शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

नाम भर की आजादी के नाम बस कुछ शब्द

अगस्त का महीना आजादी का त्योहार। हर साल हर बार। तिरंगा, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत। बचपन में आजादी के दिवस का एक उद्देश्य स्कूल में मिलने वाले बूंदी के लड्डू थे। बड़े होकर ऐसा कोई उद्देश्य भी नहीं रहा। एक जानी-पहचानी बोरियत की गुलामी में ही कट जाया करता है आजादी का ये तथाकथित दिन।  कभी पिछले कुछ सालों से जब मन आजादी के मायने ढूंढने लगा है तो नजर पड़ जाती है उन जंजीरों पर जिनमें एक स्वाभाविकता के साथ हम सब, मैं, आप जकड़े हुए हैं। बोलते वक्त अगर इस शब्द को महसूस कर लिया जाये तो एक अजीब सा खालीपन हाथ लगता है। क्योंकि आजादी का अर्थ तो हमारे साथ है ही नहीं। कहीं। देश में दरारे पड़ रही हैं हर तरफ। कहीं विचारों में। कहीं व्यवहारों में और कहीं 63 साल पुरानी रंजिशें इस तरह ताजा हैं जैसे वक्त बीता ही नहीं। देश 63 साल पहले आजाद हुआ। खुशहाली और तरक्की के सपने देखे गए। तब सोचकर देखा होगा तो 63 साल बाद के भारत को बेहद खुबसूरत और उन्नत, बैर भाव से मुक्त पाया होगा लोगों ने। लेकिन आज पूरे नक्शे पर उकेरा जाए तो एक राज्य ऐसा नहीं मिलेगा जो किसी बड़ी समस्या से न जूझ रहा हो।
समाज में न जाने कितनी पीढिय़ा गई और नई आ गई लेकिन पुरानी बेडिय़ा आज तक नहीं हटी। कहीं बातों का हिस्सा हैं कहीं बहस का। समाज के ताने बाने भी कहां बदले। वही बात हुई कि घर की दीवारों पर नया रंग तो हो गया लेकिन घर की आबोहवा अब भी वैसी ही है।
अब हालात ऐसे लगते हैं कि इन पर कविता भी नहीं लिखी जाती। जी करता यूं कि छोड़ दे लिखना कविताएं। कम से कम कविता न लिखी जाए आजादी पर। न कहा जाए इस मौके को जश्न-ए-आजादी। न आजादी असलियत है फिजाओं की। न ही जश्न मनाएं जाने सरीखा मौका। जरा बैंठे कुछ देर हर रोज की तरह इस दिन भी। जैसे मंडली में गप्पे हांकने बैठ जाते है। और सोचें, विचारें, बात करें अपनी आजादी की। मिट्टी के चूल्हों से उठते धुएं से चिमनियों के धुएं निकलने तक के इस सफर में हम क्या कुछ नहीं खो चुके। उम्मीदों के जोश की मुठ्ठी भींचे क्या कुछ लिए आगे बढ़ें थे और आज क्या कुछ बचा है हाथ में। या फिर पूछो जरा खुद से कि क्या बचा है? आखिर बचा क्या है? दिखावे वाला कितना कुछ और देखा जा सकने वाला कुछ भी नहीं। अंग्रेंजों से आजादी की लड़ाई यों खत्म हुई कि आज अपना भी बस नहीं चलता खुद पर। नौकरियों में मालिक और मैनेजमेंट का जोर है तो बाकी जगह अपने अपने कैरेक्टर लिए हर शख्स टोकाटाकी को मुंह बांये खड़ा है। हम सब जगह गुलाम से हैं। फिर जब आजाद होने का मन करता है तो ये आजादी भी किसी और को गुलाम बनाकर हासिल की जा रही है। शायद वही एक जरिया रह गया। फूड चेन की तरह की एक प्रक्रिया पूरे जोरशोर से चल रही है। सब एक दूसरे को पकाकर खा जाना चाहते हैं। बहुत कुछ का जिक्र मुझे भा नहीं रहा क्योंकि इतना सा ही लिखकर घुटन होने लगी है। अब क्या लिखूं। फिर लिखने-पढऩे से भी डर लगने लगता है। लिखने की भी कहां आजादी है।

1 टिप्पणी:

देवेश प्रताप ने कहा…

आज के मौजूदा हालत को ......बहुत सही बयां किया आपने .....स्वतंत्रता दिवस कि ढेर सारी शुभकामनाएं .