक़्त मिलते हैं

वक़्त वक़्त की बहुत सी बातें है
शाम के एक ख़ास वक़्त पर
माँ कहती है
धुप बत्ती करो
संध्या समय है
उस वक़्त वो बाल नहीं सवारने देती
दर्पण में नहीं निहारने देती
ये  उनका एक अंध विशवास लगता है
पर जब माँ कहती है
दो वक़्त मिल रहे हैं इस वक़्त
दरिया भी रुक जाता है ...
तो ये मुझे
अपना एक
अनछुआ अहसास लगता है
जैसे वक़्त के रुक जाने की कल्पना से
मन सिहर जाता है
वक़्त आगे बढ़ने लगता है
तो जी घबराता है
.
.
ये माँ कैसी बातें करती है
कि इस वक़्त
एक वक़्त
दूसरे वक़्त
से मिल जाता है
जैसे सुबह को शाम
अपने आगोश में ले लेती हो
या सूरज की  देह
चाँद बनकर निकलती हो
दरिया कितना खुशनसीब है
जो वो रुक पाता है
ये देखने के लिए
मेरा तो सारा वक़्त ही
उस वक़्त की कल्पना करने में निकल जाता है


रविवार, 1 जनवरी 2012

नए साल पर कुछ पुरानी बातें

कुछ लफ्जों में कसक है
कुछ में है महक
जो कुछ  कहना है
इन दोनों के
दरम्यान की  एक  बात है
फिर सोचती हूं चुप रहूं
तुम्हें  एक  मौका  दूं
खामोशी को  पढऩे का
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संक्रमण का अजीब सा वक्त है ये
सुनसान रास्तों पर महफिल सी मंजिल का  सपना है
जज्बातों और जरूरतों की  दौड़ में
एक रहस्मयी जुस्तुजु की  जीत तय हो गई है
अब हम ऐसे रास्तों पर हैं
की  मंजिल पीछे छूट गई है।
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आंचल पसंद है मुझे
पर मैं इस आंचल को  ही
अपनी आरजू का परचम बनाकर
लहराना चाहती हूं
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रात में नींद नदारद
दिन में सपनों की  पैठ
किसी  उलझन में है वक्त
या यही नई उम्मीद की  शुरुआत है
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अंधेरों में एक  लौ जलती रहे बस
कम से कम चकाचौंध से
अंधे होने का  डर तो न हो।