गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

नजर को नजर की तलाश

उसके कहकहों में भी एक कशिशथी ............................................................................
जिसे कहने की कोशिश उसने कई बार की ..................................................................
बताना चाहा उसने जिंदगी की जद्दोजहद और जुस्तजू को.......................................
जिससे हर रोज दो चार होती थी वो ..............................................................
भरी भीड़ में भी उन आँखों को तलाशती थी उसकी आंखे...................
जो कहीं गहरे उतर जायें मन की गली तक .................
अफसाना नही था ये एक हकीकत है...................
की भीड़ की नजर भी थी....................
ऐसी ही एक नजर पर ..................................
यूँ तो न गुमशुदा है वो न गुमनाम है..........................
जिसे ढूँढ रहा था उसकी तरह हर कोई ..............................
मगर तलाश को तराजू में तोलकर ............................................
तो पाया नही जा सकता न ...................................................................
इसलिए आज सब अपनी ही नजरों से नजरें बचा रहें है ......................................
विश्वास को तोलकर धोखो की तकलीफ उठा रहे है ........................................................
बताना है उनको दिल का सब हाल किसी को ............................................................................
मगर तनहा ही आगे बढ़ते जा रहे है .....................................................................................................

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

madhushala


आज करे परहेज जगत पर



कल पीनी होगी हाला



आज करे इंकार जगत पर



कल पीना होगा प्याला



होने दो पैदा मद का महमूद



जगत्व में कोई , फिर



जहाँ कहीं भी है मंदिर -मस्जिद



वहां बनेगी मधुशाला



बच्चन जी कि ये पंक्तिया मधुशाला का जो रूप हमारे सामने रखती है उसकी किसी और चीज से तुलना नही कि जा सकती मगर तथ्य ये है कि कविता के अहसास पर जब हकीक़त कि चादर पड़ती है तो तस्वीर बहुत बदल जाती है और आज हकीक़त ये है कि मधुशाला में बैठकर बेशक किसी जात -पात का ध्यान न दे कोई मगर न तो मंदिर-मस्जिद का विवाद सुलझा न ही मधुशाला किसी दुश्मनी को कम कर पाई है जितनी सुन्दर ये कविता है उतनी ही बदसूरत मधुशाला से समाज में उपजती बुराई है क्योकि या तो मधुशाला अब शराब के ठेके के रूप में है या फिर किसी रहिस के पैसे उडाने और ऐश करने के ठिकाने के रूप में जिन्हें तथाकथित माडर्न नामों मसलन बार या पब के नाम से जाना जाता है जहाँ जाना अमीरी का परिचायक है



ये कोई नया विषय नही है जिस पर आज मैं चर्चा कर रही हूँ न जाने कितने सालो से शराब के कहर से हजारो लाखो घर देह चुके है हाल ही में दिल्ली के एक इलाके में हुई घटना से हम सभी वाकिफ है उस पर भी चुनावों के चलते वोट के लिए नेता अवेध शराब कि सप्लाई को अपना परम धरम समझते हुए लगातार वोटर को जाम कि मोटर में बिठाकर सैर करा रहें हैं



ये नही कहूँगी कि सरकार किस कि है या फिर ये आरोप नही लगाना चाहती हूँ कि कांग्रेस गाँधी जी के उसूलों का पालन नही कर रही है क्योंकि मैं जानती हूँ कि इस समाज में सबके अपने अपने गाँधी है जिसको जिस विचार से सुविधा मिलती है वो वाही विचार अपना लेता है लेकिन ध्यान दिलाना जरुरी भी है कि आज़ादी के संघर्ष में कांग्रेस ने सामाजिक जागरूकता अभियान चुने थे जिनमे नशाबंदी भी एक था लेकिन आज़ादी मिलने के साथ ही ये नीतिया उलट दी गई अब नशाबंदी के बारे में सोचना भी पाप है क्योकि राजस्व प्राप्ति का सबसे अच्छा जरिए शराब ही तो है जब भी मैं दो चार लोगो के बिच में ये कहती हूँ की शराब की बिक्री बंद हो जानी चाहिए तब टपक से जवाब मिलता है की तेरे कहने से कोई देश तो नही badal जाएगा


thik भी है देश तो नही badlega लेकिन हम तो badal सकते है न dikhave या bhulave के लिए शराब pikar अपना और apno का भविष्य तो बरबाद न karey एक sher है


न pine में जो maja है


vo pine में नही


ये जाना हमने pikar


काश sabko ऐसा ही अनुभव हो और ये नशे में dubta समाज होश में आ सके

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

मंथन कर रहा है मन



मंथन कर रहा है मन


मंजिलों के सफर का


मोह्हबतों की डगर का


रास्ते भी मुनासिब है मंजिल के और ..................


मोह्हबत भी हो सके मुकरर शायद.....................


मगर मुश्किलों की महफिल मेजबान बनी हुई है !!!!!!!!!


जीतने से पहले हारना......... एक मर्तबा....... मेरी पहचान बनी हुई


मुक्कमल जहाँ की जुस्तजू में हूँ जिस दिन से .........


उस दिन से सांसे तो थमीं नही है .........................


लेकिन जिंदगी एक अरमान बनी हुई है