मंगलवार, 23 मार्च 2010

सुख की तलाश में

सुख की तलाश में गई थी
दूर तलक मैं
जब 
खाली  हाथ
भारी  मन
लौटना हुआ
तो देखा
दुःख अब भी वहीँ बैठा
मेरी राह तक रहा है
ज्यो का त्यों
जरा भी नही बदला
एक तरफ मेरी तलाश अधूरी थी
दूसरी तरफ
मुझसे जुदाई में
दुःख भी उदास सा दिखा मुझे
कुछ और तो न कर सकी
मैंने सुख की तलाश छोड़
दुःख में ही
 सुकून को तराशना शुरू कर दिया

4 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

दुःख में ही
सुकून को तराशना शुरू कर दिया
सार्थक पहल
वाकई सुख और दुख तो अन्योन्याश्रित है
सुन्दर रचना

संजय भास्कर ने कहा…

सुख की तलाश में गई थी
दूर तलक मैं
जब
खाली हाथ
भारी मन
लौटना हुआ
तो देखा
दुःख अब भी वहीँ बैठा
मेरी राह तक रहा है

इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ........रचना....

संजय भास्कर ने कहा…

kada parhar kiya hai

pratham ने कहा…

are pahle apni aadhi zindgi to jeelo phir sukh aur dukh mai fark karna