शनिवार, 11 अक्तूबर 2008

शब्दों की दुनिया

कुछ शब्दों मे ख़ुद को शामिल कर लेती हु

यु तो हाथ नही लगता कुछ फ़िर भी बहुत कुछ हासिल कर लेती हु

छुपाये रखना चाहती हु ख़ुद को दुनिया से

फ़िर भी हर बार दुनिया में ही दाखिल कर लेती हु

दिल मजबूर करता है इस राह की ओर

दिमाग मोड़ देता है उस राह की ओर

एक दुनिया दो भागो में बंट जाती है, एक ज़िन्दगी दो हाथो में सिमट जाती है

कुछ कहना या सोचना ऐसे में मायने कहाँ रखता है

महफिल होती है पास फ़िर भी विराना लगता है

ऐसा ही होता है एक वक़्त वो जब हर साँस में एक शब्द होता है पर जुबान तक नही आता

बताना होता है बहुत कुछ, पर इन्सान कुछ जाहिर नही कर पता

हर कोई ,कोई न कोई उपाय अपना लेता है

कोई शराब में ख़ुद को डूबा लेता है

कोई बुरी लत लगा लेता है

ये तो बस कवि है जो अपनी कशमकश को भी

कविता बना लेता है मैं भी ऐसी ही कुछ कोशिश कर लेती हु

यु टो हाथ नही लगता कुछ भी फ़िर भी बहुत कुछ हासिल कर लेती हु

2 टिप्‍पणियां:

संदीप ने कहा…

इत्तेफाकन, इसी नाम से मेरा ब्‍लॉग भी है..

:)

anubhuti ने कहा…

so what can i do dear for u ab to blog ban gya