शनिवार, 5 मार्च 2011

भीगे ही नही ...गीले भी हो गए है



  सिर में बहुत दर्द हो रहा है..   .
गाड़ियाँ भी अपनी रफ़्तार से आगे दौड़ने लगी थी    उस बारिश में.. लेकिन मैं अपने छोटे क़दमोंको       भी जितना धीरे हो सकता था उतना धीरे चला रही थी और इस धीरेबाजी में सिर्फ भीगी ही  नही सिर पर ओले भी पड़ गए..
 और अब ये दर्द..
 मुनासिब ही था इससे क्या गिला,
 गिला तो इस दिल से है जिसने बेवजह गीला करवा दिया
अब अपनी इस बेवकूफी के बारे में सोचते सोचते मुझे एक समझदारी भरी बात सूझी है
जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि जिंदगी भर की सारी फिलोसफी इस एक पल में समा गई है
बारिश जितना ही खूबसूरत लगता हैं न हमें सब कुछ
पहले पहले...
प्यार, सपने, जिंदगी, दोस्ती, रिश्ते, एहसास
और हम बिना रेनकोट और छाता लिए फुलतुश भीगने लगते है इस सब में
हम सिर्फ भीगने का मजा लेते रहते है
 अचानक जाने कहाँ से ओले भी पड़ जाते है
 फिर ऐसा ही दर्द होता है जैसे मेरे सिर में हो रहा है
और
 बचते बचाते जब जैसे तैसे घर पहुँचते है तो पता चलता है
अरे यार
हम सिर्फ भीगे ही नही
गीले भी हो गए है
इसके बाद सूखने में काफी वक़्त लग जाता है काफी वक़्त



1 टिप्पणी:

संजय भास्‍कर ने कहा…

मुनासिब ही था इससे क्या गिला,
गिला तो इस दिल से है जिसने बेवजह गीला करवा दिया
कमाल की पंक्तियाँ हैं हिमानी जी..... बहुत बढ़िया ..

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