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शनिवार, 19 जनवरी 2013

बलात्कार क्यों...


''बलात्कार, पुरुष कामुकता की न‌िरंतरता का एक चरम अंत है। पुरुषों में साथी तलाशने की चाहत मह‌िलाओं से ज्यादा प्रबल और अव‌िवेकी होती है। पुरुष इसके ल‌िए कई तरह से अपनी इच्छा को मह‌िलाओं के सामने रखते हैं। जब उनकी ये कामनाएं पूरी नहीं होती तो उनकी इच्छा पूर्त‌ि का एकमात्र साधन बलात्कार बचता है''
-स्टीवन प‌िंकर (नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक लेख से ली गई टिप्पणी)
पिछले कई दिनों से बार-बार ये सवाल दिमाग में कौंध रहा था क‌ि कोई आदमी बलात्कार क्यों करता है? अगर इसका जवाब सिर्फ इतना है कि सेक्स इच्छा की पूर्त‌ि के लिए बलात्कार किया जाता है तो इसके सामने फिर कुछ सवाल खड़े हो जाते हैं। 
पहला सवाल ये कि यह इच्छा किसी खास तबके या व्यक्ति में तो नहीं होती। दुनिया के हर आदमी में यह इच्छा कभी न कभी पैदा होती है, हर कोई बलात्कार करने लग जाए तो?  
दूसरा यह कि क्या सिर्फ एक इच्छा को पूरा करने के ल‌िए कोई इस हद तक गिर सकता है
हार्वर्ड व‌िश्वव‌िद्यालय में मनोव‌िज्ञान के प्रोफेसर स्टीवन प‌िंकर की हाल ही में सामने आई टिप्पणी जिस तरह से मेरे इन सवालों का जवाब देती है वो संतोषजनक तो नहीं है, लेकिन एक वजह को सामने जरूर रखती है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि दरिंदगी को किसी का मनोवैज्ञानिक विकार समझकर किसी भी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है। जहां तक मेरी समझ की बात है तो
बिना ज्यादा पड़ताल किए और सोचे-समझे, मेरे लिए बलात्कार का जो पहला मतलब सामने आता है, वह है किसी के साथ अनैच्छिक या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए जाने की घटना। लेकिन कुछ लोगों से बातचीत के दौरान और कुछ चीजें पढ़ते हुए जो परतें खुल रही हैं, उनसे यह घटना सिर्फ इतनी सी है नहीं। 
कई दफा मुझे लगता था कि हमारे देश में बलात्कार के इतने मामले ‌सामने आने की एक वजह ये भी हो सकती है कि यहां सेक्स नामक शब्द को जुबां पर लाने को भी बहुत बुरा माना जाता है। इसके बारे में सोचना और करना इतना गुप्त होता है कि किसका, कब, कहां और कितनी बार बलात्कार हो चुका है, इसके सही आंकड़ें शायद यहां कभी जुटाए ही न जा सकें। शरीर से जुड़ी इच्छा, भावना और जरूरत के इसी दमन की वजह हो सकता है बलात्कार। लेकिन एक दिन पहले बीबीसी पर प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट को पढ़कर ये भ्रम भी टूट गया। यह रिपोर्ट ब्रिटेन में बलात्कार के बढ़ते मामलों के बारे में है। रिपोर्ट के अनुसार इंग्लैंड और वेल्स में हर साल औसतन चार लाख 73 हज़ार सेक्स अपराध होते हैं। इनमें पुरूषों के साथ होनेवाले अपराध भी शामिल हैं, मगर बहुतायत महिलाओं के साथ हुए अपराध है। इनमें हर साल बलात्कार की संख्या 60 हज़ार से 95 हज़ार तक होती है। यानी आँकड़ों को मानें, तो इंग्लैंड-वेल्स में भारत से दोगुना से भी ज़्यादा बलात्कार होते हैं। इसका मतलब समाज में खुलापन और शारीरिक इच्छाओं की खुलेआम पूर्त‌ि भी इस समस्या का हल नहीं है। बलात्कार की घटनाओं को देखने-सुनने की इस कड़ी में मेरे बढ़ते कंफ्यूजन की एक वजह तमाम बुद्धिजीवियों और जाने-माने लोगों के बेतुके बयान भी हैं। छत्तीसगढ़ से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रमेश बैस ने भी कुछ ऐसा ही बयान दिया। उन्होंने कहा कि बड़ी लड़कियों या औरतों के साथ बलात्कार समझ में आता है, लेकिन अगर कोई इस तरह की हरकत नाबालिग के साथ करे तो उसे फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। इस बयान को सुनने के बाद बयानबाजी की जो राजनीति शुरू हुई वो तो अपने नियत कार्यक्रम के तहत जारी है ही। लेकिन मुद्दा यहां फिर सवालों पर आकर खड़ा हो जाता है कि औरतों के साथ बलात्कार अगर इतनी ही सामान्य घटना है तो फिर इस पर ‌इतना हो हल्ला क्यों? फिर सवाल ये भी है कि नाबालिग से बलात्कार के लिए आदमी की कौन सी प्रबल इच्छा जिम्मेदार है?
बलात्कार की घटनाओं के बाद लोगों ने लड़कियों के कपड़ों को लेकर भी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं जाहिर की। ''महिलाएं छोटे और भड़काऊ कपड़े न पहनें''  गोया पुराने जमाने में तो औरतें सिर से पैर तक ढकी होती थी। किसी ने तो यहां तक कह दिया कि ''लड़कियों के पास मोबाइल नहीं होना चाहिए'', गोया कि मोबाइल ही किसी आदमी को बलात्कार के सिग्नल प्रेषित करता है। ''उन्हें हमेशा किसी रिश्तेदार के साथ ही बाहर निकलना चाहिए'' गोया आज तक कभी रिश्तेदारी में किसी ने किसी का बलात्कार किया ही न हो। गोया इस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर करने वाले लोगों ने उन खबरों की तरफ कोई ध्यान ही न दिया हो, जब एक बाप अपनी बेटी की इज्जत लूटकर फरार पाया गया। घटनाएं चाहें कितनी ही सामने क्यों न आए। बहस का मुद्दा हमेशा आदमी की इच्छा और औरत की चरित्रहीनता पर खत्म होता है। 
क्या शरीर से जुड़ी कोई इच्छा, जरूरत या चाहत औरत के भीतर नहीं होती?
क्या कभी उसकी इच्छा और कामना अपने चरम पर नहीं पहुंचती?
क्या कभी औरत को पुरुष के ज्यादा अच्छे और स्मार्ट दिखने या हंस-बोलकर बात करने से गलत सिग्नल नहीं मिलते?
अगर ये सब औरत के साथ भी होता है। और अगर कुछ लोगों का सामना इस सच्चाई से भी हुआ है कि आदमियों का भी बलात्कार किया जाता है तो अंत में शायद बात प्रोफेसर स्टीवन पिंकर के उस तर्क पर ही आकर खत्म होती है, जिसमें उन्होंने आदमियों में कमुकता के स्तर को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बताया है। 
लेकिन अगर मनोवैज्ञानिक स्तर पर इच्छाओं का दमभर कर किसी अपराध और दरिंदगी को जायज ठहराया जा सकता तो अदालत, सजा और न्याय नाम के शब्द पैदा ही न हुए होते। यह मुद्दा अपराध,सजा और न्याय का तो है ही लेकिन भविष्य में इससे निपटने और इससे बचने के लिए ''आदमी, औरत और सेक्स'' की गुत्थी को भी सुलझाने की जरूरत होगी।




शनिवार, 29 दिसंबर 2012

लड़की 'हो' ना

जब इस बात का अहसास होना शुरू हुआ कि मैं लड़की हूं, तब सब कुछ इतना बुरा नहीं था। मगर जिन दिनों से उन नियमों ने मेरे दिमाग में जगह बनाई, जिन पर चलने की सीख मुझे दी जाने लगी, क्योंकि मैं एक लड़की थी, तब से सब कुछ काफी बुरा लगने लगा। यहां तक कि तब से मुझे अपना लड़की होना ही बुरा लगने लगा। उन दिनों के बाद से दुनिया भर के हसीन ख्वाबों और ख्यालों के बीच एक ख्वाहिश मेरे दिल में हमेशा कसमसाती रहती थी कि काश! मैं लड़का होती।
लड़का होती तो दादी ने मां के साथ बुरा व्यवहार न किया होता।
लड़का होती तो घर वालों के मन में एक अजीब सी असुरक्षा की भावना न होती।
लड़का होती तो मां को भविष्य इतना धुंधला और कमजोर न दिखता।
लड़का होती तो देर तक बाहर घूमती।
लड़का होती तो बिना बताए घर से चली जाती।
लड़का होती तो शराब के हर एक घुंट के साथ जिंदगी को आसान बना लेती।
लड़का होती तो सिगरेट के कश भरती और हर फिक्र को धुएं में उड़ा देती।
लड़का होती तो ऑफिस से घर जाने की जल्दी न करनी पड़ती।
लड़का होती तो नाइट रिपोर्टिंग करती।
लड़का होती तो रेड लाइट एरिया में जाकर उनकी जिंदगी करीब से देख सकती।
लड़का होती तो इस बात का इंतजार न करना पड़ता कि कोई लड़का आएगा और मेरी जिदंगी की हर तकलीफ को कम कर देगा हर पहेली को सुलझा देगा।
लड़का होती तो ये.... लड़का होती तो वो....
आज भी बेशक मैं लड़की होने पर फक्र नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे अंदर की लड़की कहीं घुट रही है।
मगर मैं अब कभी लड़का नहीं होना चाहती।
अगर लड़का होने का मतलब लड़की होने के असित्त्व को बार-बार तार-तार करना रह गया है तो मैं कभी लड़का नहीं होना चाहती।
अगर कभी बाप, कभी भाई, कभी बेटे और कभी किसी मनचले के रूप में लड़कों की मर्दानगी का मतलब लड़कियों की मौत के तौर पर ही सामने आता है तो मैं कभी लड़का नहीं होना चाहती।
और  ये जानते-समझते हुए भी कि हर शख्स एक जैसा नहीं होता, हालात बार-बार मुझे झकझोर रहे हैं, मजबूर कर रहे हैं कि मैं किसी मर्द पर भरोसा न करूं और अपने विश्वास को फौरन हर आदमी पर से चलता कर दूं.......
या फिर मैं नहीं समझ पा रही कि उसकी कुर्बानी का मोल किस तरह अदा करूं
आखिर में मैं एक लड़की हूं औऱ नहीं चाहती कि अपनी जिंदगी में फिर कभी किसी लड़की की ऐसी कुर्बानी की साक्षी बनूं। 

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

फांसी फांसी फांसी


 24 साल के इस सफर में ज‌िंदगी ने कई बार उलझाया। कई बार हालात के दलदल में फंसाया। कई मरतबा ऐसा हुआ ‌क‌ि सोचने और समझने की ताकत नहीं रही। ‌फ‌िर भी बीते कुछ द‌िनों में मेरे सामने आने वाली चीजें न जाने क्यों मुझे हर बीती हुई मुश्क‌िल से भी ज्यादा कठ‌िन लगी। हाथ में कागज, कलम, लेपटॉप कुछ नहीं था और मन में शब्दों का तेज ज्वार भाटा। मैंने क‌िसी दोस्त का फोन नहीं ल‌िया, क‌िसी से बात नहीं की। न टीवी, न रेड‌ियो, न अखबार कुछ नहीं था पास। कुछ मालूम नहीं था क‌ि दुन‌िया में हो क्या रहा है। द‌िख रहा था तो बस इतना क‌ि ज‌िंदगी में जो हो रहा है वो नहीं होना चाह‌िए। हो रहा है तो उसका हल म‌िलना चाह‌िए। मगर कुछ नहीं म‌िला। ज‌िस पटरी पर चलते-चलते गाड़ी रुक गई थी, उस पर बहुत देर रुकी रहने के बाद फ‌िर से घ‌िसटने लगी। अब कोई सोचे क‌ि ऐसा भी क्या मामला था तो इस बारे में मैं कुछ नहीं ल‌िख सकती। मुझे हमेशा से लगता आया है क‌ि अपनी न‌िजी ज‌िंदगी और पार‌िवार‌िक मसलों के बारे में दूसरों से ज्यादा बातचीत नहीं करनी चाह‌िए। लगता आया है या मां की सीख का असर है शायद। मैं इतना सब भी नहीं ल‌िखती... अगर तीन बाद अखबार देखते ही मेरे सामने दर‌िंदगी की वो घटना न आई होती। 
मैं स्तब्ध थी पढ़कर। 
नहीं महसूस कर सकती क‌ि वो कैसी होगी सहकर।  
मैं बहुत भावुक हूं। बहुत कुछ ल‌िखती व‌िखती रहती हूं, ले‌क‌िन मेरे अंदर उठ रहा शब्दों का सारा ज्वार भाटा अचानक आकाश और धरती के बीच ही कहीं अपनी जगह बनाकर रुक गया है। 
जैसे बचपन में हम दोस्तों को स्टेच्यू बोलकर कई देर के ल‌िए ज्यों का त्यों छोड़ देते थे। 
मेरी भावनाएं ऐसे सूख गई हैं जैसे उड़ीसा के कालाहांडी का अकाल। 
न मैं कैंडल मार्च कर सकती हूं। 
न हाथ में पोस्टर लेकर च‌िल्ला सकती हूं। 

मेरा कुछ भी ल‌िखना या करना इस स्थ‌ित‌ि के ल‌िए शायद क‌िसी काम का नहीं है। 
मगर इतना कहना जरूरी लगता है क‌ि 
प्रताड़ना के इस शोर के बीच क्या अपराध‌ियों को सजा की मांग या उससे जु़ड़ी क‌िसी च‌िल्लाहट की गुंजाइश बचती है?
क्या चोट पहुंचाने वाले से पूछने के बाद उसे मारा जाता है?
क्या इस देश में ज‌िसे भारत कहते हैं स‌िर्फ खोखली भावनाओं का लबादा ओढ़ने की ताकत है या फ‌िर वो ह‌िम्मत भी ज‌िसके दम पर क‌िसी को इंसाफ म‌िल सके और दु्न‌िया को सबक।
मेरी आंखों के सामने ऐसे कई सवालों का बहुत बड़ा घेरा है। ऐसे सवाल, ‌ज‌िनके जवाबों पर पुल‌िस, पार्टी, पॉल‌‌िट‌िक्स और प्रशासन की न जाने क‌ितनी मकड़‌ियां बैठी हैं।
मगर मैं अब स‌िर्फ एक लाइव सीन देखना चाहती हूं। 
ज‌िसमें लाइट कैमरा और एक्शन बोलेत ही अपराधी के पैरों के नीचे से जमीन खींच ली जाए। फंदा उसके गले के ऊपरी छोर को छूकर बाहर न‌िकलने की कोश‌िश करे, मगर न‌िकल न पाए।  

रविवार, 14 अगस्त 2011

इस आजादी पर

घुमकड़ी का अपना अलग मजा है आप अकेले होकर भी एक नए शहर में एक नई जगह पर अकेले नही होते क्योंकि वहां बहुत कुछ होता है आपके जानने समझने, देखने और महसूस करने के लिए... दिल्ली की दुनिया में रहकर पंजाब मेरे लिए सिर्फ फिल्मों में दिखने वाली एक ऐसी जगह थी जहाँ बेहद खूबसूरत सरसों के खेत होते है ..इससे ज्यादा कभी मैंने सोचा ही नही शायद ....या जरुरत ही नही पड़ी सोचने की
लेकिन जरूरतों से जुस्तजू के दरम्यान एक रात में ही मेरे रहने का ठिकाना बदला और ६ सितम्बर २०१० को मैं लुधियाना आ गई ....फिर एक सिलसिला शुरू हुआ घुमकड़ी के उस शौक को पूरा करने का जो दिल्ली में रहते हुए सिर्फ कनाट प्लेस, लाजपत नगर, साकेत या मंडी हाउस तक सीमित था...हालाँकि मैं अपना ये शौक बहुत बेहतरी से तो पूरा नही कर पाई ..लेकिन एक छोटी से अनजानी सी अनसोची सी यात्रा हुई ..


फिरोजपुर
का गाँव हुसैनीवाला, पाकिस्तान की सरहद से सटा...मेरी हमेशा से पाकिस्तान जाने की इच्छा रही है .....वजह है ये जानना कि आखिर कौन सी ऐसी खाई है जिसने एक देश को दो बना दिया और दो पड़ोसियों को कभी एक होने नही दिया..लेकिन जिदगी की दूसरी  और जरूरतों और दबावों के आगे ये इच्छा जरा साइड पर ही रहती थी ...दरसल मैं फिरोजपुर अखबार के लिए एक स्टोरी करने गई थी ...कुछ पता नही था कि जहाँ जाना है वो जगह कितनी दूर है , वहां जाने का साधन क्या है और हा रात से पहले घर भी लौटना था...मुझे मुहार जमशेर नाम के एक गाँव में जाना था जो फिरोजपुर से भी १२० किलोमीटर दूर था और दोपहर के  3 :३० बजे फिरोजपुर से इस गाँव के लिए निकलने का मतलब था वापसी में देरी और असुरक्षा... इसलिए एक जानने वाले से पूछा  कि यहाँ सरहद पर बना कौन सा गाँव सबसे नजदीक है ..तब उसने हुस्सैनिवाला के बारे में बताया.. तब नही सोचा था कि आज मेरी वो साइड की हुई इच्छा यूँ पूरी होने वाली है.. गाँव पहुंचकर वहां बने बोर्डर के बारे में पता चला तो सोचा कि यहाँ देखते है क्या होता है ..बस फिर रास्ता ही सब कुछ जानता  था और हम निरे अजनबी एक मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे ...जब पहुंचे तो दिखी
दो सरहदे...एक तरफ पाकिस्तान ....एक तरफ हिन्दुस्तान
एक तरफ पाकिस्तान के लोग ..दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के
इधर हमारे सिपाही ..उधर उनके
एक दूसरे के आगे पैर ठोकते हुए ...
एक दूसरे को अकड़ दिखाते हुए ..
अपने अपने झंडे को ऊँचा उठाते हुए ..
वहां से पाकिस्तान जिंदाबाद  के नारे लगा रहे कुछ लोग
तो यहाँ से हिन्दुस्तान की जयकार करते  नौजवान
.
.
.
.
एक साथ बहुत से सवाल उमड़ घुमड़ आये ये सब देख कर कि
ये सब क्यों हो रहा है ?
किसने बनवाया होगा ये बोर्डर ?
जब दुश्मनी है तो ये ठोक बजाने का दिखावा क्यों ?
 क्या मिल जाता है एक दूसरे के झंडे को निचा दिखाकर ?
क्या कभी मन नही करता होगा आपस में आम लोगों की तरह हसने बोलने का ?
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जब वहां एक सिपाही से इन सवालों के जवाब लेना चाहा तो उसने कहा हमें मीडिया वालों से बिना इजाजत बात करने की परमिशन नही है
जब तक वहां सेरेमनी चलती रही सिर्फ दुश्मनी दिखाई दी
जब वो सेरेमनी ख़त्म हुई और हम लोग बाहर आने लगे तब किसी को बातें करते सूना .." ये लोग सिर्फ आधे घंटे की इस सरेमोनी में ही ये ठोक बजाते है रात को साथ बैठकर दारु पीते है ..
फिर देखा की सीढियों से उतरते हुए पाकिस्तान के कुछ बच्चे हमें हाथ हिलाकर बाय कर रहे है
कुछ मुस्कुरा रहे हैं
कुछ नजरों में निगाहे डालकर कुछ ढूँढना चाह रहे है
ये वो बातें है जिन्हें लिखकर बयाँ नही किया जा सकता
हां आप चाहे तो पढ़कर महसूस जरुर कर सकते हैं ...
ये चिंदी चिंदी से एक दो पल जब आँखों के आगे दुबारा तैरते है तो लगता है यहाँ मैं रीट्रीट सेरेमनी नही
रीथिंक टू रीबिल्ड सरेमोनी देखने आई थी
यानि दुबारा से ये सोचना की हमें क्या बनाना है
दो दुश्मन देश??
दो दोस्त??
एक टुटा हुआ एक रूठा हुआ देश??
या फिर अगर हम ये सारी सरहदे ही मिटा दें !!!!! सिर्फ बातों में नही सच में ...सच में जाये और वो लोहे की तारें काट आये किसी औजार से
अब मिट जाना चाहिए इन सरहदों का अस्तित्व...हम दोनों देशवासी तो facebook पर कब से एक दूसरे के दोस्त हैं
हमारा दिल कब से धड़क रहा है विभाजन में अपने पीछे छुट चुके परिवारों के लिए

हम कहाँ चाहते है अब लड़ना झगड़ना हम तो चाहते है पाकिस्तान के खूबसूरत शहरों में जाकर छुट्टियाँ बिताना ...(इस आजादी दिवस पर पहली बार बेहद गुलाम अनुभव कर रही हूँ मैं खुद को)



मंगलवार, 7 जून 2011

ये नामुराद शहर

सपनो की अपनी एक दुनिया होती है लेकिन
मधय्वार्गिये लोगों की  दुनिया में सपनो की दुनिया का नाम कुछ  शहरों से जुडा है
जैसे लोग हनीमून मनाने के लिए स्विट्जर्लैंड  जाने का सपना देखते है
गर्मिया बिताने के लिए शिमला, मंसूरी या नैनीताल जाने का 
सपना देखते है
जीवन के आखिरी पड़ाव पर चारों धामों की यात्रा करने का सपना देखते है
और
युवा एक नई, बेहतर, शानदार, सितारों सरीखी जिंदगी जीने के लिए मुंबई जाने का सपना देखते हैं
क्या सपनो की दुनिया सिर्फ मुंबई है ....?
मैं मुंबई में रहने वाली ऐसी आँखों को भी जानती हूँ  जिनमे घर वापस लौटने का सपना पलता है
घर जो लखीम पुर खीरी में है , घर जो उज्जन में है , घर जो चित्रकूट में है...घर जो रांची में है
एक तरफ से देखें तो  घर वापसी का ये सपना गलत है, भावुकता है 
या कमजोरी है
दूसरी तरफ से देखे तो ये सपना प्यार है , लगाव है , खिंचाव है 
या जरुरत है
सपने सिर्फ वही तो नही होते न जो शाहरुख़ खान  बनने के लिए देखे जाते हैं..सपने वो भी होते हैं जो गरमी में बिना बिजली के सोती माँ के लिए इन्वेर्टर लगाने के लिए देखे जातें है...जो पापा की झुकती कमर को अपने हाथों के सहारा देने के लिए देखे जाते हैं  इसलिए बहुत से ऐसे सपने हैं जिनका शहर मुंबई नही है नॉएडा  है , गाज़ियाबाद है,  कलकाता है, बिहार भी है और ऐसे ही बहुत से नामुराद शहर जहाँ इन लोगों का घर बसता है
इस सब की जद्दोजहद में सिर्फ एक सपना होता हैं घर वापसी का


विस्थापन एक बेहद पीड़ादायक शब्द है और भविष्य बनाने के लिए घर बार को छोड़कर दूर किसी दूसरे शहर में जा बसना विस्थापन सरीखी ही पीड़ा देता है.. हाँ ये पीड़ा पथरीली नही होती मखमली होती है मगर पीड़ा तो होती है न


शनिवार, 26 मार्च 2011

एक चुटकी चैन


कुछ दिन पहले किसी ने ये दुआ दी थी मुझे  'तुम्हारा  इंसानी रूप दुनिया की हर तीखी धूप में बचा रहे। यह रंग जो तुम्हारा अपना है हंसी का, खुशी का, बचपन का, रिश्ते का, बरकरार रहे हर उस हमले से जो मासूमियत पर होता ही है हर तरफ से।
काश कि यह सब जिस जमीन पर खडा होकर मैं कह रहा हूं उसको पूरा पूरा पढ पातीं तुम। हालांकि उससे भी फर्क यही पढता कि तुम रो देतीं।''
 हाँ मैं रो देती ...
अधूरे अहसास और अनकहे लफ्जो के इस मकडजाल के बीच सच  में मुश्किल तो है उस जमीन को पूरा पूरा पूरा पढ़ पाना जहाँ जज्बात सिर्फ जरुरत भर रह गए है..जहाँ प्रेम करने के लिए प्रेम नही किया जा रहा.. जहाँ हम सब एक दुसरे के लिए सिर्फ माध्यम बन गए है.
लेकिन क्या फर्क पड़ता है अगर मैं उस जमीन को न भी पढूं तो ...
कदम बढ़ाते ही तो पैरों के नीचे वही जमीन होती है
और बिना पढने की मोहलत लिए मुझे उस जमीन को समझ कर संभल कर कदम रखने के बारे में सोचना पड़ता है.
हाँ मुझ पर हमला होता है
जब मेरे मासूम सवालों को
मायूस कर देने वाले जवाब मिलते है
जब मेरे दिल में बैठकर कोई मेरे दिमाग को
परख रहा होता है
जब उम्र भर के लिए साथ हो जाने वाला कोई लम्हा
बरसो पुराना बीता पल बन जाता है
और जब
मेरी आँखों को पढ़ सकने वाला
कोई शख्स
ढेरों शब्दों को भी नही समझ पाता है 
ये निरी कोरी भावनाए है
हर किसी का  दिल बहता होगा इनमे
मेरा जरा सा डूब गया है
और इस डूबते से मन को तिनके की तरह इन शब्दों का सहारा मिल रहा है
और ये शब्द कम्भक्त नशा बन गए है शराब की तरह
जिस दिन न पीयू नींद नही आती
 जिस दिन न लिखूं चैन नही मिलता
और फिर इतनी सख्त जमीन पर चलने के बाद
एक चुटकी चैन तो चाहिए न ....




शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

सात खून माफ़ और आठवां ...



अच्छी फिल्में सिर्फ फिल्म के लिहाज से ही अच्छी होती हैं जिंदगी के लिहाज से शायद ....
परदे पर हम अपनी दमित इच्छाओ की पूर्ति होते देख रोमांचित और उत्साहित महसूस  करते हैं और फिल्म हिट हो जाती है क्योंकि असल जिंदगी में सात खून माफ़ नही होते...और सात बार शादी करने का जोखिम उठाना .....????
हमारा आज, अभी और इस वक्त का सच ये है कि पत्नियाँ एक पति के साथ सात जन्मों के रिश्ते में बंधने के बाद शायद ७००० बार मरती हैं
बहुत सारे पतियों को लग सकता है कि ये एक तरफ़ा सच है और उनके पक्ष को दरकिनार कर दिया गया है ..तो हाँ...कर दिया है ..क्योंकि उनके पक्ष का प्रतिशत बहुत कम है..खैर इसे मेरी खुन्नस न समझिएगा सिर्फ एक बात लिखी है जो देखी और महसूस की अभी तमाम दुनिया देखना बाकी है और फिर हो सकता है कि विचार भी बदल जाये...
लेकिन विशाल भारद्वाज ने हमारे संकुचित समाज के सामने आंखे फाड़ कर, कान खड़े कर और कुर्सी से चिपक कर देखी जाने वाली एक फिल्म का प्रसार किया है ....जिस फिल्म के ख़त्म होने  के बाद अनजाने ही लोग standing oveation देते नजर आये....क्योंकि सात खून हो जाने के बाद शायद ये देखना किसी को गवारा न था कि प्यारे से शुगर( विवान शाह) का भी खून हो गया है ..साहेब (प्रियंका चोपरा) का वो शुगर जिसका एक बच्चा और बेहद प्यार करने वाली एक पत्नी है इसलिए हर बॉलीवुड फिल्म की तरह इस फिल्म की भी एंडिंग साइड हीरो और साइड हेरोइन के मिलन के साथ हैप्पी हो गई. लेकिन कुछ निराशा, अवसाद, अहसास और सवाल शादी नाम के रिश्ते से जुड़ते भी नजर आये जो कि हमारे देश में सिर्फ एक रिश्ता नही बल्कि भरा पूरा उत्सव है..
................
एक तरफ प्यार की तलाश में गुनाह करती औरत( सूजैना, प्रियंका चोपरा) ..और असफल होती सात शादियाँ और दूसरी तरफ बीवी बच्चे के साथ खुशहाल  जिंदगी जीने वाला एक छोटा सा परिवार ( विवान और कोंकना सेन शर्मा)
,क्या लगता है ????
शादी नाम की संस्था सिर्फ शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाई गई एक औपचारिक परम्परा है या एक शादी के साथ भी हमें तन मन और ...धन तीनो का सुख मिल सकता है. फिल्म सिर्फ प्यार की  तलाश में धोखे खा रही एक औरत की कहानी है या ये सच दिखाने वाला एक आईना भी कि हर औरत एक बार अपने पति को मारने के बारे में जरूर सोचती है.
अजीब तरह से बदल रही है यार ये दुनिया
प्यार करने की भी एक निश्चित स्ट्रेटजी हैं यहाँ 
और शादी इस रिश्ते पर तो भयंकर रूप से प्रश्नचिन्ह  लग रहे है 
देखना ये है कि शेष क्या बचेगा 
और सिनेमा की दुनिया में सात खून माफ़ होने के बाद असल जिंदगी का आठवां खून क्या माफ़ हो पायेगा

 

dnt just obey boss



सिर्फ घोटालों ही नहीं तमाम तरह के मोह और माया जालों में फंसे धंसे देश के बेदाग़ छवि वाले प्रधानमन्त्री कह रहे है कि मैं जॉब कर रहा हूँ. ये बात सुनकर एकबारगी तो प्रधानमन्त्री जैसे बड़े से पद की महिमा बेहद छोटी नजर आती है लेकिन वहीँ दूसरी दफा सोचने पर कीचड़ में कमल की तरह खिलते मनमोहन सिंह दिखाई देते है जो असल मायनो में पार्टी प्रधान के दिशानिर्देशों पर शिद्दत से काम कर रहे है बिलकुल जॉब के शाब्दिक अर्थ को चरितार्थ करते हुए ...just obey boss . लेकिन उनके पद की गरिमा और गुंजाईश को नौकरी नुमा घेरे में कैद करना उस मिशन के साथ नाइंसाफी है जिसके  आधार पर इस पद की अवधारणा बनाई गई थी. 
बात सिर्फ प्रधानमन्त्री के ब्यान पर टिप्पड़ी करने की नहीं है बल्कि ये भी है कि अगर हम सब लोग अपने काम को सिर्फ जॉब मानकर करें जिम्मेदारी और जवाबदेही समझकर नहीं तो क्या इस विकासशील देश के विकास का पहिया चल पायेगा ...जो सोच पहले से ही  संकुचित है अगर उसे नौकरी समझकर सीमित भी कर लिया गया तो 
किसी कंपनी में बतौर प्रशिक्षु शुरुआत करने वाली कोई महिला उसी कंपनी के सर्वोच्च पद पर पहुँच पाएगी...
क्या एक टी  वी प्रोग्राम से शुरुआत करने वाला व्यक्ति एक पुरे न्यूज़ चैनल को स्थापित कर पाता..
पेट्रोल पम्प  पर काम करने वाल एक अदना सा कर्मचारी aदेश के नामी अमीरों में शामिल होता 
ऐसे कई सवाल है जो मंत्री जी के एक जवाब पर खड़े हो गए हैं 

 

बुधवार, 12 जनवरी 2011

आखिर ये मुद्दआ क्या है





हर रोज ऑफिस आते हुए मैं मंदिर के सामने से गुजरती हूँ
हाथ जोडती हूँ और कान पकडती हूँ
बचपन की आदत है
माँ अक्सर चलती बस से भी इशारा कर मंदिर की तरफ सर झुकाने  के लिए कहती थी जाने अनजाने किसी का दिल दुखाने और गलतियों की माफ़ी मांगने को कहती थी हालाँकि इस बात के अपने अलग तर्क हो सकते है कि माफ़ी मांग लेने से गलती सुधार नही जाती लेकिन ये माँ कि बात है जिस पर हर तर्क फीका पड़ जाता है उसी तरह तब  की ये आदत आज तक बरकरार है ...और गलतियां भी तो नही रुकी फिर चाहे बचपन हो या जवानी. खैर
वहां हर रोज मैं मंदिर में एक महिला को देखती हूँ उनके अलावा मंदिर में सिर्फ पंडित जी होते है जो अक्सर बाहर आकर बातें करते हुए दिखते है
वो महिला अकेली ही मंदिर में भजन गाती है ..कभी राम रूप में आना कभी श्याम रूप में आना ... प्रभु जी चले आना
मंदिर के आलो में दीये जले होते है...एक अजीब सी सुकून देने वाली और चुभने वाली शांति भी होती है जो कभी कभी सन्नाटे जैसी भी लगती है ...ऑंखें बंद किये ढोलक की थप से अपने सुर मिलाने की कोशिश करती वो महिला गीत गाती रहती है
भगवान् को बुलाती रहती है पता नही वो वापस कब जाती होगी
पता नही भगवान् उसके बुलाने से आते होंगे या नही
क्या ये भगवान् को बुलाने का तरीका है या फिर खुद को बहकाने का
यहाँ मुद्दा
न आस्था है
न भगवान्
न अरदास
बात ये है कि
इंसान जीवन के यथार्थ पर नहीं बल्कि सपनो पर जीता है.
ऐसे सपने जो कभी कभी बिलकुल बेमानी होते है और कभी कभी ऐसे कि सपने जिंदगी बन जाते है
पर उस महिला को देखकर फिर भी बहुत से सवाल सामने आ जाते है
क्यों गा रही है ये अरदासों के ये गीत जब हर कोई मशगूल है अपनी जिंदगी में
मंदिर का पंडित भी मंदिर से बाहर बगले झांक रहा है







गुरुवार, 30 सितंबर 2010

चलो हम काफ़िर ही सही.

मुझे जानने और समझने वाले कुछ लोग अक्सर कहते है कि..हिमानी तू किताबों और कहानिओं की दुनिया में रहती है. तू सच देखकर भी शतुरमुर्ग  की तरह आँख बंद किये हुए है. कहानिओं वाला प्यार , किताबों के विचार ऐसा कुछ भी तो नही है दुनिया में आज फिर क्यों इन ख्यालों में खो कर अपनी जिंदगी के अहम् पल ख़राब कर रही है . छोड़ दे किताबे पढना और ख्वाब गढ़ना, बाहर निकाल. दुनिया को देख और उसकी सचाई को भी. 
ये आज की बात नही है जो भी,    जैसा भी,   जहाँ भी मिला,   उससे मुझे यही मशविरा मिला...और मैं ????  मैं आज तक हू ब हू ..ज्यों की त्यों ..वैसी की वैसी ...और और मशविरे सुनती जा रही हूँ ...और और ख्वाब बुनती जा रही हूँ. ऐसा नही है  कि मैंने कभी बदलने की कोशिश नही की. जब जब जिंदगी ने झटका दिया तब तब मैंने बदलने की प्रतिज्ञा ले डाली है. एक दिन बदली रही दो दिन बदली रही ...मगर बादल हैं आखिर कब तक न बरसेंगे ?  मशविरे की धूप सर पर खड़ी रही और मेरे मन के बादल अपनी जिद पर अड़े रहे. बारिश होती रही. धूप में भी मैं भीगती रही अपने ही पानी से मैंने खुद को पानी पानी कर लिया. कभी देखा है बादलों को खुद को भिगोते हुए..मेरे साथ कुछ ऐसा ही होता रहा..भीगना यूँ भी बहुत भाता है .. तो बारिश कहाँ से आई है ये कभी सोचा ही नही. बहरहाल मेरे बदलने की नाकाम कोशिशे जारी है आज भी ..
मगर....मगर एक सवाल जो ये सब सोचते हुए कोंधा है दिमाग में. मैं किताबों की दुनिया में हूँ , कहानिओं पर यकीं करती हूँ . चाहती हूँ ये कहानियां सच हो. कुछ को सच करने में मैं भी योगदान दे सकूँ ...किताबों में दर्ज मोहब्बतें , मासूमियत, मतवालापन, सपनो को पूरा करने की जिद, मन से मन का मिलना ...अगर ये सब कुछ झूठ है और हमें किताबें पढना छोड़ देना चाहिए. शामिल हो जाना चाहिए भली बुरी सी दो चेहरों वाली इस दुनिया में तो फिर ..शेष क्या बचा... आज कमसकम किताबें तो है ख्याल संजोने और सपने बोने के लिए. आने वाले समय में हम क्या पढ़ाएंगे आने वाली पीढ़ियों को. क्या मिलेगा किताबों में उन्हें नफरत, धोखा, स्वार्थ, हर शख्स एक सामान सा,  हर रिश्ता एक व्यापार सा ...और हर मकसद के पीछे एक राजनितिक षड़यंत्र ..
हम किताबों को छोड़ना चाहते है या किताबों का कलेवर ?? हम इतने  व्यावहारिक हो गए है कि भावनाए  महज एक बेवकूफी के कुछ और मायने ही नही रखती हमारे लिए. हम महफिलों में जाना चाहते है और मधुशाला में भी. हम मोहब्बत भी करना चाहते है और मिलन भी. हमारे मकसद भी हैं और मंजिलों की आरजू भी. ........मगर हम हर काम को शातिरता से करना चाहते है. चालाकी के सारे पैमानों से भी ज्यादा चालाक बनकर . किताबों में जो कल्पना है उसे तो कबिर्स्तान पहुंचा दियाक गया है कब का. सब आँखे खोल कर जी रहे है ..जो आँखों का इस्तेमाल उस कल्पना और कल्पना के कमरों में घूमकर अपने लिए घर बनाने के लिए कर रहे है उन्हें काफ़िर समझा जा रहा है काफ़िर मतलब नास्तिक  होता है लेकिन यहाँ जब श्रधा अपने स्वार्थ के लिए ही बची है तो ऐसे में किताबों की कल्पना में खोया रहने वाला काफ़िर ही हुआ ..................चलो हम काफ़िर ही सही. 

बुधवार, 29 सितंबर 2010

एक नूर से सब जग उपज्या



मुझे कल गाजिअबाद अपने घर आना है, लेकिन नही आ पाऊँगी शायद, कारण अयोध्या मुद्दे पर फैसला आने वाला  है. पता नही क्या फैसला होगा.फैसले के बाद क्या होगा. दंगे, शांति, सुलह या एक नए रस्ते की तलाश या फिर हमारी कल्पनाओ से परे कुछ. सब आपस में बतिया रहे है क्या होना चाहिए  ???
सब अपने अपने ख्याल जता रहे है , यहाँ किसी ने कहा की मेरे ख्याल से वहां एक स्कूल बना दिया जाना चाहिए. उसमे हिन्दू मुस्लिम दोनों के बच्चे पढ़ सकेंगे. दूसरी आवाज आई बेशक बाकी जगह कुछ भी हो रहा हो लेकिन इस वजह से कई दिनों  से घर में बेरोजगार बैठे यु पी के कुछ होम गार्ड  काम पाकर राहत  महसूस कर रहे है. बातों के बीच से टी वी पर नजर दौड़ाई तो अवध और अयोध्या से  भाईचारे की मिसाल पेश करती कहानिया दिखाई जा रही थी. जैसे वहां तो लोग हिन्दू मुस्लिम और कौम नाम की बातों को जानते ही नही है. सिर्फ अयोध्या और अवध ही क्यों देश भर में ऐसी कई मिसाले है जहाँ लोगों ने हिन्दू मुस्लिम के बीच की खाई को पाट कर अपनी अलग पहचान बनाई है.
हम आपस में बात करते हुए भी लोगो से यही सुनते है कि क्या रखा है मंदिर और मस्जिद में. कोई  कबूतर से पूछे कि कौमी एकता क्या है कभी मंदिर पे बैठा होगा कभी मस्जिद पे. ऐसे मिस्रो और मिसालों की कमी नही है जो हमें ऐसी सोच से दूर रहने के लिए कहते है जहाँ दो धर्मो के बीच दुश्मनी पनपे उनमे कोई भी बैर हो ...जहाँ तहां सून रही हूँ अधिकतर लोग चाहते है कि मामला सुलझ जाये और फिर जो आग बुझ सी गई है उसे अब चिंगारी दिखा कर राख लेने का क्या मतलब. 
पूरा देश डर के सायें में है और मुद्दा सिर्फ इतना है कि एक जगह पर मंदिर बनाया जाये या मस्जिद. मेरा एक मासूम सा सुझाव है अगर कोई पढ़ ले तो एक ऐसा निर्माण किया जाये जहाँ भगवान् के नाम का हर चिन्ह मौजूद हो. ईसामसीह, राम, कृष्ण, खुदा की इबादत, गुरबानी.
सवाल ये भी है कि जब कोई हम आप मैं चाहते ही नही कि कोई विवाद हो दंगा हो तो कौन लोग हैं हमारे ही बीच से जो खा म खा चिंगारियां भड़का  रहे है. क्या राजनीती  की लौ में तेल डालने के लिए महानुभाव देश को जला डालना चाहते है .
सवाल बहुत सारे है जवाब शायद एक कि

 एक नूर से सब जग उपज्या.............


 

शनिवार, 25 सितंबर 2010

ताकि छोटा न हो शब्दों का आंचल

शब्दों से हमारा रिश्ता बहुत ख़ास होता है . लेकिन इस रिश्ते का महत्व तब तक एक रहस्य बना रहता है जब तक की कोई ऐसी परिस्थिति न आन पड़े कि  हमारे पास भावनाए हो और शब्द न मिले. वो एक अनमना सा पल जब अचानक शब्द गले तक पहुँच कर फिसल जाये जुबान तक आ ही न पाए. कितनी तकलीफ से भर जाता है मन ,  मन की बात कहने को जुबान व्याकुल सी हो जाती है लेकिन दिमाग है कि एक भूलभुलैया में खो जाता है . शब्दों की भुलभुलिया . जहाँ अपनी भावनाओ को सही शब्द दे पाना एक मुश्किल से भरा फैसला होता है.


ये बातें मैं किसी प्रेम प्रसंग या किसे कहानी के वश में होकर नही लिख रही हूँ, बल्कि पिछले कुछ दिनों से एक अखबार के दफ्तर में काम करते हुए, हुआ एक अनुभव है , जहाँ शब्दों के लिए शब्दों के ही बीच में हर रोज एक  जंग सी होती है. सभी के सुझाये गए शब्दों की अपनी एक वजह है. उनकी बोली, उनका परिवेश,उनकी पढाई .....और फिर हर शब्द के साथ काम करने वाली उनकी निजी सोच. मगर उस एक वक़्त जरुरत होती है हर तरह से फिट एक अदद शब्द की. शब्द मिलने के बाद उसकी लिखावट पर चर्चा. कहीं छोटा उ कही बड़ी ई. हालाँकि हर अखबार की अपनी एक स्टाइल शीट होती है लेकिन फिर भी हिंदी के अख़बारों में भाषा गत शुद्धता को लेकर बहुत सारा विरोधाभास है ....पढाई के दिनों में हमें अच्छी अंग्रेजी के लिए द हिन्दू पढने को कहा जाता था लेकिन वही हिंदी को लेकर हम अपनी अशुधता को दूर कर सके उसके लिए किसी एक भी अखबार का नाम ध्यान नही आता . ख़बरों की अपनी अलग पहचान के साथ अखबार या चैनल की पहचान उसकी भाषागत शैली के साथ भी जुडी है.मीडिया में हर बढ़ते दिन के साथ नए नए प्रयोग हो रहे है अलग तरह के कोलुम्न्स ले आउट लेकिन भाषा को लेकर सिर्फ एक निजी सोच और समझ  है वास्तव में सही क्या है इसका फैसला एक बड़ी बहस का बाद भी न निकले शायद. कुछ आगे बढ़कर कहीं कहीं तो हिंदी लिखने के साथ भी अजीब गरीब आसान नुस्खे अपनाये जा रहे है. एक तर्क ये होता है की वही लिखना है जो पाठक  को समझ में आये. लेकिन समझाने का ये कौन सा तरीका है की शब्द की बनावट ही अपने हिसाब से तय कर ली जाये. और फिर आम भाषा बोलचाल की भाषा और अखबार और चैनल की भाषा में कुछ तो फर्क होता है न . मुझे लगता है कि यंग इंडिया का मीडिया बनने से पहले शायद इंडिया का मीडिया बनना ज्यादा जरुरी है क्योंकि यंग इंडिया भी इंडिया को खोना नही चाहता वो अपने जुगाड़ करना अच्छे से जानता है उसके लिए इंडिया की भाषा, संस्कृति को idiotik  बनाना सही नही होगा.
शब्द भी बाकी चींजों कि तरह हमारी अनमोल धरोहर है उस एहसास से ही मन मायूस हो जाता है कि कहीं कोई शब्द खो गया है
प्रोयोगों के इस दौर में झांक के देखेंगे तो एक गहरी खाई है जिसमे बहुत सारे शब्द गिरा दिए गए है उन्हें वापिस लाने की कोशिश करनी चाहिए .............ये कोशिश कामयाब होना भी निहायत जरुरी है ताकि शब्दों के आंचल में हमेशा हमारी भावनाओ की बयाँ करने के लिए जगह रहे

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

अंग्रेजी से चल रहा है एक्स्ट्रा marrital affair

उसका आयोजन ख़बरों में छाया हुआ है. कहीं एक दिवस. कहीं सप्ताह .कहीं पूरा पखवाडा. कोई एक शब्द कह रहा है. कोई कई वाक्य, और कोई दे रहा है पूरा भाषण. १४ सितम्बर हिंदी दिवस है. हिंदी हमारी ये, हिंदी हमारी वो. हिंदी के लिए हमें ये करना चाहिए, हिंदी के लिए हमें वो करना चाहिए. 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे'. पूरा साल क्या होता है हम जानते है.
अभी कुछ दिन पहले जो हुआ वो बताती हूँ
एक बच्चे से बात कर रही थी मेरा सवाल हिंदी में था उसका जवाब अंग्रेजी में सवाल था , कौन सी क्लास में पढ़ते हो?  जवाब दिया फिफ्थ ए.
बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ? जवाब दिया 
आई वांट  बिकेम मैथ्स टीचर. 
सुनकर हंसी आ गई और साथ ही आई एक सोच भी. क्या पढ़ रहे है बच्चे ?? कैसे बढ़ रहे है बच्चे ?? न हिंदी बोलना चाहते है न अंग्रेजी बोल पाते है. उर्दू और संस्कृत की तो भनक तक नही है उन्हें. शायद ही वो जानते हो कि ये भी दो भाषाएँ है. बच्चे प्रेमचंद को नही जानते उनकी कहानी ईदगाह को पढ़ भी ले तो वो चीमटा  क्या होता है , ये ही नही समझ पाएंगे. वो नही समझ पाते जब उनसे कहा जाता है कि पुनजब में धान उगाया जाता है उन्हें बताना पड़ता है कि धान मेंस राईस होता है यानि चावल.
एक समय था जब हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद  करते थे अब बच्चों को हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करके बताना पड़ता है. वो अपने आस पास के शब्द ही नही समझते. उनकी सेब शब्द को सुनने समझने कि शक्ति उतनी नही है जितना वो एप्पल को समझते है. बच्चों की बात तो ये है कि वेह स्कूल में अंग्रेजी बोलने कि जबरदस्त बाध्यता से बंधे है और घर का देसी माहौल उन्हें उस सीखे पढ़े को उस तरह अप्लाई नही करने देता जिस तरह वो सीख रहे है. नतीजा टूटी फूटी अंग्रेजी और आधी अधूरी हिंदी.
अब अगर बात अपनी, यानि हर रोज हिंदी लिखने पढने वालों,  हिंदी की रोटी खाने वाले लोगों की करें तो सुकून और कम हो जाता है
हर दिन शब्दों में उलझना, उन्हें समझना.  एक अजनबी की तरह तमाम शब्दों से रोज मुलाकात होती है.  कुछ शब्द ऐसे जो समझ आते है लिखावट में नासमझी हो जाती है . कुछ लिखे देते है लेकिन वो शब्द कहीं सुने हुए नही लगते. हर दिन की  अलग कहानी है. 
आखिर इस कहानी की वजह क्या है,पढाई का कमजोर ढांचा या पढने में हमारी कमजोरी?????
एक वजह तो भाषा गत बाध्यता भी है हम अंग्रेजी से कुछ ज्यादा ही प्यार कर रहे है हिंदी से शादी हुई  और अब ये एक्स्ट्रा मरिटल अफ्फैर अंग्रेजी के साथ कुछ ज्यादा ही लम्बा हो रहा है और ज्यादा ही संजीदा भी. 
अब हम मनाते रहे हिंदी दिवस. हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाडा एक दिन जब ये हिंदी रूठ कर उन अग्रेजों के देश चली जाएगी तब शायद उसकी कीमत पता चलेगी.ये धमकी नही है न हीमैन धमकी देने की हैसियत रखती हूँ शायद क्योंकि मैंने भी अंग्रेजी सीखी है बोली है पढाई है पर इतना कहना काफी होगा की हिंदी भाषाओँ में मेरा पहला प्यार है.


शनिवार, 21 अगस्त 2010

पेड न्यूज - पत्रकारिता के फूल पर मंडराता भंवरा

फूल की महक और खुबसूरती की बात हो तो भंवरे का जिक्र भी आ ही जाता है। हाल-ए-पत्रकारिता भी कुछ ऐसा ही हो गया है। इसके आकार और सरोकार की चाशनी पर मंडराते पेड न्यूज रुपी भँवरे की मेहरबानी के चलते पत्रकारिता में मुद्दों की चर्चा के बजाए आजकल पत्रकारिता स्वयं में एक चर्चित विषय हो गया है। ताजा बात से शुरु करते हैं।
हाल ही में बिहार और झारखंड के पत्रकारों ने पेड न्यूज को रोकने की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप करने की गरज से एंटी पेड न्यूज फोरम का गठन किया है। ये संगठन पेड न्यूज के कारोबार पर नजर रखेगा और इस तरह की तमाम गतिविधियों को लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करेगा। संगठन में कोई भी पद नहीं रखा गया है। केवल एक कोर कमेटी होगी, जो सबसे सलाह-मशवरा करके काम करेगी। इस महीने की 28 तारीख को इस फोरम के तहत सम्मेलन भी किया जाएगा। इस सम्मेलन में देश के ऐसे पत्रकार भी शिरकत करेंगे जो पेड न्यूज की प्रणाली को पत्रकारिता पर कलंक मानते हैं।
अब से कुछ दिन पहले भी पत्रकारिता की पनाह में पलते पेड न्यूज की अवैध संपति पर हो हल्ला हुआ था। मौका था रामनाथ गोयनका अवार्ड समारोह। चर्चा हुई। पत्रकारों ने एक सुर में पेड न्यूज को पत्रकारिता के लिए घातक करार दिया। और फिर सब अपने-अपने घर लौट गए। पेड न्यूज जहां थी वहीं रही। ये बात भी ध्यान देने की है कि  प्रेस परिषद ने पेड न्यूज की जांच के लिए कमेटी भी गठित की थी जिसकी रिपोर्ट इसी वर्ष 26 अप्रैल को आनी थी लेकिन वह भी अब तक नहीं आई है। जब से यह मुद्दा उठा है तब से पत्रकार और मीडिया टाइकून अलग-अलग अवसरों पर इस विषय पर अपनी राय देते रहे हैं।

इसकी एक बानगी मैंने तमाम अवसरों पर दिए गए कुछ बयानों को खोज बीन कर तैयार की है-

पेड न्यूज सिर्फ वही नहीं, जो पैसे लेकर छापी जाती है। किसी विचारधारा के तहत लिखी गयी खबर भी पेड न्यूज जितनी ही गलत है।
आशुतोष,  मैनेजिंग एडीटर, आईबीनएन-7।

खराब अखबार निकालने का दोष मालिकों पर मढऩा ठीक नहीं है। पत्रकारों को ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिससे पाठकों में उसकी इमेज खराब हो। किसी भी कानून से ज्यादा जनता और पाठक की नजर हालात को सही करने में अपनी भूमिका निभा सकती है। कानून बन जाएगा तो पेड न्यूज का सिलसिला दूसरे रास्तों से शुरु हो जाएगा।
श्रवण गर्ग, दैनिक भास्कर।

मीडिया पर हमेशा से दबाव रहा है। जब हमने नवभारत टाइम्स में पशुपालन घोटाला की खबर छापी तो लालू यादव ने हमारे ऑफिस में आग लगवा दी थी। हमारा काम खबर छापना है, हमें हर हाल में इस काम को जारी रखना होगा। आज ही नहीं पहले भी मीडिया पूंजीपतियों के हाथों में रहा है। ऐसी भी घटनाएं हैं जब मालिकों से अलग हटकर चलने पर संपादकों (बीसी वर्गीज और एचके दुआ) को सड़कों पर ही बर्खास्त किया जाता रहा है।  अखबार का मालिक अखबार चलाने के लिए कहां से पैसा लाता है, सम्पादक को इससे कोई मतलब नहीं होता।
आलोक मेहता, संपादक, नई दुनिया।

कॉरपोरेट जगत को माइनस करके अखबार और चैनल नहीं चलाए जा सकते। हमारे एक चैनल ने एक कॉरपोरेट घराने के खिलाफ कैम्पेन चलाई। इसके नतीजे में उस कॉरपोरेट ने हमारे सभी नेटवर्क के चैनलों से अपने विज्ञापन वापिस ले लिए।
राजदीप सरदेसाई,  सीएनएन-आईबीएन।

सरोकारों का संसार सिमट रहा है या फिर सरोकार ही बदल गए हैं ये कहना मुश्किल है लेकिन पेड न्यूज पर चर्चा करने वाले इन सभी पत्रकारों की बात से जो निष्कर्ष निकलता जान पड़ता है वो यही है कि पत्रकारिता को पूंजी के बिना देखना अंसभव हैं । ऐसे में भला मीडिया उन सत्ततर प्रतिशत लोगों की बात क्यों करे, जो रोजाना पन्द्रह से बीस रुपए रोज पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर हैं। उन्हें मरते हुए किसान विज्ञापन नहीं देते। इसलिए मीडिया को कॉरपोरेट जगत के हितों की बात करनी ही होगी। इसे उनकी मजबूरी भी कहा जा सकता है और मनमानी भी। फैसला आप पर है। आप क्या कहेंगे?

ब्ला ब्ला ब्ला... आखिर ये बला क्या है????
साल 2009 के अप्रैल-मई महीने में पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव हुए। इन चुनावों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए प्रेस काउंसिल की तरफ से सरकारी अधिकारियों और प्रेस दोनों के लिए गाइडलाइन्स तय कर दी गई थी। लेकिन चुनावों के दौरान इसकी अनदेखी हुई।  जिसके परिणाम में एक नया ट्रेंड देखने को मिला। चुनाव में खड़े प्रत्याशियों का अपने प्रचार के लिए मीडिया कंपनियों को पैसे देकर खबर छपवाने का ट्रेंड। ऐसी खूब खबरें छपी जिनमें खबर कहीं थी ही नहीं, खबर के रूप में पूरा इश्तिहार था। इस नए ट्रेंड को मशहूरी मिली  पेड न्यूज के नाम से। यानि पैसे लेकर प्रकाशित की जाने वाली खबर। ये बात पिछले साल की है, विरोध भी पिछले साल से ही शुरू हो गया था और आज तक हो रहा है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

नाम भर की आजादी के नाम बस कुछ शब्द

अगस्त का महीना आजादी का त्योहार। हर साल हर बार। तिरंगा, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत। बचपन में आजादी के दिवस का एक उद्देश्य स्कूल में मिलने वाले बूंदी के लड्डू थे। बड़े होकर ऐसा कोई उद्देश्य भी नहीं रहा। एक जानी-पहचानी बोरियत की गुलामी में ही कट जाया करता है आजादी का ये तथाकथित दिन।  कभी पिछले कुछ सालों से जब मन आजादी के मायने ढूंढने लगा है तो नजर पड़ जाती है उन जंजीरों पर जिनमें एक स्वाभाविकता के साथ हम सब, मैं, आप जकड़े हुए हैं। बोलते वक्त अगर इस शब्द को महसूस कर लिया जाये तो एक अजीब सा खालीपन हाथ लगता है। क्योंकि आजादी का अर्थ तो हमारे साथ है ही नहीं। कहीं। देश में दरारे पड़ रही हैं हर तरफ। कहीं विचारों में। कहीं व्यवहारों में और कहीं 63 साल पुरानी रंजिशें इस तरह ताजा हैं जैसे वक्त बीता ही नहीं। देश 63 साल पहले आजाद हुआ। खुशहाली और तरक्की के सपने देखे गए। तब सोचकर देखा होगा तो 63 साल बाद के भारत को बेहद खुबसूरत और उन्नत, बैर भाव से मुक्त पाया होगा लोगों ने। लेकिन आज पूरे नक्शे पर उकेरा जाए तो एक राज्य ऐसा नहीं मिलेगा जो किसी बड़ी समस्या से न जूझ रहा हो।
समाज में न जाने कितनी पीढिय़ा गई और नई आ गई लेकिन पुरानी बेडिय़ा आज तक नहीं हटी। कहीं बातों का हिस्सा हैं कहीं बहस का। समाज के ताने बाने भी कहां बदले। वही बात हुई कि घर की दीवारों पर नया रंग तो हो गया लेकिन घर की आबोहवा अब भी वैसी ही है।
अब हालात ऐसे लगते हैं कि इन पर कविता भी नहीं लिखी जाती। जी करता यूं कि छोड़ दे लिखना कविताएं। कम से कम कविता न लिखी जाए आजादी पर। न कहा जाए इस मौके को जश्न-ए-आजादी। न आजादी असलियत है फिजाओं की। न ही जश्न मनाएं जाने सरीखा मौका। जरा बैंठे कुछ देर हर रोज की तरह इस दिन भी। जैसे मंडली में गप्पे हांकने बैठ जाते है। और सोचें, विचारें, बात करें अपनी आजादी की। मिट्टी के चूल्हों से उठते धुएं से चिमनियों के धुएं निकलने तक के इस सफर में हम क्या कुछ नहीं खो चुके। उम्मीदों के जोश की मुठ्ठी भींचे क्या कुछ लिए आगे बढ़ें थे और आज क्या कुछ बचा है हाथ में। या फिर पूछो जरा खुद से कि क्या बचा है? आखिर बचा क्या है? दिखावे वाला कितना कुछ और देखा जा सकने वाला कुछ भी नहीं। अंग्रेंजों से आजादी की लड़ाई यों खत्म हुई कि आज अपना भी बस नहीं चलता खुद पर। नौकरियों में मालिक और मैनेजमेंट का जोर है तो बाकी जगह अपने अपने कैरेक्टर लिए हर शख्स टोकाटाकी को मुंह बांये खड़ा है। हम सब जगह गुलाम से हैं। फिर जब आजाद होने का मन करता है तो ये आजादी भी किसी और को गुलाम बनाकर हासिल की जा रही है। शायद वही एक जरिया रह गया। फूड चेन की तरह की एक प्रक्रिया पूरे जोरशोर से चल रही है। सब एक दूसरे को पकाकर खा जाना चाहते हैं। बहुत कुछ का जिक्र मुझे भा नहीं रहा क्योंकि इतना सा ही लिखकर घुटन होने लगी है। अब क्या लिखूं। फिर लिखने-पढऩे से भी डर लगने लगता है। लिखने की भी कहां आजादी है।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

बाइते का जाना और खबर का देर से आना

अपने व्यवहार और संस्कारों के ठीक उल्ट आज की पत्रकारिता से जुडऩे का नादान फैसला जब लिया था तब इस नादानी के पैमाने को मैं समझी नहीं थी। पढऩे, समझने और लिखने के बावजूद भी कुछ नादान सवाल गाहे-बगाहे मन में उठते रहते थे। ऐसा क्यों होता है, ये क्यों लिखा जाता है, वो तो कहीं छपा ही नहीं वगैर-वगैरह। मेरी मां जो सामाजिक शास्त्र की टीचर हैं, उनसे मैं अक्सर पूछा करती थी कि मम्मी असम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुुर, ये जो जगह हैं क्या यहां कभी कुछ नहीं होता। यहां की कोई खबर ही नहीं आती कभी। और फिर एक मासूम भ्रम मन में पाल लेती थी कि ये छोटे राज्य हैं। यहां सब कुछ ठीक ही रहता होगा। लेकिन आज अखबारों से जूझते हुए जब जनसत्ता के एक कॉलम पर नजर पड़ी तो मेरा भ्रम टूटा या कहूं कि चकनाचूर हुआ। क्योंकि टूटना तभी शुरू हो गया था जब पिछले दिनों मणिपुर में घट रही घटनाओं को हमारे अखबारों नें एक कॉलम की जगह दी और चैनलों ने शायद एक बुलेटिन में सिर्फ  शाॉट-बाईट ही चलाया। राहुल महाजन का उसकी दूसरी बीवी से झगड़ा और उसका विश्लेषण हमारे मीडिया और ऐसे मीडिया को टीआरपी देने वाले दर्शकों के लिए ज्यादा जरूरी था। मैं यहां दर्शकों का भी जिक्र कर रही हूं क्योंकि हमेशा सिर्फ मीडिया को ही कोसा जाता है लेकिन ऐसे घटिया स्तर के मीडिया को पालने-पोसने का काम तो ये दर्शक ही करते हैं न। जो देश के एक अहम हिस्से की घटनाओं को जानने में दिलचस्पी तक नहीं दिखाते और एक नाकुछ इंसान की शादी और तलाक को नजरे गड़ाकर देखते और कान खड़े करके सुनते हैं। खैर मीडिया भी मोटापा बढ़ाने वाली इस टीआरपी रूपी मलाई का मोह छोड़कर अपने दायित्वों को याद रखते हुए सेहतमंद दूध रूपी वास्तविक न्यूज दे तो शायद बेहतर हो। पर इस बीच जो बेहद दुख भरा लगा वो है इंफाल में दूरदर्शन के समाचार संपादक राबर्ट बाइते की मौत की खबर का मीडिया में उनके अंतिम सांस लिए जाने के 52 दिन बाद आना। अमिताभ बच्चन को अगर किसी सूदूर आईलैंड पर खांसी भी आ जाए तो बड़ी खबर हो जाती है। कुछ लोगों पर इतनी पैनी नजर और कुछ लोगों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिए जाना। कुछ शहरों में धूप निकलना भी खबर और कुछ राज्यों में तबाही मच जाना भी बात से नदारद। खबरों की दुनिया का ये विरोधाभास बेचैन कर देता है। सवाल सिर उठाते हैं और फिर जवाब कहीं देर से ही सही लेकिन छप सके किसी कॉलम में मिलते हैं। जैसे आज मिले और मैं लिखने की इस नाकाफी सी कोशिश को करने से खुद को रोक न सकी। और बाइते के संदभॆ में खास बात ये भी है कि वो खुद मीडिया से जुड़े थे न सिफॆ खानापूरती के लिए बल्कि उन परदों को उठाने के लिए जिनके पीछे से आता शोर तो सबको सुनाई देता है लेकिन कोई उन्हें उघाड़ कर ये देखने की कोशिश नहीं करता कि इस शोर की वजह क्या है। उनकी मौत से जो सन्नाटा पसरा है उसके बाद पीछे छूट गए उस शोर को सुनने का साहस अब कौन दिखाएगा? कब मीडिया में सरोकारों का दौर वापस आयेगा? कब?? ये सवालों का केवल एक सिरा है। पूरी की पूरी एक रस्सी पड़ी है जिसके दूसरे सिरे तक सिफॆ सवाल है सवाल।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बारिश की शोख अदाएं अब सिर्फ सुर्खियां

 बारिश की वो शोखियां सड़कों के ट्रैफिक और नालों से बाहर आते पानी के बीच कहीं खो गई हैं। इन्हें ढूंढने का वक्त किसी के पास नहीं है क्योंकि हर कोई जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता है। और घर पहुंच कर पहला वाक्य निकलता है आफत आ जाती है बारिश में। पता नहीं कब जाएगी ये बारिश। और यहां हम सोचते हैं कि  मेघा बरसते ही रहें। बूंदे झरती ही रहे। और मिट्टी से वो सौंधी महक आती ही रहे हमेशा। चारो पहर।
                                        

बारिश...इस शब्द के होठों पर आते ही रुमानियत का जो अहसास दम भरने लगता है उसमें खुशी और ग़म दोनो रंग होते है। मौसम की पहली बारिश जाने क्या कुछ समेट लाती है अपने साथ। कुछ बीती बातें कुछ मीठी यादें या फिर एक नई याद कुछ नए जज्बात। साफ-सुथरे मौसम का यूं सीला सा हो जाना और सूखे से पत्तों का यूं गीला सा हो जाना।  एक बारिश और दो दृश्य।  एक के  बाद अगला। पहले बादलों की साजिश और बूंदो का झरना और फिर गीले से उन पत्तों से बूंदो का टपकना।  सोचती हूं तमाम लोगों को यूं अपनी ही दुनिया में मग्न कर देना भी तो कहीं आकाश की कोई चाल नही। चुपके से वो जो कहना चाहता है धरती से उसमें शायद उसे किसी का दखल पसंद नही है इसलिए ऐसा समां बांधता है कि हर कोई अपने ही मिलन और जुदाई के जोड़-घटा, गुणा-भाग में उलझ जाता है। हालांकि बारिश के बारे में काफी कुछ कहा जा सकता है और इसमें फीलिंगस आर मोर एंड वर्डस आर फ्यू वाली स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन बादल, बिजली,घटाएं और बारिश के अलावा कहने और सहने वाली बात ये है कि बेसब्री से जिस बारिश का हम इंतजार करते हैं जिसके बरसने से जेहन और जिंदगी में इतना कुछ घटित होने लगता है उसकी टीआरपी और ब्रांडिंग पर अव्यवस्थाओं का ऐसा असर होता है कि बारिश से लोग घबराने लगे हैं, कतराने लगे हैं। शायद भारत ही एक ऐसा देश है जहां बारिश सिर्फ आसमान से पानी गिरना भर नहीं है। उत्सव, गीत, कथाएं, हरियाली बहुत से पहलू यहां बारिश से जुड़ते हैं। कभी बारिश की भी अपनी शोखियां थी लेकिन अब बारिश सिर्फ अखबारों और चैनलों की सुर्खियां हैं। यहां बारिश आने से इतने लोगों की मौत और यहां बारिश से बाढ़ का खतरा।                                  

बुधवार, 21 जुलाई 2010

मैनेजमेंट कला के फेर में बेचारा दिन और बेचैन रातें

मेरी शक्ल पर कुछ मुरझाए बादल और माथे पर टेड़ी-मेड़ी घटाएं देखकर एक दिन यूं ही मुझसे कहा गया था चीजों को मैनेज करना सीखो। चीजे मसलन,  सुख और दुख का मैनेजमेंट।  हंसी और आसूंओं का मैनेजमेंट।  इच्छाओं और कुंठाओं का मैनेजमेंट। प्रेम और नफरत का मैनेजमेंट।   शरीर और आत्मा का  मैनेजमेंट। 
 बेचारा दिन और बेचैन रातें
ये हंसी इसके सामने नहीं। इस इच्छा को यहीं अभी मार दो। इससे प्रेम करना अच्छा है और इससे सिर्फ दोस्ती रखो जब तक कि तुम्हे जरूरत है। शरीर की फिक्र करो अब आत्मा को कोई नहीं पूछता। गोया आत्मा कोई शादी कर चुकी अभिनेत्री हो। और प्रेम या नफरत कोई नहाने का साबुन जिसे कोई खूशबू के लिए खरीद रहा है तो कोई रंग गोरा करने के लिए। खैर, चीजों को मैंनेज करने के इस सुझाव पर अंदरखाने तो मैंने बहुत शोर मचाया लेकिन  बाहर से पड़ रहे बदलाव के दबाव ने मुझे बिना इतलाह के ही बदलना शुरू कर दिया है। जहां एक बड़ी चिल्लाहट दर्ज कर सकती थी अब वहीं एक गहरी खामोशी को इस तरह ओड़ लेती हूं जैसे शब्दों से ही अनजान हूं मैं। और इस खामोशी के बाद खुद से खफा भी हो जाती हूं। दरअसल दुनियावी होने में मुझे भी गुरेज नहीं लेकिन aमैं मायावी नहीं होना चाहती। सवालों का एक झंझावत सा मन में शोर मचा रहा है और मेेरे पास उन सवालों को दबा देने की मजबूरी के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। हर गहराती रात के साथ ये सवाल मुझे मुझसे मिलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन दिन की रोशनी में मेरी आंखे ऐसे चौंधिया जाती है कि फिर इन सवालों के जिक्र से भी कोफ्त होने लगती है। इस बदलाव के बाद क्या कुछ बचा रह जाएगा। सिवाए रात को सोने और दिन को खोने के। या फिर रात भी बेचैन रहेगी और दिन भी बेचारा सा। 

रविवार, 18 जुलाई 2010

जाति संग सब सून

जीने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है
पानी या शराब?
रोटी या कबाब?
पैसा या व्यापार?
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जाति या समाज?
नही जानती कि जाति के मामले में मेरी जानकारी का स्तर क्या है? मैंने वर्णव्यवस्था को कितना समझा है? मैं समाज के विभिन्न धर्मो और वर्गो के बारे में कितना जानती हूं? लेकिन इसके बावजूद भी ये सब कुछ ठीक से न समझने को कहीं न कहीं मैं अपना सौभाग्य मानती हूं। ये आधा-अधूरा ज्ञान मुझे पूरा हक देता है हर किसी से बात करने का, हर किसी के साथ खाना खाने का और वो सब कुछ करने का जो समाज में रहते हुए आम व्यवहार में हम एक दूसरे के साथ करते हैं। काश कि कोई भी न जानता होता इस वर्ण व्यवस्था के बारे में । इस बारे में कि फलाना इंसान दलित है और फलाना ऊंची जाति का है। ये एक निरी कल्पना है जिसका साकार होना निरा मुश्किल भी है। लेकिन जाति के नाम पर जो कुछ समाज में होता आया है और हो रहा है उसकी कल्पना करना भी तो निहायत कठिन है। कल की ही खबर है कि उत्तर प्रदेश के कन्नौज में मीड डे मील में दलित महिला के खाना बनाने को लेकर वहां के लोगों ने हंगामा किया। और अब फिर वही सवाल कि जीने के लिए जाति ज्यादा जरुरी है या बराबरी का समाज। ये जात वो बिरादरी। इसके साथ खाना ,उसके साथ मत घूमना। इसका झूठा मत खाना, उसके बर्तन भी मत छूना। अपने आस-पास के लोगों से हर वक्त इस तरह की दूरियां बनाने में न जाने कितना दिमाग और वक्त खर्च कर देते हैं लोग। कहने को भारतीय संस्कृति बहुत कुछ है लेकिन दूसरा सच ये है कि आज हम सभ्यता के उस मुहाने पर खड़े हैं जहां जाति गालियों में शुमार एक ऐसा दस्तावेज है जिसकी परते जब खुलती हैं तो इसंान का अस्तित्व ही मैला नजर आता है। अबे चमार कहीं के, अरे वो तो ब्राहम्ण कुल का है। जाति सूचक ये शब्द इस तरह इंसान का दर्जा तय कर देते हैं कि एक तबका तो जाति के बोझ तले ही दब जाता है और दूसरा जाति की छत्रछाया में अपने महल बना लेता है। छठवीं शताब्दी में उपजी समूह व्यवस्था ने जाति को सामाजिक संरचना से लेकर आर्थिक और राजनीतिक हर स्तर पर एक मुख्य पहचान और पुख्ता हथियार बना दिया। परिणाम हमारे सामने है अनेकता में एकता वाला भारत टूट रहा है और बिखर रहा है। एक इमारत में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों से लेकर एक प्रदेश में जीवन यापन करने वाले अलग-अलग जातियों के लोगों में आपस में दिली तौैर पर इतनी दूरियां पैदा कर दी गई हैं कि लोग अपनी जाति पर आधारित एक अलग प्रदेश चाहते हैं। समाज में पैठी ये दूरियां सत्ता में बैठे लोगों के लिए भी एक हथियार बन चुकी हैं। जाति बनाने वाले बनाकर चले गए शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि आने वाली पीढिय़ां इस बनावट को इतनी शिद्दत से निभाएंगी। लेकिन अब इस पीढ़ी को ये प्रथा तोडऩी होगी, बरसों पुरानी शिद्दत को तिलांजलि देनी होगी, छोडऩा होगा एक ऐसे बंधन को जो सिर्फ एक हथकड़ी है हमारे और आपके बीच में। छठवी शताब्दी की शुरूआत को भूलकर एक ऐसा प्रारंभ इक्कीसवी सदी में करना होगा जिससे ये सारे भेद मिट जाए। जाति का वो पिरामिड जिसमें सबसे ऊपर के माले पर ब्राहम्ण का सिंहासन है और दलित की झोपड़ी जमीन में धंसी हुई है, उस पिरामिड की व्यवस्था और विचारधारा को बदलना बहुत जरुरी है।
ये सब लिख्रते हुए मैं इस बात से भी पूरा सरोकार रखती हूं कि भारतीय समाज की व्यवस्था में जाति गहरे पैठी हुई है इसका त्याग करना इतना आसान नही होगा उन लोगों के लिए जिन्होंने तथाकथित नीच जाति के लोगों से कभी बात करना भी गंवारा नहीं किया लेकिन अगर वही लोग घर में भात की जगह मैगी को दे सकते हैं तो विचारधारा का ये बदलाव भी लाजंमी है जिससे जिंदगी की वास्तविक नफासत वापस आ सकती है।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

पत्रकार प्रहार और प्रतिरोध


मीडिया में तमाम विषयों को लेकर जितनी चर्चा होती है खुद मीडिया भी उतना ही चर्चित विषय है। लोकतंत्र का ऐसा चौथा स्तंभ है जिसे उखाडऩे के लिए तमाम प्रयास किए जाते हैं बिना ये सोचे कि इसके हटने पर जो छत गिरेगी उसमें कोई भी दब सकता है। प्रेस, प्रहार और प्रतिरोध की चिंगारियां गाहे-बगाहे भड़कती ही रहती है। सवाल उठते हैं कि क्या मीडिया को किसी लक्ष्मण रेखा की जरुरत है? क्या मीडिया के लिए भी कुछ सख्त मापदंड बनाए जाने चाहिए? इसी तरह के कई सवालों के बीच ये धुंधली तस्वीर उभरती है उस शख्स की जिसे पत्रकार कहा जाता है, जो मीडिया नामक संस्था का प्रहरी होता है। मीडिया की आजादी पर उठने वाले सवालों से इतर अब इतफाकन या प्रायोजित तरीके से एक पत्रकार की आजादी पर हमला किया जाने लगा है। सरकार और गैरकानूनी साजिश रचने वाले दोनों ही पत्रकार पर दबाव बनाते हैं और इन दबावों के बीच वह पत्रकार अपनी जगह किस तरह बनाए ये उसके लिए एक बड़ी चुनौती हो जाता है। सच को सामने लाने के लिए निकले पत्रकार पर हमले के कई हालिया संस्करण हैं जिन्होंने इस विषय को यहां सूचीबद्घ किया है।


मणिपुर के पत्रकार पिछले दिनो हड़ताल पर रहे और वहां दो दिनों तक कोई अखबार नहीं छपा। वजह थी कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी  से जुड़े आतंकवादी पत्रकारों को उनके खिलाफ खबर छापने पर जान से मारने की धमकी देते हैं। पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर में कम से कम 25 पत्रकारों की हत्या हुई और 30 से अधिक को आतंकवादियों को मदद देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। मणिपुर जैसे कई राज्यों में आतंकवादियों ने मीडिया को वास्तव में बंधक बना लिया है। असम में 20 और मणिपुर में पांच पत्रकारों की हत्या हुई, लेकिन किसी को भी इस संबंध में गिरफ्तार नहीं किया गया. आतंकवादियों के साथ ही राज्य प्रशासन भी मीडिया का उत्पीडऩ करता है।
महाराष्ट्र में 5 जुलाई को भारत बंद के दौरान नागपुर के वेरायटी चौक पर कवरेज के लिए गए मीडियाकर्मियों पर भी पुलिस द्वारा लाठीचार्ज  किया गया। 
लखनऊ में क्वीन्स ूबेटन की कवरेज में गए पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी की गई। लाइव कवरेज करने वाले पत्रकारों को रोका गया और जब पत्रकारों ने विरोध किया तो अधिकारियों ने अफरातफरी का माहौल बनाते हुए कई पत्रकारों को जबरिया पुलिस के वाहनों में बैठा लिया। इसके बाद यहां से करीब एक दर्जन पत्रकारों को बलपूर्वक वाहन मे ठूंसकर मोहनलालगंज थाने को भेज दिया गया। इसके अलावा बेटन के साथ चल रहे लोगों को भी चौराहे पर घण्टों धूप व उमस भरी गर्मी में रोके रखा गया।
नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज के साथ हाल ही में नंदीग्राम पुलिस ने ऐसा बरताव किया जैसे वह कोई आतंकवादी हों।
कश्मीर में जिस तरह से स्थानीय पत्रकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है उससे भी तमाम लोग वाकिफ हैं।
पत्रकार के प्रतिकार का एक छोटा सा हालिया नमूना ये भी है
सिरसा और फतेहाबाद में बाढग़्रस्त, इलाकों का जायजा लेने पहुंचे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा एक पत्रकार के सवाल पर बुरी तरह झल्ला गए और उसे पत्रकार काांफ्रेस से बाहर निकल जाने का हुक्म सुना दिया। पत्रकार ने मुख्यमंत्री हुड्डा से पूछा था कि केंद्र सरकार ने बाढ़ से बचाव के लिए हरयिाणा को 75 करोड़ रूपए दिए हैं, लेकिन अकेले रोहतक को ही 23 करोड़ रूपए क्यों दे दिए गए। राज्य के बाकी जिलों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों। पत्रकार का यह सवाल हुड्डा का नागवार लगा और उन्होंन झल्लाते हुए पहले तो उससे उसके अखबार का नाम पूछा और बाद में उसे बाहर निकल जाने कह दिया। ज्ञात रहे मुख्यमंत्री हुड्डा रोहतक से ताल्लुक रखते हैं।

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...