रविवार, 13 सितंबर 2009

तीसरी फसल

एक तरफ़ देश झुझ रहा है सुखा और बांड के जाल में और इसी तरफ़ देश की सरकार सुलग रही है इनसे फैली समस्यों की बांड और इनके समाधानों के सूखे से .....ये समस्याएँ देश के लिए नई नही है यूँ भी भारत के तकलीफदेह संघर्षो में से अधिकांश संघर्ष पानी के साथ जुड़े रहे है ...... इन तमाम संघर्षो का इतिहास तो इस तरह की समस्याओं के बढ़ने से और अधिक समरद्ध हो जाता है लेकिन समाधानों के नाम पर शतरंज जसी बिसात बिछी दिखाई देती है ......हालाँकि हम और आप जैसे लोग यहाँ दूर दिल्ली प्रदेश में बैठे रहकर सूखे या बांड को सिर्फ़ अख़बारों में पढ़ और टी वि पर देख सकते है महसूस नही कर सकते पर जिन इलाकों पर ये आपदायें आए दिन मुह बाएं खड़ी रहती है वहां के लोगो के लिए पुरी जिंदगी की लग्जरी सिर्फ़ दो वक़्त की रोटी ही होती है हमारी तरह वो बंगले गाड़ी की दुआ कभी नही मांगते ......और सबसे ख़ास बात ये की उनकी अपनी दो वक़्त की रोटी जिस चीज से नकलती है उसी से हमारा भी पेट भरता है क्योंकि वो लोग कोई और नही बल्कि हमारेवास्त्विक अन्नदाता है वो हमारे कृषि प्रधान कहे जाने वाले देश के वास्तविक राजा है वो है किसान .....हम कितने भी उन्नत क्यों न हो जाए लाख रुपये की नैनो के बाद हजार रुपये का हवाई जहाज ही क्यो न बना ले मगर अन्न को कोई विकल्प हम नही ढूंढ पाएंगे की क्योकि पेट तो आख़िर अनाज की रोटी से ही भरा जा सकता है .....इन सभी चीजो के बारे में सोचते हुए मेरे हाथ के किताब लगी पत्रकार पी साईनाथ की लिखी "तीसरी फसल " मैं काफी दिनों से इन समस्याओं से जुड़ी जानकारी जुटा रही थी और इस किताब से बहुत मदद मिली .....ग्रामीण भारत के लोग साल में दो बार फसल करते है लेकिन जिन इलाकों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जाता है उनके लिए तिन फसल होती है सूखे के लिए मिलने वाली सुखा राहत को लेखक को ने तीसरी फसल कहा है हालाँकि इस फसल को काटने वाले वो नही होते ..दुसरे लोग होते है .......

सुखा रहत का बहुत बड़ा हिस्सा उन कामों में चला जाता जिनका सञ्चालन प्राइवेट कम्पनियाँ करती है .....एक जरुरी जानकरी जो इस किताब से मिली वो ये की सिधांत रूप में सूखे की चपेट में आने वाले इलाको को एक केन्द्रिये योजना के अधीन रखा जाता है जिसका नाम है द्रोत प्रोने अरास (दी पी ऐ पी ) लेकिन इन इलाको को दी पी ऐ पी के अर्न्तगत लान अब विशुद्ध रूप से एक राजनितिक निर्णय हो गया है अगर कोई ब्लाक दी पी ऐ पी में आ जाता है तो उसके लिए कई परियोजनाए एक के बाद एक तैयार होने लगती है ऐसी हालत में कुछ लोगो के लिए चपर फाड़ पैसे की बारिश हो जाती है सरकार की तरफ़ से जो मदद दी जाती है वो सुख्ग्रस्त इलाकों के लिए मगर कुछ ऐसे tathya सामने आते है जिनमे दी पी ऐ पी के अर्न्तगत वो इलाके शामिल है जहाँ अची खासी वर्षा होती है

मैं यहाँ सिर्फ़ ये बात एक किताब पढ़कर ही नही लिख रही इन बातों का sidha असर हमारी jivanshaili पर padne लगा है जब दाल chini के daam बढ़ने की वजह से लोगो ने khanne में mithaas कम कर दी है

यहाँ गौर इसी बात पर करना है की ये mithaas हमारे भोजन से ही नही जीवन से भी कम होती jayegi यदि देश की jadon में बस्ती कृषि और इसकी aatma ग्रामीण भारत की उन्नति पर dhyan नही दिया जाएगा

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