रविवार, 7 जून 2009

बीच बाजार में

लगभग हर दिन जिंदगी बीतती है आज क्या पाया ये सोचने और कल क्या हासिल करना है ये योजना बनाने में और हर दिन लगता है क्या है ये ज़िन्दगी .......... वाही शेर की पंक्ति ध्यान आती है की ..............बड़ी आसन थी मंजिल हमारी मगर रहबर ने उलझाया बहुत है ......................हर एक बात के लिए संघर्ष और उस पर एक महान सोच की संघर्ष ही सफलता की सीडी है............ चिडिया के बच्चे की तरह जब तक हम भी एक सायें तले जी रहे थे ऐसा ही लगता था पर घोंसले से बहार निकलकर देखा तो पता चला की सब कुछ बेमानी था सारा संघर्ष और सारी सोच धरी की धरी रह गई और अब शुरू होता है" एक नया संघर्ष ...... संघर्ष में न पड़ने का "मतलब अपना स्वार्थ साधो और पता नही क्या क्या??????????????? एक पत्रकार नही एक प्रसिद्ध पत्रकार बन्ने का सपना लेकर ये संघर्ष शुरू किया था लेकिन एक न्यूज़ चैनल में आते हुए अभी कुछ एक दिन ही हुए है और लगने लगा है की "ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नही"दरअसल यहाँ काम तो बहुत है लेकिन काम को देखकर लगता नही की ये पत्रकारिता है मैं लिखना जानती हूँ पढने का भी बहुत शौंक है लेकिन इस लिखने पढने के बिच ये घालमेल का फ्यूजन फिलहाल तो समझ नही आ रहा शायद भाविश्यें में आ जायें तो ..............अपनी ही इन बातों का मैं समर्थन न कर सकूँ फिलहाल भाविश्यें की कल्पना से भी भयभीत हूँ क्योंकि पत्रकारिता में आकर पत्रकार बन्ने की बजाये इस माहौल से एक लेखक मेरे अंदर पलने लगा है ............... जो हर दिन बहुत कुछ लिख देना चाहता है और क्या लिखे इस वजह से कुछ नही लिख पाता............... अब हिन्दी में लेखको की इस्थिति किसी से छुपी नही है ये एक शौंक हो सकता है लेकिन मंदी और महंगाई के इस दौर में कैसे कोई इसे अपने करमशेत्र में शामिल कर ले ?????बहरहाल आज ये यंत्र (कंप्यूटर ) मिला तो भड़ास निकाल दी अब भी लग रहा है कुछ कहना बाकि है खैर जिंदगी भी बाकि है लिखते ही रहेंगे पर आप हमें कागज पर पढेंगे या इस्क्रिन पर इसका हमें भी फिलहाल कोई अंदाजा नही है ...............

1 टिप्पणी:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

bahut umda post ............
lekin ek bar edit me ja kar proof k kuchh dosh sudha lenh toh aur sundar lagegi aapki rachna
WISH YOU ALL THE VERY BEST_________