गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

क्या .......मालूम ......




हवा का वो हल्का सा झोंका

जब भी छूकर गुजरता है तन को

एक सिरहन सी महसूस होती है मन को

जैसे किसी ने ......नींद से जगा दिया हो

जैसे .............भटकते किसी राही को रास्ता दिखा दिया हो

क्या मालूम कुछ पूछने आई थी ये हवा

या कुछ बताकर चली गयी

क्या मालूम कोई दीया बुझ गया उसके आने से

या बुझे से मेरे मन की लौ को जगा कर चली गईं

मालूम है तो बस इतना कि

हवा आकर चली गई

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

शुन्य से ..............शिखर तक




कभी-कभी सोच बिल्कुल शुन्य हो जाती है कुछ समझ नही

आता की क्या सही है क्या ग़लत या कहू कि सही ग़लत नाम की कोई चीज़ होती ही नही है इन दिनों मीडिया से जुड़े कई लोगो से मिलने और बातचीत करने का मौका मिला लेकिन सबके अलग अनुभवों अलग प्रष्टभूमि के बावजूद भी एक विचार सबका साझा था कि मीडिया में मिशन जैसा कुछ नही है इट्स ओनली ऐ प्रोफेशन .............ख़बर से खेल जाओ ...................ख़बर बिकती है ..................और अंत में आम भाषा में सबका सार................ गन्दा है पर धंदा है ये ............हो सकता है फिल्ड में जाने पर ये ही सारी बाते मेरी जुबान पर भी आ जाए लेकिन बेशक ये सोच लेकर मैंने एक पत्रकार बन्ने का सपना नही पाला था आप सोचेंगे कि ये कैसी सोच है जो एकपल में ही बदल गई लेकिन सच्चाई ही कुछ ऐसी है की सोच बदलने पर मजबूर कर देती है .......... पहले कहते थे आवय्शाकता ही अविष्कार की जननी है लेकिन अब तो द्रश्य बिल्कुल ही बदल गया है लगातार अविष्कार हो रहे और उसके बाद उनकी जरुरत इस कदर पैदा की जा रही है सब कुछ भूलकर हर कोई भागे जा रहा है और आगे और आगे न जाने २ गज जमीं के लिए क्यो इतना बेचैन हो गया है इंसान और मैं बेचैन हु ये सोचकर कि कैसे ख़ुद को बदलूंगी इस दुनिया के हिसाब ............ज्यादा भली तो नही हु लेकिन अपने लिए ही एक शेर याद आ रहा है .........................

अलग नही मेरी दुनिया अगरचे है मालूम

jamana और भले आदमी का साथ नही

मैक्सम गोर्की ने कही लिखा था ..................यदि मैं अपनी चिंता न करू तो और कौन करेगा ???? लेकिन यदि मैं केवल अपनी ही chinta करू तो मेरा अस्तित्व ही किसलिए है ??????????????

आज बहुत आदर्शवादी बातें लिख दी है मैंने जिनका शायद अब कोई अस्तिtva या वजूद नही बचा है और यदि हमें अपना वजूद बनाना है तो इन सब vicharon से तौबा करना ही बेहतर ये सोच मैंने शुन्य से शुरू कि थी लेकिन badlaav कि इस byar के साथ ही इसे शिखर तक ले जाना है न जाने कैसे होगा पर जैसे taise करना तो होगा ही





बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

कविता और जिंदगी


कवितायों में जिंदगी

कुछ कहती हुई सी

कुछ अनकही सी

जिंदगी के अर्थ को

कविता के शब्दों में पिरोना

दिल की हर भावना को

तुक और ताल में भिगोना

आसान तो नही होता

जिंदगी में हंसकर

कवितायों में रोना

लेकिन क्या करे????

कविता का ही तो किनारा है

वरना घर में कहा मिलता है कोई कोना

जिंदगी के अभावो को इस तरह

कविता में भावःमिल जाता है

जिस तरह कीचड़ में

होकर भी कमल खिल जाता है

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

इश्क kije फिर samajhiye.............


मीडिया की डेडलाइन के हिसाब से प्यार, इश्क और मोहब्बत के बारे में मुझे जो भी लिखना था, कल ही लिख देना चाहिए था, क्योकि कल ही तो थाप्यार का तथाकथित दिन वैलेंटाइन डे ......लेकिन लव की इस lifeline
मीडिया की डेडलाइन के दायरे में baandhna कुछ ठीक
नही लगा इसलिए sochaa पहले देख लू समझ लू
वैलेंटाइन डे क्या है और इसमे क्या क्या होता है
तो बस जो देखा समझा और जो समझ नही आया
वो सब आपके सामने रख रही ----------
सुबह जब अख़बार लेने निकली तो अखबारों से
ज्यादा ध्यान पास की दुकान पर महक रहे गुलाबो
पर गया जहाँ रोज सिर्फ़ एक ही फूल वाला बैठा
करता था वाही अज ३-४ बैठे थे फूल खरीदने
में बॉय फ्रेंड टाइप लड़के कम और पति टाइप आदमी
ज्यादा दिख रहे थे
खैर घर आकर अख़बार खोला तो अख़बार में भी
वैलेंटाइन डे की धूम मची थी अब भाई कोई समर्थन
करे या खिलाफत वैलेंटाइन डे ने तो अपनी टी आर पी
बडवा ही ली थी तो देखिये दैनिकभास्कर में खुशवंत
सिंग प्यार को परिभाषित कर रहे है -------
वासना को main समझता हु प्रेम को नही
जीवन की निरंतरता को बनाये रखने वाला
प्राकर्तिक आवेग है यह किसी नस्ल ,धर्म या वर्ग की दीवारों को नही jaanta प्रेम वह चमकीला आवरण है जो वासना को सम्मानजनक banaane के लिए हम उस पर चडाते है
ये विचार पढ़कर dharamveer bhaarti की कविता की कुछ panktiyan याद आ गई उन्होंने लिखा है
न हो ये वासना तो
जिंदगी की maap कैसे हो
किसी के रूप का samman
mujh पर पाप कैसे हो
naso का reshmi तूफान
mujh पर shaap कैसे हो
mehaj इससे किसी का
प्यार mujh पर पाप कैसे हो
मुझे तो वासना का विष
हमेशा बन गया अमृत
basharte वासना भी हो
तुम्हारे रूप से aabad
panktiya बहुत ही sashaqt है और शायद कही न कही कोई सच लिए हमारे सामने आती है लेकिन फिर भी ये sawal उठ जाता है की क्या वासना ही प्रेम है सिर्फ़ प्यार ही प्रेम नही है बहुत teda swal है शायद premiyo को भी कोई जवाब न pta हो
फिर देखा दा हिंदू में reuter का एक article जिसका heading था
DISPOSABLE MONEY AND DISPOSABLE RELATIONSHIP
जिसमे जो ख़ास baat likhi थी वो ये की
PEOPLE HAD DISPOSABLE MONEY AND THEY WANT DISPOSABLE RELATIONSHIP
वैसे बात चाहे प्रेम के vaasna में badalane की हो या vyavsayik हो जाने की akhbaron से ज्यादा ये बातें aasal जिंदगी में दिखाई दे जाती है
चलिए akhbaron की dunia से hatkar अब apko ले चलते है न्यूज़ channel की dunia में जहाँ आकर मैं kafi सोच में पड़ गई क्योकि surkhiyan hi kuch aisi थी ----------------


  • ujjain में bajrang दल के लोगो ने भाई-behan को peeta

  • jeend में police वालों ने लड़की की बाल pakadkar berahmi से pitai की

  • kolhapur में greeting card jalaye गए

  • ranchi में dinbhar hinduvadi sanghtno ने हंगामा किया

  • khabre तो और भी थी दोस्त लेकिन ये मेरा ब्लॉग है न्यूज़ channel नही इसलिए इससे ज्यादा नही लिख रही

यानि प्यार भी हुआ और ijhaar भी लेकिन pehre के sayen में


जितना कुछ देखा और पढ़ा utna लिख दिया लेकिन प्रेम क्या है इस बात पर अब भी ? ही laga है


लेकिन अपनी बात khatam करते करते apko kristofar morli की एक बात बताना chahungi उन्होंने कहा था की -------------------


अगर hame pta चले ki zindagi के minute बचे है jinme hame वो सब कुछ कहना जो हम कहना चाहते है तो हर टेलीफोन booth पर भीड़ लग jayegi और लोग atakte हुए एक doosre को batayenge की वो उनसे कितना प्यार करते है


बिल्कुल सही लिखा है उन्होंने प्यार तो सभी के दिल में होता है कही कहा नही jata और कही कहे बिना रहा नही जाता प्यार jatane के tarike badal गए प्यार करने वाले लोग badal गए लेकिन प्यार तो अब भी वैसा ही है तो क्यो प्यार के लिए सिर्फ़ ek दिन ko reserve किया जाए वो भी इतना ladjhagad कर हर navvarsh के sath प्यार को एक नया sankalp देते हुए उसे आगे badhaye और पूरे वर्ष उस sankalap को nibhakar हर दिन को प्यार के दिन की तरह manaye क्योकि ये प्यार ही जो इस bhagti dodti जिंदगी को tarotaja कर देता है

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

बस वादविवाद

मुझे हमेशा से वाद विवाद प्रतियोगितायों में हिस्सा लेने का बहुत शोंक रहा है लेकिन कॉलेज में दाखिल होने पर मेरी साथी ने मुझे संसदिये वाद विवाद प्रतियोगिता के बारे में बताया और मुझे हिस्सा लेने के लिए कहा लेकिन मुझे इस तरह की वाद विवाद का कोई अनुभव नही था तो मई थोड़ा नेर्वेस थी लेकिन मेरी साथी जो मुझसे पहले इस तरह की वाद विवाद में जा चुकी थी मुझे समझाया की --------------------------
संसदिये वादविवाद प्रतियोगिताक्पेहला और सबसे जरुरोई नियम यही है की आपको अपने विपक्षी दल की बात को हर कीमत पर काटना ही है यदि आप तथ्यों के साथ अपनी बात रखते हो तो और भी बढ़िया है उसके इस nuskhe को apnate हुए मैंने २-३ बार संसदिये वाद विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा तो लिया लेकिन जीत नही सकी क्योंकि सही बात को काटने का मुझे कोई अनुभव नही रहा है
खैर मैं बेशक अपनी दोस्त की seekh को नही अपना सकी लेकिन उसकी बात बिल्कुल सही थी ये aehsaas aajkal मुझे बार बार हो रहा है
कुछ १-२ दिन पहले BJP के rajnath singh ने कहा -------------satta में आने पर raam मन्दिर दुबारा banvayenge ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,लाल कृष्ण advani ने कहा की कोई अगर मुझसे जय shri ram कहता है तो मई कहता hun की जय shri raam कहना tab sarthak होगा जब हम ayodhya में भव्य raam मन्दिर banva सकेंगे
BJP के इस विचार और naare को NDA या sangh से कोई samarthan नही मिला vahi congress पार्टी ने भी बात के javab में कहा है की raam के नाम पर gumraah किया जा रहा है

ये बातें और bayanbaji अपने TV और akhbaro में khoob सुनी और पड़ी hongio लेकिन inka astitva क्या है जिस देश में गरीबी ,brashtachar, berojgari और aatankvaad हर badte दिन के sath badta जा raaha है vaha भव्य raam मन्दिर banvane की bate हो रही है bhagvan raam के प्रति shradha की वजह से ये सब नही हो रहा बल्कि इसलिए किया जा रहा है की और कोई मुद्दा नही bacha है और विपक्षी दल की बात काटना और उस पर aarop लगाना संसदिये vyavstha का नियम हो गया है
जो लोग ये मन्दिर m,asjid kom लेकर हर ५ वर्ष बाद bawal machate hia यदि १९९१ में एक poorani मस्जिद के बदले sansad की garima की raksh के लिए यदि उसने सरकार गिरा दी hiti तो तो शायद आज asli raam राज्य की isthapna की राह मिल गई होती
लेकिन
sarkaro के raveye के बारे में तो यही बात सही है की

तुमको aashoofta mijaajon की ख़बर से क्या काम
तुम sawara करो बैठे हुए gaisun अपने

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

नैतिकता का अत्याचार

आजकल हमारे कॉलेज में विभिन्न व्यक्तियों से बातचीत का आयोजन करवाया जा रहा है
इसी दौरान हाई कोर्ट की वकील चंद्रा निगम से विमर्श का अवसर मिला अब एक खास बात का जिक्र करुँगी जो इस बीच हुई......... एक छात्र ने पुछा कि
यदि कोई लड़की अभिभावकों के मना करने पर भी बार या पब में जाती है , शराब पीती है,रात को देर से घर आती है तो क्या अभिभावकों के पास उसके खिलाफ कोई अधिकार है सारी कक्षा में हँसी गूंज उठी क्योकि शायद बहुत गंभीर मुद्दों की शुरुवात एक लतीफे से ही होती है पता नही चलता कब एक मजाक हकीकत बनकर सामने आ जाता है खैर ये दार्शनिक बातें एक तरफ़ रखते है अभी
चंद्रा जिन ने भी फ़ौरन सवाल का जवाब दिया की यदि लड़की १८ वर्ष से अधिक आयु की है तो अभिभावक के पास कानूनी रूप से उससे रोकने का कोई अधिकार नही है अब बात बिल्कुल साफ़ थी लेकिन ये साफ़ बात कुछ बुद्धिजीवी लोगो को बिल्कुल समझ नही आती १८ वर्ष से अधिक आयु से अभिप्राय है की व्यक्ति अपना भला बुरा ख़ुद समझता है जबरन उस पर कुछ थोपा नही जा सकता
मंगलोर में हुई घटना से हम सभी वाकिफ है
अब इस पर स्वस्थ्य मंत्री रामदास का बयान पढिये ------
पब कल्चर भारतीयता के खिलाफ है
एक बात तो सीधे तौर पर समझ आती है की शराब ,बार ,पब ये सब अगर ग़लत है तो फिर सिर्फ़ महिलोयों के लिए नही पुरषों के लिए भी है
जिस संस्कृति की दुहाई देकर ये तथाकथित नेता हंगामा करते है शायद उसके इतिहास से वाकिफ नही है वो हमारी ही संस्कृति की तस्वीर है जहाँ अप्सराएँ नृत्य करती थी और राजा महाराजा मंद्दिरा रस में
इसकी वजह से देश का युवा वर्ग बड़ी संख्या में शराब पीने लगा है उन्होंने कहा भारत में ४० फीसदी सड़क दुर्घट्नाये नशे में गाड़ी चलने के कारन होती है हालिया सर्वे में खुलासा किया गया युवायों का ६० फीसदी शराब पीने लगा है
अब मंत्री जी ये बताये की शराब पीने का कारन क्या है जाहिर तौर पर उनके स्त्रोत जो की बार,पब और शराब के ठेकों के रूप में हर जगह खुलें है और इन्हे लाइसेन्स भी सरकार ही देती है यदि जनता की सेहत की इतनी ही चिंता है तो इन्हे बंद कर देना चाहिए जो करने का सरकार कभी सोचती भी नहीं है
श्री राम सेना के जिन लोगो ने इस घटना को अंजाम दिया है उनका कहना है की उन्होंने बिल्कुल ठीक किया है वो चाहते है की महिलाएं ऐसी जगहों पर न जायें, शाम होने से पहले घर वापस आ जाए औए शराब पीना उनके लिए बिल्कुल ग़लत है
अबसही ग़लत के बारें में मुझे इन बुद्धिजीवियों जितनी समझ तो नही है लेकिन
डूबे रहते थे वो हमारा ही इतिहास है जहाँ अजंता अल्लोरा की गुफाओं ,खजुराहो की शिल्प कला में नग्नता के दर्शन होते है ,हमारी पौराणिक कथाएँ जहाँ कामदेव और रति को कामुकता का देवत्व प्राप्त है
तो संस्कृति की दुहाई देना तो यहाँ सही नही ही लगता बेशक आचार विचार सिखाया जा सकता है लेकिन इस तरह आत्याचार करके तो ये हिंदुत्व के पहरेदार आतंक फैला रहें है इस एक घटना ने काफी सारी परते खोल दी है दूसरी बात जो सामने आई की इस घटना के लिए उत्तरदायी लोगो को जमानत दे दी गई है हलाकि जमानत मिल जन कानूनी प्रक्रिया का एक अंग है लेकिन इस जमानत और ऐसे अत्याचारियों के कुले आम घुमने का एक कारन हमारा सामाजिक परिवेश है जहाँ यदि लड़किया अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के लिया आगे आकर इन तथाकथित पहरेदारों के खिलाफ लडाई लड़ना चाहती है तो उन्हें न्याय की मंशा पलने से पहले ये ध्यान करना पड़ता है की वो एक लड़की है हमारा ये समाज घटना के लिए उत्तरदायी लोगो को भूल जाएगा लेकिन उस लड़की का नाम बदनामी की फेहरिस्त में युगों युगों के लिए दर्ज कर दिया जाएगा
सब कहते है वक़्त बदल रहा है लेकिन फिर कुछ ऐसा हीओ जाता है एक एहसास फिर जीवन पा लेता है की आजतक हम उसी लाकर को पीट रहे है जिसे लांघकर जमाना आगे निकल चुका है पिछले दिनों मैंने लड़की शीर्षक से एक कविता लिखी जिस पर कुछ लोगो ने कहा की अब लड़कियों की स्थिति बदल रही है लेकिन अब सब कुछ उनके सामने है बदलाव भी और बेदर्दी भी