रविवार, 31 अक्तूबर 2010

एक चुप सौ सुख

एक चुप सौ सुख
मगर इतना आसान भी नही है 
यूँ चुप रह जाना 
कितना भी हो 
थोडा या ज्यादा
लेकिन , मुश्किल तो है ही 
शब्दों को पी जाना 
होंटों को सी जाना 
कशमकश है कि
कह दूं तो 
शायद 
रातें खफा हो जाएँगी
ख़ामोशी से भी वैसी दोस्ती नही है मेरी
रहूंगी खामोश गर तो 
बातें जुदा हो जाएँगी
कैसे चुप रहूँ
इस मौन को तोड़ने के शोर के बीच
कैसे रहूँ स्तब्ध 
झंझावातों के इस दौर के बीच
मैं बोलती हूँ तो 
बोलने को वो मेरा कसूर बताता है
चुप रहने पर
चुप चाप ही जाने कौन
चुप रहने की सजा सुना जाता है
मैं अपनी जनम  कुंडली में 
खुद जो बना रही हूँ जिंदगी के निशाँ 
तो जमाना जिरह पाले है मुझसे 
मेरी हर बात ही पर एतराज जताता है 

4 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

सुंदर रचना।

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

चुप्पी को साध लेने पर जिस सब का सामना करना पड़ता है...उन भावो का सुंदर वर्णन.

उपेन्द्र ने कहा…

very nice ............