शनिवार, 29 मई 2010

डूबता सूरज


उगते सूरज को मैंने कभी नही देखा
रात भर नींद से चली अनबन जब तडके ख़त्म होती है
तब अक्सर आँख लग जाया करती है
और यूँ
हर बार छूटता रहता है
वो दृश्य
जबकि मैं देख पाती एक स्वर्णिम सवेरे को
मगर हर दिन, जब ढलती है शाम
मैं देखती हूँ
डूबते सूरज को
सफ़ेद से स्वर्णिम
स्वर्णिम से सफ़ेद
आग की तरह तपकर भर दिन
शाम को जब ढलता है तो
फिर कुछ पल बाद
एक नए रूप में निकलता है
लोग उसे चाँद कहते है
मुझे तो डूब चुके सूरज का
अक्स लगता है
.
.
प्रकाश भी उसे सूरज से मिलता है
पल भी वो सूरज के लेता है
प्रेमी उसमे अपना महबूब तलाश लेते है
बेशक
मगर
प्रेम के अर्थ तो सूरज ही देता है

सोमवार, 24 मई 2010

मुखोटे लगा लो , मनी कमा लो

तू बेवकूफ है झूठ नही बोल सकती थी ...........
तेरी शकल पर झलक जाता है तेरे मन का भाव ....ऐसे कैसे काम करेगी तू
अच्छी बातें करने वाले सारे लोग ही अच्छे हो ऐसा जरुरी नही होता ...जितना दूर रह सको ऐसे लोगो से उतना दूर रहो ................
उसने पुछा और तुने बता दिया ......बेवकूफ कहीं की ........कुछ नही हो सकता तेरा .......
ज्यादा मेहनत और लगन से काम करने की कोई जरुरत नही है ..काम कोई नही देखता .............
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यूँ ही अगर लिखती जाऊं तो बात बहुत लम्बी हो जाएगी
ये तमाम वाक्य...अक्सर उस लड़की को कहे जाते रहे है जो इस दुनिया में रहकर भी उस जैसी नही बन पा रही है ....यहाँ मैं ये भी कहना चाहूंगी कि बात सिर्फ उस एक लड़की कि नही है ...न जाने कौन कौन हो इस तरह के दो पाटो में शामिल ...........
बचपन की  पढाई लिखाई और युवा मन के सपनो के साथ आप जब आगे कि दुनिया में बढ़ते है तो दृश्य बदलने लगता है .......जो आँखे फाड़ फाड़ कर इस दृश्य का लुत्फ़ उठा लेते है वो आगे कि इस दुनिया में आगे बढ़ जाते है और जिनकी आँखे इस अजीब तरह के प्रकाश में चुंधिया जाती है वो पहले आंखे मलते है और फिर हाथ मलते रह जाते है ............जो बातें मैं लिख रही हूँ ,  बिलकुल भी नई नही हैं ..कहानी, उपन्यास और फिल्मों में कई बार संघर्ष के ऐसे किस्से कमाल कर गए है ........मगर हकीकत में भी जब एक ऐसे बॉक्स के ऑफिस पर आपको हिट होने के लिए मेहनत करनी पड़े जिसका कोई रिश्ता आपके काम से नहीं है .......तो साडी पढाई लिखी और सपने कूड़ेदान में ड़ाल  देने का मन करता है ........वैसे इन निजी भावनाओ के आलावा भी कुछ तथ्य है जो इन हालातों के लिए जिम्मेदार है ................
PROFESSIONAL बनो
जब अप नौकरी करने निकलते है तो आप के निश्छल और कभी मुर्खता भरे स्वभाव को देहते हुए कहा जाता है क़ि
PROFESSIONAL बनो ..........सच मत बोलो .......सब कुछ छुपाओ ...काम आता हो तो भी मत करो.....बॉस के सामने न आता हो तो भी करने का दिखावा करो ........ये कुछ ऐसे टिप्स है जो तथाकथित PROFESSIONAL बन्ने में आपको मदद करते है ........... कभी कभी मैं सोचती हूँ अगर ये पैमाना न होता तो देश कहीं आगे होता ..यहाँ हर जगह इंसान को नोचा जा रहा है ......जो काम करना चाहता है उसे करने नहीं देते जो नहीं करता उसे फलक पर बिठा देते है ...कौन क्यों कब कहाँ कैसे पहुँच गया .......आप सोचते रह जाइये लेकिन  कुछ नहीं सूझेगा ...अगर सूझ भी गया तो उस रास्ते पर चलने के लिए आप शायद खुद को तैयार न कर पाए ..........आखिरी रास्ता कता बचा ...अलग अलग सूरते तय करती है ...कभी मुड जाना हुआ .......कभी लौटा आना ......कभी खुद को अलविदा करके एक मुखोटे को अपनाना .................फिर फराज के वो शब्द कि .......मंजिले दूर भी है ....मंजिले नजदीक भी ....अपने ही पाँव में कोई जंजीर पढ़ी हो जैसे ........

बुधवार, 19 मई 2010

हमें अपना हुनर मालूम है

एक चाँद ही को पाने का न सोचा हमने
वर्ना हर एक सितारे क़ी चाहत रही
वो टूटे तो घूरा गुस्से से आसमान को 
क़ि क्यूँ न संभाल सका वो हमारे प्यार को 
वो टिमटिमाये तो दुआओं में भी
उनकी ही वफा मांगी  
सिर्फ उगते सूरज को ही
न झुकाया है सर हमने
डूबते सूरज क़ी लाली को भी
सराहा है न जाने कितनी शामों में
सफ़ेद सी रौशनी का वो पीलापन
जाते जाते भी एक
चमक छोड़ जाता है 

समुंदर तक तो पहुंचे ही न
कभी कदम अभी तक
औकात से बाहर हम जाते भी नहीं है
नदिया भी यूँ सब न देखि है हमने
कुछ तालाब, सरोवर और झील के किनारे ही अक्सर
हमें हर वक़्त से प्यारे हुए है

बाग़ बगीचे लगाने क़ी चाहत है हमेशा से
हालाँकि रोप नहीं पाई एक पोधा भी अपने हाथों से
पैसे वाला वो पेड़ कई बार लगया है कांच क़ी बोतल में
मगर बेजान होकर मुरझा जाति है अक्सर उसकी पतिया
कुछ किया हो न 
पर प्रेम भरे उस गुलाब पर एतराज किया है हमेशा 
जो झूठे दिखावे के लिए बाग़ से तोड़कर 
प्रेमिका को देते है लोग 

ऊँचाइयों से फासला ही रखा है हमेशा गहराई में जाना हुआ है अक्सर
छोटे छोटे शब्द ही ख़ुशी बनते गए है बड़े बड़े गम के कारखानों में

सोमवार, 17 मई 2010

कुछ सवाल - स्त्री ( मुक्ति या मौत )


कुछ दिन पहले मोबाइल पर एक एस ऍम एस आया ...


एक लड़की बस स्टॉप पर खड़ी थी


तभी वहां एक आदमी आया और बोला


ऐ चलती है क्या नौ से बारह


लड़की ने पलटकर देखा


और कहा


पापा


मैं


हूँ


मेरे छोटे भाई-बहिन जो इस सन्देश कि गहराई को भांप नहीं सके उन्हें इस पर हंसी आ गई ..लेकिन मेरे सामने एक गंभीर द्रश्य अंकित हो गया ..जिसने कई परतो को पलटना शुरू कर दिया.


उनमे से एक समसामयिक परत है निरुपमा कि मौत का मामला ....ये मौत हत्या है या आत्महत्या इसकी गुथी हर मामले कि तरह न जाने कब तक सुलझेगी लेकिन कुछ उलझाने वाले सवाल ये है कि अगर सच मुच में निरुपमा की हत्या की गई है तो उसकी मुख्य वजह क्या है ......एक दूसरी जाति के लड़के से सम्बन्ध या फिर उसका बिन ब्याहे माँ बनना .......इस सवाल का जवाब तो हत्या करने वाले को ही ठीक ठीक मालूम होगा.लेकिन अगर ये हत्या है तो इसे सिर्फ निरुपमा की


हत्या नहीं माना जाना चाहिए ...हर उस लड़की के लिए मौत का एक प्रस्ताव पेश करने वाली इस घटना पर अलोक धन्वा के ये शब्द काफी कुछ कह जाने में मदद करते है ................. सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है / तुम्हारे टैंक जैसे बन्द और मज़बूत / घर से बाहर / लड़कियाँ काफ़ी बदल चुकी हैं / मैं तुम्हें यह इजाज़त नहीं दूँगा / कि तुम अब / उनकी सम्भावना की भी तस्करी करो / वह कहीं भी हो सकती है / गिर सकती है / बिखर सकती है / लेकिन वह खुद शमिल होगी सब में / ग़लतियाँ भी ख़ुद ही करेगी / सब कुछ देखेगी / शुरू से अन्त तक / अपना अन्त भी देखती हुई जायेगी / किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी.


मेरा ये सब लिखना लड़कियों के घर से भागने को सही ठहराने के लिए नहीं है ...बल्कि अभिभावकों के संक्रिन और अड़ीयाल रविये को गलत बताने के लिए है ....क्योंकि घर से भागने की वजह कहीं न कहीं घर से मिलने वाले प्यार और सहयोग की कमी भी है ....


दूसरी बात जो इस घटना से उठी है उसमे स्त्री मुक्ति से जुड़े कुछ सवाल उठ खड़े हुए है .....आधुनिक संसाधनों का भरपूर प्रयोग करने वाले प्रहरी निरुपमा के PREGNANAT होने की खबर सुनकर ये प्रश्न उठा रहे है क़ि उसके जैसी पढ़ी-लिखी लड़की को क्या गर्भ निरोधक के बारे में जानकारी नहीं थी ....अगर वेह उनका इस्तेमाल करती तो शायद उसकी ये नियति न होती ................जाने माने लेखक और विचारक राज किशोर जी का ताजतार्रिन लेख अखबार में पढ़ा तो स्त्री मुक्ति का ये प्रश्न और भी गहरा गया ....जादुई गोली के पचास साल ...यहाँ वो जादुई गोली का इस्तेमाल गर्भनिरोधक गोली के लिए कर रहे है ....वेह कहते है ...इस गोली ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकर्तिक जंजीर से मुक्ति दी है ..अगर ये गोली न होती तो यौन क्रांति भी न होती . यौन क्रांति न होती तो स्त्री स्वंत्रता के आयाम भी बहुत सिमित रह जाते ..इस गोली ने एक महतवपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है क़ि यौन समागम कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है ...यह वैसा ही है जैसा एक मानव व्यवहार है जैसे खाना, पीना या चलना-फिरना ........


अगर बिना कोई तर्क किये इन शब्दों पर सहमति क़ि मोहर लगा दी जाति है तो स्त्री विमर्श के लिए उठने वाले सभी सवाल खुद ही ढेर ही जायेंगे .....................लेकिन क्या ये इतना आसान होगा भावनात्मक और प्रयोगात्मक दोनों सूरतों में क्या शब्दों क़ि ये आजादी समाज में अकार ले सकती है ...................ये बेहद पेचीदा प्रश्न है. सम्भोग अगर आजादी है तो ये समाज उसे कब क्या नाम देगा इसक़ि आजादी वो हमेशा से लेता आया है ......यूँ तो पत्नी ...नहीं तो प्रेमिका ........और वर्ना वेश्या





शुक्रवार, 14 मई 2010

भ्रष्टाचार-रिस रहा है मवाद

आस पास से शुरू करे तो सब कुछ खूबसूरत लगता है. रोटी और सुकून के लिए जद्दोजहद करते चेहरों के बीच यह कहना बेहद मुश्किल हैं की कौन भ्रष्ट है. एक एक चेहरे को परखने लगे तो सभी और सबके भीतर झांके तो कोई भी नही. फिर भी क्यों हमारी छवि भ्रष्ट होती जा रही है. क्या हम अकेलेपन में बेहद इमानदार और समूह में बहुत लालची है. या फिर सारा कसूर इस व्यवस्था का है ...वही हमें भ्रष्ट बना रही है....दरअसल
किसी व्यक्ति का व्यवहार कब भ्रष्ट होता है। ये सवाल आज की परिस्थितियों में बिलकुल बचकाना लगता है। वास्तविक सवाल यह है की हम कब भ्रष्ट नहीं होते? रिश्वत देना तो खुद पापा ने सिखाया...यह महज एक मनोरंजन प्रधान फिल्म के गीत के बोल नहीं बल्कि समाज की हकीकत है। अगर तुम क्लास में प्रथम आयोगे तो हम तुम्हे साईकील दिलायेंगे, बचपन में मिलने वाले इस प्रलोभन के साथ बड़प्पन आने तक कई दूसरे आयाम जुड़ जाते है। शोहरत और बुलंदियों तक पहुंचने का सपना , इस जैसा..उस जैसा बनने की तमन्ना में नैतिकता के नारों का शोर स्व हित को साधने वाले सन्नाटे में तब्दील हो जाता है। इससे स्वार्थ सिद्धी का ऐसा मकड़जाल तैयार होता है की कोई अपनी मर्जी से और कोई न चाहते हुये भी उसमें फंसता ही जाता है। भ्रष्ट आचरड़ की शुरुआत घर से होती है और बाहर आकर बीज रूप में पनपा यह भ्रष्ट आचरड़ ऐसा पेड़ बन जाता है जिसकी सिंचाई के लिये रिश्वत, धोखा, धांधली और घोटालों की खाद तैयार की जाने लगती है। इस खाद का साइड एफ्फेक्ट गरीब और कमजोर भुगतते हैं। इससे एक तरफ गरीबी उनमूलन की योजनाओं का बंटाधार होता है, दूसरी तरफ कानून और न्याय की नींव हिलती है।


फलती फूलती फसल


बीज से पेड़ बनने के बाद भ्रष्टाचार को फलने फूलने का माहोल देती है हमारी सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था। इस व्यवस्था में निजी पूंजी को फैलने की बेलगाम आजादी दी जाती है। इस के लिये तमाम नियम--कानूनों को तोड़ कर, जिम्मेदार अफसरों को साझीदार बनाकर जरुरत मंद जनसंखया को किनारे कर दिया जाता है। मामूली से दफ्तर से से लेकर बड़े प्रशासनिक कार्यलयों तक ऐसे कई बाबू है जो आप को इन शब्दों की बानगी दिखाने के लिये हमेशा तत्पर दिखाई देंगे। इसी लिए ही शायद कहा जाता है की भ्रष्टाचार का सबसे ताकतवर त्रिगुट राजनीटिक नौकरशाह और व्यापारी का है। तीनों अपनी पूंजी की बाल्टियां भरने के लिये पूंजीपतियों से


लेकर आम इंसान का इस्तेमाल करने में गुरेज नहीं करते। अब अगर भ्रष्टाचार को ‘पूंजी का पूंजी के लिये पूंजी के पुजारियों द्वारा किया गया गलत इस्तेमाल कहें’ तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। आलम यह है की भ्रष्टाचार की फसल को अनुकुलीत करने वाले ही आयोग बना कर जांच का आदेश देते है। यह आयोग महज खानापूर्ति भर होते है वर्षों तक जांच चलती रहती है और भ्रष्टाचार का मवाद नासूर बनकर गरीब, लाचार जनता का शोषड़ करता रहता है।


फसल को गिजा-पानी देती जनता


जिस व्यवस्था के अंदर ये फसल फल फुल रही है उस का अहम अंग है हम यानि जनता। नौकरशाह बेशक कितने ही तानाशाह क्यों न हो जाये लेकिन इस फसल को पानी देने में जनता के योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता । इस पहलू की खास बात ये है की जनता भ्रष्टाचार को मुद्दा ही नहीं मानती। उनके बीच ये सोच विकसित होती जा रही है की ऐसा तो होता ही है। यह उदासीन आच्रद ही सबसे खतरनाक साबित हो रहा है। इसी का नतीजा है की इस फसल से हर साल नए-नए फल मिल रहे है।


फिर चाहे वह बरसो पुराने कुछ घोटाले हो या कुछ एक साल पहले वाला सत्यम घोटाला या फिर ताजा ट्रेन खेल में खेला गया खेल यानि आई पी एल






गुरुवार, 13 मई 2010

वापसी का विकल्प

आगे बढ़ना किसे अच्छा नही लगता ....लेकिन ऐसे वक़्त में जब कदम लड़खड़ाने लगे तब .........................................
वापसी का विकल्प होना वरदान सरीखा हो जाता है ........वर्ना तो लौटना आखिर कौन चाहता है बीच सफ़र से

गुरुवार, 6 मई 2010

पतंग से जुडी जिंदगी की डोर


शादी को लेकर दुनिया भर में तमाम विचार प्रचलित है. दार्शनिक या  विचारक हो या फिर हर शक्स की निजी सोच ...शादी से जुड़े विचार की गहराई में उतरना आसान नही लगता. कही सोच ..अनुभव को बदल देती है तो कही अनुभव... सोच को. इन तमाम उहापोहो के बीच एक सर्वमान्य   सच ये  है की शादी दो लोगो के बीच का एक सम्बन्ध है जो जीवन भर के लिए जोड़ा जाता है. हाल ही में उठे विवाद हो या सदीओ पुराने अत्याचारों की दस्ता इनकी जड़ में जो बात खाद पानी की तरह डाली जा रही है  उसके मूल विचार में कई बातों की घाल मेल है 
शादी समान जाति-धर्म  के लोगो में हो ....समान गोत्र न हो....बिरादरी ऊँची हो....बहुत आगे जाये तो लड़की गोरी और सुन्दर हो ...कद-काठी छोटी न हो ..और न जाने क्या-क्या....उत्सव की तरह मनाये जाने वाले शादी नाम के इस पर्व में न जाने कितनी भावनाओं की बलि चढ़ाई जाति जा रही है ...और यहाँ बीते दिनों बात वास्तविक बलि तक पहुँच गई है ....दिल्ली की पत्रकार निरुपमा  की हत्या हो या ऐसे ही कितने दबे पड़े केस....बिना मतलब के मुगालतों ने मौत को आखिरी मंजर बना दिया है ....और अगर अब ये सवाल या विचार उठाये की लोगों में जागरूकता नहीं है या लोग पढ़े लिखे नहीं है तो ये बाते बेहद बेमानी लगती है ...भले चंगे ऊँचे खानदानो के पढ़े लिखे लोग भी अपने तथाकथित सम्मान के लिए अपने बच्चों के साथ जिंदगी और मौत की जद्दोजह्दा को अंजाम देने में गुरेज नहीं करते.
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लड़कियां भाग कर शादी कर रही है ..छुप-छुप कर अपने चाहने वालों से मिल रही है और फिर बात एक बगावत तक पहुँच कर जिंदगी से जिंदगी को बाहर कर रही है .....ये क्या है ....कैसी परवरिश है ये जो प्यार को एक विद्रोह के रूप में सामने ला रही है .........बहुत कुछ कहना लाज़मी नहीं है यहाँ अगर इस बात पर गौर किया जाये कि पतंग को पकड़ कर खीचने से वो टूट जाती है ...उस्क्ली डोर अपने हाथ में पकड़कर उड़ने कि आज़ादी दी जाये तो वो मंजिल तक भी पहुंचेगी और जीत भी आपकी ही होगी ....ये किस्सा महज पतंग का नहीं जिंदगी के कई अफ़साने जुड़ते है इस हकीकत से ......

मंगलवार, 4 मई 2010

घर लौटने का डर .......

घर लौटने का डर .......
वो लोग भी है मेरे ही आसपास
जो साल में एक दो बार ही सही
मगर
जाना चाहते है घर
यहाँ नौकरी की जद्दोजहद से दूर
कुछ पल... एक अलग तरह की
जुस्तजू में गुजारने के लिए 
जहाँ खाने की थाली में
माँ को हर बार याद आता होगा उनका झूठा बचा खाना
जो पसंद न आने से तुमने छोड़ दिया था
और उसने कहा था कि खाने का निरादर नही करते
फिर एक बाप जो अच्छा भी हो सकता है
और ऐसा भी कि जिससे आप घर पर रहते हुए बात ही न करते हो कभी
अब  जब घर जाने की सोचते है
 तो खरीद ही लेते है उसके लिए भी
 नए ज़माने का कोई मफलर
जिसमे सिर्फ गर्माहट ही नही
आपके और उसके विचारों में जमा हुआ विरोधाभास भी महसूस हो सके
घर की वही पुरानी चार दिवारी और उससे झड़ता चुना
जिसे अपनी ए सी  वाली दुनिया से लौटकर  
आप नही चाहते हो छुना
फिर भी आपका मन करता है
इस अनजान शहर से दूर जाकर
उन अपनों से मिलने का
जिनसे मिल पाने का महूरत आप का मन नही
उस  कम्पनी का मालिक निकालता  है जिसमे आप मजदूरी कर रहे है
ये सब देखकर मुझे बस येही लगता है कि
कैसे होते है ऐसे लोग  जिनका घर जाने का मन करता है
लेकिन
कुछ घर के बेहद करीब  रहने वाले ऐसे भी लोग हैं
जिन्हें घर लौटने से लगता है डर
है तो ये भी सोचने वाली ही बात कि
जहाँ इस जहाँ में घर को तरसने वाले लोगो कि कमी नही
वहां किसी को घर लौटने से लगता है डर

सोमवार, 3 मई 2010

तारीखों के तिलिस्म

एक फिल्म के मशहूर संवाद तारीख पर तारीख के अलावा भी कई बार मेरा इन तारीखों के तिलिस्म से सामना हुआ. यहाँ सिर्फ कोर्ट ही तारीख नही देता किसी भी  ओहदे पर बैठा हर शक्स यहाँ तारीख देने के लिए तत्पर है.हालाँकि फेहरिस्त खासी लम्बी है लेकिन जब लिखने बैठी हूँ तो सोचती हूँ कि सबका जिक्र आ सके ...
दुनिया में किसी  एक तारीख को हम पैदा हुए फिर किसी एक तारीख को स्कूल गए फिर किसी एक तारीख को हमारा स्कूल का जीवन भी ख़त्म हो गया ...फिर हमारी आँखों में  कुछ सपने थे आगे के जीवन को लेकर ...रोमांस और रोमांच से भरे...इन सपनो को एक सहारा मिलता है कॉलेज के नाम से ...उस कॉलेज में दाखिला लेना जिसमे आसमान जितने ऊँचे ख्वाबों को जमीन मिल सके ...इस तारीख का इन्तजार भी कम जानलेवा नही होता ...वो भी तब जब आपको एक साल ऐसा पाठ  पढना पड़े जो आप नही पढना चाहते ...और उसकी वजह ये हो कि जिस कॉलेज में आप दाखिल होना चाहते थे उसमे आपकी जगह किसी रसूख और पहुँच वाले का दाखिला हो गया है
उस एक साल कि हर एक तारीख मुश्किल होती है  जिसमे आप आने वाली तारीखों का बेसब्री से इन्तजार कर रहे हों ये उमीद बाये कि इस बार आपकी शिद्दत कि पहुँच किसी पहुच वाले शक्स से ज्यादा कारगार होगी ...खैर इन्तजार लम्बा ही सही लेकिन किसी एक तारीख को आपकी ये उम्मीद भी सच हो जाती है बिलकुल एक सपने की तरह....आपका दुर्भाग्य इस समय ये होता है की आप सुख के इस समय  में भी हतप्रभ होते है हंस नही पाते ...अजीब विडंबना है .......अब ये सब सोचकर जरूर हंसी आ रही है ...फिर एक तारीख से लेकर एक तारीख तक आप इस जमीन पर अपने झंडे गाड़ने की कोशिशे करते है ...कामयाब  भी होते है लेकिन हमेशा की तरह कई बार हारने के बाद...फिर एक तारीख को आप रुखसत हो लेते है ख्वाबों की जमीन से खुले आस्मां के नीचे फिर एक जमीन की तलाश में ...जैसे बिन खाद पानी के कोई पेड़ चल पड़ा हो फल देने के लिए...........................
सिफारिशों की इस सभ्यता में अपनी एक गरीब सी संस्कृति को लेकर जिन संभावनाओ को तलाशने आप निकलते हैं उनमे आपको कदम कदम पर मिलती है एक तारीख ....आप उस महीने की उस तारीख को आइये मैं देखता हूँ कुछ हो सका तो ......फिर आप उस तारीख को पहुँचते है आखिरी तारीख समझकर लेकिन वहां से ऐसी तारीख लेकर लौटते है जो फिर कभी आती ही नही ....इसी तरह तारीख पर तारीख मिलती जाती है ...हो सकता है किसी तारीख को आप कोई और तारीख न लेने का निश्चय कर बैठे .....इस सब में एक दिलचस्प और सुहावना मोड़ तब आता है जब किस्मत के मारे आप... अपनी हाथों की लकीरों को पढवाने के लिए भूले भटके किसी पंडित के पास पहुँच जाते है ये सोचकर क़ि शायद पाप और पुण्य के हिसाब में जो गड़बड़ी हो रही है उसे वो संतुलित कर देगा .....लेकिन जानते हैं क़ि वहां क्या होता है ....सोचिये.... सोचिये .....आप समझ ही गए होंगे
पंडित जी भी आपको दे देते हैं एक तारीख .........अजीब नही बेहद गहरी विडंबना ......जाओ बालक इस तारीख को तुम्हारी जिंदगी के दिन फिर जायेंगे ........और जानते हैं क़ि होता क्या है फिर फिर कर कई महीनो क़ि वो तारीख निकाल जाती है और हम फिर भी वाही खड़े रह जाते हैं जहाँ इस सारे तामझाम से पहले खड़े थे ......एक ऐसी तारीख के इंतज़ार में जब सब कुछ ठीक हो जायेगा .......