बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

शुन्य से ..............शिखर तक




कभी-कभी सोच बिल्कुल शुन्य हो जाती है कुछ समझ नही

आता की क्या सही है क्या ग़लत या कहू कि सही ग़लत नाम की कोई चीज़ होती ही नही है इन दिनों मीडिया से जुड़े कई लोगो से मिलने और बातचीत करने का मौका मिला लेकिन सबके अलग अनुभवों अलग प्रष्टभूमि के बावजूद भी एक विचार सबका साझा था कि मीडिया में मिशन जैसा कुछ नही है इट्स ओनली ऐ प्रोफेशन .............ख़बर से खेल जाओ ...................ख़बर बिकती है ..................और अंत में आम भाषा में सबका सार................ गन्दा है पर धंदा है ये ............हो सकता है फिल्ड में जाने पर ये ही सारी बाते मेरी जुबान पर भी आ जाए लेकिन बेशक ये सोच लेकर मैंने एक पत्रकार बन्ने का सपना नही पाला था आप सोचेंगे कि ये कैसी सोच है जो एकपल में ही बदल गई लेकिन सच्चाई ही कुछ ऐसी है की सोच बदलने पर मजबूर कर देती है .......... पहले कहते थे आवय्शाकता ही अविष्कार की जननी है लेकिन अब तो द्रश्य बिल्कुल ही बदल गया है लगातार अविष्कार हो रहे और उसके बाद उनकी जरुरत इस कदर पैदा की जा रही है सब कुछ भूलकर हर कोई भागे जा रहा है और आगे और आगे न जाने २ गज जमीं के लिए क्यो इतना बेचैन हो गया है इंसान और मैं बेचैन हु ये सोचकर कि कैसे ख़ुद को बदलूंगी इस दुनिया के हिसाब ............ज्यादा भली तो नही हु लेकिन अपने लिए ही एक शेर याद आ रहा है .........................

अलग नही मेरी दुनिया अगरचे है मालूम

jamana और भले आदमी का साथ नही

मैक्सम गोर्की ने कही लिखा था ..................यदि मैं अपनी चिंता न करू तो और कौन करेगा ???? लेकिन यदि मैं केवल अपनी ही chinta करू तो मेरा अस्तित्व ही किसलिए है ??????????????

आज बहुत आदर्शवादी बातें लिख दी है मैंने जिनका शायद अब कोई अस्तिtva या वजूद नही बचा है और यदि हमें अपना वजूद बनाना है तो इन सब vicharon से तौबा करना ही बेहतर ये सोच मैंने शुन्य से शुरू कि थी लेकिन badlaav कि इस byar के साथ ही इसे शिखर तक ले जाना है न जाने कैसे होगा पर जैसे taise करना तो होगा ही





2 टिप्‍पणियां:

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

शुन्य और शिखर दोनों ही जरूरी हैं ताकि व्यक्ति को पता रहे कि वो कहां खड़ा है।

संगीता पुरी ने कहा…

पहले कहते थे आवय्शाकता ही अविष्कार की जननी है लेकिन अब तो द्रश्य बिल्कुल ही बदल गया है लगातार अविष्कार हो रहे और उसके बाद उनकी जरुरत इस कदर पैदा की जा रही है सब कुछ भूलकर हर कोई भागे जा रहा है
बिल्‍कुल सही कहा...और इतना ही नहीं ....उसको पाने के लिए उल्‍टे सीधे धंघे भी लगातार किए जा रहा है।