शनिवार, 26 जनवरी 2013

''करियर, प्यार और सेक्स'' किसे इनकार करेंगे आप

इनकार (2013)

प्रोड्यूसर-प्रकाश झा

डायरेक्टर-सुधीर मिश्रा
अर्जुन रामपाल
चित्रांगदा सिंह

तुम और मेरे जैसे लोग, जो प्यार के अलावा और भी बहुत कुछ चाहते हैं...क्या उनके बीच कुछ मुमकिन है…?... इसका जवाब है ‘’इनकार’’
फिल्म शुरू होती है सेक्सुअल हैरेसमेंट से औऱ खत्म होती है लव कन्फेशन पर। कहानी शुरू होती है बचपन की एक सीख से और खत्म होती है, जवानी के एक सिलसिले पर। कुल मिलाकर देखें तो दो बातें कही जा सकती हैं। या तो कहानी, फिल्म के हिसाब से हल्की थी, या फिल्म ही कहानी पर भारी पड़ गई। इन दो बातों के बावजूद भी इस फिल्म को देखऩे से इनकार नहीं किया जा सकता। सुधीर मिश्रा का डायरेक्शन और अर्जुन-चित्रांगदा की सुपर एक्टिंग के साथ ही फ्रेश कांसेप्ट वाली इस फिल्म को एक बार देखना तो बनता है। अब जब एक बार आप इस फिल्म को देख रहे होते हैं, तो आपको लगता है कि यह फिल्म एक बॉस के अपनी फीमेल एंप्लाई को सेक्सुअल हैरेस करने की कहानी है। यानी ऐसी कहानी, जहां बॉस, एक महिला कर्मी को कॉफी पर मिलने के बहाने होटल में बुलाता है और जबरदस्ती उसके साथ संबंध बनाता है। इस सबके बदले महिला कर्मी को मिलता है प्रमोशन औऱ नौकरी के तयशुदा फायदों से कहीं ज्यादा लाभ। (नोट-हर ऑफिस में बॉस इस तरह की कुछ न कुछ हरकतें जरूर करते हैं वो शारीरिक भी हो सकती हैं, मौखिक भी और ऐसी भी, जिनकी कोई भाषा नहीं है, इसे मद्देनजर रखते हुए हर किसी को अलग-अलग लग सकता है) मगर फिल्म की कहानी में सेक्सुअल हैरेसमेंट का सिर्फ नाम होता है। फिल्म सेक्सुअल हैरेसमेंट के केस की सुनवाई के तीन दिनों में तीन घंटे पूरा करती है और खत्म होने पर पता चलता है कि जिन लोगों के बीच सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस चल रहा होता है, वो दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे, हैं और शायद हमेशा करते रहेंगे। जहां प्यार हो फिर वहां कोई केस या कोई तीसरा कुछ नहीं कर सकता। यहीं पर फिल्म खत्म हो जाती है। इसके बावजूद भी लगभग तीन घंटे तक देखते रहने की कई वजह भी इस फिल्म में है। कहानी की लाइन से हटकर भी फिल्म में औरत और आदमी के बीच की अलग-अलग तरह की भावनात्मक कमजोरियों को बारीकी से दिखाया गया है। आज के समय में यह फिल्म हर उस लड़की और औरत को एक बार जरूर देखनी चाहिए, जो जिदंगी में सच में प्यार के अलावा और भी बहुत कुछ चाहती है। जो सपने देखती है और उन्हें पूरा करना चाहती है। जो एक औरत होकर भी टीम लीडर बनना चाहती है। सदियों से चली आ रही उस सोच को बदलना चाहती है, जिसके मुताबिक औरतों में किसी बड़ी पोजीशन को संभालने की क्षमता ही नहीं होती। बेशक देश और दुनिया में कई औऱतों ने इस मानसिकता को बदला है, लेकिन आज भी कहीं न कहीं अपनी कुछ भावनात्मक कमजोरियों की वजह से औरत को अच्छी-खासी करियर ग्रोथ को पीछे छोड़ शुरू से शुरू करना पड़ता है। देसी-विदेशी खूबसूरत लोकेशंस की बजाए फिल्म का ज्यादातर हिस्सा एक एड कंपनी के कांफ्रेंस रूम में शूट हुआ है। फिर भी इसमें हिंदुस्तान से लेकर न्यूयॉर्क और लंदन तक बिखरे कुछ ऐसे रगं देखे जा सकते हैं, जो देश और वेश दोनों बदलने पर भी एक जैसे रहते हैं। चिंत्रागदा बार-बार यह कहकर कि ‘’उस वक्त मुझे उस पर भरोसा था, इसलिए मैंने उसे जाने दिया’’   औऱत औऱ आदमी के बीच बनने वाले विश्वास की एक बहुत महीन लकीर की तरफ देखने को मजबूर करती हैं, जिसे बार-बार पार किया जाता है और प्यार का मामला, सेक्सुअल हैरेसमेंट में बदल जाता है या फिर जिसे आम भाषा में नफरत और ब्रेकअप कह दिया जाता है। क्योंकि यहां सब कुछ एक बॉस और एंप्लोई में हो रहा है, इसलिए कहानी थोड़ी अलग लगती है, लेकिन शायद सच्चाई हर तरह से कुछ इसी तरह की है कि उस वक्त का भरोसा, वक्त के साथ कमजोर क्यों होता जाता है। एक बात और इस पूरी फिल्म को देखने के बाद समझ आती है। जिस पर चाहें तो हंस भी सकते हैं। ज्यादातर फिल्मों मैं जो मैंने देखा है वो यही रहा है कि हीरो के हीरोइन को आई लव यू बोलने में ही इंटरवल हो जाता है और फिल्म के आखिरी सीन में दोनों एक बिस्तर पर होते हैं और लाइट बंद हो जाती है। इस फिल्म ने सोसाइटी के नए लव कल्चर को सामने रखा है। हीरो और हीरोइन एक-दूसरे के बहुत नजदीक आ जाते है। कई बार दोनों बिस्तर पर साथ होते हैं और बत्ती बुझ जाती है। लेकिन एक बार दोनों एक-दूसरे को आई लव यू नहीं बोलते। उनके बीच में प्यार का इजहार होता है आई लवड यू डैमिड...आई लवड यू जैसी भूतकाल की भाषा में। बस प्यार के इस इजहार के साथ सारी सजा, सारी दफा माफ औऱ फिल्म खत्म। रही बात बॉक्स ऑफिस रेटिंग की तो इसे रेटिंग के हिसाब से जज नहीं किया जा सकता। ये शायद हर तरह की ऑडियंस के लिए बनी भी नहीं है। कुछ फिल्मों को देखने के लिए एक समझ चाहिए होती है और कुछ फिल्में खुद-ब-खुद बहुत कुछ समझा देती हैं। इनकार इन दोनों परिस्थितियों को मिलाकर देखी जाने वाली फिल्म है। इसे देखने के लिए एक समझ चाहिए, अगर यह समझ एक दर्शक के तौर पर आपमें है तो फिल्म खुद-ब-खुद आपको राहुल वर्सेज माया के केस की सुनवाई के जरिये सपने और उनकी सीढ़ी वर्सेज प्यार और सेक्स का फर्क दिखा सकती है। इस फर्क को देखने के साथ ही अगर आप फिल्म देख चुके हैं तो उस फर्क को समझना भी जरूरी है जिसमें फिल्मों के हिट और फ्लॉप होने की वजहें बदल रही हैं। इन दिनों कुछ ऐसी भी बॉक्स ऑफिस हिट फिल्में आई हैं, जिनमें न स्टोरी है, न कांसेप्ट, न एक्टिंग। उनमें है सुपरस्टार हीरो, बेहतरीन लोकेशन, आइटम नंबर और तड़कते-भड़कते, नचाते-थिरकाते गाने। इस हिसाब से इनकार में एक कहानी है, जो बेशक अपने सब्जेक्ट के साथ पूरा इंसाफ नहीं कर पाई, लेकिन इसमें किरदार हैं, निर्देशन है, अभिनय है। इस सबसे बढ़कर घिसे-पिटे पुराने फार्मुले या सिक्वल नंबर पर बनने वाली फिल्मों से अलग ये एक नए सब्जेक्ट पर बनी फिल्म है। जहां तक म्यूजिक की बात है तो हजारों ख्वाहिशें ऐसी में सुधीर मिश्रा के साथ शुरुआत करने वाले और परिणिता जैसी फिल्मों के लिए म्यूजिक अवार्ड जीतने वाले शांतनु मोइत्रा और स्वानंद किरकिरे की टीम का म्यूजिक और लिरिक्स भी इस फिल्म को एक अलग टच देने में कामयाब रहे हैं।






और अंत में
-लड़कों के लिए ध्यान देने वाली एक बात
फ्लर्टेशन जब औरत को पसंद न हो तो वो हैरेसमेंट बन जाता है
-लड़कियों को समझना चाहिए
इनकार करने से पहले ये न सोचें कि कहीं मैं ओवर रिएक्ट तो नहीं कर रही! क्योंकि बाद में इनकार करने पर उसे सचमुच में ओवर रिएक्शन समझकर दरकिनार कर दिया जाता है।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

बलात्कार क्यों...


''बलात्कार, पुरुष कामुकता की न‌िरंतरता का एक चरम अंत है। पुरुषों में साथी तलाशने की चाहत मह‌िलाओं से ज्यादा प्रबल और अव‌िवेकी होती है। पुरुष इसके ल‌िए कई तरह से अपनी इच्छा को मह‌िलाओं के सामने रखते हैं। जब उनकी ये कामनाएं पूरी नहीं होती तो उनकी इच्छा पूर्त‌ि का एकमात्र साधन बलात्कार बचता है''
-स्टीवन प‌िंकर (नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक लेख से ली गई टिप्पणी)
पिछले कई दिनों से बार-बार ये सवाल दिमाग में कौंध रहा था क‌ि कोई आदमी बलात्कार क्यों करता है? अगर इसका जवाब सिर्फ इतना है कि सेक्स इच्छा की पूर्त‌ि के लिए बलात्कार किया जाता है तो इसके सामने फिर कुछ सवाल खड़े हो जाते हैं। 
पहला सवाल ये कि यह इच्छा किसी खास तबके या व्यक्ति में तो नहीं होती। दुनिया के हर आदमी में यह इच्छा कभी न कभी पैदा होती है, हर कोई बलात्कार करने लग जाए तो?  
दूसरा यह कि क्या सिर्फ एक इच्छा को पूरा करने के ल‌िए कोई इस हद तक गिर सकता है
हार्वर्ड व‌िश्वव‌िद्यालय में मनोव‌िज्ञान के प्रोफेसर स्टीवन प‌िंकर की हाल ही में सामने आई टिप्पणी जिस तरह से मेरे इन सवालों का जवाब देती है वो संतोषजनक तो नहीं है, लेकिन एक वजह को सामने जरूर रखती है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि दरिंदगी को किसी का मनोवैज्ञानिक विकार समझकर किसी भी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है। जहां तक मेरी समझ की बात है तो
बिना ज्यादा पड़ताल किए और सोचे-समझे, मेरे लिए बलात्कार का जो पहला मतलब सामने आता है, वह है किसी के साथ अनैच्छिक या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए जाने की घटना। लेकिन कुछ लोगों से बातचीत के दौरान और कुछ चीजें पढ़ते हुए जो परतें खुल रही हैं, उनसे यह घटना सिर्फ इतनी सी है नहीं। 
कई दफा मुझे लगता था कि हमारे देश में बलात्कार के इतने मामले ‌सामने आने की एक वजह ये भी हो सकती है कि यहां सेक्स नामक शब्द को जुबां पर लाने को भी बहुत बुरा माना जाता है। इसके बारे में सोचना और करना इतना गुप्त होता है कि किसका, कब, कहां और कितनी बार बलात्कार हो चुका है, इसके सही आंकड़ें शायद यहां कभी जुटाए ही न जा सकें। शरीर से जुड़ी इच्छा, भावना और जरूरत के इसी दमन की वजह हो सकता है बलात्कार। लेकिन एक दिन पहले बीबीसी पर प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट को पढ़कर ये भ्रम भी टूट गया। यह रिपोर्ट ब्रिटेन में बलात्कार के बढ़ते मामलों के बारे में है। रिपोर्ट के अनुसार इंग्लैंड और वेल्स में हर साल औसतन चार लाख 73 हज़ार सेक्स अपराध होते हैं। इनमें पुरूषों के साथ होनेवाले अपराध भी शामिल हैं, मगर बहुतायत महिलाओं के साथ हुए अपराध है। इनमें हर साल बलात्कार की संख्या 60 हज़ार से 95 हज़ार तक होती है। यानी आँकड़ों को मानें, तो इंग्लैंड-वेल्स में भारत से दोगुना से भी ज़्यादा बलात्कार होते हैं। इसका मतलब समाज में खुलापन और शारीरिक इच्छाओं की खुलेआम पूर्त‌ि भी इस समस्या का हल नहीं है। बलात्कार की घटनाओं को देखने-सुनने की इस कड़ी में मेरे बढ़ते कंफ्यूजन की एक वजह तमाम बुद्धिजीवियों और जाने-माने लोगों के बेतुके बयान भी हैं। छत्तीसगढ़ से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रमेश बैस ने भी कुछ ऐसा ही बयान दिया। उन्होंने कहा कि बड़ी लड़कियों या औरतों के साथ बलात्कार समझ में आता है, लेकिन अगर कोई इस तरह की हरकत नाबालिग के साथ करे तो उसे फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। इस बयान को सुनने के बाद बयानबाजी की जो राजनीति शुरू हुई वो तो अपने नियत कार्यक्रम के तहत जारी है ही। लेकिन मुद्दा यहां फिर सवालों पर आकर खड़ा हो जाता है कि औरतों के साथ बलात्कार अगर इतनी ही सामान्य घटना है तो फिर इस पर ‌इतना हो हल्ला क्यों? फिर सवाल ये भी है कि नाबालिग से बलात्कार के लिए आदमी की कौन सी प्रबल इच्छा जिम्मेदार है?
बलात्कार की घटनाओं के बाद लोगों ने लड़कियों के कपड़ों को लेकर भी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं जाहिर की। ''महिलाएं छोटे और भड़काऊ कपड़े न पहनें''  गोया पुराने जमाने में तो औरतें सिर से पैर तक ढकी होती थी। किसी ने तो यहां तक कह दिया कि ''लड़कियों के पास मोबाइल नहीं होना चाहिए'', गोया कि मोबाइल ही किसी आदमी को बलात्कार के सिग्नल प्रेषित करता है। ''उन्हें हमेशा किसी रिश्तेदार के साथ ही बाहर निकलना चाहिए'' गोया आज तक कभी रिश्तेदारी में किसी ने किसी का बलात्कार किया ही न हो। गोया इस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर करने वाले लोगों ने उन खबरों की तरफ कोई ध्यान ही न दिया हो, जब एक बाप अपनी बेटी की इज्जत लूटकर फरार पाया गया। घटनाएं चाहें कितनी ही सामने क्यों न आए। बहस का मुद्दा हमेशा आदमी की इच्छा और औरत की चरित्रहीनता पर खत्म होता है। 
क्या शरीर से जुड़ी कोई इच्छा, जरूरत या चाहत औरत के भीतर नहीं होती?
क्या कभी उसकी इच्छा और कामना अपने चरम पर नहीं पहुंचती?
क्या कभी औरत को पुरुष के ज्यादा अच्छे और स्मार्ट दिखने या हंस-बोलकर बात करने से गलत सिग्नल नहीं मिलते?
अगर ये सब औरत के साथ भी होता है। और अगर कुछ लोगों का सामना इस सच्चाई से भी हुआ है कि आदमियों का भी बलात्कार किया जाता है तो अंत में शायद बात प्रोफेसर स्टीवन पिंकर के उस तर्क पर ही आकर खत्म होती है, जिसमें उन्होंने आदमियों में कमुकता के स्तर को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बताया है। 
लेकिन अगर मनोवैज्ञानिक स्तर पर इच्छाओं का दमभर कर किसी अपराध और दरिंदगी को जायज ठहराया जा सकता तो अदालत, सजा और न्याय नाम के शब्द पैदा ही न हुए होते। यह मुद्दा अपराध,सजा और न्याय का तो है ही लेकिन भविष्य में इससे निपटने और इससे बचने के लिए ''आदमी, औरत और सेक्स'' की गुत्थी को भी सुलझाने की जरूरत होगी।