रविवार, 2 नवंबर 2008

गिरती संभलती ज़िन्दगी

सेंसेक्स,एन एस ई ,बी एस ई ,निफ्टी, सी आर आर और ऐसे ही तमाम तरह के शब्द पिछले कई दिनों से चर्चा में है मुझे तो खेर कई शब्दों का मतलब भी अभी पता चला लेकिन बहुतायत लोगो का तो जीवन ही इस शैएर मार्केट से चल रहा है उनके लिए वक़्त काफी कठिन रहा ,हालाकि जिस लक्ष्य को पाने की जुगत में मै जी रही हु उसके लिए मुझे हर फिल्ड की जानकारी होनी चाहिए लेकिन शैएर मार्केट के बारे में मै ज्यादा नही जानती फिर भी मैंने काफी कुछ नोटिस किया जिसक अधर पर ये विचार रख रही हु

आजकल काम के नाम बदल गए है बस वरना काम तो वाही है सदियों पुराने शैएर मार्केट मे भी वाही किस्मत का खेल चलता है जो किसी जमाने में लॉटरी और बोलिया लगा कर चला करता था किस्मत को अजमाना ग़लत नही है न ही शैएर मार्केट कोई बुरी चीज़ है लेकिन बुरा लगा ये देखकर की वो डॉक्टर जो मरीजों के इलाज के लिए अपनी आजीविका के लिए पाँच से सात वर्षो तक की कठिन पदाई करता है उसे मरीजों को देखने में अब मज़ा नही आता क्योकि कभी तो वो मुनाफे की खुशी में फुला बैठा होता है कभी मंदी के गम में डूबा रहता है हर एक पल उसकी इन्द्रिय सेंसेक्सकी रीडिंग को ताकने के लिए बेताब रहती है सिर्फ़ डॉक्टर ही नही बहुत से जिम्मेदार पेशेवर लोग अपना मूल कार्य छोड़कर इस गंगा में हाथ धोने के लिए अपना नित्य नहाने का कम छोड़े बैठे है निवेशक कम्पनिया या बैंक तो इस कार्य में शामिल होते है क्योंकि ये उनके और देश के लाभ के लिए जरुरी है लेकिन अन्य कार्यो में लगे लोगो को पार्ट टाइम ही इसे अपनाने कोशिश करनी चाहिए क्योकि अकेले shaiyer मार्केट के उठने गीरने से देश की छवि नही चलती शिक्षा, स्वास्थ्य,व्यवस्था जैसे अन्य बहुत से मापदंड है जिनमे सुधार कार्य होने की जरुरत है झा अज की बाघ दोड़ भरी ज़िन्दगी में वैस ही अपने परिवार और घर को देने का टाइम नही मिलता वहा रहा सहा टाइम भी शियेर गिरने उठने के इंतजार में बीतने लगा तो सुकून कहा बचेगा जिसके लिए ये सब किया जा है

हो सकता है मेरी राय से बहुत से लोग इतिफाक न रखे लेकिन मैंने वाही लिखा जो भावः दीपावली कि रौशनी में भी लोगो के मनन के अंधियारे को महसूस कर मुझे महसूस हुआ

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