सोमवार, 28 दिसंबर 2009

हर शक्स यहाँ परेशान क्यों है (१)

कभी कभी बातें तय नही होती तुरत फुरत ही मुह से कोई कसीदा निकल पड़ता है ......ऐसा ही एक कसीदा मेरी माँ के मुह से भी निकल पड़ा उस दौरान मैं मीडिया में संघर्ष के किस्से कह रही थी अचानक उनके मुह से निकला ...."पता नही कैसा महकमा है ये !" सुनकर पहले तो मुझे हंसी आई लेकिन फिर लगा कि ये विस्मय बोधक वाक्य मुझसे कुछ न कुछ तो जरुर लिखवा लेगा । यूँ तो बहुत कुछ है लिखने को यहाँ (मीडिया)मगर क्या कह दे और क्या न करें बयाँ , इसलिए सोच नही पा रही हूँ कि क्या लिखूं और क्या नहीं । अच्छी खासी नौकरी कर रहे लोग जब मुझ जैसे बेरोजगार से ये कहते है कि हम तो भैया नौकरी छोड़ने कि सोच रहे है ...फिर ये सवाल भी साथ ही दाग देते है कि "मोहतरमा आप क्यों आना चाहती है इस फील्ड में ? जवाब बेहद आसन मगर सवाल बेहद मुश्किल । आपके साथ हुआ है कभी ऐसा मेरे साथ हर उस बार होता है जब मुझसे ये सवाल पूछा जाता है । मैं परेशान हूँ यहाँ अपने सपनो कि जमीं तलाशने के लिए.. लेकिन जब यहाँ आकर देखती हूँ तो उन सपनो कि हकीकत के साथ जी रहे लोग किसी और हकीकत को अपनाने का सपना पाले हुए है । आज ही किसी से बात कर रही थी तो बातों बातों में उन्होंने मुझे बताया कि यहाँ का माहौल ऐसा इसलिए है कि एक डॉक्टर साडी उम्र डॉक्टर बनकर जी सकता है एक इन्जीनिएर को पता है कि वो एक इन्जीनेइर बनकर अपने परिवार को पालेगा लेकिन एक पत्रकार ताउम्र पत्रकारिता करते हुए जीवन में ज़िन्दगी को जुटा पायेगा ये बहुत विश्वस्निये
बयान नही हो सकता । और भी बहुत कुछ है कहने के लिए अभी तो सफ़र शुरू हुआ है न जाने क्या कुछ देखना और लिखना हो सकता है ......सफ़र जारी है ....संघर्ष भी ..और कलम भी

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

रास्तें और मंजिल

उस शक्स को मोह है मंजिल का
और मंजिल
मोहताज है रास्तों की
रास्तों ने अपनी अलग ही राहें निकल ली है
और वो शक्स
ख्वाबों का बोझ लिए खड़ा है
बेहद दूर कहीं
रास्तें बेदर्द है है
और मंजिल बेक़सूर
न वक़्त ही मरहम है उसका
न उम्मीद ही दवा

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

हाल

गमें जिंदगी अब गंवारा नही होता

गरजते बादलों सी उम्मीदों से अब गुजारा नही होता