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रविवार, 15 सितंबर 2013

गुनाहों का देवता न बनाएं उन्हें

देश ही नहीं दुनिया भर से एक ही आवाज सामने आई- फांसी। 
आवाज अपनी मंजिल तक पहुंची और फांसी का फैसला सामने आया।
जिस उम्मीद से न्यायपालिका की तरफ देखा जा रहा था, वह उम्मीद पूरी हुई।

मगर फिर भी न जाने क्यों मन को चैन नहीं मिला।
वजह यह कि कुछ ऐसी बातें फिर से देख ली, फिर से पढ़ ली और फिर से समझ लीं कि फांसी के फैसले से जो ठंडक दिल को मिली थी उससे भी कंपकंपी होने लगी।
 
पहला तो यह कि फांसी का फैसला सुनने भर पर इतना फोकस था कि ध्यान ही नहीं रहा, यह फांसी पहले सिर्फ कागज पर होगी और उसे हकीकत बनता देखने के लिए लंबा इंतजार भी करना पड़ सकता है।
हाईकोर्ट-सुप्रीमकोर्ट-मर्सी पिटीशन और इसके बाद जब हर स्तर पर यह मान लिया जाएगा कि सच में एक जघन्य अपराध के लिए दिया गया यह फैसला सही है तब जाकर फांसी की सजा मुकम्मल होगी।
बेशक यह एक कानूनी प्रक्रिया है, जिस पर अमल होना जरूरी है और न्यायपरक भी।
 
चिंता, डर और परेशानी सिर्फ इसी बात को लेकर है कि कहीं इस एक मामले के दोषियों को फांसी तक पहुंचते-पहुंचते इतना वक्त न लग जाए कि कई दामिनियों के दमन की कहानी हमारे सामने हो और हम बेबस होकर सिर्फ इंतजार ही करते रह जाएं।
डर, बेवजह भी नहीं है।
पहले आसपास की घटनाएं डराती थी।
फिर खबरें पढ़कर डर लगने लगा
फिर लगातार बढ़ते हुए आंकड़े सामने लगे
और अब अध्ययन भी...
 
''केवल झारखंड में ही पिछले एक महीने के दौरान बलात्कार के 818 मामले दर्ज दिए गए हैं।'' (बीबीसी हिंदी)
 
''एशिया के कुछ हिस्सों में किए गए हाल के एक अध्ययन के मुताबिक 10 में से एक व्यक्ति ने माना कि उसने एक महिला के साथ बलात्कार किया है।''
 
दूसरा मुद्दा मानवअधिकारों की रक्षा करने वाले लोगों का है। ये लोग आज भी न जाने अपनी पेशेवर मजबूरी या फिर किसी और वजह से यही राग अलाप रहे हैं कि बलात्कारियों के भी मानवाधिकार होते हैं।
जिस समाज में आज भी एक तबका औरत को इंसान जैसे अधिकार नहीं देता उसी समाज में एक औरत का बलात्कार करने वाले व्यक्ति के मानवाधिकार की बात करना......यह तर्क सुनने में ही इतना घटिया लगता है कि इसे विडंबना भी नहीं कहा जा सकता।
 

तीसरी बात उन लोगों की है जिन्हें लगता है कि दोषियों को सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए लिहाजा उनकी सजा भी कम होनी चाहिए।
इस बात का जवाब एक दृश्य की कल्पना से देना ज्यादा बेहतर होगा-
 
मान लीजिए आपके हाथ में गर्म चाय का कप है, सामने से कोई अपनी मस्ती में आ रहा है और उसका धक्का आपको लग गया।
गर्म चाय आपके हाथ पर गिर गई और हाथ जल गया।
आपको गुस्सा आएगा। आप चिल्ला भी सकते हैं।
सामने वाला माफी मांग सकता है।
आप थोड़ा बहुत चिल्ला कर लड़-झगड़कर माफ भी कर सकते हैं।
 
अब मानिए कि आपके हाथ में गर्म चाय का कप है और सामने से आने वाला व्यक्ति यह सोचकर ही आ रहा है कि वह आपको इस तरह धक्का देगा कि चाय आपके हाथ पर गिरे और हाथ जल जाए।
वह आता है और अपनी योजना के मुताबिक आपका हाथ जलाकर भाग जाता है।
आप क्या करेंगे।
आप सिर्फ चिल्लाएंगे नहीं।
उसके पीछे दौड़ेंगे। आसपास के लोगों को आवाज लगाएंगे। उसे पकड़वाएंगे।
चाहेंगे कि उसे सजा हो। शायद ही आप वहां पश्चाताप की गुंजाइश तलाशने बैठें।
 
 
जिन लोगों की बात हम यहां कर रहे हैं वह दूसरे दृश्य से संबंधित हैं।
उन्होंने गलती नहीं की है गुनाह किया है।
 

स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है और उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में भी यह स्पष्टता सार्थक होगी
और इंसाफ रास्ते में ही दम नहीं तोड़ देगा। 

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

ऑटो में दो लड़कियां



लड़की-1
वही हरा वाला...। थोड़ा ट्रांसपेरेंट हैं न वो...। जैसे ही पहनने लगी, मम्मी ने टोक दिया।
"ये पहनकर बाहर नहीं जाना। ऑटो-वॉटो से जाना है, सही ढंग के कपड़े पहन लो।"

मेरा मूड ही खराब हो गया
फिर मैंने छोड ही दिया। ऐसे ही जींस कुर्ता पहनकर आ गई मैं।
तू बता, बड़ी स्मार्ट लग रही है.. आंटी ने कुछ नहीं कहा...

लड़की-2

हां यार
मेरी भी मम्मी कल से सवाल पूछे जा रही हैं।
"क्यों इतनी तैयारी कर रही है.."
"क्या बात है"
"कॉलेज ही जा रही हो न।"
मैंने बताया उनको कि आज कॉलेज में फेस्ट है...
मम्मी ने पूछा फेस्ट क्या होता है
मैंने कहा, मम्मी जैसे स्कूल में एनुयअल फंक्शन होता था न
ऐसे ही कॉलेज में फेस्ट होता है
फिर पता है मम्मी ने क्या कहा...
कहने लगी तो बेटा फिर वो दीवाली पर जो लाए थे वो सूट पहन ले या कोई साड़ी दूं अपनी निकालकर
मम्मी भी न .... समझती नहीं है
फेस्ट में कोई सूट या साड़ी थोड़ी पहनता है
फिर पूछने लगी "क्यों नहीं पहनता भला
एनुअल फंक्शन में भी तो तुम सब तैयार होकर जाते थे।"
मैंने बताया उन्हें, कॉलेज के फेस्ट बड़े ही धमाकेदार होते हैं
डांस  होता है, म्यूजिक होता है
दूसरे कॉलेज के भी लोग आते हैं
सब मस्ती करते हैं
सूट साड़ी में कैसे इंज्वाय करेंगे...
फिर तो मम्मी को औऱ ज्यादा लगने लगा कि मुझे ज्यादा तैयार नहीं होना चाहिए

लड़की-1
लेकिन यार मम्मी ठीक ही चिंता करती हैं
कल देखा नहीं था तूने टीवी पर
गाजियाबाद में ऑटो वाला ही
लड़की को भगाकर ले गया और
रेप कर दिया

लड़की-2
हां.... (अनमने से)



अब सिर्फ ऑटो की खड़खड़ की आवाज थी
संजी-संवरी सी वो दो लड़कियां बिलकुल सहमकर शांत हो गईं थी।
शायद मेरे ऑटो से उतरने के बाद उन्होंने किसी दूसरे विषय पर फिर से बात शुरू करने की हिम्मत जुटाई हो

-आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस था...

शनिवार, 19 जनवरी 2013

बलात्कार क्यों...


''बलात्कार, पुरुष कामुकता की न‌िरंतरता का एक चरम अंत है। पुरुषों में साथी तलाशने की चाहत मह‌िलाओं से ज्यादा प्रबल और अव‌िवेकी होती है। पुरुष इसके ल‌िए कई तरह से अपनी इच्छा को मह‌िलाओं के सामने रखते हैं। जब उनकी ये कामनाएं पूरी नहीं होती तो उनकी इच्छा पूर्त‌ि का एकमात्र साधन बलात्कार बचता है''
-स्टीवन प‌िंकर (नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक लेख से ली गई टिप्पणी)
पिछले कई दिनों से बार-बार ये सवाल दिमाग में कौंध रहा था क‌ि कोई आदमी बलात्कार क्यों करता है? अगर इसका जवाब सिर्फ इतना है कि सेक्स इच्छा की पूर्त‌ि के लिए बलात्कार किया जाता है तो इसके सामने फिर कुछ सवाल खड़े हो जाते हैं। 
पहला सवाल ये कि यह इच्छा किसी खास तबके या व्यक्ति में तो नहीं होती। दुनिया के हर आदमी में यह इच्छा कभी न कभी पैदा होती है, हर कोई बलात्कार करने लग जाए तो?  
दूसरा यह कि क्या सिर्फ एक इच्छा को पूरा करने के ल‌िए कोई इस हद तक गिर सकता है
हार्वर्ड व‌िश्वव‌िद्यालय में मनोव‌िज्ञान के प्रोफेसर स्टीवन प‌िंकर की हाल ही में सामने आई टिप्पणी जिस तरह से मेरे इन सवालों का जवाब देती है वो संतोषजनक तो नहीं है, लेकिन एक वजह को सामने जरूर रखती है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि दरिंदगी को किसी का मनोवैज्ञानिक विकार समझकर किसी भी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है। जहां तक मेरी समझ की बात है तो
बिना ज्यादा पड़ताल किए और सोचे-समझे, मेरे लिए बलात्कार का जो पहला मतलब सामने आता है, वह है किसी के साथ अनैच्छिक या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए जाने की घटना। लेकिन कुछ लोगों से बातचीत के दौरान और कुछ चीजें पढ़ते हुए जो परतें खुल रही हैं, उनसे यह घटना सिर्फ इतनी सी है नहीं। 
कई दफा मुझे लगता था कि हमारे देश में बलात्कार के इतने मामले ‌सामने आने की एक वजह ये भी हो सकती है कि यहां सेक्स नामक शब्द को जुबां पर लाने को भी बहुत बुरा माना जाता है। इसके बारे में सोचना और करना इतना गुप्त होता है कि किसका, कब, कहां और कितनी बार बलात्कार हो चुका है, इसके सही आंकड़ें शायद यहां कभी जुटाए ही न जा सकें। शरीर से जुड़ी इच्छा, भावना और जरूरत के इसी दमन की वजह हो सकता है बलात्कार। लेकिन एक दिन पहले बीबीसी पर प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट को पढ़कर ये भ्रम भी टूट गया। यह रिपोर्ट ब्रिटेन में बलात्कार के बढ़ते मामलों के बारे में है। रिपोर्ट के अनुसार इंग्लैंड और वेल्स में हर साल औसतन चार लाख 73 हज़ार सेक्स अपराध होते हैं। इनमें पुरूषों के साथ होनेवाले अपराध भी शामिल हैं, मगर बहुतायत महिलाओं के साथ हुए अपराध है। इनमें हर साल बलात्कार की संख्या 60 हज़ार से 95 हज़ार तक होती है। यानी आँकड़ों को मानें, तो इंग्लैंड-वेल्स में भारत से दोगुना से भी ज़्यादा बलात्कार होते हैं। इसका मतलब समाज में खुलापन और शारीरिक इच्छाओं की खुलेआम पूर्त‌ि भी इस समस्या का हल नहीं है। बलात्कार की घटनाओं को देखने-सुनने की इस कड़ी में मेरे बढ़ते कंफ्यूजन की एक वजह तमाम बुद्धिजीवियों और जाने-माने लोगों के बेतुके बयान भी हैं। छत्तीसगढ़ से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रमेश बैस ने भी कुछ ऐसा ही बयान दिया। उन्होंने कहा कि बड़ी लड़कियों या औरतों के साथ बलात्कार समझ में आता है, लेकिन अगर कोई इस तरह की हरकत नाबालिग के साथ करे तो उसे फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। इस बयान को सुनने के बाद बयानबाजी की जो राजनीति शुरू हुई वो तो अपने नियत कार्यक्रम के तहत जारी है ही। लेकिन मुद्दा यहां फिर सवालों पर आकर खड़ा हो जाता है कि औरतों के साथ बलात्कार अगर इतनी ही सामान्य घटना है तो फिर इस पर ‌इतना हो हल्ला क्यों? फिर सवाल ये भी है कि नाबालिग से बलात्कार के लिए आदमी की कौन सी प्रबल इच्छा जिम्मेदार है?
बलात्कार की घटनाओं के बाद लोगों ने लड़कियों के कपड़ों को लेकर भी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं जाहिर की। ''महिलाएं छोटे और भड़काऊ कपड़े न पहनें''  गोया पुराने जमाने में तो औरतें सिर से पैर तक ढकी होती थी। किसी ने तो यहां तक कह दिया कि ''लड़कियों के पास मोबाइल नहीं होना चाहिए'', गोया कि मोबाइल ही किसी आदमी को बलात्कार के सिग्नल प्रेषित करता है। ''उन्हें हमेशा किसी रिश्तेदार के साथ ही बाहर निकलना चाहिए'' गोया आज तक कभी रिश्तेदारी में किसी ने किसी का बलात्कार किया ही न हो। गोया इस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर करने वाले लोगों ने उन खबरों की तरफ कोई ध्यान ही न दिया हो, जब एक बाप अपनी बेटी की इज्जत लूटकर फरार पाया गया। घटनाएं चाहें कितनी ही सामने क्यों न आए। बहस का मुद्दा हमेशा आदमी की इच्छा और औरत की चरित्रहीनता पर खत्म होता है। 
क्या शरीर से जुड़ी कोई इच्छा, जरूरत या चाहत औरत के भीतर नहीं होती?
क्या कभी उसकी इच्छा और कामना अपने चरम पर नहीं पहुंचती?
क्या कभी औरत को पुरुष के ज्यादा अच्छे और स्मार्ट दिखने या हंस-बोलकर बात करने से गलत सिग्नल नहीं मिलते?
अगर ये सब औरत के साथ भी होता है। और अगर कुछ लोगों का सामना इस सच्चाई से भी हुआ है कि आदमियों का भी बलात्कार किया जाता है तो अंत में शायद बात प्रोफेसर स्टीवन पिंकर के उस तर्क पर ही आकर खत्म होती है, जिसमें उन्होंने आदमियों में कमुकता के स्तर को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बताया है। 
लेकिन अगर मनोवैज्ञानिक स्तर पर इच्छाओं का दमभर कर किसी अपराध और दरिंदगी को जायज ठहराया जा सकता तो अदालत, सजा और न्याय नाम के शब्द पैदा ही न हुए होते। यह मुद्दा अपराध,सजा और न्याय का तो है ही लेकिन भविष्य में इससे निपटने और इससे बचने के लिए ''आदमी, औरत और सेक्स'' की गुत्थी को भी सुलझाने की जरूरत होगी।




शनिवार, 29 दिसंबर 2012

लड़की 'हो' ना

जब इस बात का अहसास होना शुरू हुआ कि मैं लड़की हूं, तब सब कुछ इतना बुरा नहीं था। मगर जिन दिनों से उन नियमों ने मेरे दिमाग में जगह बनाई, जिन पर चलने की सीख मुझे दी जाने लगी, क्योंकि मैं एक लड़की थी, तब से सब कुछ काफी बुरा लगने लगा। यहां तक कि तब से मुझे अपना लड़की होना ही बुरा लगने लगा। उन दिनों के बाद से दुनिया भर के हसीन ख्वाबों और ख्यालों के बीच एक ख्वाहिश मेरे दिल में हमेशा कसमसाती रहती थी कि काश! मैं लड़का होती।
लड़का होती तो दादी ने मां के साथ बुरा व्यवहार न किया होता।
लड़का होती तो घर वालों के मन में एक अजीब सी असुरक्षा की भावना न होती।
लड़का होती तो मां को भविष्य इतना धुंधला और कमजोर न दिखता।
लड़का होती तो देर तक बाहर घूमती।
लड़का होती तो बिना बताए घर से चली जाती।
लड़का होती तो शराब के हर एक घुंट के साथ जिंदगी को आसान बना लेती।
लड़का होती तो सिगरेट के कश भरती और हर फिक्र को धुएं में उड़ा देती।
लड़का होती तो ऑफिस से घर जाने की जल्दी न करनी पड़ती।
लड़का होती तो नाइट रिपोर्टिंग करती।
लड़का होती तो रेड लाइट एरिया में जाकर उनकी जिंदगी करीब से देख सकती।
लड़का होती तो इस बात का इंतजार न करना पड़ता कि कोई लड़का आएगा और मेरी जिदंगी की हर तकलीफ को कम कर देगा हर पहेली को सुलझा देगा।
लड़का होती तो ये.... लड़का होती तो वो....
आज भी बेशक मैं लड़की होने पर फक्र नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे अंदर की लड़की कहीं घुट रही है।
मगर मैं अब कभी लड़का नहीं होना चाहती।
अगर लड़का होने का मतलब लड़की होने के असित्त्व को बार-बार तार-तार करना रह गया है तो मैं कभी लड़का नहीं होना चाहती।
अगर कभी बाप, कभी भाई, कभी बेटे और कभी किसी मनचले के रूप में लड़कों की मर्दानगी का मतलब लड़कियों की मौत के तौर पर ही सामने आता है तो मैं कभी लड़का नहीं होना चाहती।
और  ये जानते-समझते हुए भी कि हर शख्स एक जैसा नहीं होता, हालात बार-बार मुझे झकझोर रहे हैं, मजबूर कर रहे हैं कि मैं किसी मर्द पर भरोसा न करूं और अपने विश्वास को फौरन हर आदमी पर से चलता कर दूं.......
या फिर मैं नहीं समझ पा रही कि उसकी कुर्बानी का मोल किस तरह अदा करूं
आखिर में मैं एक लड़की हूं औऱ नहीं चाहती कि अपनी जिंदगी में फिर कभी किसी लड़की की ऐसी कुर्बानी की साक्षी बनूं। 

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

फांसी फांसी फांसी


 24 साल के इस सफर में ज‌िंदगी ने कई बार उलझाया। कई बार हालात के दलदल में फंसाया। कई मरतबा ऐसा हुआ ‌क‌ि सोचने और समझने की ताकत नहीं रही। ‌फ‌िर भी बीते कुछ द‌िनों में मेरे सामने आने वाली चीजें न जाने क्यों मुझे हर बीती हुई मुश्क‌िल से भी ज्यादा कठ‌िन लगी। हाथ में कागज, कलम, लेपटॉप कुछ नहीं था और मन में शब्दों का तेज ज्वार भाटा। मैंने क‌िसी दोस्त का फोन नहीं ल‌िया, क‌िसी से बात नहीं की। न टीवी, न रेड‌ियो, न अखबार कुछ नहीं था पास। कुछ मालूम नहीं था क‌ि दुन‌िया में हो क्या रहा है। द‌िख रहा था तो बस इतना क‌ि ज‌िंदगी में जो हो रहा है वो नहीं होना चाह‌िए। हो रहा है तो उसका हल म‌िलना चाह‌िए। मगर कुछ नहीं म‌िला। ज‌िस पटरी पर चलते-चलते गाड़ी रुक गई थी, उस पर बहुत देर रुकी रहने के बाद फ‌िर से घ‌िसटने लगी। अब कोई सोचे क‌ि ऐसा भी क्या मामला था तो इस बारे में मैं कुछ नहीं ल‌िख सकती। मुझे हमेशा से लगता आया है क‌ि अपनी न‌िजी ज‌िंदगी और पार‌िवार‌िक मसलों के बारे में दूसरों से ज्यादा बातचीत नहीं करनी चाह‌िए। लगता आया है या मां की सीख का असर है शायद। मैं इतना सब भी नहीं ल‌िखती... अगर तीन बाद अखबार देखते ही मेरे सामने दर‌िंदगी की वो घटना न आई होती। 
मैं स्तब्ध थी पढ़कर। 
नहीं महसूस कर सकती क‌ि वो कैसी होगी सहकर।  
मैं बहुत भावुक हूं। बहुत कुछ ल‌िखती व‌िखती रहती हूं, ले‌क‌िन मेरे अंदर उठ रहा शब्दों का सारा ज्वार भाटा अचानक आकाश और धरती के बीच ही कहीं अपनी जगह बनाकर रुक गया है। 
जैसे बचपन में हम दोस्तों को स्टेच्यू बोलकर कई देर के ल‌िए ज्यों का त्यों छोड़ देते थे। 
मेरी भावनाएं ऐसे सूख गई हैं जैसे उड़ीसा के कालाहांडी का अकाल। 
न मैं कैंडल मार्च कर सकती हूं। 
न हाथ में पोस्टर लेकर च‌िल्ला सकती हूं। 

मेरा कुछ भी ल‌िखना या करना इस स्थ‌ित‌ि के ल‌िए शायद क‌िसी काम का नहीं है। 
मगर इतना कहना जरूरी लगता है क‌ि 
प्रताड़ना के इस शोर के बीच क्या अपराध‌ियों को सजा की मांग या उससे जु़ड़ी क‌िसी च‌िल्लाहट की गुंजाइश बचती है?
क्या चोट पहुंचाने वाले से पूछने के बाद उसे मारा जाता है?
क्या इस देश में ज‌िसे भारत कहते हैं स‌िर्फ खोखली भावनाओं का लबादा ओढ़ने की ताकत है या फ‌िर वो ह‌िम्मत भी ज‌िसके दम पर क‌िसी को इंसाफ म‌िल सके और दु्न‌िया को सबक।
मेरी आंखों के सामने ऐसे कई सवालों का बहुत बड़ा घेरा है। ऐसे सवाल, ‌ज‌िनके जवाबों पर पुल‌िस, पार्टी, पॉल‌‌िट‌िक्स और प्रशासन की न जाने क‌ितनी मकड़‌ियां बैठी हैं।
मगर मैं अब स‌िर्फ एक लाइव सीन देखना चाहती हूं। 
ज‌िसमें लाइट कैमरा और एक्शन बोलेत ही अपराधी के पैरों के नीचे से जमीन खींच ली जाए। फंदा उसके गले के ऊपरी छोर को छूकर बाहर न‌िकलने की कोश‌िश करे, मगर न‌िकल न पाए।  

शनिवार, 1 सितंबर 2012

दो टुकड़े दिल

घर से निकलने से पहले मां

के सवालों का जवाब दिया

दफ्तर में बॉस की बातों का

दोस्तों के साथ

उन्ही की हां में हां

और न से न

मिलाई

मामी, बुआ, चाची, भैया और भाभी

के भी थे कुछ सवाल

जिन्हें पल भर में सुलझा दिया

हर बार

कितने दिनों तक सवालों में ठनती रही रार

मगर जवाबों ने बाजी मार ली हर बार

आज लेकिन सवाल सख्त था

जवाब पस्त था

आज अपने ही दिल ने

अपने ही दिल से पूछी

थी एक बात

क्यों री छोरी

कहां से आए हैं ..

किसके लिए हैं.. ये जज्बात

सवालों के साथ

सलाह भी मुफ्त थी

न चाहते हुए भी..

न जाने क्यों

बार-बार

चीख-चीख कर

कह रहा था

भटक मत...भटक मत

तुझे सिर्फ एक राह जाना है

उस एक ही को अपनाना है

उसी से करनी है दिल की सारी बात

...

...

और फिर अचानक

पता ही नहीं चला

कब एक दिल दो टुकड़ों में बंट गया

एक हमेशा के लिए सवाल बन गया

और दूसरा जवाब बनने की कोशिश में

मर गया...

लड़की के दिल की किस्मत भी

लड़की जैसी ही...।



मंगलवार, 21 अगस्त 2012

मैं एक औरत हूं

1)

मैं उस पर
कभी नहीं कर पाई पलट कर वार
सिर्फ इसलिए नहीं कि औरत हूं
और
मेरे कमजोर अंगों में हिम्मत नहीं
उस जितनी,
मगर इसलिए कि
मुझ पर वार करने वाला
पहले मेरा पिता था
और फिर
पति।
पिता... जो जीवनदाता है
और पति.. जिसे परमेश्ववर कहा जाता है

2)

मेरा वजन लगातार
कम हो रहा है
और कंधे झुकते जा रहे हैं
संस्कारों का कैसा बोझ है ये

3)
एक औरत चांद पर    
कदम रख चुकी है
और मैं
मेरे कदम
मेरे कदम तो...
जमीन पर भी
लड़खड़ाते हैं
जब भी कोशिश करती हूं चलने की
अपनी तरफ।

4)

एक औरत देश चला चुकी हूं
और मैं ...
मैं तो अपना तथाकथित घर भी
हर रोज टूटते देखती हूं
हिंदु-मुस्लिम दंगों से भी बड़ी जंग
छिड़ती है हर रोज यहां
मंदिर टूटता है
जलता चूल्हा मेरे ऊपर फेंका जाता है
टूटे फूलदानों को हर सुबह फिर करीने से सजाती हूं मैं
मगर
यहां कभी
लागू नहीं होती एमरजेंसी।

5)

एक औरत कर चुकी है एवरेस्ट की चढ़ाई
और मैं नहीं चढ़ पाती
कचहरी, महिला आयोग या फिर किसी एनजीओ की
सीढियां भी।

6)
एक औरत की कलम ने
खोल दी है बड़े-बड़े सरकारी घोटालों की पोल
मगर
मैं नहीं खोल पाती अपने होंठ भी
जब एक कठपुतली की तरह मुझे
सिर्फ बेटी, पत्नी और
औरत हो जाना होता है
एक इनसान होने से भी पहले।

7)

कुछ औरतें सुना है..खेल रही हैं
कई तरह के खेल
हॉकी से लेकर कुश्ती तक
और
मैं...
मै...अभी तक
जिंदगी के खेल
में फिल्डिंग की कर रही हूं बस

8)
एक औरत ने कत्ल कर दिया है अपने पति का
एक औऱत दूसरे आदमी के साथ भाग गई है
एक औरत ..
एक औरत..
मैं इन औरतों में शामिल नहीं हूं
अब तक
मैं भी औरत हूं
लेकिन एक खालिस औरत।
अब भी हूं मैं इन औरतों के बीच
अपने जैसी कई सारी खालिस औरतों के साथ
चांद,देश,एवरेस्ट या ओलंपिक
एक और सिर्फ किसी एक-एक औरत की जिंदगी में ही है बस
कितनी ही तो हैं
अब भी बस बेबस।
मैं वही बेबस औरत हूं
इसलिए नहीं कि औरत हूं
इसलिए कि मैं खालिस औरत हूं।

रविवार, 24 जून 2012

गाली, गोली और ....गैंग ऑफ सो मेनी रियल्टीज



न लूट खसोट करने वाले गुंडों के गैंग पहली बार पर्दे पर दिख रहे थे, न ही मार-धाड़ वाली फिल्म देखना कोई नई बात थी। 
न गालियां अजनबी थीं, न आदमी की वो जात... जो वो अक्सर दूसरी औऱतों के सामने दिखाते नजर आते हैं। मगर इन सब जानी पहचानी चीजों को एक बड़े से कमरे में सौ लोगों के बीच देखना बहुत अजीब था। 
शायद खुद से आंखें मिलाने जैसा या फिर उस दुनिया से आंखें चुराने जैसा, जिसका हिस्सा हम आज भी थे...। 


ये फिल्म 1940 के जिन हालातों से शुरू होकर आज में लौटती है...उस बीच में दुनिया कितनी बदल गई है ...ये सवाल इस फिल्म को देखने से पहले पूछा जाता तो हम कहते .. बहुत ज्यादा...मगर फिल्म देखने के बाद समझ में आता है कि ...बहुत कम बदली है।


हां.. इतने समय में जो कुछ तरक्की हुई है उसे फिल्म में बखूबी दिखाया गया है। अब घर वैक्यूम क्लीनर से साफ होने लगे हैं बेशक दिमागों में गंदगी भरी पड़ी हो। फल सब्जियां ठंडी रखने के लिए घर में फ्रिज आ गए हैं बेशक शरीर की गर्मी को शांत करने के लिए आज भी आदमी अपनी बीवियों को छोड़कर किसी दूसरी औरत को धँधे वाली बना रहे हो।
शहर में मोहल्लों में... आज भी तो कई तरह के गैंग हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि जैसा फिल्म में दिखाया गया है वैसे बम बनाने के लिए सल्फर और पोटेशियम खाने के डिब्बे में नहीं मंगाना पड़ता..अब बड़े-बड़े खतरनाक हथियार सीधा सप्लाई हो जाते हैं।


जिस तरह शाहिद खान की मौत का बदला लेने के लिए एक सुंदर और शांत बच्चा, सरदार खान बन जाता है और सरदार खान की रंजिशों को देखते हुए उसके बेटे दानिश और फैजल की मानसिक स्थिति अलग-अलग तरह से आकार लेती है.....हो सकता है शायद आज इस हद तक का कुछ न होता हो। मगर आज भी बाप की करनी का असर बच्चे भुगतते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि भुगतने के लिए उन्हें महंगे कांवेंट बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया जाता है, एक ही घर में रहकर बच्चे को उस रात का गवाह नहीं बनना पड़ता शायद जब उसकी मां इतनी कमजोर पड़ गई थी कि दादा की उम्र के आदमी के साथ सोने पर मजबूर हो रही थी क्योंकि वो टूट चुकी थी ये सुनकर कि उसका पति यानी बच्चे का बाप किसी दूसरी औऱत के साथ सो रहा है।


गंदी गालियों, बिस्तर के रूमानी, बॉलीवुडिया सीनों से हटकर फिल्माएं गए ठेठ गंवई सीनों और  अधाधुंध मार कुटाई के अलावा इस फिल्म में कई ऐसी खिड़किया हैं जहां से देखने पर अब तक की दुनिया की कई तरह की शक्ल सामने आती है। फिल्में में दिखाया गया सालों का बदलाव एक बार को तो ऐसे लगता है जैसे कोई समय की सुइयों को पीछे घुमाकर हमें पहले की दुनिया दिखा रहा है। 


उस दुनिया में एक शाहिद खान है जो सस्ता अनाज देने के लिए ट्रेन लूट रहा है। उसका बेटा सरदार खान है जो बाप की मौत का बदला ले रहा है...कहके ले रहा है....ये फिल्म की पंचलाइन भी है तेरी कह के लूंगा....शायद ये हीरो का हुनर है कि वो कहके वार कर रहा है। सरदार खान की बीवी है नगमा। जो उसी हद तक गालियां दे सकती है जिस हद तक कोई भी सरदार खान देता है। जो भीड़ भरे रास्ते में उस सरदार खान को मार-मार कर घर ला सकती है जो सरदार खान भरे बाजार में आदमी को बेहिसाब काट डालता है और रौब से आगे चला जाता है। वही औरत नगमा अपने पति को दूसरी औरतों के पास जाने से नहीं रोक पाती। अनकहे तौर पर समझौता कर लेती है। गुरुराती है चिल्लाती है चाकू भी दिखाती है मगर किसी भी हालत में ऐसे आदमी की बेगम बनकर रहना उसे मंजूर है जो कब कहां कौन सी औरत के पास है उसे खुद नहीं पता। बेशक वो घर न आता हो पैसे न भेजता हो उसने दूसरा परिवार बना लिया हो मगर अपने बेवफा शौहर के लिए वो पूरी तरह वफादार रहना चाहती है। एक बंगालन है जो सरदार खान की दूसरी औरत है। पहली औरत नगमा से ज्यादा खूबसूरत ज्यादा कमसीन ज्यादा नकचढ़ी है। जो सरदार खान से पैसे भी लेती है, उसे गालियां भी देती है और अंत में मरवा भी देती है....


सरदार खान की जिंदगी का मकसद ...उसकी रंजिश.. कितनी पूरी हुई है.. ये फिल्म का दूसरा भाग बताएगा मगर वक्त सरदार खान के हाथ से बंदूक गिरने के बाद भी उसका जयघोष करता है ...जीया हो बिहार के लाला....फिल्म के आखिर में ये जयघोष फिल्म की शुरुआत में आए उन सपनों की टीस को महसूस करवाता है जब शाहिद खान हमेशा के लिए गांव छोड़कर धनबाद में बसने जा रहा होता है वो गाता है....


एक बगल में चांद होगा एक बगल में रोटियां
एक बगल में नींद होगी एक बगल में लोरियां


अगर आप  बहुत सब्जेकिट्व होकर न देखें तो ये फिल्म आपको बहुत कुछ देखने और महसूस करने की आजादी देती हैं लेकिन अगर आपको सिर्फ वासेपुर के गैंग्स देखने हैं तो इस फिल्म में सिर्फ लूट-खसोट, बंदूक की आवाजें और मां-बहन की गालियां हैं जिसे देखना एक औसत दर्शक को रास नहीं आएगा...फिर भी ये फिल्म बॉक्स ऑफिस की रेटिंग से ये कहीं आगे है और मनोज वाजपेयी के अभिनय को किसी ऑस्कर की जरूरत नहीं है।


सिर्फ मनोज वाजपेयी ही नहीं फिल्म का हर किरदार कहीं भी किरदार नहीं लगता ....बिल्कुल उसी दुनिया के असली चेहरे लगते हैं जहां कोयले की खदाने बंद तो हो चुकी हैं लेकिन उनकी कालक अब भी लोगों की जिंदगी में इस तरह शामिल है कि सुबह का उजाला भी मटमैला दिखता है.....


अनुराग कश्यप सिनेमा की अपनी एक अलग दुनिया बना रहे हैं जहां सिनेमा .... में सच है..... सिर्फ सच.....कड़वे वाला सच















शनिवार, 31 मार्च 2012

बस स्टैंड के वेटिंग रूम में एक घंटा


सूरज उग तो चुका होगा, लेकिन जापान से भारत और भारत में लुधियाना बस स्टैंड तक आते-आते शायद सूरज को देर लग रही थी। कहने को सुबह के पांच बज रहे थे, लेकिन देखने को गुप अंधेरा था जिसे चीरकर देखने पर खुद मुझे चीरकर देखती कुछ आंखें नजर आ रही थी। मैंने शक्ल पर बाहर बजाए बिना पूरी धाक के साथ यहां-वहां घूमना शुरू कर दिया...
यहां-वहां से मतलब, बस स्टैंड पर बाजार भाव से ज्यादा दाम में मिलने वाली दुकानों के आस-पास घूमना शुरू कर दिया। पर दुकानदारों की आंखों में अपना सामान बेचने का लालच था या .....जैसे मेरी ही कीमत लगाकर मुझे खरीदने का..मैं समझ ही नहीं पा रही थी। तेज कदमों से शौचालय की तरफ बढ़ी। बाहर ही काले रंग की एक औरत बैठी थी, जिसकी शक्ल और पहनावे पर बिहार की छाप साफ दिखती थी मगर पंजाब की भाषा और बोली के रंग में वो पूरी तरह रंग चुकी थी...

उसे देखकर मालूम हो गया था कि ये यूपी-बिहार से हर साल हजारों की तादाद में पंजाब आकर बसने वाले लोगों में से एक थी। अंदर जाने से पहले ही बता दिया..दो रुपये लगेंगे। मैंने हामी में सिर हिलाया और अंदर चली गई। बाहर आई तो दीवार पर नजर पड़ी जिस पर लिखा था महिला वेटिंग रूम। शौचायल के बाहर की तरफ एक कमरे में कई सारी कुर्सियां रखी थी। मुझे लगा जब तक सूरज की किरणें सुबह होने का सबूत नहीं देती, तब तक यहीं इंतजार करना सही होगा। मैं वहीं दो कुर्सियां मिलाकर कमर सीधी करके बैठ गई..लेकिन कुछ ही देर बाद देखा कि...

कुछ ही देर बाद देखा कि कमरे के बाहर बैठी औरत से आते-जाते एक-दो आदमी मेरी तरफ इशारा करके पूछ रहे थे..कौन है ये लड़की..कब आई..कितनी देर से बैठी है यहां..जवाब देते वक्त उस औरत की आंखें कहीं और थी सोच कहीं और , और वो जवाब कहीं और से दे रही थी..उसका जवाब यही थी कि हुणे ही आया है...ज्यादा देर नहीं हुआ...इसके बाद उसने जो बोला उससे जवाब देने के उसके लहजे का कारण पता चला...उसकी आंखें कहीं और, और सोच कहीं और इसलिए थी क्योंकि...वो उस लड़की के बारे में सोच रही थी जो अभी कुछ देर पहले यानी मेरे आने से पहले यहां बैठी थी...जो अक्सर इस वेटिंग रूम में आती थी... ऐसे ही समय... जब अंधेरा उजाले के सामने जबरदस्ती सीना तान कर खड़ा हो जाता है...एक नाजायज हक की तरह...उस लड़की का कुछ सामान यहां छूट गया था..औरत छूटे हुए सामान और उस लड़की के बारे में ही सोच रही थी...बोली अभी तो मैंनू कही सी आंटी चाय पी लो तुसी..हुण दीखदी नइ..सामान भी इत्थे छोड़ गया है...अब मेरी आंखें कहीं और थी और सोच कहीं..मैं...


मैं सोच रही थी कि मैं यहां बैठकर कुछ गलत तो नहीं कर रही। वो आदमी वहां से जा चुके थे। औरत खुद ही बात करते हुए मेरी तरफ बढ़ी, बताने लगी...वो तो आता रहता है यहां..काम ही ऐसा है उसका...अभी तो यहीं था, आप देखा था क्या उसको..मैंने कहा नहीं, मैं तो आपके सामने ही आई हूं...
औरत बोली हां सही कह रहे हो मैं यही बोला पाजी नूं...वो पूछ रहा था ...पता नहीं कहा चला गया वो ये सामान यही छोड़ गया...हम जानता है उसको रात का काम करता है..आता रहता है यहां...वो औरत बार-बार कह रह थी..रात का काम करता है..दो-तीन दिन पर आता रहता है यहां...फिर बोली एक आदमी का पांच सौ रुपये लेता है...मैं...मैंने...मैंने पूछा..

वो औरत एक लड़की के बारे में बात कर रही थी। एक आदमी के पांच सौ रुपये लेने वाली लड़की के बारे में, जो हर दो-तीन दिन बाद ऐसे ही अंधेरे जैसे उजाले के वक्त इस वेटिंग रूम में आती थी। उसकी बातों को सुनने के बाद मैं जो समझ रही थी उसे समझना चाहती नहीं थी, इसलिए मैंने उस औरत से पूछा क्या काम करती है वो लड़की...उसने जिस क्रियात्मक तरीके से उसके काम का ब्यौरा दिया वो...मेरे लिए ऐसा था जैसा मैंने बिल्कुल उम्मीद नहीं थी की और...पता नहीं शायद उसके बाद कहने के लिए सवाल बचे थे या पूछने की हिम्मत ही जवाब दे चुकी थी। मैं उसके हर ब्यौरे को झुकलाना चाहती थी.. मैंने औरत से पूछा आपको कैसे पता..कहने लगी ...

मैंने अपनी समझ को नकारने के लिए उस औरत से पूछा- आपको कैसे पता कि वो लड़की क्या काम करती है..वो बोली हमको चाय पिलाती है..दिल की बहुत साफ है, खुद बताया उसने...सिर्फ एक घर है यहां, बाप नहीं है...एक भाई है जो कुछ काम नहीं कर सकता बीमार रहता है..घर का खर्च चलाने के लिए धंधे का काम करने लगी है। हमको बताती है रोती भी है। मजबूरी में करती है। पर ऐसा करना नहीं चाहिए हम भी तो यहां रात भर ड्यूटी देता है फिर सुबह फैक्ट्री में भी काम करता है, शरीर ही जो बेच दिया तो फिर क्या बाकी रहा..करना नहीं चाहिए...पर बेचारा मजबूरी में करने लगी होगी...मैं सुनने से पहले ही समझ चुकी थी ये बात और अब दोबारा सुनने के बाद अपने कानों की सन्नाहट में गरम सरसों का तेल डाल लेना चाहती थी...अब उजाले ने अंधेरे को हटाकर अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी लेकिन मैं अपनी जगह पर सुन्न हो चुकी थी...
बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई, अब भी जैसे अंधेरे की चादर में उजाला पैबंद की तरह था, मैं यहां से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। ये अलग बात है कि अब वो जगह उस तरह महफूज नहीं लग रही थी जैसा सोचकर मैं वहां रुक गई थी। उस औरत के पास बताने के लिए अभी कुछ और भी बाकी थी...बोली हम तो बेटा यहां बहुत लड़कियों की जिंदगी बचाया है। कई दफा भाग-भाग कर आ जाती हैं किसी लड़का-वड़का के साथ। हम प्यार से नाम और घर का पूछता है। इतलाह भी कर देता है मां-बाप को उनके। कई को घर भी पहुंचवाया। अब उनके मां-बाप पैर छूकर जाता है हमारे। मैं सोच रही थी कि एक बस स्टैंड के वेटिंग रूम में मैं वेट कर रही हूं या जिंदगी के कई गहरे रंग मेरा वेट कर रहे थे...और जैसे आते ही बिखरने लगे..एक एक करके ..मैं सिमटती जा रही थी वो रंग बिखरते ही जा रहे थे...
अब वो औरत अपनी जगह पर जाकर बैठ चुकी थी। मैं अपनी जगह पर सीधे होकर बैठ गयी थी। सामान सीधा कर दिया और वहां से बाहर निकलने को तैयार होने लगी। रोका उस औरत ने, कहने लगी अभी बैठ जाओ, इतना उजाला नहीं हुआ सात-एक बजे तक निकलना, कुछ ठीक नहीं है माहौल का...मैंने उसकी बात को अनसुना कर दिया। मैं बाहर निकल आई। धीरे-धीरे बस स्टैंड से बाहर निकलने लगी। एक-एक कदम के साथ सवालों का एक-एक कांबोपैक था। अब मुझे अंधेरे और उजाले के फर्क की परवाह नहीं थी। मैं ऑटो में बैठ गई थी, लेकिन मैं स्तब्ध थी।

दुनिया में वेश्याएं होती हैं, जनरल नॉलेज की तरह मैं ये बात जानती थी, मानना नहीं चाहती थी। मुझे ये मिथकीय चरित्र लगते थे। मैं कभी नहीं मान पाती थी कि एक औऱत अपना शरीर बेच सकती है, पैसों के लिए। लेकिन इस दफा मैंने सच में उस लड़की को देखा था जो अपना शरीर बेचकर आ रही थी। मैं स्तब्ध न होती अगर वो लड़की अपना सामान लेने वापस उस वेटिंग रूम में न आई होती और मैंने उसे अपनी आंखों से न देखा होता, अगर मेरे मन के मिथकीय चरित्र से परदा न हटा होता... जींस-टीशर्ट पहने बेहद शरीफ घर की दिख रही थी वो लड़की। कोई लीपापोती नहीं थी उसके चेहरे पर। जैसे नाक की सीध में दो दिशाओं में बंटा था उसका चेहरा नाक की सीधी तरफ मासूमियत और बांयी तरफ मजबूरी...इशारा करके बताया उस औरत ने यही है वो लड़की...। उसकी बॉडी लैंग्वेज में कहीं से ये नहीं झलक रहा था कि वो एक ऐसा काम करती है जिसे सोचना भी....।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

बारिश, धरती, आसमान मैं और तुम ..मेरे प्रिये

(एक ऐसे समाज में जहाँ लड़के नौकरी करने वाली लड़कियां ढून्ढ रहे है
और लड़कियों का अपने कर्रिएर के लिए शादी बच्चे यहाँ तक कि कई बार प्रेम को भी दरकिनार कर देना आम हो गया है
ये कविता उस औरत कि बात को बयाँ करने के लिए है जो अपने पति से बहुत प्यार करती है और .... उसके प्यार के साथ ही अपने सपनो को सतरंगी बनाना चाहती है जो इक्कीसवी सदी में रहकर भी सिर्फ अपने लिए नही जी रही...अपनों के लिए जी रही है
ये उसका नारीत्व भी हो सकता है और उसकी आदत भी जिसे वो आज के आधुनिक युग में justify  कर पाती है )




आज फिर आई बारिश
दरवाजे पर हुई जोरों से आवाज
बहुत दिनों बाद अनमनी सी नींद
जल्दी खुल गई आज
मगर मैंने दरवाजा नही खोला
नही देखा बाहर
झांककर
किस तरह पेड़ हरे भरे हो गए है
बूंदों का स्पर्श पाकर
किस तरह हवा के सर्द झोंकों से
पंछी घोंसलों में अलिगनबद हो गए है
किस तरह धरती भीग रही है
चुपचाप एक शांत अहसास के साथ
अहसास जो कह रहा है
कि दूरिया हमेशा फासले नही होते
और नजदीकियां हमेशा करीब होने का प्रमाण पत्र नही दे सकती
जब आसमान धरती को ये अहसास दे सकता है
जब बूंदे पत्तो को चूम सकती है
पंछी आजाद गगन को छोड़ अपने घरोंदे  में
रम सकते है
तो तुम क्यों नही हो सकते मेरे सबसे करीब
हमेशा नजरों के सामने होकर भी
क्यों मैं हमेशा कहती हूँ तुमसे आधी बात
और छुपा लेती हूँ आधी
बताने की चाहत रखते हुए भी
क्यों मुझे लगता है कि मेरे जीवनसाथी
तुम नही समझोगे इस बात को
सुनोगे तो नही दोगे फिर मेरा साथ
तुम रूठ जाओगे मुझसे
मन्वाओगे अपनी जिद
थोप दोगे अपना निर्णय
चादर, परदे बच्चों का स्कूल सब कुछ तुम कहते गए
मैं रजामंद होती गई
मेरी पसंद का सवाल ही नही उठा
मैं खो गई तुम्हारी दलीलों
और दुनिया  की मुझसे जयादा समझ होने के तर्क में
मगर मेरे प्रिये अब जब मैं
फिर से रंगना चाहती हूँ अपनी
जिंदगी को अपने रंग में
वो रंग
जिस पर तुम्हारे प्यार की छाया
और मेरी उम्र की धूप ने
डाल दिया था पर्दा
तो दिल से तुम्हे बताकर
तुम्हारी तस्वीर से ढेरों बातें करके
अपनी आखों से तुमसे सबकुछ कहकर
और होठों को सीकर
भर दिया है नौकरी के लिए आवेदन पत्र
इस उम्मीद के साथ की तुम इसे सिर्फ मेरा नही समझोगे
हमारा समझ कर स्वीकार करोगे
और तुम्हारी सहमति के साथ मैं
महसूस कर सकूंगी
आसमान और धरा की दूरियों के बीच पनपते
हमेशा करीब होने के अहसास को
और
पी सकूंगी तुम्हारे प्यार की
वो बूँद जिसका मैंने  चातक की तरह
इन्तजार किया है
हर सावन को स्वाति नक्षत्र  मानकर

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

खोल दो (पुरस्कृत कविता)


खोल दो का आग्रह
फिर मेरे सामने  है
क्योंकि अब वो मुझे
अपनी जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं
मेरी उड़ान मंजूर है उन्हें
मगर वो उसकी दिशा बदलना चाहते है
मेरी आहटों का जिक्र भी भाता है उन्हें
और मेरे कदम बढ़ाने पर भी वो ऐतराज जताते है
उनकी मीठी सी बातों में एक तीखा सा पन है
छलकती सी आँखें छल का दर्पण है
सब कुछ छिपा कर जाने क्या बताना चाहते हैं
मेरे जवान दिल में बैठे बचपने को
वो हर रोज बहकाना चाहते है
मेरी बातों की तफसील से मतलब नहीं उन्हें
मेरे बदन की तासीर को आजमाना चाहते हैं
जो नाम हिमानी है
उसमे वो क्या आग जलाएंगे
बर्फ की इस नदी को कितना पिघलायेंगे
बारिश तो ठीक है मगर
बाढ़ का कहर क्या वो सह पाएंगे
सवाल उनके भी हैं सवाल मेरे भी
मैं विश्वास करने में यकीं रखती हूँ
उनके सवालों में है शक के घेरे भी
देखें अब हम
भाग खड़े होंगे वो
या इन हालातों को सुलझाएंगे???


सोमवार, 12 जुलाई 2010

एक अभागी लड़की ....(पुरस्कृत कविता)



बच्ची से बड़ी होती है वो
सीखती है घर के काम-काज
रोटियां बेलना
तवे पे डालना
तरकारी छीलना
पकाना 
अक्सर
ऊँगली जल जाती है
कट जाती है
पर बात
आग और चाकू से आगे  निकलकर
उसके ग्रहों की चाल पर चल जाती है

छत पर सूखते कपड़ों में
जब सब लत्ते रहते है अपनी जगह पर
और बस उसकी ही चुनरी उड़ जाती है
तो बात हवा के झोंको और तेज आंधी
को छोड
उसके  नसीब के पन्नो को पलट आती है

वो भी बढाती है  कदम आगे
फांसला  कम भी हो जाता है मंजिलों का
मगर जब उसके  ही रस्ते में हरे भरे बूढ़े हो चुके
किसी पेड़ की शाख गिर जाती है तो
ये बात किसी प्रख्यात  पंडित 
तक पहुँच जाती है

सोलह, सात और एक सौ आठ 
हर संख्या के उपवास रख चुकी है वो 
अपनी पहुँच से पैर बाहर निकालकर 
न जाने कितने मंदिरों की सीडियां 
चढ़ चुकी है वो 
मगर जब उसकी ही मन्नत अधूरी रह जाती है 
तो बात भगवान् के कच्चे कानो का नजर अंदाज  कर 
उसके कर्मों को कोस आती है

मौसम  बदलते है हर बरस
मगर जब पतझड़ ही बस
उसके  आँगन में रुक जाता है तो
बात मौसम से बदलकर
 मुक़दर की तरफ मुड़ जाती है

फिर जब कभी किसी  दिन सखियों के बीच
जिक्र  होता है
उसकी प्रेम कहानी का तो
दिल की देहलीज से निकलकर
बात  उसके हाथ की लकीरों तक पहुँच जाती है

एक लड़की 
जब लड़की होने के साथ 
एक अभागी लड़की बन जाती है 
तब जिंदगी के सारे धागों में जैसे कोई 
गिरह  पड़
जाती है........
न कोई अदालत 

न वकील 
न सबूत 
न गवाह
मुक़द्दर के इस मुक़दमे की सुनवाई 
में हर बार होता है एक एतिहासिक फैंसला 
और फिर
जीते जी मरने की सजा सुनाई जाती है


सोमवार, 17 मई 2010

कुछ सवाल - स्त्री ( मुक्ति या मौत )


कुछ दिन पहले मोबाइल पर एक एस ऍम एस आया ...


एक लड़की बस स्टॉप पर खड़ी थी


तभी वहां एक आदमी आया और बोला


ऐ चलती है क्या नौ से बारह


लड़की ने पलटकर देखा


और कहा


पापा


मैं


हूँ


मेरे छोटे भाई-बहिन जो इस सन्देश कि गहराई को भांप नहीं सके उन्हें इस पर हंसी आ गई ..लेकिन मेरे सामने एक गंभीर द्रश्य अंकित हो गया ..जिसने कई परतो को पलटना शुरू कर दिया.


उनमे से एक समसामयिक परत है निरुपमा कि मौत का मामला ....ये मौत हत्या है या आत्महत्या इसकी गुथी हर मामले कि तरह न जाने कब तक सुलझेगी लेकिन कुछ उलझाने वाले सवाल ये है कि अगर सच मुच में निरुपमा की हत्या की गई है तो उसकी मुख्य वजह क्या है ......एक दूसरी जाति के लड़के से सम्बन्ध या फिर उसका बिन ब्याहे माँ बनना .......इस सवाल का जवाब तो हत्या करने वाले को ही ठीक ठीक मालूम होगा.लेकिन अगर ये हत्या है तो इसे सिर्फ निरुपमा की


हत्या नहीं माना जाना चाहिए ...हर उस लड़की के लिए मौत का एक प्रस्ताव पेश करने वाली इस घटना पर अलोक धन्वा के ये शब्द काफी कुछ कह जाने में मदद करते है ................. सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है / तुम्हारे टैंक जैसे बन्द और मज़बूत / घर से बाहर / लड़कियाँ काफ़ी बदल चुकी हैं / मैं तुम्हें यह इजाज़त नहीं दूँगा / कि तुम अब / उनकी सम्भावना की भी तस्करी करो / वह कहीं भी हो सकती है / गिर सकती है / बिखर सकती है / लेकिन वह खुद शमिल होगी सब में / ग़लतियाँ भी ख़ुद ही करेगी / सब कुछ देखेगी / शुरू से अन्त तक / अपना अन्त भी देखती हुई जायेगी / किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी.


मेरा ये सब लिखना लड़कियों के घर से भागने को सही ठहराने के लिए नहीं है ...बल्कि अभिभावकों के संक्रिन और अड़ीयाल रविये को गलत बताने के लिए है ....क्योंकि घर से भागने की वजह कहीं न कहीं घर से मिलने वाले प्यार और सहयोग की कमी भी है ....


दूसरी बात जो इस घटना से उठी है उसमे स्त्री मुक्ति से जुड़े कुछ सवाल उठ खड़े हुए है .....आधुनिक संसाधनों का भरपूर प्रयोग करने वाले प्रहरी निरुपमा के PREGNANAT होने की खबर सुनकर ये प्रश्न उठा रहे है क़ि उसके जैसी पढ़ी-लिखी लड़की को क्या गर्भ निरोधक के बारे में जानकारी नहीं थी ....अगर वेह उनका इस्तेमाल करती तो शायद उसकी ये नियति न होती ................जाने माने लेखक और विचारक राज किशोर जी का ताजतार्रिन लेख अखबार में पढ़ा तो स्त्री मुक्ति का ये प्रश्न और भी गहरा गया ....जादुई गोली के पचास साल ...यहाँ वो जादुई गोली का इस्तेमाल गर्भनिरोधक गोली के लिए कर रहे है ....वेह कहते है ...इस गोली ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकर्तिक जंजीर से मुक्ति दी है ..अगर ये गोली न होती तो यौन क्रांति भी न होती . यौन क्रांति न होती तो स्त्री स्वंत्रता के आयाम भी बहुत सिमित रह जाते ..इस गोली ने एक महतवपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है क़ि यौन समागम कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है ...यह वैसा ही है जैसा एक मानव व्यवहार है जैसे खाना, पीना या चलना-फिरना ........


अगर बिना कोई तर्क किये इन शब्दों पर सहमति क़ि मोहर लगा दी जाति है तो स्त्री विमर्श के लिए उठने वाले सभी सवाल खुद ही ढेर ही जायेंगे .....................लेकिन क्या ये इतना आसान होगा भावनात्मक और प्रयोगात्मक दोनों सूरतों में क्या शब्दों क़ि ये आजादी समाज में अकार ले सकती है ...................ये बेहद पेचीदा प्रश्न है. सम्भोग अगर आजादी है तो ये समाज उसे कब क्या नाम देगा इसक़ि आजादी वो हमेशा से लेता आया है ......यूँ तो पत्नी ...नहीं तो प्रेमिका ........और वर्ना वेश्या





गुरुवार, 6 मई 2010

पतंग से जुडी जिंदगी की डोर


शादी को लेकर दुनिया भर में तमाम विचार प्रचलित है. दार्शनिक या  विचारक हो या फिर हर शक्स की निजी सोच ...शादी से जुड़े विचार की गहराई में उतरना आसान नही लगता. कही सोच ..अनुभव को बदल देती है तो कही अनुभव... सोच को. इन तमाम उहापोहो के बीच एक सर्वमान्य   सच ये  है की शादी दो लोगो के बीच का एक सम्बन्ध है जो जीवन भर के लिए जोड़ा जाता है. हाल ही में उठे विवाद हो या सदीओ पुराने अत्याचारों की दस्ता इनकी जड़ में जो बात खाद पानी की तरह डाली जा रही है  उसके मूल विचार में कई बातों की घाल मेल है 
शादी समान जाति-धर्म  के लोगो में हो ....समान गोत्र न हो....बिरादरी ऊँची हो....बहुत आगे जाये तो लड़की गोरी और सुन्दर हो ...कद-काठी छोटी न हो ..और न जाने क्या-क्या....उत्सव की तरह मनाये जाने वाले शादी नाम के इस पर्व में न जाने कितनी भावनाओं की बलि चढ़ाई जाति जा रही है ...और यहाँ बीते दिनों बात वास्तविक बलि तक पहुँच गई है ....दिल्ली की पत्रकार निरुपमा  की हत्या हो या ऐसे ही कितने दबे पड़े केस....बिना मतलब के मुगालतों ने मौत को आखिरी मंजर बना दिया है ....और अगर अब ये सवाल या विचार उठाये की लोगों में जागरूकता नहीं है या लोग पढ़े लिखे नहीं है तो ये बाते बेहद बेमानी लगती है ...भले चंगे ऊँचे खानदानो के पढ़े लिखे लोग भी अपने तथाकथित सम्मान के लिए अपने बच्चों के साथ जिंदगी और मौत की जद्दोजह्दा को अंजाम देने में गुरेज नहीं करते.
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लड़कियां भाग कर शादी कर रही है ..छुप-छुप कर अपने चाहने वालों से मिल रही है और फिर बात एक बगावत तक पहुँच कर जिंदगी से जिंदगी को बाहर कर रही है .....ये क्या है ....कैसी परवरिश है ये जो प्यार को एक विद्रोह के रूप में सामने ला रही है .........बहुत कुछ कहना लाज़मी नहीं है यहाँ अगर इस बात पर गौर किया जाये कि पतंग को पकड़ कर खीचने से वो टूट जाती है ...उस्क्ली डोर अपने हाथ में पकड़कर उड़ने कि आज़ादी दी जाये तो वो मंजिल तक भी पहुंचेगी और जीत भी आपकी ही होगी ....ये किस्सा महज पतंग का नहीं जिंदगी के कई अफ़साने जुड़ते है इस हकीकत से ......

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

लड़किया प्रेम में

ये कविता मैंने कहीं पर पढ़ी थी न जाने क्यो बहुत सच्ची लगी आप के लिए पोस्ट कर रही हूँ शायद आपको भी ऐसा ही कुछ अनुभव हो

लड़किया जब प्रेम करती है
तो वो खिला पाती है हर मौसम
तब वो चुपके से उत्तर जाती है
खुश्बूयों की किसी नदी में
या फ़िर पर्वतों की हथेलियोमे चमचमाती
किसी झील में तारती रहती है देर तक
उन्हें लगता है धरती और आसमान के
बिच जो इन्देर्धनुष खिलता है
वो उन्ही का प्रतिबिम्ब है
लड़किया अपने भीतर जगे उस मौसम के वशीभूत
लिखती है लंबे लंबे ख़त वों जानती है
सबकी नजरो से बचाकर लिखा गया
ये ख़त जब पहुंचेगा गंतव्य तक
तब स्वर्ग में बैठे देवता
उनकी राह में एक और फूल रख देंगे
लड़किया मानती है उनके प्रेमी
आएंगे उनकी उंगली थामने
प्रलय और झंझावातों के बीच भी
लड़किया जो आकंठ डूबी है प्रेम में
वो नही जानती कि विदा भी होते है मौसम

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...