सोमवार, 12 मार्च 2012

दो दुनिया

उनके पास एक वजह थी
बेवजह वक्त बरबाद करने की।
हमें हर वजह को भुलाकर
एक वक्त को हासिल करना था
उनके रास्तों पर मंजिलें खड़ी हुई थी
हमें खड़े खड़े रेलगाड़ी का सफर तय करना था
उन्होंने देखी नहीं होगी अपनी हथेली कभी
हमें हर वक्त हाथ की रेखाओं से लड़ना था
उनके लिए थे समुद्र के किनारों पर लगे हुए मेले   
हमें कुछ बनते ही गढ़ वाली गंगा में स्नान करना था
हम चबा रहे थे चाहतों को च्वीइंगम की तरह
और निगल रहे थे हर मजबूरी को
और उन्हें खाने से पहले उसकी खुशबू को          
चखना था
हमारे दरम्यान कोई दूरी नहीं थी मीलों की
इसी दुनिया में
उनकी बहुमंजिला इमारत के सामने हमारा
एक कमरे वाला किराये का घर था।

2 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत ही बढ़िया।


सादर

वन्दना ने कहा…

सुन्दर चित्रण्।