शनिवार, 10 मार्च 2012

अपनी तरह जीना भी दुश्वार

बहुत कुछ कहना होता है तो खामोशी एक बेहतर विकल्प लगता है। लेकिन साथ ये भी लगता है कि कभी कभी विकल्पों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ना अच्छा होता है। खामोशी को तोड़ देना अच्छा होता है। हालांकि इस वक्त कुछ कहने की शुरुआत करना मेरे लिए मुशिकल है। इस खामोशी को तोड़ना मुश्किल है। क्योंकि ये खामोशी बातों का ऐसा ज्वार भाटा लिए बैठी है जो कब आएगा, कब जाएगा कुछ पता नहीं है। इस आने-जाने के बीच में कितना कुछ बह जाएगा, कितना कुछ रह जाएगा ये सवाल भी लगातार डरा रहा है। अब इस पल, मैं इन सबसे पार पाकर लिखना शुरू कर रही हूं।
जैसे बिना कुछ सोचे-समझे खाली हाथ, आधी रात घर छोड़ते वक्त महसूस होता होगा वैसा ही इस वक्त मुझे महसूस हो रहा है। इस तरह शब्दों की दुनिया में... भावनाओं के समुद्र के साथ... रेगिस्तानी धरती की तरह... निशब्द होकर कदम रखना... भी तो बिल्कुल ऐसा ही है। ये अलग बात है कि मैं घर छोड़कर वापस आ चुकी हूं। लेकिन मन ने शायद अब भी घर को ही नहीं मुझे भी कहीं बीच में ही छोड़ा हुआ है। ये एक ऐसी जगह है जहां हर वक्त मेरे सामने दो विरोधाभासी विकल्प हैं।
चांद की चांदनी चुनूं या सूरज का प्रकाश
बारिशों का मौसम मांगूं या समुद्र वाले शहर का साथ
मंदिर-गुरुद्वारे जाउं या बस मन से कर लूं अरदास
इंतजार करूं या खुद ही चली जाऊं उसके पास
सीमाओं में बंधी रहूं उसूलों के साथ या छोड़ दूं हर बंधन की लाज

ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब भी मेरे पास हैं और इनसे जुड़े नए सवाल भी। अब परेशानी ये कि जवाब की दुनिया चुन लूं या सवालों की दहलीज पर ही खड़ी रहूं। कहते हैं कि सब कुछ हमारे हाथ में होता है जिंदगी की उलझनें भी रास्ते भी मंजिलें भी। हम जो चाहें वो कर सकते हैं। किताबों में पढ़ी ये बातें सिर्फ किताबी हैं या असल जिंदगी से भी इनका सरोकार है....फिर किसी से ये भी सुना कि कुछ सही गलत नहीं होता हमारी सोच उसे सही गलत बनाती है। लेकिन अगर मैं ये सोचती हूं कि रात के वक्त एक पुरुष मित्र के साथ एक कमरे में रुकना सही नहीं है और मेरे आसपास की दुनिया में तकरीबन हर शख्स इसे सही ठहरा चुका है तो सही गलत की इस लड़ाई में मैं कहां खड़ी हूं...दकियानुसी दुनिया में या ईमानदार सच्चाई के साथ जो अपने पैदा करने वालों को धोखा नहीं देना चाहती। ये मेरी इच्छाओं का खून हो रहा है या एक बेटी की मर्यादा का पालन। फिर मर्यादा, ये शब्द मेरे जेहन में कहां से आया..किसने सिखाया, किसी ने भी नहीं। किसी ने नहीं कहा कि मेरी इज्जत की रक्षा करना। जिन्हें कहना था वो शायद खुद इज्जत को बरी करके आगे बढ़ चुके थे जिंदगी में लेकिन मैं पीछे निकलती जा रही थी, मर्यादा के मोह में। नहीं जानती ये मर्यादा मेरी थी या उनकी जो कितने मेरे थे ये भी मुझे नहीं पता। अगर मुझे उनके अपना होने पर शक था तो मैं ये विश्वास भी कैसे कर सकती थी कि जिसके लिए मैं मर्यादा तोड़ूगी वो मेरा असपना ही होगा। औऱ इन सबसें आगे निकलकर जिंदगी का एक कड़वा सच ये है कि कोई अपना पराया नहीं होता। कुछ पलों के लिए हम कुछ लोगों की जरूरत होती है। पैदा करने के लिए मां की, प्यार पाने के लिए पति या प्रेमी की और आदर-सम्मान पाने के लिए औलाद की। क्या ये जिंदगी, समाज और दुनिया इतनी ही निरीह होती जा रही है जितना इन हालातों से महसूस हो रहा है। या जैसे मैं सोचती हूं वैसे भी जीया जा सकता है। जो लोग बंधन तोड़ चुके हैं उनके काफी आगे निकल जाने से परेशानी होती है। जो बंधनों में हैं उनके अब तक यूं जकड़े होने से चिढ़ होने लगती है। लेकिन आखिर में सब अपनी तरह अपनी जिंदगी जी रहे हैं। मुझे भी अपनी तरह जीना होगा। अपनी तरह......हिमानी की तरह  






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