बुधवार, 14 जनवरी 2009

हकीकत -ऐ -अफसाना

हकीकत में तुम मिल न सके मुझे

इसलिए ख्वाबों में तुमसे मुलाकात करती हूँ

तुम देते नही मेरी किसी बात का जवाब

इसलिए ख़ुद से ही सवालात करती हूँ

न जाने क्यो भूल नही पाती हूँ

वो वजह भी नही मालूम जिसकी

वजह से शामो-सेहर याद करती हूँ

तुम बसंती हवा की तरह आए

और पतझड़ दिखा कर चले गए

लेकिन मैं अब भी झूठी उम्मीद बांधे

सावन का इंतजार करती हूँ

तुमने तीन शब्दों में कर दिया

अपने प्यार का इजहार

मेरे पास तो शब्दों का अथाह सागर है

फिर मैं कैसे बताऊँ की कितना प्यार करती हूँ

1 टिप्पणी:

RAJEEV RAMAN ने कहा…

Aapki kavita Dil ki bahut gahrai se aa rahi aavaj ko sunke likhi gayi jaan padti hai.
shabdo ke tane-bane se aapne jo shama bandha hai vo vakai Kabile Tarif Hai.
Hamiri Duaye hamesha aapke sath hai.

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