बुधवार, 12 जनवरी 2011

आखिर ये मुद्दआ क्या है





हर रोज ऑफिस आते हुए मैं मंदिर के सामने से गुजरती हूँ
हाथ जोडती हूँ और कान पकडती हूँ
बचपन की आदत है
माँ अक्सर चलती बस से भी इशारा कर मंदिर की तरफ सर झुकाने  के लिए कहती थी जाने अनजाने किसी का दिल दुखाने और गलतियों की माफ़ी मांगने को कहती थी हालाँकि इस बात के अपने अलग तर्क हो सकते है कि माफ़ी मांग लेने से गलती सुधार नही जाती लेकिन ये माँ कि बात है जिस पर हर तर्क फीका पड़ जाता है उसी तरह तब  की ये आदत आज तक बरकरार है ...और गलतियां भी तो नही रुकी फिर चाहे बचपन हो या जवानी. खैर
वहां हर रोज मैं मंदिर में एक महिला को देखती हूँ उनके अलावा मंदिर में सिर्फ पंडित जी होते है जो अक्सर बाहर आकर बातें करते हुए दिखते है
वो महिला अकेली ही मंदिर में भजन गाती है ..कभी राम रूप में आना कभी श्याम रूप में आना ... प्रभु जी चले आना
मंदिर के आलो में दीये जले होते है...एक अजीब सी सुकून देने वाली और चुभने वाली शांति भी होती है जो कभी कभी सन्नाटे जैसी भी लगती है ...ऑंखें बंद किये ढोलक की थप से अपने सुर मिलाने की कोशिश करती वो महिला गीत गाती रहती है
भगवान् को बुलाती रहती है पता नही वो वापस कब जाती होगी
पता नही भगवान् उसके बुलाने से आते होंगे या नही
क्या ये भगवान् को बुलाने का तरीका है या फिर खुद को बहकाने का
यहाँ मुद्दा
न आस्था है
न भगवान्
न अरदास
बात ये है कि
इंसान जीवन के यथार्थ पर नहीं बल्कि सपनो पर जीता है.
ऐसे सपने जो कभी कभी बिलकुल बेमानी होते है और कभी कभी ऐसे कि सपने जिंदगी बन जाते है
पर उस महिला को देखकर फिर भी बहुत से सवाल सामने आ जाते है
क्यों गा रही है ये अरदासों के ये गीत जब हर कोई मशगूल है अपनी जिंदगी में
मंदिर का पंडित भी मंदिर से बाहर बगले झांक रहा है







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