रविवार, 14 अगस्त 2011

इस आजादी पर

घुमकड़ी का अपना अलग मजा है आप अकेले होकर भी एक नए शहर में एक नई जगह पर अकेले नही होते क्योंकि वहां बहुत कुछ होता है आपके जानने समझने, देखने और महसूस करने के लिए... दिल्ली की दुनिया में रहकर पंजाब मेरे लिए सिर्फ फिल्मों में दिखने वाली एक ऐसी जगह थी जहाँ बेहद खूबसूरत सरसों के खेत होते है ..इससे ज्यादा कभी मैंने सोचा ही नही शायद ....या जरुरत ही नही पड़ी सोचने की
लेकिन जरूरतों से जुस्तजू के दरम्यान एक रात में ही मेरे रहने का ठिकाना बदला और ६ सितम्बर २०१० को मैं लुधियाना आ गई ....फिर एक सिलसिला शुरू हुआ घुमकड़ी के उस शौक को पूरा करने का जो दिल्ली में रहते हुए सिर्फ कनाट प्लेस, लाजपत नगर, साकेत या मंडी हाउस तक सीमित था...हालाँकि मैं अपना ये शौक बहुत बेहतरी से तो पूरा नही कर पाई ..लेकिन एक छोटी से अनजानी सी अनसोची सी यात्रा हुई ..


फिरोजपुर
का गाँव हुसैनीवाला, पाकिस्तान की सरहद से सटा...मेरी हमेशा से पाकिस्तान जाने की इच्छा रही है .....वजह है ये जानना कि आखिर कौन सी ऐसी खाई है जिसने एक देश को दो बना दिया और दो पड़ोसियों को कभी एक होने नही दिया..लेकिन जिदगी की दूसरी  और जरूरतों और दबावों के आगे ये इच्छा जरा साइड पर ही रहती थी ...दरसल मैं फिरोजपुर अखबार के लिए एक स्टोरी करने गई थी ...कुछ पता नही था कि जहाँ जाना है वो जगह कितनी दूर है , वहां जाने का साधन क्या है और हा रात से पहले घर भी लौटना था...मुझे मुहार जमशेर नाम के एक गाँव में जाना था जो फिरोजपुर से भी १२० किलोमीटर दूर था और दोपहर के  3 :३० बजे फिरोजपुर से इस गाँव के लिए निकलने का मतलब था वापसी में देरी और असुरक्षा... इसलिए एक जानने वाले से पूछा  कि यहाँ सरहद पर बना कौन सा गाँव सबसे नजदीक है ..तब उसने हुस्सैनिवाला के बारे में बताया.. तब नही सोचा था कि आज मेरी वो साइड की हुई इच्छा यूँ पूरी होने वाली है.. गाँव पहुंचकर वहां बने बोर्डर के बारे में पता चला तो सोचा कि यहाँ देखते है क्या होता है ..बस फिर रास्ता ही सब कुछ जानता  था और हम निरे अजनबी एक मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे ...जब पहुंचे तो दिखी
दो सरहदे...एक तरफ पाकिस्तान ....एक तरफ हिन्दुस्तान
एक तरफ पाकिस्तान के लोग ..दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के
इधर हमारे सिपाही ..उधर उनके
एक दूसरे के आगे पैर ठोकते हुए ...
एक दूसरे को अकड़ दिखाते हुए ..
अपने अपने झंडे को ऊँचा उठाते हुए ..
वहां से पाकिस्तान जिंदाबाद  के नारे लगा रहे कुछ लोग
तो यहाँ से हिन्दुस्तान की जयकार करते  नौजवान
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एक साथ बहुत से सवाल उमड़ घुमड़ आये ये सब देख कर कि
ये सब क्यों हो रहा है ?
किसने बनवाया होगा ये बोर्डर ?
जब दुश्मनी है तो ये ठोक बजाने का दिखावा क्यों ?
 क्या मिल जाता है एक दूसरे के झंडे को निचा दिखाकर ?
क्या कभी मन नही करता होगा आपस में आम लोगों की तरह हसने बोलने का ?
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जब वहां एक सिपाही से इन सवालों के जवाब लेना चाहा तो उसने कहा हमें मीडिया वालों से बिना इजाजत बात करने की परमिशन नही है
जब तक वहां सेरेमनी चलती रही सिर्फ दुश्मनी दिखाई दी
जब वो सेरेमनी ख़त्म हुई और हम लोग बाहर आने लगे तब किसी को बातें करते सूना .." ये लोग सिर्फ आधे घंटे की इस सरेमोनी में ही ये ठोक बजाते है रात को साथ बैठकर दारु पीते है ..
फिर देखा की सीढियों से उतरते हुए पाकिस्तान के कुछ बच्चे हमें हाथ हिलाकर बाय कर रहे है
कुछ मुस्कुरा रहे हैं
कुछ नजरों में निगाहे डालकर कुछ ढूँढना चाह रहे है
ये वो बातें है जिन्हें लिखकर बयाँ नही किया जा सकता
हां आप चाहे तो पढ़कर महसूस जरुर कर सकते हैं ...
ये चिंदी चिंदी से एक दो पल जब आँखों के आगे दुबारा तैरते है तो लगता है यहाँ मैं रीट्रीट सेरेमनी नही
रीथिंक टू रीबिल्ड सरेमोनी देखने आई थी
यानि दुबारा से ये सोचना की हमें क्या बनाना है
दो दुश्मन देश??
दो दोस्त??
एक टुटा हुआ एक रूठा हुआ देश??
या फिर अगर हम ये सारी सरहदे ही मिटा दें !!!!! सिर्फ बातों में नही सच में ...सच में जाये और वो लोहे की तारें काट आये किसी औजार से
अब मिट जाना चाहिए इन सरहदों का अस्तित्व...हम दोनों देशवासी तो facebook पर कब से एक दूसरे के दोस्त हैं
हमारा दिल कब से धड़क रहा है विभाजन में अपने पीछे छुट चुके परिवारों के लिए

हम कहाँ चाहते है अब लड़ना झगड़ना हम तो चाहते है पाकिस्तान के खूबसूरत शहरों में जाकर छुट्टियाँ बिताना ...(इस आजादी दिवस पर पहली बार बेहद गुलाम अनुभव कर रही हूँ मैं खुद को)



2 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें और बधाई

अनुभव करने से क्या होगा ? जो रेखा खिंच गयी है विभाजन की उसे मिटाना असंभव है

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
HAPPY INDEPENDENCE DAY!