शुक्रवार, 12 मार्च 2010

मैं



एक मुक्कमल सुबह का इंतज़ार है
मगर हर रात आने वाले चाँद  से भी बेहद प्यार है
नींद जरुरी है सेहत के लिए
मगर सपने दवाओं से ज्यादा तीमारदार है
एक दिल, एक जाँ है मुझमे
एक ही शक्स हूँ मैं
फिर भी आईने में देखकर
लगता है
कितनी ही परछाइयों का
अक्स हूँ मैं

4 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

RaniVishal ने कहा…

Bahut sundar rachana....word verification hata dijiyega, comment karane walo ko suvidha rahegi.
Shubhkaamnaae!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

M VERMA ने कहा…

कितनी ही परछाइयों का
अक्स हूँ मैं
परछाईयाँ तो खुद अक्स हैं
सुन्दर अभिव्यक्ति

संजय भास्कर ने कहा…

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।