बुधवार, 4 नवंबर 2009

मेरे शब्द

मेरे शब्दों में ही कहीं दूर खड़ी
दिखी है मुझे मेरी शक्सियत अक्सर
जिसे मेरा कहकर मगर मैंने
ख़ुद में बसाया वो शब्द सोर्फ़ मेरे नहीं थे
कभी किसी मुसाफिर की थकन में भी वाही शब्द थे
कभी किसी की शायर की कशिश को भी उन्होंने ही किया था बयाँ
किसी की दुआओं में भी भी शामिल रहे वो
और किसी की नफरत को भी होटों तक ला दिया था
किस तरह कहूँ की मेरे शब्द थे वो
अपना कहकर उन्हें मैंने ख़ुद ही को धोखा दिया था
किसी की जुबान से निकलकर
किसी के होंटों से होते हुए
किसी के कलामों में सोते हुए
मेरी कलम तक पहुचे थे वो
और मैंने कभी ख़ुद को उनमे
कभी उनको ख़ुद में कैद कर लिया था

सोमवार, 2 नवंबर 2009

तेते पाँव पसारिये जेती लम्बी सोड

घर में मेहमान आने वालें है । ये मेहमान रोज ब रोज आने वालें आम मेहमान नहीं है । कई साल बाद आ रहे है बहुत ख़ास मेहमान है ये । कब से इनकी खातिरदारी की तैयारी हो रही है हर चीज को चुस्त दुरुस्त किया जा रहा है । खोकली हो चुकीं दीवारों की मरम्मत की जगह उन पर डिस्टेम्पर से पैंट कर दिया गया है । नई चादरें परदे लाकर पुराने फर्नीचर को ढका जा रहा है । आवभगत में कहीं भी कोई कमी न रह जाए उसका हर सम्भव प्रयास किया जा रहा है । अब हर घर के सदस्य को अपनी जेब काटकर मेहमाननवाजी की गुल्लक में पैसे डालने होंगे । अपनी बेहद जरुरी जरूरतों को कुछ दिन के लिए अलविदा कहना होगा । हालाँकि बजट इतना बढ़िया नहीं है पर मेहमान को खुश करने के लिए कांच की क्रोकरी तो लानी ही होगी हमारे इस्टील के बर्तन तो नहीं ही जाचेंगे उनके गोरे चेहरों के सामने । भोजन के बाद कुछ मीठा भी तो चाहिए होगा अब थोड़ा उधार लेकर ही सही हलवाई से थोडी मिठाई भी मंगवानी ही चाहिए । जाते समय उन्हें खली हाथ थोड़े ही जाने देंगे तो बच्चों के लिए जो थोड़े पैसे जोड़ रखे है उन्ही में से निकलकर कुछ उपहार खरीद लेते है ।
जो व्यक्ति कुछ इस तरह की सोच के साथ मेहमान नवाजी की तयारी कर रहा हो उसे आप क्या कहेंगे ?? ..............मेरे ख्याल से तो वो थोड़ा सा सिरफिरा और थोड़ा सा भावुक है जो सेवा से ज्यादा यकीं दिखावे में करता है।
यकीनन अतिथि देवोभव ! मगर देव के सामने ये दिखावा कैसा ??
बिल्कुल यही सवाल कॉमनवेल्थ गेम्स की तयारी में हो रहे फालतू खर्चे पर भी उठता है । विदेशों का पता नही लेकिन भारत में जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने के संस्कार दिए जाते है तभी शायद आज विश्वव्यापी मंदी के बावजूद भी यहाँ ज्यादा खतरा नही मंडरा रहा । लेकिन सी डब्लू जी की मेहमान नवाजी के लिए सरकार कई जगह गैर जरुरी खर्च कर रही है और उसका बोझ जनता पर डाला जा रहा है । हाल ही में डी टी सी बसों के किराये में हुआ इजाफा इसका ताजातरीन उद्धरण है ।
आख़िर भुखमरी और कुपोषण से मरते निम्न वर्ग के लोगो और दाल आटे के बढ़ते भावों से ट्रस्ट मध्यम वर्ग के सामने विदेशी मेहमानों को लजीज व्यंजन परोसकर हमारी व्यवस्था किस झूठी शान का परिचय देना चाहती है ।
विदेश से आन एवालें मेहमान सिर्फ़ ट्रांसपोर्ट और इमारतों की साज सजावट ही नहीं देखेंगे उनके आसपास से गुजरने वालें चेहरों को पढ़ना भी उन्हें खूब आता होगा । बिना वजह के दिखावे से बेहतर होगा सरकार मेहमानों की मुलभुत अवश्यक्तायों में कोई कमी न आने दे ।