रविवार, 31 अक्तूबर 2010

एक चुप सौ सुख

एक चुप सौ सुख
मगर इतना आसान भी नही है 
यूँ चुप रह जाना 
कितना भी हो 
थोडा या ज्यादा
लेकिन , मुश्किल तो है ही 
शब्दों को पी जाना 
होंटों को सी जाना 
कशमकश है कि
कह दूं तो 
शायद 
रातें खफा हो जाएँगी
ख़ामोशी से भी वैसी दोस्ती नही है मेरी
रहूंगी खामोश गर तो 
बातें जुदा हो जाएँगी
कैसे चुप रहूँ
इस मौन को तोड़ने के शोर के बीच
कैसे रहूँ स्तब्ध 
झंझावातों के इस दौर के बीच
मैं बोलती हूँ तो 
बोलने को वो मेरा कसूर बताता है
चुप रहने पर
चुप चाप ही जाने कौन
चुप रहने की सजा सुना जाता है
मैं अपनी जनम  कुंडली में 
खुद जो बना रही हूँ जिंदगी के निशाँ 
तो जमाना जिरह पाले है मुझसे 
मेरी हर बात ही पर एतराज जताता है 

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

परख

परख 
पलक झपकते ही जो बादल देते हैं कारवां
उनकी परख
प्रेम नाम के पर्यायवाची
भरे पड़े हैं जिनके शब्दकोष में
जान, जानम, जानेमन और  जिंदगी
जो कहते हैं अपनी हर महबूबा को 
उनकी परख
हर रात होना चाहते हैं 
जो हम बिस्तर 
चोरी छिपे
हर उस लड़की के साथ
जिसने मान लिया हैं
उनके शब्दों को पर ब्रह्म
या फिर वो 
जिसे नही है कोई परवाह लोकलाज की
जो खुद भी मिटाना चाहती हैं महज जिस्मानी भूख
इस जगमगाहट के जरिये
उनकी परख
रोजी रोटी और मकान के बाद
या इन तीनो से पहले एक और 
मूलभूत जरुरत है हमारे बीच
देह
देह की भूख
देह की मुक्ति
देह का समर्पण
जो देते हैं इस तरह के प्रवचन
उनकी परख
जो स्त्री को करना चाहते है स्वतंत्र समाज की  बेड़ियों से
और वही 
जो नही देख सकते 
अपनी बहिन, बेटी या माँ को 
किसी पुरुष के ख्वाब ख्याल
संजोते हुए भी
उनकी परख
जस्बातों के दरम्यान पनपती
जरुरत से प्रेम को बचाने के लिए
शायद  परख जरुरी है 


शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मासूम सी मुश्किलें

कदम दर कदम मेरे साथ रहती है
कुछ मासूम सी मुश्किलें
जैसे जानती हो
वो मुझे हमेशा से
मालूम चल जाता हो उन्हें मेरी हर आहट  का पता
मेरे हर मकसद की वजह

सुकून के एक छोटे से पल में
भी इनके आने का ही शोर रहता है
हर ख़ुशी से हो जाती हूँ मैं अनमनी   सी
मुश्किलों की उस सनसनी में 
फिर कौन साथ देता है 

अपना पराया तो महज दो शब्द हैं विरोधाभास के 
आखिर तो हर आदमी में एक आदमी रहता है
प्यार, वफा, नफरत, धोखा 
कहने को तो किस्से हजारों है 
मगर सब एक इन्तजार में हैं
चुप है यहाँ
की देखे कौन पहले कहता है 

जिक्र हो उठा कहीं उनकी कहानी का पहले तो फिर होगा ये सितम
की शब्द ढाएँगे जुलम
कहेंगे देखो भई 
उस शराफत के पैमाने में ही तो नशे का सारा चिलम रहता है