शनिवार, 11 मई 2013

भरोसे को तो बदनाम मत कीजिए


वे कच्ची उम्र के नहीं थे।
जवानी को पार करके काफी आगे निकल चुके थे।
दो जवान बच्चों की शादी कर चुके थे।
अच्छे खासे बुजुर्ग व्यक्ति थे।
बातों ही बातों में कमिटमेंट की बात चली और उन्होंने तपाक से कहा-
कमिटमेंट तो होता ही तोड़ने के लिए है। फिर इतना क्या डरना!
अब मुद्दा यहां यह नहीं है कि किस मुद्दे पर उन्होंने यह बात कही।
मुद्दा यह है कि उन्होंने यह बात कही।
उन्होंने यानी 65 बरस के एक ऐसे व्यक्ति ने जो अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल जिंदगी में उम्र के इस पड़ाव पर भी पूरी तरह सक्रिय है।
मैं यहां सिर्फ यह सब इसलिए नहीं लिख रही कि
मुझे उनकी बात बुरी लगी
या
बुजुर्ग उम्र के व्यक्ति का ऐसी बात कहना शोभा नहीं देता।
मैं यहां यह सब इसलिए लिख रही हूं कि 
बच्चे, बूढ़े, जवान
अमीर गरीब
महिला पुरुष
हर उम्र, लिंग और वर्ग का व्यक्ति यह बात अच्छे से मान चुका है कि कमिटमेंट होता ही तोड़ने के लिए है।

कैसी मान्यता है ये!

कहां से आई है?
क्या हमारे ही दिए हुए धोखे, दगा और अविश्वास ने हमारे ही आसपास के लोगों को ऐसा बना दिया है।
या फिर एक रस्म शुरू हो गई है इनसानों के बीच 
उन बादलों की तरह जो जेठ की दोपहरी में गरज-गरज कर जी को जलाते हैं, मन को ललचाते हैं और बिना बरसे ही चले जाते हैं।
आसमान में बादल को देखकर भी धरती के सूखे रह जाने जैसा ही होता है वह पल
जब हम आप एक दूसरे को दिलाए गए भरोसे पर खरे नहीं उतरते।


भाषण देने का तात्पर्य बिलकुल नहीं है।

लेकिन एक टीस है
जिसे निकालने की शैली में भाषणनुमा वाक्य घुसपैठ करते जा रहे हैं
और मैं उन्हें रोक नहीं पा रही हूं। 


बात सिर्फ प्यार, मोहब्बत के कमिटमेंट की नहीं है।

बात उस बात की है
जब एक कामयाब बेटा अपने बूढ़े मां-बाप से हर‌ महीने मिलने और घर खर्च के पैसे देने का वादा करता है और किसी भी महीने मिलने नहीं आता।


बात उस बात की है 

जब आज की कामकाजी मां हर दिन अपने बेटे को यह विश्वास दिलाती है कि वह उसके साथ दफ्तर से आकर जरूर खेलेगी, लेकिन हर दिन वह घर आकर अपनी थकान को ज्यादा प्रमुखता देती है और बच्चे का भरोसा टूटता जाता है।


बात उस बात की है

जब एक लड़का एक लड़की को प्यार करने के साथ-साथ उस शादी के भी सपने दिखाता है, जिसका न हो पाना पहले से तय होता है।


बात उस बात की भी है

जब एक लड़की यह जानने के बावजूद कि वह अपने प्यार और मां-बाप में से हमेशा मां-बाप को ही चुनेगी, लड़के को अपने प्यार में बांधे रखती है, पिंजरे के पंछी की तरह।


बात उस मामूली सी बात की भी है

जब हम यूं ही अपने साथ काम करने वाले को विश्वास दिलाते रहते हैं, उसकी मदद जरूर कर देंगे। उसके काम की चीज जरूर लाकर दे देंगे।
और हफ्ते दर हफ्ते 
''ओह मैं तो भूल ही गई''
''अरे कल पक्का''
जैसे संबोधनों और खिलखिलाहट में सच को छिपाते रहते हैं।


आखिर में बात सिर्फ इतनी है कि आप मत कीजिए वह काम जो आप नहीं करना चाहते

नहीं कर सकते
चाह कर भी नहीं
लेकिन कम से कम भरोसे को तो बदनाम मत कीजिए।
माना कि उम्मीद पर दुनिया कायम है
लेकिन उम्मीद भी तो ऐसी हो, जिसे पचाने के लिए कायम चूर्ण की जरूरत न पड़े।

''

मैंने भाषणबाजी न करने का भरोसा नहीं दिलाया था। 
''
;)