शनिवार, 12 दिसंबर 2009

रास्तें और मंजिल

उस शक्स को मोह है मंजिल का
और मंजिल
मोहताज है रास्तों की
रास्तों ने अपनी अलग ही राहें निकल ली है
और वो शक्स
ख्वाबों का बोझ लिए खड़ा है
बेहद दूर कहीं
रास्तें बेदर्द है है
और मंजिल बेक़सूर
न वक़्त ही मरहम है उसका
न उम्मीद ही दवा

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन भाव!!

Harsh ने कहा…

bhaav gehre hai............

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com