शुक्रवार, 14 मई 2010

भ्रष्टाचार-रिस रहा है मवाद

आस पास से शुरू करे तो सब कुछ खूबसूरत लगता है. रोटी और सुकून के लिए जद्दोजहद करते चेहरों के बीच यह कहना बेहद मुश्किल हैं की कौन भ्रष्ट है. एक एक चेहरे को परखने लगे तो सभी और सबके भीतर झांके तो कोई भी नही. फिर भी क्यों हमारी छवि भ्रष्ट होती जा रही है. क्या हम अकेलेपन में बेहद इमानदार और समूह में बहुत लालची है. या फिर सारा कसूर इस व्यवस्था का है ...वही हमें भ्रष्ट बना रही है....दरअसल
किसी व्यक्ति का व्यवहार कब भ्रष्ट होता है। ये सवाल आज की परिस्थितियों में बिलकुल बचकाना लगता है। वास्तविक सवाल यह है की हम कब भ्रष्ट नहीं होते? रिश्वत देना तो खुद पापा ने सिखाया...यह महज एक मनोरंजन प्रधान फिल्म के गीत के बोल नहीं बल्कि समाज की हकीकत है। अगर तुम क्लास में प्रथम आयोगे तो हम तुम्हे साईकील दिलायेंगे, बचपन में मिलने वाले इस प्रलोभन के साथ बड़प्पन आने तक कई दूसरे आयाम जुड़ जाते है। शोहरत और बुलंदियों तक पहुंचने का सपना , इस जैसा..उस जैसा बनने की तमन्ना में नैतिकता के नारों का शोर स्व हित को साधने वाले सन्नाटे में तब्दील हो जाता है। इससे स्वार्थ सिद्धी का ऐसा मकड़जाल तैयार होता है की कोई अपनी मर्जी से और कोई न चाहते हुये भी उसमें फंसता ही जाता है। भ्रष्ट आचरड़ की शुरुआत घर से होती है और बाहर आकर बीज रूप में पनपा यह भ्रष्ट आचरड़ ऐसा पेड़ बन जाता है जिसकी सिंचाई के लिये रिश्वत, धोखा, धांधली और घोटालों की खाद तैयार की जाने लगती है। इस खाद का साइड एफ्फेक्ट गरीब और कमजोर भुगतते हैं। इससे एक तरफ गरीबी उनमूलन की योजनाओं का बंटाधार होता है, दूसरी तरफ कानून और न्याय की नींव हिलती है।


फलती फूलती फसल


बीज से पेड़ बनने के बाद भ्रष्टाचार को फलने फूलने का माहोल देती है हमारी सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था। इस व्यवस्था में निजी पूंजी को फैलने की बेलगाम आजादी दी जाती है। इस के लिये तमाम नियम--कानूनों को तोड़ कर, जिम्मेदार अफसरों को साझीदार बनाकर जरुरत मंद जनसंखया को किनारे कर दिया जाता है। मामूली से दफ्तर से से लेकर बड़े प्रशासनिक कार्यलयों तक ऐसे कई बाबू है जो आप को इन शब्दों की बानगी दिखाने के लिये हमेशा तत्पर दिखाई देंगे। इसी लिए ही शायद कहा जाता है की भ्रष्टाचार का सबसे ताकतवर त्रिगुट राजनीटिक नौकरशाह और व्यापारी का है। तीनों अपनी पूंजी की बाल्टियां भरने के लिये पूंजीपतियों से


लेकर आम इंसान का इस्तेमाल करने में गुरेज नहीं करते। अब अगर भ्रष्टाचार को ‘पूंजी का पूंजी के लिये पूंजी के पुजारियों द्वारा किया गया गलत इस्तेमाल कहें’ तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। आलम यह है की भ्रष्टाचार की फसल को अनुकुलीत करने वाले ही आयोग बना कर जांच का आदेश देते है। यह आयोग महज खानापूर्ति भर होते है वर्षों तक जांच चलती रहती है और भ्रष्टाचार का मवाद नासूर बनकर गरीब, लाचार जनता का शोषड़ करता रहता है।


फसल को गिजा-पानी देती जनता


जिस व्यवस्था के अंदर ये फसल फल फुल रही है उस का अहम अंग है हम यानि जनता। नौकरशाह बेशक कितने ही तानाशाह क्यों न हो जाये लेकिन इस फसल को पानी देने में जनता के योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता । इस पहलू की खास बात ये है की जनता भ्रष्टाचार को मुद्दा ही नहीं मानती। उनके बीच ये सोच विकसित होती जा रही है की ऐसा तो होता ही है। यह उदासीन आच्रद ही सबसे खतरनाक साबित हो रहा है। इसी का नतीजा है की इस फसल से हर साल नए-नए फल मिल रहे है।


फिर चाहे वह बरसो पुराने कुछ घोटाले हो या कुछ एक साल पहले वाला सत्यम घोटाला या फिर ताजा ट्रेन खेल में खेला गया खेल यानि आई पी एल






4 टिप्‍पणियां:

honesty project democracy ने कहा…

दरअसल भ्रष्टाचार आज जो हमारे देश और समाज में व्याप्त है वह तो पूरी तरह व्यवस्था के निकम्मेपन,निगरानी व्यवस्था का पूरी तरह खत्म हो जाना और मंत्रियों का लूटेरा बन जाना तथा जनता का डर के मारे एक शब्द भी नहीं बोलने के वजह से है / रही पापा द्वारा बच्चों को क्लास में फर्स्ट आने पर साईकिल की पेशकश एक प्रोत्साहन है ,हाँ अगर पापा यह कहते हैं की किसी भी तरह चाहे पैसे से चीटिंग से या किसी अन्य तरीके से तुम्हे फर्स्ट आना है तो ,इस बात को भ्रष्टाचार कहा जा सकता है /

संजय भास्कर ने कहा…

किसी व्यक्ति का व्यवहार कब भ्रष्ट होता है।

GHAMBHIR SWAAL KIYA HAI AAPNE

pratham ने कहा…

निहायती पुराना विचार है ,आपको अब समझ आ गया बधाई हो ,

dishan ने कहा…

kya aap ka ka blog aap ko paese earn kar ke deta hae agar ha to achchi baat hae agar nhe to aap hamare sath jud jaiye ek achche or nek kam ke liye un bachcho ke padahai ke liye jo kabhi school collage ka muh nhe dekh pate i m waiting for u r reply