शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

आज बाल दिवस है







आज बाल दिवस है यानि बालको का दिन
सोच रही हूँ किसे बधाई दूँ उन्हें जिनके हाथो में चॉकलेट और ढेर सारे गिफ्ट्स है या उन्हें जो आज भी निकल पड़े है अपने नन्हे हाथो में परिवार का पेट भरने की जिम्मेदारी लिए जिन्हें पता भी नही है बाल दिवस नामक किसी चीज के बारे में उनके लिए मैं शायद इस हद तक कुछ नही कर सकती कि सारे दुखो से मुक्ति दिला दूँ मै कर नही सकती और जो कर सकते है वो करना नहीं चाहते क्योकि न तो उन्हें दिखाई देता
सीमापुरी जैसे इलाके का कूदे के ढेर में बीतता बचपन
न उन्हें दिखाई देता
सी पी जैसे पोश इलाके में बन्दर बन कर भीख मांगते वो मासूम चेहरे
जिनके mann में सवाल तो कई है लेकिन वो आपसे जवाब लेने के ज्यादा echchuk नज़र नही आते क्योकि वो चाहते है सिर्फ़ थोडी सी भीख जिससे उनका पेट भर जाए
ये है २१ वी सदी का बचपन - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -- - - -----
जिम्मेदारी के बोझ को उठता बचपन जैसे इस बोझ के अलावा कुछ बचा ही न हो ज़िन्दगी में
ज्यादा से ज्यादा बोझ उठा सके वो उसकी खुशी है बस इसी में
क्या है ये ज़िन्दगी और क्या होता है इस ज़िन्दगी में ,न उसे मालूम है न उसने कभी सोचा
सोचता भी , तो कहाँ से शुरुवात करता
उसकी शुरुवात तो इसी सोच से होती है कैसे जुटाएगा वो दिन का खाना रात की रोटी
एक पहिये की तरह अच्छे बुरे हर रस्ते पर वो चोट खाकर भी चलता ही जाता है
मेहरूम है वो मासूम अपने बचपन से
खुशी क्या, खुशी क्या ख्याल भी उसे छु नही paata है
हर सवेरा उसकी ज़िन्दगी में संतुष्टि का सवाल लेकर आता है
इस सवाल को सुलझा ले वो बस यही चाहता है
कैसे कोई नियम , कोई कानून उसकी इस चाहत को मिटा सकता है
वो काम करना छोड़ दे तो क्या कानून उसे रोटी खिला सकता है, उसका घर चला सकता
यही सोचकर वो unhi raahon पर चल पड़ता है जिन पर वो चलता आया है
jahan उसने खेलने खाने की ummar में pasina bahaya है

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

लड़किया प्रेम में

ये कविता मैंने कहीं पर पढ़ी थी न जाने क्यो बहुत सच्ची लगी आप के लिए पोस्ट कर रही हूँ शायद आपको भी ऐसा ही कुछ अनुभव हो

लड़किया जब प्रेम करती है
तो वो खिला पाती है हर मौसम
तब वो चुपके से उत्तर जाती है
खुश्बूयों की किसी नदी में
या फ़िर पर्वतों की हथेलियोमे चमचमाती
किसी झील में तारती रहती है देर तक
उन्हें लगता है धरती और आसमान के
बिच जो इन्देर्धनुष खिलता है
वो उन्ही का प्रतिबिम्ब है
लड़किया अपने भीतर जगे उस मौसम के वशीभूत
लिखती है लंबे लंबे ख़त वों जानती है
सबकी नजरो से बचाकर लिखा गया
ये ख़त जब पहुंचेगा गंतव्य तक
तब स्वर्ग में बैठे देवता
उनकी राह में एक और फूल रख देंगे
लड़किया मानती है उनके प्रेमी
आएंगे उनकी उंगली थामने
प्रलय और झंझावातों के बीच भी
लड़किया जो आकंठ डूबी है प्रेम में
वो नही जानती कि विदा भी होते है मौसम

सोमवार, 3 नवंबर 2008

बादशाह का संदेश


कल यानि २ नवम्बर को मेरे fovourite अभिनेता का जन्मदिन था आप समझ ही गए होंगे मै किसकी बात कर रही हु वाही जिन्हें बॉलीवुड का किंग कहा जाता है शाहरुख़ खान उन्हें अपने ब्लॉग के मध्यम से ही शुभकामनाये देना चाहती हूँ
आज सुबह एन दी टी वि पर उनका इंटरव्यू दिखाया जा रहा था जैसा हर जन्मदिन पर सभी न्यूज़ चैनल्स में किया जाता है पर उन्होंने इस बार जो एक खास बात कही वो ये थी की हमें धरम और जात के आधार पर लडाई झगडा बंद कर देना चाहिए क्योकि आज विकसित होते हमारे देश में हम सबका एक साझा धरम होना चाहिए हमारा काम बेहद सुलझा संदेश है हम सबके लिए लेकिन अब जो लोग आतंक फैलाने को ही अपना काम समझ बैठे है उन्हें कौन समझाए ?

रविवार, 2 नवंबर 2008

गिरती संभलती ज़िन्दगी

सेंसेक्स,एन एस ई ,बी एस ई ,निफ्टी, सी आर आर और ऐसे ही तमाम तरह के शब्द पिछले कई दिनों से चर्चा में है मुझे तो खेर कई शब्दों का मतलब भी अभी पता चला लेकिन बहुतायत लोगो का तो जीवन ही इस शैएर मार्केट से चल रहा है उनके लिए वक़्त काफी कठिन रहा ,हालाकि जिस लक्ष्य को पाने की जुगत में मै जी रही हु उसके लिए मुझे हर फिल्ड की जानकारी होनी चाहिए लेकिन शैएर मार्केट के बारे में मै ज्यादा नही जानती फिर भी मैंने काफी कुछ नोटिस किया जिसक अधर पर ये विचार रख रही हु

आजकल काम के नाम बदल गए है बस वरना काम तो वाही है सदियों पुराने शैएर मार्केट मे भी वाही किस्मत का खेल चलता है जो किसी जमाने में लॉटरी और बोलिया लगा कर चला करता था किस्मत को अजमाना ग़लत नही है न ही शैएर मार्केट कोई बुरी चीज़ है लेकिन बुरा लगा ये देखकर की वो डॉक्टर जो मरीजों के इलाज के लिए अपनी आजीविका के लिए पाँच से सात वर्षो तक की कठिन पदाई करता है उसे मरीजों को देखने में अब मज़ा नही आता क्योकि कभी तो वो मुनाफे की खुशी में फुला बैठा होता है कभी मंदी के गम में डूबा रहता है हर एक पल उसकी इन्द्रिय सेंसेक्सकी रीडिंग को ताकने के लिए बेताब रहती है सिर्फ़ डॉक्टर ही नही बहुत से जिम्मेदार पेशेवर लोग अपना मूल कार्य छोड़कर इस गंगा में हाथ धोने के लिए अपना नित्य नहाने का कम छोड़े बैठे है निवेशक कम्पनिया या बैंक तो इस कार्य में शामिल होते है क्योंकि ये उनके और देश के लाभ के लिए जरुरी है लेकिन अन्य कार्यो में लगे लोगो को पार्ट टाइम ही इसे अपनाने कोशिश करनी चाहिए क्योकि अकेले shaiyer मार्केट के उठने गीरने से देश की छवि नही चलती शिक्षा, स्वास्थ्य,व्यवस्था जैसे अन्य बहुत से मापदंड है जिनमे सुधार कार्य होने की जरुरत है झा अज की बाघ दोड़ भरी ज़िन्दगी में वैस ही अपने परिवार और घर को देने का टाइम नही मिलता वहा रहा सहा टाइम भी शियेर गिरने उठने के इंतजार में बीतने लगा तो सुकून कहा बचेगा जिसके लिए ये सब किया जा है

हो सकता है मेरी राय से बहुत से लोग इतिफाक न रखे लेकिन मैंने वाही लिखा जो भावः दीपावली कि रौशनी में भी लोगो के मनन के अंधियारे को महसूस कर मुझे महसूस हुआ