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सोमवार, 19 सितंबर 2011

मन शैतान हो गया है


मन करता है नास्तिक हो जाऊं
मन करता है किसी को नाराज कर दूँ
और कभी न मनाऊँ
किसी को दूँ बेइंतहा मोहब्बत
और फिर मैं भी बेवफाई कर पाऊं
मन करता है अहसासों का
अंश अंश निकालकर
किसी कूड़ेदान में फेंक आऊं
मन  करता है किसी पहाड़ी जगह नही
पकिस्तान में जाकर छुट्टियाँ बिताऊं
मन करता है तोड़ दूँ
सारे परहेज और रजकर खाऊं
मांगूं नही
छीन लूँ
अपना हर हक़ - अधिकार
मोड़ दूँ तोड़ दूँ मरोड़ दूँ
उन सारे गृह नक्षत्रों को जो मेरे
खिलाफ
हो गए हैं
काट दूँ सारी किस्मत की रेखाएं
हाथ से
और खुद सपनों की एक तस्वीर हथेली पर सजाऊं
अब मन करता है खुद  पर करूँ एक अहसान
भूल जाऊं
सबको
और याद रखूं बस अपना नाम
ये मन अब शायद चंचल नही रहा
शैतान हो गया है

बुधवार, 22 जून 2011

रात, चाँद और एक सवाल

सारा आसमान नीला था
मगर चाँद पर पड़ी थी
सफ़ेद बादलों की एक चादर
सब लोग सो गए
मगर रात बेचैन थी
चाँद चादर की ओट में से भी
बहुत कुछ कह रहा था
मगर रात खुले आम घूमते हुए
 भी खामोश थी
मैं एक टक चाँद को देखती
और एक पल रात को महसूस करती
ये वो समय था जब सारी कायनात शांत थी
पेड़ फूल  पत्ते कलियाँ
झील झरने सागर नदियाँ
सब
मगर मैंने सुना कि
रात और चाँद चीख चीख कर
बातें कर रहे हैं
चाँद है तो रात है
और
रात है तो चाँद है
मगर
चाँद वहां है
रात यहाँ है
ये कमबख्त खुदा कहाँ है





गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

क्या मैं नास्तिक हो गई हूँ

कभी तुम्हे देखा नही था मैंने
न कभी देखने की जरुरत ही दिखी '
मेरे मन में तुम्हारे लिए नमन था
कब से मैं नही जानती
माँ की दिया- बाती में मुझे
तुम्हारी रौशनी दिखती थी
मंदिर की घंटियों में मैं
तुमसे कुछ कहने की धून सुनती थी
सारे मंत्रो और श्लोको को
रट लेना चाहती थी , तुम्हे खुश करने की खातिर मैं 
मेरी दुआओं की बढती फेहरिस्त में से 
तुम कुछ भी हटा न दो 
ये भी मेरी एक दुआ थी तुमसे 
नियम , धर्म, व्रत, उपवास 
सब करती रही 
सारे तर्कों को भुलाकर मैं 
तुम्हारी निराकार सत्ता को 
सिहासन पर बिठाये 
निरंतर प्रयास में लगी थी 
की जीवन की गुत्थी सुलझ जाये 
मगर बिन खटकाये कब 
वो निराकार सत्ता 
एक अंधकार में समा गई 
मैं नही जान पाई 
आस्था के टुकड़े 
और उम्मीद की टोकरी लिए 
निर्जन से वन में अकेली रह गई थी
एक सवाल के साथ
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क्या मैं नास्तिक हो गई हूँ
या फिर
उस निराकार शक्ति का अस्तित्व न होना ही
एक सच
है

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...