मंगलवार, 25 जनवरी 2011

लम्हा लम्हा तनहा तनहा अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ





लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
चाँद की चांदनी में खामोश रात
सूरज के उजाले में बेचैन दिन
वक़्त के सायें में सिसकते जज्बात
और साथ होकर भी जीना तेरे बिन
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
हवा के महकते झोंको
में उचटता सा मन
बादल गरजकर बारिशें लाकर
हर शय  को भिगोता सावन
और गीली गीली भीगी भीगी सी इस रुत में
सुखा रह जाता मेरा दामन
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
लम्बे रास्ते दूर मंजिल
चलने का शौंक
और
पहुँचने का हुनर भी
फिर मिलना दिलों जाँ को
तोड़ देने वाली एक थकान
महफ़िल से गुजरकर
वीरान सा एक मकाम
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
सांसो के एहसास से धड़कन की आवाज तक
कई मर्तबा तुझे खोकर
फिर से पाने की तारीख से आज तक
न जाने कितनी बार
मैंने खुद को तेरा होते हुए पाया है
और अब
जिंदगी का यूँ तुझे पराया कर जाना 
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

तन्हाई पर नहीं 'रजाई' पर लिखूं



 आज सोचा कि
जिंदगी की तन्हाई पर नही 
हर रात मुझे गुदगुदाता है जिसका अहसास 
अकेले से बिस्तर की उस रजाई पर लिखू 
उन बातों पर नहीं
जिनसे बेमानी हो गए थे रिश्ते 
उन मुलाकातों पर लिखूं 
जिन्होंने हर बार दे छोड़ी 
दोबारा मिलने की एक वजह
उन किस्सों को न फिर से आम करूँ आज 
जिन्होंने हर खास पल को बना दिया था खोखला
अब लिखूं वो कहानिया 
जिन्होंने राजा रानी की ख़त्म हो चुकी कहानी को भी 
आगे बढ़ाने का होंसला दिया 
करूँ कुछ ऐसा क़ि
चाँद शर्माए और शिद्दत भी शर्मिंदा हो जाए 
देश दुनिया से दूर किसी द्वीप पर '
कोई ताजमहल नहीं 
एक तस्वीर बन आऊं 
बस एक वो ही न जान पाए
उसकी बेकरारी का मुझ पर असर 
और सारी कायनात को खबर हो जाए
क्यूँ लिखूं मैं कुछ दिल पर
दिल की बातों पर 
या दिल के बारे में
आज जिक्र करना चाहिए मुझे धड़कन का 
जिसने दिल के हर बदलते रुख को दिया है 
आगे बढ़ने का रास्ता 
ख्वाइशों और खामोशियों पर जाने कितना कुछ लिखा गया है आज तलक 
आज सोचती हूँ लिखूं उन इशारों पर 
जिन्होंने हर बार किया था खबरदार 
दिल की बातों में बह जाने से
दिखाया था आईना कई बार 
मिलाया था 
मेरे ही अक्स में मेरी जिंदगी से जुड़े हर अफ़साने से
उसने नहीं लिखे थे कभी ख़त मुझे 
भेजे थे कुछ एस ऍम एस 
संक्षिप्त सन्देश सुविधा के तहत
आज रोक लूँ मैं किसी तरह खुद को 
न पढूं दोबारा से उन शब्दों को 
जिन्होंने हकीकत से रुसवा कर दिया मुझे 
आज याद करूँ उन इमारतों को
जहाँ बचपन में मैंने अनजाने ही लिख दीये थे 
दो नाम 
एक बेनाम प्रेम कहानी के
क्यों ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ?
सही सोचा है न मैंने 
जिंदगी की तन्हाई पर नहीं 
अकेले से बिस्तर की रजाई पर लिखूं



बुधवार, 12 जनवरी 2011

आखिर ये मुद्दआ क्या है





हर रोज ऑफिस आते हुए मैं मंदिर के सामने से गुजरती हूँ
हाथ जोडती हूँ और कान पकडती हूँ
बचपन की आदत है
माँ अक्सर चलती बस से भी इशारा कर मंदिर की तरफ सर झुकाने  के लिए कहती थी जाने अनजाने किसी का दिल दुखाने और गलतियों की माफ़ी मांगने को कहती थी हालाँकि इस बात के अपने अलग तर्क हो सकते है कि माफ़ी मांग लेने से गलती सुधार नही जाती लेकिन ये माँ कि बात है जिस पर हर तर्क फीका पड़ जाता है उसी तरह तब  की ये आदत आज तक बरकरार है ...और गलतियां भी तो नही रुकी फिर चाहे बचपन हो या जवानी. खैर
वहां हर रोज मैं मंदिर में एक महिला को देखती हूँ उनके अलावा मंदिर में सिर्फ पंडित जी होते है जो अक्सर बाहर आकर बातें करते हुए दिखते है
वो महिला अकेली ही मंदिर में भजन गाती है ..कभी राम रूप में आना कभी श्याम रूप में आना ... प्रभु जी चले आना
मंदिर के आलो में दीये जले होते है...एक अजीब सी सुकून देने वाली और चुभने वाली शांति भी होती है जो कभी कभी सन्नाटे जैसी भी लगती है ...ऑंखें बंद किये ढोलक की थप से अपने सुर मिलाने की कोशिश करती वो महिला गीत गाती रहती है
भगवान् को बुलाती रहती है पता नही वो वापस कब जाती होगी
पता नही भगवान् उसके बुलाने से आते होंगे या नही
क्या ये भगवान् को बुलाने का तरीका है या फिर खुद को बहकाने का
यहाँ मुद्दा
न आस्था है
न भगवान्
न अरदास
बात ये है कि
इंसान जीवन के यथार्थ पर नहीं बल्कि सपनो पर जीता है.
ऐसे सपने जो कभी कभी बिलकुल बेमानी होते है और कभी कभी ऐसे कि सपने जिंदगी बन जाते है
पर उस महिला को देखकर फिर भी बहुत से सवाल सामने आ जाते है
क्यों गा रही है ये अरदासों के ये गीत जब हर कोई मशगूल है अपनी जिंदगी में
मंदिर का पंडित भी मंदिर से बाहर बगले झांक रहा है







बुधवार, 5 जनवरी 2011

मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा.. ?





कितने दिन हो गए इस शहर में आये...आज भी हर शाम अलसाई सी है और हर सुबह ललचाई सी है. हालाँकि  इस शहर की  आबोहवा में खुद को तबसे ही शामिल कर लिया था जब दिल्ली से आ रही बस की खिड़की से मैंने वो बोर्ड देखा था. .. वेलकम टू लुधियाना सिटी . ये कोई  टूरिस्ट स्पोट नही था न ही कोई हिल स्टेशन, ये मेरी जिंदगी का पहला destination है ,  जहाँ मैंने अपने सपनो की तरफ अपना पहला कदम रखा था. शहर को जाना.. देखा.. जहाँ तक देख सकती थी, फिर लिखा भी.. उन बातों को जो चुभी जिन्हें महसूस किया. लेकिन लगा और लगातार लग रहा है कि शहर ने मुझे नही अपनाया. एक अजीब सा अकेलापन है यहाँ. हालाँकि अकेलापन अजीब ही होता है लेकिन मैं ये कहूँगी  कि ये अकेलापन अजीबोगरीब है. अजीब इसलिए कि अकेलेपन को दूर करने के जो उपाय है उन पर अमल नही हो पा रहा और जिन उपायों को अपनाने का मन है उन्हें खरीदने की पहुँच अभी नही जुटा पाई हूँ.
सार संक्षेप ये है कि यहाँ मन लग रहा है रम नही रहा. कुछ लोग यहाँ आकर लुधियानवी हो गए और मैं अब तक वो वजह नही जुटा पाई जिससे लुधियाना के कुछ लम्हे बटोर पाऊ अपनी यादों के लिए. नाम के साथ सरनेम जोड़ना तो दूर की बात है.
लोग अच्छे नहीं है जब ये सोचती हूँ तो लगता है क़ि मैं खुद भी तो बहुत बुरी सी हो गई हूँ शायद. और फिर किसी ने कहा क़ि पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा शायद इस शहर के साथ भी मेरी चाहतों का कुछ ऐसा ही सिलसिला  चल रहा है. मैं ही नहीं छू पाई हूँ यहाँ क़ि रूह को.. खैर आजकल तो धुंध भी बहुत है रूह को ढूँढ पाना फिर से एक मुश्किल भरा काम होगा. न जाने क्यों दिल चाहता है क़ि मैं उस रूह को न तलाश करू वो रूह खुद ब खुद मुझे दूंढ ले
 पहले से भी ज्यादा आलसी हो  गई हूँ यहाँ आकर ...............  

शनिवार, 1 जनवरी 2011

बीता साल- एक अलग शब्द, एक अनकहा अर्थ

बहुत सारा समय बीत गया
या सिर्फ एक साल ..
कविता सी रही जिंदगी
वक़्त से कदमताल करती हुई
या
उतार चढाव ने दी
एक अधूरी आखरी पंक्ति वाली
कहानी की  शक्ल
जिंदगी को
ख्वाबों को मिला खुला आसमान
या
अरमानो की आंधी में उड़ चले
मजबूर लम्हे और उलझे मसले तमाम 
बात कहकहो की बारात की
या
कुम्हलाया रहा सूरज जिस दिन
उस रात की बात
मामलात वो जिन्होंने तसव्वुर
को महका दिया
या
वो मशविरे जिन्होंने बेहद
मासूमियत से दगा दिया
बहुत सी शख्सियतें
और कुछ एक शख्स
या
महज एक बंदा खुदा का(माँ)
जिसने साल भर मिसाल बन
जीना आसान किया
जिसने हर साल, हर महीने, हर हफ्ते, हर दिन, हर पल को
अपने आंचल से छान
मुझे हर धूप से बचा लिया
फरवरी के महीने में भी जो खिले हुए फूलों से खरखराहट
सुनी थी मैंने
और जून की दोपहरी भी वो
जिसने पसीने को पहलूँ में छुपाने का लुत्फ़ दिया
एक अलग सा शब्द रहा वो साल जिसने
एक अनकहा अर्थ दिया