सोमवार, 2 अगस्त 2010

आंखों का एक कसूर


उजालों के दरम्यान क्या खूब बनाए थे ख्वाबगाह।
इल्म ही नहीं था
अंधेरों के कारवां में
एक दरगाह भी नहीं मिलेगी
मन्नत के लिए।।
न रहमत
न किस्मत
साथ।
जवाब भी नहीं मिल रहे
हर रास्ते पर खड़े हैं सवालात।।
फिर जिक्र इन सपनों का।
फिर जंग उस सच के साथ।।
सपनों वाली इन आंखों को क्या दिया मैंने??
लेकिन इन आंखों ने क्या न दिया मुझे??
सपने भी।
और आंसूओं का सैलाब
भी साथ।।
काश कि ये आंखे मेरी
हंसी पर भी
होंठो के साथ मुस्कुराती।
काश कि ये आंखें
सपनें न दिखाती।।
काश कि ये आंखे देख पाती
कुछ पूरे ख्वाब।
सुन पाती
आधूरे जज्बात।।
महसूस हो पाता इन्हें
उस टूटन का अहसास।।

7 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

काश ये आँखें सपने ना दिखाती ...
सपने है तो आशा है ...आशा है तो विश्वास है ...कभी तो पूरे भी होंगे सपने ...इतनी निराशा क्यों ...?

nilesh mathur ने कहा…

कमाल कि अभिव्यक्ति, बहुत सुन्दर!

'अदा' ने कहा…

bahut khoob..!

देवेश प्रताप ने कहा…

लाजवाब रचना ..

संजय भास्कर ने कहा…

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

आपकी अभिव्यक्ति अत्यंत ही सुन्दर और सारगर्भित है , यदि संभव हो तो हमारे आगामी कार्यक्रम हेतु अपना एक खुबसूरत गीत अथवा नज़्म भेजें !

विशेष जानकारी के लिए यह लिंक देखें-

http://www.parikalpnaa.com/2010/07/blog-post_08.html

neeshoo ने कहा…

bahut hi khubsurasat kavita .....bhav aur saral shabd iski pradhanta hain ....