शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

ब्लास्ट फरोम द पास्ट (1) - दोस्ती

दिल चाहता है हम न रहें कभी यारों के बिन, पुरानी जींंस और गिटार, यारों दोस्ती बड़ी हसीन है..दोस्ती से जुड़े ऐसे न जाने कितने गीत और फिल्में हैं जिनसे अपनी दोस्ती के दिनों की ताजगी को हम फिर से महसूस कर सकते हैं। ब्लास्ट फरोम द पास्ट में इस बार हम आपकों दोस्ती के ऐसे सफर पर ले चलते हैं जहां आपको ताजगी के साथ ही दोस्ती के मायनों की महक भी मिलेगी। पास्ट से इस बार का ब्लास्ट कर रही है 1964 में आई फिल्म दोस्ती। ये फिल्म न सिर्फ सिनेमा की सफलता के लिहाज से बेहतरीन रही बल्कि दोस्ती नाम के रिश्ते को भी इसने बखूबी बयां किया। राजश्री फिल्मस के बैनर तले बनी इस फिल्म के निर्देशक थे सत्येन बोस। दो दोस्तों के  किरदार को इस फिल्म में जीवंत बनाया अभिनेता सुशील कुमार और सुधीर कुमार ने। इस फिल्म से बहुत सी ऐसी खास बातें जुड़ी हैं जिन्हें जानकर आपको हैरानी होगी। ये बॉलीवुड की पहली ऐसी हिट फिल्म थी जिसमें कोई हिरोइन नहीं थी। फिल्म की कहानी का आधार था दोस्ती। ऐसी दोस्ती जो आजकल की हाय, हैलो वाली फ्रेंडशिप परंपरा से बिल्कुल अलग थी। कहानी के किरदार दो ऐसे दोस्त थे जो न सिर्फ  एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बनते हैं बल्कि एक दूसरे की शारीरिक कमियों को भी पूरा करते हैं। दरअसल इस कहानी में एक दोस्त की आंखों की रोशनी नहीं है और दूसरा पैरों से लाचार है। फिल्म के आखिरी सीन में उनकी दोस्ती की मिसाल को फिल्मांकन भी शानदार तरह से किया गया है। बरबस ही वो दृश्य जिसमें एक दोस्त दूसरे को अपने कंधे पर बिठाए बाढ़ से निकल रहा है और दूसरा उसे रास्ता दिखा रहा है दर्शकों को अपनी ओर न सिर्फ आकर्षित करता है बल्कि दोस्ती के इस दर्जे को सलाम करने पर भी मजबूर करता है। आजकल के दौर में जहां जितनी जल्दी 'दुआ सलाम' होता है उतनी ही जल्दी बात 'सलाम नमस्ते' तक भी पहुंच जाती है वहां दोस्ती का ये नजरिया फ्रेंडशिप डे के मौके पर किसी नजराने से कम नहीं है। दरअसल दोस्ती का रिश्ता तो आज भी उतना ही अहम है जितना हमेशा रहा है लेकिन बदलते दौर ने इसकी अहमियत को बहुत सी दूसरी चीजों से जोड़ दिया है। ऑरकुट, फेसबुक और टिवटर के युग में सिर्फ चटर-पटर ही बाकी रह गई दिखती है दोस्तों की चहल-पहल और दोस्ती की चहक अब बहुत लंबी नहीं होती। हालात बदलते जाते हैं, दोस्त भी और दोस्ती भी। लेकिन सेल्यूलाइड सिर्फ सपने नहीं दिखाती समाज के सच को दिखाती और बनाती भी है। इस समय का सच बेशक ये है कि दोस्ती टाइम पास रह गई है लेकिन उस वक्त की ये फिल्म आज भी इस खास रिश्ते की गहराई को दिलों में उतार सकती है। इस ब्लास्ट को इस बार फ्रेंडशिप के बूम में बदल कर क्यूं न दोस्ती का नया बेस बनाया जाए।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बारिश की शोख अदाएं अब सिर्फ सुर्खियां

 बारिश की वो शोखियां सड़कों के ट्रैफिक और नालों से बाहर आते पानी के बीच कहीं खो गई हैं। इन्हें ढूंढने का वक्त किसी के पास नहीं है क्योंकि हर कोई जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता है। और घर पहुंच कर पहला वाक्य निकलता है आफत आ जाती है बारिश में। पता नहीं कब जाएगी ये बारिश। और यहां हम सोचते हैं कि  मेघा बरसते ही रहें। बूंदे झरती ही रहे। और मिट्टी से वो सौंधी महक आती ही रहे हमेशा। चारो पहर।
                                        

बारिश...इस शब्द के होठों पर आते ही रुमानियत का जो अहसास दम भरने लगता है उसमें खुशी और ग़म दोनो रंग होते है। मौसम की पहली बारिश जाने क्या कुछ समेट लाती है अपने साथ। कुछ बीती बातें कुछ मीठी यादें या फिर एक नई याद कुछ नए जज्बात। साफ-सुथरे मौसम का यूं सीला सा हो जाना और सूखे से पत्तों का यूं गीला सा हो जाना।  एक बारिश और दो दृश्य।  एक के  बाद अगला। पहले बादलों की साजिश और बूंदो का झरना और फिर गीले से उन पत्तों से बूंदो का टपकना।  सोचती हूं तमाम लोगों को यूं अपनी ही दुनिया में मग्न कर देना भी तो कहीं आकाश की कोई चाल नही। चुपके से वो जो कहना चाहता है धरती से उसमें शायद उसे किसी का दखल पसंद नही है इसलिए ऐसा समां बांधता है कि हर कोई अपने ही मिलन और जुदाई के जोड़-घटा, गुणा-भाग में उलझ जाता है। हालांकि बारिश के बारे में काफी कुछ कहा जा सकता है और इसमें फीलिंगस आर मोर एंड वर्डस आर फ्यू वाली स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन बादल, बिजली,घटाएं और बारिश के अलावा कहने और सहने वाली बात ये है कि बेसब्री से जिस बारिश का हम इंतजार करते हैं जिसके बरसने से जेहन और जिंदगी में इतना कुछ घटित होने लगता है उसकी टीआरपी और ब्रांडिंग पर अव्यवस्थाओं का ऐसा असर होता है कि बारिश से लोग घबराने लगे हैं, कतराने लगे हैं। शायद भारत ही एक ऐसा देश है जहां बारिश सिर्फ आसमान से पानी गिरना भर नहीं है। उत्सव, गीत, कथाएं, हरियाली बहुत से पहलू यहां बारिश से जुड़ते हैं। कभी बारिश की भी अपनी शोखियां थी लेकिन अब बारिश सिर्फ अखबारों और चैनलों की सुर्खियां हैं। यहां बारिश आने से इतने लोगों की मौत और यहां बारिश से बाढ़ का खतरा।                                  

बुधवार, 21 जुलाई 2010

मैनेजमेंट कला के फेर में बेचारा दिन और बेचैन रातें

मेरी शक्ल पर कुछ मुरझाए बादल और माथे पर टेड़ी-मेड़ी घटाएं देखकर एक दिन यूं ही मुझसे कहा गया था चीजों को मैनेज करना सीखो। चीजे मसलन,  सुख और दुख का मैनेजमेंट।  हंसी और आसूंओं का मैनेजमेंट।  इच्छाओं और कुंठाओं का मैनेजमेंट। प्रेम और नफरत का मैनेजमेंट।   शरीर और आत्मा का  मैनेजमेंट। 
 बेचारा दिन और बेचैन रातें
ये हंसी इसके सामने नहीं। इस इच्छा को यहीं अभी मार दो। इससे प्रेम करना अच्छा है और इससे सिर्फ दोस्ती रखो जब तक कि तुम्हे जरूरत है। शरीर की फिक्र करो अब आत्मा को कोई नहीं पूछता। गोया आत्मा कोई शादी कर चुकी अभिनेत्री हो। और प्रेम या नफरत कोई नहाने का साबुन जिसे कोई खूशबू के लिए खरीद रहा है तो कोई रंग गोरा करने के लिए। खैर, चीजों को मैंनेज करने के इस सुझाव पर अंदरखाने तो मैंने बहुत शोर मचाया लेकिन  बाहर से पड़ रहे बदलाव के दबाव ने मुझे बिना इतलाह के ही बदलना शुरू कर दिया है। जहां एक बड़ी चिल्लाहट दर्ज कर सकती थी अब वहीं एक गहरी खामोशी को इस तरह ओड़ लेती हूं जैसे शब्दों से ही अनजान हूं मैं। और इस खामोशी के बाद खुद से खफा भी हो जाती हूं। दरअसल दुनियावी होने में मुझे भी गुरेज नहीं लेकिन aमैं मायावी नहीं होना चाहती। सवालों का एक झंझावत सा मन में शोर मचा रहा है और मेेरे पास उन सवालों को दबा देने की मजबूरी के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। हर गहराती रात के साथ ये सवाल मुझे मुझसे मिलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन दिन की रोशनी में मेरी आंखे ऐसे चौंधिया जाती है कि फिर इन सवालों के जिक्र से भी कोफ्त होने लगती है। इस बदलाव के बाद क्या कुछ बचा रह जाएगा। सिवाए रात को सोने और दिन को खोने के। या फिर रात भी बेचैन रहेगी और दिन भी बेचारा सा। 

रविवार, 18 जुलाई 2010

जाति संग सब सून

जीने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है
पानी या शराब?
रोटी या कबाब?
पैसा या व्यापार?
.
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.
जाति या समाज?
नही जानती कि जाति के मामले में मेरी जानकारी का स्तर क्या है? मैंने वर्णव्यवस्था को कितना समझा है? मैं समाज के विभिन्न धर्मो और वर्गो के बारे में कितना जानती हूं? लेकिन इसके बावजूद भी ये सब कुछ ठीक से न समझने को कहीं न कहीं मैं अपना सौभाग्य मानती हूं। ये आधा-अधूरा ज्ञान मुझे पूरा हक देता है हर किसी से बात करने का, हर किसी के साथ खाना खाने का और वो सब कुछ करने का जो समाज में रहते हुए आम व्यवहार में हम एक दूसरे के साथ करते हैं। काश कि कोई भी न जानता होता इस वर्ण व्यवस्था के बारे में । इस बारे में कि फलाना इंसान दलित है और फलाना ऊंची जाति का है। ये एक निरी कल्पना है जिसका साकार होना निरा मुश्किल भी है। लेकिन जाति के नाम पर जो कुछ समाज में होता आया है और हो रहा है उसकी कल्पना करना भी तो निहायत कठिन है। कल की ही खबर है कि उत्तर प्रदेश के कन्नौज में मीड डे मील में दलित महिला के खाना बनाने को लेकर वहां के लोगों ने हंगामा किया। और अब फिर वही सवाल कि जीने के लिए जाति ज्यादा जरुरी है या बराबरी का समाज। ये जात वो बिरादरी। इसके साथ खाना ,उसके साथ मत घूमना। इसका झूठा मत खाना, उसके बर्तन भी मत छूना। अपने आस-पास के लोगों से हर वक्त इस तरह की दूरियां बनाने में न जाने कितना दिमाग और वक्त खर्च कर देते हैं लोग। कहने को भारतीय संस्कृति बहुत कुछ है लेकिन दूसरा सच ये है कि आज हम सभ्यता के उस मुहाने पर खड़े हैं जहां जाति गालियों में शुमार एक ऐसा दस्तावेज है जिसकी परते जब खुलती हैं तो इसंान का अस्तित्व ही मैला नजर आता है। अबे चमार कहीं के, अरे वो तो ब्राहम्ण कुल का है। जाति सूचक ये शब्द इस तरह इंसान का दर्जा तय कर देते हैं कि एक तबका तो जाति के बोझ तले ही दब जाता है और दूसरा जाति की छत्रछाया में अपने महल बना लेता है। छठवीं शताब्दी में उपजी समूह व्यवस्था ने जाति को सामाजिक संरचना से लेकर आर्थिक और राजनीतिक हर स्तर पर एक मुख्य पहचान और पुख्ता हथियार बना दिया। परिणाम हमारे सामने है अनेकता में एकता वाला भारत टूट रहा है और बिखर रहा है। एक इमारत में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों से लेकर एक प्रदेश में जीवन यापन करने वाले अलग-अलग जातियों के लोगों में आपस में दिली तौैर पर इतनी दूरियां पैदा कर दी गई हैं कि लोग अपनी जाति पर आधारित एक अलग प्रदेश चाहते हैं। समाज में पैठी ये दूरियां सत्ता में बैठे लोगों के लिए भी एक हथियार बन चुकी हैं। जाति बनाने वाले बनाकर चले गए शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि आने वाली पीढिय़ां इस बनावट को इतनी शिद्दत से निभाएंगी। लेकिन अब इस पीढ़ी को ये प्रथा तोडऩी होगी, बरसों पुरानी शिद्दत को तिलांजलि देनी होगी, छोडऩा होगा एक ऐसे बंधन को जो सिर्फ एक हथकड़ी है हमारे और आपके बीच में। छठवी शताब्दी की शुरूआत को भूलकर एक ऐसा प्रारंभ इक्कीसवी सदी में करना होगा जिससे ये सारे भेद मिट जाए। जाति का वो पिरामिड जिसमें सबसे ऊपर के माले पर ब्राहम्ण का सिंहासन है और दलित की झोपड़ी जमीन में धंसी हुई है, उस पिरामिड की व्यवस्था और विचारधारा को बदलना बहुत जरुरी है।
ये सब लिख्रते हुए मैं इस बात से भी पूरा सरोकार रखती हूं कि भारतीय समाज की व्यवस्था में जाति गहरे पैठी हुई है इसका त्याग करना इतना आसान नही होगा उन लोगों के लिए जिन्होंने तथाकथित नीच जाति के लोगों से कभी बात करना भी गंवारा नहीं किया लेकिन अगर वही लोग घर में भात की जगह मैगी को दे सकते हैं तो विचारधारा का ये बदलाव भी लाजंमी है जिससे जिंदगी की वास्तविक नफासत वापस आ सकती है।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

पत्रकार प्रहार और प्रतिरोध


मीडिया में तमाम विषयों को लेकर जितनी चर्चा होती है खुद मीडिया भी उतना ही चर्चित विषय है। लोकतंत्र का ऐसा चौथा स्तंभ है जिसे उखाडऩे के लिए तमाम प्रयास किए जाते हैं बिना ये सोचे कि इसके हटने पर जो छत गिरेगी उसमें कोई भी दब सकता है। प्रेस, प्रहार और प्रतिरोध की चिंगारियां गाहे-बगाहे भड़कती ही रहती है। सवाल उठते हैं कि क्या मीडिया को किसी लक्ष्मण रेखा की जरुरत है? क्या मीडिया के लिए भी कुछ सख्त मापदंड बनाए जाने चाहिए? इसी तरह के कई सवालों के बीच ये धुंधली तस्वीर उभरती है उस शख्स की जिसे पत्रकार कहा जाता है, जो मीडिया नामक संस्था का प्रहरी होता है। मीडिया की आजादी पर उठने वाले सवालों से इतर अब इतफाकन या प्रायोजित तरीके से एक पत्रकार की आजादी पर हमला किया जाने लगा है। सरकार और गैरकानूनी साजिश रचने वाले दोनों ही पत्रकार पर दबाव बनाते हैं और इन दबावों के बीच वह पत्रकार अपनी जगह किस तरह बनाए ये उसके लिए एक बड़ी चुनौती हो जाता है। सच को सामने लाने के लिए निकले पत्रकार पर हमले के कई हालिया संस्करण हैं जिन्होंने इस विषय को यहां सूचीबद्घ किया है।


मणिपुर के पत्रकार पिछले दिनो हड़ताल पर रहे और वहां दो दिनों तक कोई अखबार नहीं छपा। वजह थी कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी  से जुड़े आतंकवादी पत्रकारों को उनके खिलाफ खबर छापने पर जान से मारने की धमकी देते हैं। पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर में कम से कम 25 पत्रकारों की हत्या हुई और 30 से अधिक को आतंकवादियों को मदद देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। मणिपुर जैसे कई राज्यों में आतंकवादियों ने मीडिया को वास्तव में बंधक बना लिया है। असम में 20 और मणिपुर में पांच पत्रकारों की हत्या हुई, लेकिन किसी को भी इस संबंध में गिरफ्तार नहीं किया गया. आतंकवादियों के साथ ही राज्य प्रशासन भी मीडिया का उत्पीडऩ करता है।
महाराष्ट्र में 5 जुलाई को भारत बंद के दौरान नागपुर के वेरायटी चौक पर कवरेज के लिए गए मीडियाकर्मियों पर भी पुलिस द्वारा लाठीचार्ज  किया गया। 
लखनऊ में क्वीन्स ूबेटन की कवरेज में गए पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी की गई। लाइव कवरेज करने वाले पत्रकारों को रोका गया और जब पत्रकारों ने विरोध किया तो अधिकारियों ने अफरातफरी का माहौल बनाते हुए कई पत्रकारों को जबरिया पुलिस के वाहनों में बैठा लिया। इसके बाद यहां से करीब एक दर्जन पत्रकारों को बलपूर्वक वाहन मे ठूंसकर मोहनलालगंज थाने को भेज दिया गया। इसके अलावा बेटन के साथ चल रहे लोगों को भी चौराहे पर घण्टों धूप व उमस भरी गर्मी में रोके रखा गया।
नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज के साथ हाल ही में नंदीग्राम पुलिस ने ऐसा बरताव किया जैसे वह कोई आतंकवादी हों।
कश्मीर में जिस तरह से स्थानीय पत्रकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है उससे भी तमाम लोग वाकिफ हैं।
पत्रकार के प्रतिकार का एक छोटा सा हालिया नमूना ये भी है
सिरसा और फतेहाबाद में बाढग़्रस्त, इलाकों का जायजा लेने पहुंचे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा एक पत्रकार के सवाल पर बुरी तरह झल्ला गए और उसे पत्रकार काांफ्रेस से बाहर निकल जाने का हुक्म सुना दिया। पत्रकार ने मुख्यमंत्री हुड्डा से पूछा था कि केंद्र सरकार ने बाढ़ से बचाव के लिए हरयिाणा को 75 करोड़ रूपए दिए हैं, लेकिन अकेले रोहतक को ही 23 करोड़ रूपए क्यों दे दिए गए। राज्य के बाकी जिलों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों। पत्रकार का यह सवाल हुड्डा का नागवार लगा और उन्होंन झल्लाते हुए पहले तो उससे उसके अखबार का नाम पूछा और बाद में उसे बाहर निकल जाने कह दिया। ज्ञात रहे मुख्यमंत्री हुड्डा रोहतक से ताल्लुक रखते हैं।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

एक साल और बीत गया ( जन्मदिन पर )


एक साल और बीत गया
एक तारीख के साथ
वक्त न जाने कितना कुछ जीत गया
मेरे पास जो बाकी रहा
वो हैं कुछ बीते लम्हों की तस्वीर बस
नहीं जानती उमर ही बीती या फिर
बहुत कुछ रीस गया
मासूमियत, मतवालापन और मिट्टी की वो सौंधीं महक
जिसके साथ मन
आकाश हो जाता है
चुनर का वो धानी रंग
जिसे गुलाबी करने के बारे में
उमर के इस बरस से सोचा जाता है
मन में हर बार जश्न होता है इस दिन पर
पर हर बार जश्न से मन खुश नहीं हो पाता है
न जाने ये मन कितनी खुशियां चाहता है
किसी तारीख को ऐसा नहीं होता
पर इस तारीख पर ही क्यों
तमन्नाओं का आंचल दूर तक लहरा आता है
दुआएं,  उपहार और आशीरवाद
काफी नहीं है क्या
जाने ये मन और क्या चाहता है
बुहत कुछ बदला बदला है इस तारीख पर
मेरे कपड़ो का रंग कुछ नया है
फोन बार बार बज रहा है
दिल न जाने किससे मिला है
पर हाथ कई लोगों से मिल रहा है
मिल बांट यू भी कई बार मुंह झूठा किया है
पर आज उत्सव का माहौल बन रहा है
 भीड़ भरे इस माहौल में भी
मन मेरा तन्हा ही भटक रहा है
कुछ सपनों को पूरा करने की ख्वाहिश में
कुछ अपनों को अपना करने की ख्वाहिश में
ये तारीख तो हर साल आयेगी
काश कि कुछ ऐसा हो
साल की हर तारीख मुकम्मल हो जाए
और इस तारीख पर
मेरा मन भी
मेरे जन्म का जश्न मनाएं




सोमवार, 12 जुलाई 2010

एक अभागी लड़की ....(पुरस्कृत कविता)



बच्ची से बड़ी होती है वो
सीखती है घर के काम-काज
रोटियां बेलना
तवे पे डालना
तरकारी छीलना
पकाना 
अक्सर
ऊँगली जल जाती है
कट जाती है
पर बात
आग और चाकू से आगे  निकलकर
उसके ग्रहों की चाल पर चल जाती है

छत पर सूखते कपड़ों में
जब सब लत्ते रहते है अपनी जगह पर
और बस उसकी ही चुनरी उड़ जाती है
तो बात हवा के झोंको और तेज आंधी
को छोड
उसके  नसीब के पन्नो को पलट आती है

वो भी बढाती है  कदम आगे
फांसला  कम भी हो जाता है मंजिलों का
मगर जब उसके  ही रस्ते में हरे भरे बूढ़े हो चुके
किसी पेड़ की शाख गिर जाती है तो
ये बात किसी प्रख्यात  पंडित 
तक पहुँच जाती है

सोलह, सात और एक सौ आठ 
हर संख्या के उपवास रख चुकी है वो 
अपनी पहुँच से पैर बाहर निकालकर 
न जाने कितने मंदिरों की सीडियां 
चढ़ चुकी है वो 
मगर जब उसकी ही मन्नत अधूरी रह जाती है 
तो बात भगवान् के कच्चे कानो का नजर अंदाज  कर 
उसके कर्मों को कोस आती है

मौसम  बदलते है हर बरस
मगर जब पतझड़ ही बस
उसके  आँगन में रुक जाता है तो
बात मौसम से बदलकर
 मुक़दर की तरफ मुड़ जाती है

फिर जब कभी किसी  दिन सखियों के बीच
जिक्र  होता है
उसकी प्रेम कहानी का तो
दिल की देहलीज से निकलकर
बात  उसके हाथ की लकीरों तक पहुँच जाती है

एक लड़की 
जब लड़की होने के साथ 
एक अभागी लड़की बन जाती है 
तब जिंदगी के सारे धागों में जैसे कोई 
गिरह  पड़
जाती है........
न कोई अदालत 

न वकील 
न सबूत 
न गवाह
मुक़द्दर के इस मुक़दमे की सुनवाई 
में हर बार होता है एक एतिहासिक फैंसला 
और फिर
जीते जी मरने की सजा सुनाई जाती है


मंगलवार, 6 जुलाई 2010

कार्य प्रगति पर है ......!

   प्रधानमंत्री  
    उवाच.
      .... 

    भोपाल गैस त्रासदी मामले में सरकार कुछ नहीं छिपा रही है। एंडरसन की सुरक्षित रिहाई संबंधी दस्तावेज अब उपलब्ध नहीं हैं। मेरा मानना है कि जीओएम ने इस संबंध में तमाम कागजात देखे हैं, लेकिन उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे बिल्कुल स्पष्ट रूप से पता लगता कि रिहाई का जिम्मेदार कौन था?

27 जून 2010



                पेट्रोलियम पदार्थो की बढ़ाई कीमतों में रोल बैक नहीं होगा। पेट्रोल की तरह अब डीजल की कीमतों को भी सरकार के नियंत्रण से मुक्त किया जाएगा। ऐसा करना बहुत जरूरी है। सरकार पर मूल्य वृद्धि के लिए किसी तरह का कोई बाहरी दबाव नहीं था। केरोसिन तेल और रसोई गैस पर सब्सिडी उस स्तर पर पहुंच गई थी, जिसमें सुधार निहायत जरूरी हो गया था।

28 जून 2010 




                1984 के सिख विरोधी दंगे नहीं होने चाहिए थे। मैं देश से माफ़ी माँग चुका हूं। पीडि़तों के जख्मों को भरने के लिए हरसंभव क़दम उठाए जाएंगे। अब हमें इससे आगे बढऩे की ज़रूरत है।  लगातार 1984 के दंगों को याद करते रहने से सोच पर असर पड़ता है


29 जून 2010


                हमारी न्याय प्रक्रिया में वक्त ज्यादा लगता है। इसीलिए भोपाल गैस त्रासदी के अदालती फैसले में करीब 25 साल लग गए। यह हमारी न्यायपालिका की सबसे बड़ी समस्या है।Ó सिंह ने कहा, '1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में भी न्याय तंत्र से चूक हुई है। जिम्मेदार लोगों को सजा जरूर मिलनी चाहिए। सरकार न्याय तंत्र की इन खामियों को दूर करने के प्रयास कर रही है।

29 जून 2010





 माननीय प्रधानमंत्री जी के ये शब्द भविष्य की सारी उम्मीदों को ठेठ हिंदुस्तानी अंदाज में मरहम लगा रहे हैं।  ऐसा लगता हैं मानो कह रहे हों जो हुआ उसे भूल जाओ, जो हो रहा है वह हमारी मजबूरी है, और हम अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।  ऐसे समय में जब पूरे देश की जनता मंहगाई की महामारी से जूझ रही है, सत्ता के गलियारों में जनता की सुध कम और स्वार्थ सिद्घी का शोर अधिक सुनाई दे रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश के हर कोने से व्यवस्था के चरमराने की आवाजें आ रही हैं, प्रधानमंत्री इस बयानबाजी से अपना बचाव कर रहे हैं या जनता को बेवकूफ बनाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं?


 कश्मीर में बढ़ती हिंसा, पश्चिम बंगाल, छतीसगढ़, झारखण्ड में लगातार हो रहे माओवादी हमले, मणिपुुर में अलगाव से पनप रहा उग्रवाद, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र , कर्नाटक और उड़ीसा में किसानों की आत्महत्या और बदहाली के बढ़ते मामलों के अलावा, इस समय देश के हर राज्य में किसी न किसी तरह का संघर्ष दम भर रहा है। गौर करने की बात ये है कि संघर्ष की वजह वर्षो पुरानी हैं और उनके समाधान के नाम पर आज भी 'कार्य प्रगति पर हैÓ सरीखी मीठी गोलियां दी जा रही हैं। पिछले दिनों लगातार हो रहे नक्सली हमलों में अब तक 175 जवान मारे जा चुके हैं और न जाने कितनी निर्दोष जाने गई हैं लेकिन 'सरकार कार्यवाही कर रही हैÓ और 'नक्सलवाद देश की सबसे बड़ी समस्या हैÓ के बयान के अलावा अब तक कोई कदम नहीं उठाया जा सका। भोपाल की गैस त्रासदी जो पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है उस पर 25 साल बाद किस तरह का मरम लगाया गया है ये भी सभी देख रहे हैं। जिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर तीन हज़ार लोग मारे गए थे और मौतों का ये सिलसिला बरसों चलता रहा अब उसी सरकार ने ये बयान दिया है कि उस दोषी के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं मिल पाया जिसके दोषी होने की गवाही हर वो जख्म दे रहा है जो आज 25 साल बाद भी ताजा है। 1984 में हुए सिख विरोधी दंगे जो बेगुनाह लोगों की मौत और विध्वंस का सबब बन गये थे। जिनमें दस हज़ार से भी अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भी केवल दिल्ली में ही 2733 लोगों को मार डाला गया था। देश की राजधानी में तीन दिनों तक चले इस ख़ूनी खेल में तब पुलिस और प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और सबसे हैरान करने वाली बात कि आज 25 साल बाद भी इस घटना को अंजाम देनेवाले और उनके राजनीतिक संरक्षकों में से 99.9 प्रतिशत सज़ा से साफ बच गए हैं। ऐसे में खुद एक सिख होते हुए प्रधानमंत्री इन बातों को भूल कर आगे बढऩे की सलाह दे रहे हैं, जैसे ये कोई सच्ची घटना नहीं महज एक बुरा ख्वाब हो। मंदी में आई बेरोजगारी से अभी जनता उबरी नहीं थी कि उसे मंहगाई के बोझ ने मार दिया। बोझ भी ऐसा जो हर हफ्ते की दर से बढ़ता ही जा रहा है। पहले खाने का सामान मंहगा हुआ और अब बनाने का साधन। जनता जवाब मांगे तो एक ऐसा बयान दिया जाता है जिससे लोकतंत्र में तानाशाही होने की बू आने लगती है। देश ने चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से बहुत लड़ाईयां लड़ ली हैं और बहुत से संधि-समझौतों पर भी हस्ताक्षर हो चुके हैं लेकिन पानी को लेकर जो संग्राम छिडऩे वाला है वो शायद पानीपत की लड़ाई से भी ज्यादा खतरनाक होगा। मुद्दे कई है कुछ बहुत जोर-शोर से उठाए जा रहे है कुछ सतही स्तर पर हल्ला बोल रहे हैं, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश के कर्ता-धर्ता इस अवसर पर जो बोल रहे हैं क्या उससे समस्याओं के निदान का कोई सुराग मिलता है?

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

प्रेम- कुछ सवाल (१)

दोस्ती के दायरों के बीचोंबीच 
प्यार के कुनमुनाते एहसास को 
जब कोई नाम न मिले 
एक जरुरी जुस्तजू  के बीच 
जब उस  नाजायज जिक्र को
जुबान न मिले 
तब क्या हो ???
तुम कहो 
तुम बताओ 
कि तब 
एहसासों का अंजाम क्या हो ??
चाय की चुस्कियों के संग कभी 
कभी यूँ ही सरेराह पानीपूरी के चटकारों के 
में चल रही 
बातों का मुकाम क्या हो ??
मुझे भी नही है यकीं किसी 
बंधन में 
पर वो साथ जो बांध ले तुम्हे 
उसका अहसान क्या हो ??
मैं तो ठिठक गई हूँ 
ठेठ प्रेम के सांचों में कहीं 
जो मैं न मान 
सकी किसी एल ओ वी इ की 
गुजारिश को 
और हर बार किया मैंने इंकार 
तुम्हारे उस 
साथ आवारा सडको पर 
फिरने के मनुहार को 
तो बताओ 
इसमें सजा का फरमान क्या हो ??
काश तुम कह पाते एक शब्द भी 
इन सारे सवालों के जवाब में 
मगर 
तुम ने ओड़ ली होगी एक 
शातिर सी ख़ामोशी फिर से 
जैसी तुम ओड़ते आए हो 
शायद तब से 
जब से तुमने अपनी उम्र की 
लड़कियों का मतलब सिर्फ 
वक़्त बिताने के एक माध्यम के रूप में समझा है .....
.
.
.

मैं भी क्यों थकी नही न जाने अब तक 
क्यों सावन की इस पहली बारिश के संग 
फिर से मैंने सवालों की झरी में 
खुद को इस कदर भिगो दिया है 
कि अब गीला हुआ वो आंचल
सूखता ही नही है 
भीगता ही जाता है
कभी बारिश की  बूंदों से 
कभी आंसुओं के पानी से
;
;

और तुम उधर दूसरी तरफ खड़े कही
किसी नए प्यार की धुप सेंक रहे हो 
सुखा रहे हो हर पुराने प्यार के सिलेपन को 
या न जाने तुम्हारे शब्दों में कहते होंगे उसे
बासीपन...
बासी रोटी की तरह
जिसे सब जानवरों को खिला देते है
;
;
तुम्हारे न होने के गम में 
ये सवाल उठे है 
ये शंकाए पैदा हुई है 
ऐसा सोचोगे तुम 
मुझे लगता है 
तुम्हारी सोच के पैमानों 
को परखा है मैंने 
मगर सच ये है कि
ये सारे सवाल तुम्हारे होने की
हर बात 
हर जज्बात 
हर मुलाकात 
को झुक्लाना चाहते हैं