शुक्रवार, 18 जून 2010

खिड़की वाली सीट .............


दिल्ली में मेट्रो आये हुए,  न जाने कितने दिन हो गए हैं. शुरू में लोग आँख भर कर देखते थे अजूबे सरीखे इस संसार को और फिर अरमान भर चढ़ने लगे कृत्रिम ठंडक के साथ यात्रा का अहसास लेने के लिए और अब तो हालत ये हैं की मुंबई की लोकल और दिल्ली की मेट्रो मुझे एक जैसी ही लगती है. भीड़ की असलियत  इतनी भयावह है कि नकली रूप से इजाद की गई ठंडक कहीं काफूर हो जाती है. फिर गाहे बगाहे हादसे भी होते रहे है, तो मेट्रो सुर्ख़ियों में रहती ही है ...लेकिन न जाने क्यों मेरी अंखियों में हमेशा खचाखच भरी बसों का ख्वाब ही तैरता रहता है. वो बसे जिनमे कंडेक्टर धक्के दे देकर आपको बस में भरता ही जाता है. वो बसे जिनमे कभी भी आपकी तलाशी ली जा सकती है और पकडे जाने पर १०० रूपये का जुरमाना भी भरना पड़ सकता है. कम तो ये बसे भी नही है हादसों में ,   न जाने कितनी जाने गईं है इनके पह्यिओं से.    हर ख्वाब की कडवी हकीकत की तरह इस ख्वाब में हादसों का रुदन हमेशा याद आ जाता है लेकिन पहलूँ दूसरा है एक,  जो दिल से जुडा है , जिसे मैं कभी भूल नही पाती , दिल्ली जैसे महानगर में मेरी जद्दोजहद और ito , मंडी हाउस और कनाट प्लेस में चपले घिस कर बीत जाने वाली वो सुर्ख दुपहरियां.   कहीं दरवाजे के अन्दर पहुँच कर "न " कहीं दरवज्जे से ही "न ". आप अन्दर नही जा सकती ...अभी यहाँ कोई नौकरी नही हैं. जाने कितनी बार फोन पर बात करने के बाद मिलने वाले वो किसी के १० मिनट और वो दो मिनट में ख़त्म हो जाने वाली बात.... जिन रास्तों पर कभी झांककर  देखा नही था , लेकिन उन गलियों की जिज्ञासा हमेशा मन में थी की  ये रास्ता जाता कहाँ है ...हर ऐसे रस्ते पर चलने का वो लुत्फ़ और मन की बेचैनी क़ि मंजिल मिलेगी या नही...और फिर वहां से लौटते वक़्त उस लुत्फ़ का मन की गलियों में कहीं लटके हुए मिलना..... ये दिन बहुत अजीब थे.... दिल अमीर था , हालात गरीब थे . हालाँकि हालत अब भी ज्यादा नही बदली हालात अब भी चिड़ाते है ...लेकिन जब भी कई दिन बाद फिर तमाम आरोपों से घिरी उन बसों में से एक बस पर चढ़ने के बाद वो खिड़की वाली सीट मुझे मिली तो .....सारी यादें याद आ गई, ये एहसास जो तब कहना ही भूल गई थी मैं इसलिए आज लिख रही हूँ .....कई उम्मीदों की उलझन में घर से निकलना और  नाउमीद होकर वापस लौटने के बीच वो कुछ सुकून के पल... जिन्होंने हमेशा आत्महत्या करने जा रहे मेरे सपनो की जान बचाई....जब जब निराश हताश बस में चढ़ी  और मुझे मिली वो खिड़की  वाली सीट....... मैंने खुद को एक कोने में रखकर जब दुनिया को देखा तो मुझे दिखा सड़क पार करता एक बूढा इंसान,,नंग धडंग बच्चे को गोद में लिए भीख मांगती औरत... पानी की पन्नियों को बाल्टी में रखकर हर स्टॉप पर पानी बेचते दिखते वो बच्चे, वहीँ कहीं पानीपूरी की दूकान पर चाट पकोदियों के चटकारे लेते परिवार, फिर रस्ते में पड़ने वाले माल से हाथ में हाथ डाले निकलने वाले वो  प्रेमी जोड़े,............ कुछ रास्तों से खौफ खाकर बस में चड्ती थी और फिर खिड़की वाली सीट से जो रस्ते मैंने देखे उन्होंने मुझे जिंदगी के कई रंग दिखाए एक ही सड़क पर साथ साथ चलते कई तरह के सच ...जो सिर्फ सच थे कुछ और नही...न उनमे कोई सोच थी न कोई सपना ...एकलौते सच. आज भी दोस्त हँसते है जब मेट्रो को छोड़ बस में निकलने की जिद पकड़ लेती हूँ मैं ....मैं नही बंध पाती आराम के उन अंधेरों के बीच जहाँ उजाले में भी मुझे दुनिया दिखाई ही न दे ...सब रंग छुप जाये कहीं कुछ झूठी  चीजों के दिखावे की खातिर ....अब जहाँ नौकरी मिली है वहां ऑटो से ही जाना होता है बस में नही बैठ पाती हूँ लेकिन अब भी जब कभी हताश होती हूँ तो बहुत याद आती है वो खिड़की वाली सीट ........उस खिड़की से पड़ने वाले जाती- जाती धुप और आती-आती हवा दोनों का अहसास आज भी मुझे याद है ..एक कुनमुनाता सा एहसास जिसे महसूस कर लेंने भर से ही मैं गिरते गिरते संभल जाती हूँ ...............

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