गुरुवार, 15 जुलाई 2010

पत्रकार प्रहार और प्रतिरोध


मीडिया में तमाम विषयों को लेकर जितनी चर्चा होती है खुद मीडिया भी उतना ही चर्चित विषय है। लोकतंत्र का ऐसा चौथा स्तंभ है जिसे उखाडऩे के लिए तमाम प्रयास किए जाते हैं बिना ये सोचे कि इसके हटने पर जो छत गिरेगी उसमें कोई भी दब सकता है। प्रेस, प्रहार और प्रतिरोध की चिंगारियां गाहे-बगाहे भड़कती ही रहती है। सवाल उठते हैं कि क्या मीडिया को किसी लक्ष्मण रेखा की जरुरत है? क्या मीडिया के लिए भी कुछ सख्त मापदंड बनाए जाने चाहिए? इसी तरह के कई सवालों के बीच ये धुंधली तस्वीर उभरती है उस शख्स की जिसे पत्रकार कहा जाता है, जो मीडिया नामक संस्था का प्रहरी होता है। मीडिया की आजादी पर उठने वाले सवालों से इतर अब इतफाकन या प्रायोजित तरीके से एक पत्रकार की आजादी पर हमला किया जाने लगा है। सरकार और गैरकानूनी साजिश रचने वाले दोनों ही पत्रकार पर दबाव बनाते हैं और इन दबावों के बीच वह पत्रकार अपनी जगह किस तरह बनाए ये उसके लिए एक बड़ी चुनौती हो जाता है। सच को सामने लाने के लिए निकले पत्रकार पर हमले के कई हालिया संस्करण हैं जिन्होंने इस विषय को यहां सूचीबद्घ किया है।


मणिपुर के पत्रकार पिछले दिनो हड़ताल पर रहे और वहां दो दिनों तक कोई अखबार नहीं छपा। वजह थी कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी  से जुड़े आतंकवादी पत्रकारों को उनके खिलाफ खबर छापने पर जान से मारने की धमकी देते हैं। पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर में कम से कम 25 पत्रकारों की हत्या हुई और 30 से अधिक को आतंकवादियों को मदद देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। मणिपुर जैसे कई राज्यों में आतंकवादियों ने मीडिया को वास्तव में बंधक बना लिया है। असम में 20 और मणिपुर में पांच पत्रकारों की हत्या हुई, लेकिन किसी को भी इस संबंध में गिरफ्तार नहीं किया गया. आतंकवादियों के साथ ही राज्य प्रशासन भी मीडिया का उत्पीडऩ करता है।
महाराष्ट्र में 5 जुलाई को भारत बंद के दौरान नागपुर के वेरायटी चौक पर कवरेज के लिए गए मीडियाकर्मियों पर भी पुलिस द्वारा लाठीचार्ज  किया गया। 
लखनऊ में क्वीन्स ूबेटन की कवरेज में गए पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी की गई। लाइव कवरेज करने वाले पत्रकारों को रोका गया और जब पत्रकारों ने विरोध किया तो अधिकारियों ने अफरातफरी का माहौल बनाते हुए कई पत्रकारों को जबरिया पुलिस के वाहनों में बैठा लिया। इसके बाद यहां से करीब एक दर्जन पत्रकारों को बलपूर्वक वाहन मे ठूंसकर मोहनलालगंज थाने को भेज दिया गया। इसके अलावा बेटन के साथ चल रहे लोगों को भी चौराहे पर घण्टों धूप व उमस भरी गर्मी में रोके रखा गया।
नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज के साथ हाल ही में नंदीग्राम पुलिस ने ऐसा बरताव किया जैसे वह कोई आतंकवादी हों।
कश्मीर में जिस तरह से स्थानीय पत्रकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है उससे भी तमाम लोग वाकिफ हैं।
पत्रकार के प्रतिकार का एक छोटा सा हालिया नमूना ये भी है
सिरसा और फतेहाबाद में बाढग़्रस्त, इलाकों का जायजा लेने पहुंचे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा एक पत्रकार के सवाल पर बुरी तरह झल्ला गए और उसे पत्रकार काांफ्रेस से बाहर निकल जाने का हुक्म सुना दिया। पत्रकार ने मुख्यमंत्री हुड्डा से पूछा था कि केंद्र सरकार ने बाढ़ से बचाव के लिए हरयिाणा को 75 करोड़ रूपए दिए हैं, लेकिन अकेले रोहतक को ही 23 करोड़ रूपए क्यों दे दिए गए। राज्य के बाकी जिलों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों। पत्रकार का यह सवाल हुड्डा का नागवार लगा और उन्होंन झल्लाते हुए पहले तो उससे उसके अखबार का नाम पूछा और बाद में उसे बाहर निकल जाने कह दिया। ज्ञात रहे मुख्यमंत्री हुड्डा रोहतक से ताल्लुक रखते हैं।

3 टिप्‍पणियां:

neeshoo ने कहा…

हिमानी जी मुद्दा विचारनीय है..........लोक तंत्र के चौथे स्तम्भ को भी अपना कार्य खुद से नि तय करना होगा ...........बाकी अभी तो ऐसा कोई कानून भारत में नहीं बना जो पत्रकारिता के कार्य को निर्धारित कर सके ........

संजय भास्कर ने कहा…

हिमानी जी मुद्दा विचारनीय है..

संजय भास्कर ने कहा…

VAIS HIMANI JI MAIN FATEHABAD ME HI REHTA HOON...

MERA SEHAR HAI..

YAHA PAR PATRAKAR SE BATTAMIJI KI GAI HAI.