शनिवार, 30 जनवरी 2010

बदलते जाना


वक़्त के ढांचे में ढलकर

अपने वजूद को बनाना

वो अनजान से रस्ते चुनना

और जान भूजकर उन पर चलते जाना

अंधेरों से रौशनी कभी

और कभी

रौशनी से नींद के लिए

थोडा सा अँधेरा उधार मांग लाना

पहले जद्दोजहद से जिंदगी

और फिर

जिंदगी में जुस्तजू को पाना

खलिश से जगी ख्वाहिशें

और ख्वाहेशों को पाने में

खताओं को अपनाना

आसान तो नही होता न

सपनो को सच करने के लिए

हर बार लगातार

अपनी सोच को बदलते जाना

4 टिप्‍पणियां:

sanjay vyas ने कहा…

अद्भुत है! बस वर्तनी की एकाध अशुद्धि बहुत चुभती है.

संजय भास्कर ने कहा…

भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
सुंदर रचना....

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

ह्रदय पुष्प ने कहा…

अच्छी सोच

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सपनो को सच करने के लिए
हर बार लगातार
अपनी सोच को बदलते जाना

गहरे भाव लिए ........ सच है खुद को बदलना और अपनी सोच, अपने सपनो को बदलना आसान तो नही पर ........ बहुत लाजवाब रचना ....... एहसास जो सीधे उतार गये अंदर तक .........