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गुरुवार, 14 मार्च 2013

11 मिनट और बेइंतहा मोहब्बत के अनंत पल

“प्यार”
को जिंदगी में कितनी जगह दे पाई हूं, ये तो मैं खुद भी नहीं जानती। लेकिन बातों में प्यार का मुद्दा अक्सर शामिल रहता है। एक दिन यूं ही जब प्यार बातों के बीच आया (ये भी कह सकती हूं कि प्यार के बीच में बातों को लाया गया) ,,,,, तब एक किताब का नाम सामने आया, “11 मिनट्स”।


दुनिया भर में मशहूर ब्राजील के लेखक पाओलो कोहेलो की सच्ची घटना पर लिखी गई एक किताब।
अल्केमिस्ट को पढ़ने के बाद पाओलो कोहेलो की शैली से ठीक-ठाक जान-पहचान हो गई थी। फिर भी इस किताब को सुनते ही, ढूंढने, खरीदने और जल्द से जल्द पूरा करने की वजह थी, वो एक लाइन जो इस किताब का जिक्र करते हुए मुझे बताई गई-
“ये एक लड़की की कहानी है, जो वेश्या बन जाती है (साथ में परिस्थितिवश लिखना जरूरी नहीं लगा, क्योंकि शौक से शायद ही कोई लड़की वेश्या बनना चाहती होगी) लेकिन जिदंगी में कई लोगों से शारीरिक संबंध बनाने के बाद भी उसे वह सुख और संतुष्टि नहीं मिल पाती, जो एक चित्रकार से प्यार करके उसके बिना छुए मिल जाती है।“


सुनने में यह काफी दिलचस्प और रहस्यमयी लगता है और खास बात ये है कि पढ़ने के बाद भी यह कहानी उतनी ही दिलचस्प और रहस्यमयी है। इसमें एक लड़की मारिया का बचपन है। उसका पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा और ....... वां प्यार है। उसके सपने हैं। उसकी एडवेंचर की दुनिया है। उसकी किताबें हैं। उसकी डायरी है। उसका अकेलापन है और फिर एक ऐसा सफर है, जिसमें उसे वेश्या बनना पड़ता है। इसी सफर में आने वाले उतार-चढ़ाव और ज्वार भाटे को मारिया अपनी डायरी में दर्ज करती है। उसी डायरी से कुछ बातें ---


“सबसे दिलचस्प लोग आखिरकार साथ छोड़ ही जाते हैं।“

“प्यार एक खतरनाक वस्तु का नाम है।“

“इलाज, दर्द से भी अधिक पीड़ादायक है।“

“जब हम किसी से मिलते हैं और उसे चाहने लगते हैं, तो लगता है जैसे सारी कायनात हमारे साथ है। आज सूरज डूबते वक्त मैंने ऐसा ही कुछ देखा।
और अगर कहीं कुछ गड़बड़ हो जाए तो फिर कुछ भी बाकी नहीं रहता। न कोई पंछी, न दूर से आती संगीत की आवाज और न ही उसके होंठों का स्वाद। ऐसा कैसे संभव है कि जो खूबसूरती कुछ पल पहले थी, अचानक गायब हो जाए... “

“हर चीज मुझे यह अहसास दिला रही है कि जो निर्णय मैं लेने जा रही हूं वह सही नहीं है, लेकिन गलतियां करना तो जिंदगी का हिस्सा है। यह दुनिया पता नहीं मुझसे क्या चाहती है। क्या यह चाहती है कि मैं कोई जोखिम न उठाऊं और वहीं लौट जाऊं, जहां से आई हूं केवल इसलिए कि जिंदगी को हां कह देने की मुझमे हिम्मत नहीं है।“

“मैंने जिंदगी में, उन चीजों को अस्वीकृत करने में बहुत समय गंवा दिया था, जिन्हें मैं हां कहना चाहती थी।“

‘’मैं तुमसे प्यार करता हूं’’ ...हालांकि यह शब्द उसने अपनी 22 बरस की उम्र में कई बार सुने थे, और उसे लगता था कि इन शब्दों के पीछे सिर्फ खोखलापन है, क्योंकि इन शब्दों में उसे कभी गंभीरता या गहराई का आभास नहीं हुआ, ये शब्द कभी किसी अटूट रिश्ते में नही बदले।“

“सभी को एक जैसी चीजों की तलाश थी।“

“वो नियति की शिकार नहीं थी, वो अपने आप से यही कहती रही, वो अपने जोखिम खुद उठा रही थी, अपनी हद से गुजर रही थी। ऐसी चीजों का अनुभव कर रही थी, जिन्हें किसी रोज, अपने मन की खामोशी में बुढ़ापे की उकताहट के समय वो भावुक होकर याद कर लिया करेगी-बात इस समय चाहे कितनी भी बेहूदा लग रही हो।“

“क्या स्कूल में सिखाई गई बातों से दुनिया इतनी अलग थी।“

“कुछ लोग जिंदगी का सामना अकेले ही करने के लिए जन्म लेते हैं और इसमें अच्छाई और बुराई जैसी कोई बात नहीं है, यह तो बस जिदंगी है। मारिया ऐसे ही लोगों में से एक थी।“

“जिदंगी उसे सिखा रही थी बहुत तेजी से, कि सिर्फ ताकतवर ही जिंदा रहते हैं। ताकतवर होने के लिए उसे श्रेष्ठ बनना पड़ेगा, दूसरा कोई विकल्प नहीं था।“

“सभ्यता के साथ कुछ तो बहुत बड़ी गड़बड़ थी। यह अमेजन के वर्षा वनों का विनाश या ओजोन परत या पांडा, सिगरेट, घातक खाद्य पदार्थ या जल के हालातों की बात नहीं थी, इन विषयों को तो अखबार उठाते थे।“

“मनुष्य पानी के बिना एक सप्ताह रह सकता है, खाने के बिना दो सप्ताह और घर के बिना तो शायद बरसों, मगर अकेलेपन के साथ नहीं, यह सबसे भयानक यंत्रणा है, सबसे बुरी तकलीफ।“

“प्यार के प्रलोभन से बचने के लिए उसने अपना दिल अपनी डायरी के नाम कर दिया।“

“प्यार किसी प्रकार की स्वेच्छा से स्वीकार की गई दासता है। पर यह सच नहीं है। स्वतंत्रता का अस्तित्व तभी है, जब प्यार की उपस्थिति हो। जो व्यक्ति को खुद को पूरी तरह दे देता है, जिसे सम्पूर्ण स्वतंत्रता का अहसास होता है, वही व्यक्ति भरपूर प्यार दे सकता है।“

“एक ऐसे मर्द की तलाश जो मुझे समझ तो सकेगा, लेकिन मुझे तकलीफ नहीं देगा।“

“मुझे बेहद तकलीफ हुई थी जब एक-एक करके मैंने उन मर्दों को खो दिया, जिन्हें मैंने प्यार किया था। अब हालांकि मुझे यकीन हो गया था कि कोई किसी को नहीं खोता क्योंकि कोई किसी का स्वामी नहीं होता।

स्वतंत्रता का यही सच्चा अनुभव है- संसार की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु का अपने पास होते हुए भी उसका मालिक न होना।“

“वो जो करती उसका उचित कारण देने की कोशिश करती, वो उस समय हिम्मत करने का बहाना करती जब वो कमजोर होती थी या जब हिम्मत से भरी होती तो कमजोर दिखने का प्रयत्न करती थी।“

मारिया अपने बारे में रैल्फ(चित्रकार) को बताते हुए
“मैं दरअसल एक नहीं, तीन हूं, सच कह रही हूं-यह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं किसके साथ हूं। एक तो मासूम लड़की है, जो मर्दों की शौर्य गाथाओं को सुनकर मंत्रमुग्ध हो उन्हें सराहनीय नजरों से देखने का बहाना करती है। फिर दूसरी एक कातिल हसीना, जो किसी को जरा भी असुरक्षित पाती है तो उस पर झपट पड़ती है और ऐसा करते ही वो स्थिति का नियंत्रण करने के साथ सामने वाले को उत्तरदायित्व से मुक्त कर देती है, क्योंकि फिर उन्हें किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। और आखिरकार मैं एक समझदार मां हूं, जो दूसरों की जरूरत के मुताबिक उन्हें राय देती है, जो सब कहानियों को तन्मयता से सुनती है और उन्हें एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर निकाल देती है। इन तीनों में से तुम किससे मिलना चाहोगे.. “
“तुमसे“

“मैं यह मानना चाहूंगी कि मुझे प्यार हो गया है। एक ऐसे व्यक्ति के साथ जिसे मैं नहीं जानती और जो कभी मेरी योजनाओं का हिस्सा नहीं था। आत्मनियंत्रण और प्यार से दूर भागते रहने के इतने महीनों बाद भी मुझे बिल्कुल विपरीत परिणाम मिला, मुझसे थोड़ा अलग सा व्यवहार करने वाले पहले व्यक्ति पर मैंने अपना दिल लुटा दिया।“

“यह दुनिया जिस तरह की है उसमें एक प्रसन्नता भरा दिन, एक चमत्कार ही तो है।“

रैल्फ ने जब मारिया से कहा-
“मैं तुम्हें हर उस रूप में चाहता हूं जिसमें तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें चाहूं।“
तब मारिया की डायरी से
“नहीं वो ऐसा नहीं कह सकता, क्योंकि ठीक यही बात तो वो सुनना चाहती थी। वो भूकंप, वो ज्वालामुखी, वो तूफान लौट आए। उसे अपने ही जाल से निकल पाना असंभव प्रतीत होने लगा था, वो इस आदमी को वास्तव में पाने से पहले ही खो देने वाली थी।“

मारिया, रैल्फ को उपहार देते हुए
“तुम्हारे पसंद की कोई खरीदकर तुम्हें देने की जगह, मैं तुम्हें वो वस्तु दे रही हूं जो मेरी है, सचमुच मेरी। उपहार।“
उपहार देना। अपना कुछ किसी को देना। मांगने के स्थान पर कुछ ऐसा देना जो अपने लिए महत्वपूर्ण हो। तुम्हारे पास मेरा खजाना है, वो पेन जिससे मैंने अपने कुछ सपनों को कागज पर उतारा। मेरे पास तुम्हारा खजाना है, रेलगाड़ी का डिब्बा, तुम्हारे उस बचपन का हिस्सा, जिसे तुम जी नहीं पाए।
मेरे साथ तुम्हारे अतीत का हिस्सा है और तुम्हारे पास मेरा एक छोटा सा उपहार कितनी सुंदर बात है न।“

“मैं जान गई हूं कि प्रतीक्षा करना बहुत कठिन होता है और मैं इस अहसास की आदत डालना चाहती हूं, यह जानते हुए कि तुम मेरे साथ तब भी हो जब तुम मेरे साथ नहीं हो।“

“गहरी इच्छा और सच्ची इच्छा है किसी के पास होने की इच्छा। पर इसके आगे सब बदल जाता है. मर्द और औरत सामने आ जाते हैं पर इससे पहले क्या होता है-जो आकर्षण दोनों को पास लेकर आया-उसे समझा पाना असंभव है, वर्तमान स्थिति में वो एक अनछुई इच्छा है।जब इच्छा अपनी इस शुद्ध अवस्था में होती है, तब औरत और मर्द को जिदंगी से प्यार हो जाता है। वो हर पल, श्रद्धापूर्वक सचेत रहकर जीते हैं और सदैव अगले पल के आर्शीवाद का उत्सव मनाते हैं।“

“सबसे महत्वपूर्ण अनुभव किसी व्यक्ति के लिए वो होता है जो उसे उसकी हद तक ले जाए। इसी एकमात्र तरीके से हम सीखते हैं, क्योंकि इसके लिए हमें अपनी सारी हिम्मत जुटानी पड़ती है।“



“मैं एक ही शरीर में दो औरते हूं-
एक जो उन सारी खुशियों, जुनूनों और साहसिक अनुभवों को जी लेना चाहती है, जो जिंदगी मुझे दे सकती है। दूसरी औरत नित्य के नियमों, पारिवारिक जीवन और उन चीजों की जिन्हें योजना के साथ पाया जा सकता है, सबकी गुलामी करना चाहती है।
इन दो औरतों का मिलन, गंभीर खतरों से भरा एक खेल है।“

“कुछ तकलीफें ऐसी होती हैं, जिन्हें तभी भुलाया जा सकता है जब हम अपने दर्द से ऊपर उठने मैं सफल हो सकें।“

क्या एक सिपाही युद्ध में दुश्मन को मारने जाता है?
“नहीं, वह जाता है अपने देश पर मर मिटने के लिए।

क्या एक पत्नी अपने पति को यह दिखाना चाहती है कि वो कितनी खुश है?
नहीं, वो चाहती है कि उसका पति देख सके कि वो कितनी समर्पित है. उसे खुश रखने के लिए वो कितनी तकलीफें उठा रही है।

क्या एक पति काम पर इसलिए जाता है कि वहां उसे निजी पूर्णता मिल जाएगी?
नहीं, वो अपना खून पसीना अपने परिवार की भलाई के लिए बहाता है।

यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहता है। कुछ लोग अपने मां-बाप की खुशी के लिए अपने सपने भुला देते हैं, मां-बाप, बच्चों को खुशहाल रखने के लिए अपना जीवन लगा देते हैं। दर्द और तकलीफ का उपयोग केवल एक वस्तु को सत्य ठहराने के लिए होता है,
जिससे हमें केवल आनंद ही मिलना चाहिए-प्रेम।


“कुछ चीजें बांटी नहीं जा सकती। ना ही हमें उन सागरों से भय लग सकता है, जिनमें हम अपनी स्वेच्छा से डूबना चाहें, डर हर किसी की शैली को संकुचित कर देता है, यह समझने के लिए मनुष्य न जाने कितने नरक झेलता है। एक दूसरे से प्यार तो करें, परंतु हम एक दूसरे को पाने की कोशिश कभी न करें। “

“पैसा एक विशेष कागज का टुकडा, रंग-बिरंगी आकृतियों से सजा हुआ। सबके अनुसार जिसकी कोई न कोई कीमत थी। वह इस बात को मानती, सब मानते थे। जब तक कि आप ऐसे ही कागज के टुकड़ों का बड़ा सा ढेर लेकर किसी सम्मानित, परंपरागत, बहुत ही गोपनीय स्विस बैंक मैं जाकर कहें, क्या मैं इनसे अपने जीवन के कुछ क्षण वापस खरीद सकती हूं,
नहीं मैडम हम बेचते नहीं, केवल खरीदते हैं।“

“शायद यही कारण था कि वे एक-दूसरे से प्यार करते थे क्योंकि वे जानते थे कि उन्हें एक दूसरे की आवश्यकता नहीं है।“

“आदमी हमेशा डर जाते हैं जब औरत कहती है, मुझे तुम्हारी जरूरत है।“

....

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

शिक्षा फॉर लाइफ या सिर्फ सबक जिंदगी भर के लिए

लस्ट फॉर लाइफ
महान चित्रकार विंसेंट वॉन गॉग के जीवन पर आधारित विश्व प्रसिद्ध उपन्यास
लेखक-इरविंग स्टोन



इस किताब के आखिरी पन्नों को पलटते हुए मैं मन ही मन में कुछ फैसले कर चुकी थी। 

पहला और हास्यास्पद फैसला ये कि अब मैं किताबें नहीं पढ़ूंगी..।
दूसरा ये कि किसी भी बात की गहराई में जाने की कोशिश नहीं करुंगी।
तीसरा ये कि बार-बार अपने लिखे को सुधारने और एक अद्भुत, अकल्पनीय या उस उपमा वाला एक शब्द, जिसे अंग्रेजी में मास्टरपीस कहते हैं जैसी कोई कविता या कहानी लिखने की कोशिश भी नहीं करुंगी।

मुझे नहीं पता कि मैं इन फैसलों पर कितना अमल कर पाऊंगी। क्योंकि जो तीन बातें मैंने ऊपर लिखी हैं, मेरी 75 फीसद जिंदगी उन्हीं बातों के इर्द-गिर्द घूमती है। 463 पन्नों वाली इस किताब को मैंने घर से दफ्तर आने-जाने के रास्ते का इस्तेमाल करते हुए पढ़ा। लगभग एक महीने का समय लगा। एक दोस्त की सलाह मानकर मैंने ये किताब पढ़नी शुरू की थी। किताब पूरी पढ़ने के बाद समझ नहीं आ रहा कि ये सलाह मानना सही था या गलत। मेरे सामने दो विकल्प हैं एक है इस किताब से मिलने वाली शिक्षा और दूसरा इसे पढ़ने के बाद मेरे स्वार्थी और डरपोक मन को मिला एक सबक। किसे चुनूं ये दुविधा है। सुविधा ये है कि वक्त अपने विकल्प खुद चुन लेता है इसलिए फैसला उसी पर छोड़ दूं। बहरहाल एक नजर शिक्षा और सबक दोनों पर....


शिक्षा 
एक सच्चे कलाकार को अपनी कला के लिए पूरी जिंदगी दांव पर लगा देनी होती है। जैसा कि विंसेंट वॉन गॉग ने अपनी पूरी जिंदगी अपने भीतर से उस अद्भुत, अकल्पनीय और असल कला को बाहर लाने के लिए देश-देश भटकते हुए बिता दी। ऐसे हालातों का सामना किया जब उनके पास भूखमरी से मर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। ऐसा वक्त भी जब उनके हर एक रिश्तेदार ने उन्हें सिवाय तानों के कुछ नहीं दिया। ऐसा वक्त जब हर देखने वाले ने उन्हें पागल कहकर मुंह मोड़ लिया। 

सबक
अपनी कला के बारे में गंभीर होकर सोचना इंसान को पागल कर देता है और उसे पूरी जिंदगी कुछ नहीं मिलता। मरने के बाद अगर दुनिया किसी को महान बना दे तो फिर...। 


********

इस किताब में लिखी कुछ बातें आपके लिए चुनकर यहां लिख रही हूं....“आप केवल साहस और शक्ति जुटा सकते हैं, वह करने के लिए, जो आप सही समझते हैं। यह गलत भी हो सकता है। ले‌क‌िन आप उसे कर चुके होंगे और यही महत्वपूर्ण है। हमें अपनी बुद्धि के श्रेष्ठ चुनाव के आधार पर काम करते हुए उसके अंतिम मूल्य का फैसला ईश्वर पर छोड़ देना चा‌हिए।“

“प्रेम जीवन का नमक था। जीवन में स्वाद लाने के ‌लिरए हर एक को उसकी जरूरत थी।““रोटी के लायक न बन पाना निस्संदेह एक अपराध है, क्योंकि  हर ईमानदार आदमी अपनी रोटी के लायक होता है। लेकिन उसे न कमा पाना उसके लायक होने के बावजूद एक बड़ा अपराध होता है, बहुत बड़ा।“

“आदमी का व्यवहार काफी कुछ ड्राइंग की तरह होता है। आंख का कोण बदलते ही सारा दृश्य बदल जाता है। यह बदलाव विषय पर नहीं, ब‌ल्क‌ि देखने वाले पर निर्भर करता है। “

“मृत्यु कितनी साधारण चीज होती है, शरद में गिरती हुई एक पत्ती जैसी।“
‌“जिंदगी एक अनंत खाली और हतोत्सा‌हित कर देने वाली निगाह से हमें घूरती रहती है, जैसे यह कैनवस करता है। ““अक्सर यातना ही किसी भी कलाकार की रचना को सबसे मुखर बनाती है।“

“आदमी प्रकृति का पीछा करने की हताश मशक्कत से शुरू करता है और सब कुछ गलत होता जाता है। अंततः आदमी अपने रंग खोज लेता है और सहमत होकर प्रकृति उसके पीछे आने लगती है।“


“मानवीय दिमाग दो तरह की बातें सोचता है छाया और रोशनी, मीठा और खट्टा,अच्छा और बुरा, प्रकृति में इन दोनों चीजों का असितत्व नहीं होता। दुनिया में न अच्छाई है न बुराई केवल होना है और करना। जब एक क्रिया का हम वर्णन करते हैं तो हम जीवन का वर्णन कर रहे होते हैं। जब हम उस क्रिया को कोई नाम दे देते हैं जैसे अश्लीलता तो हम व्यक्तिगत द्वेष की तरफ बढ़ रहे होते हैं।“

“आदमी या तो पेंटिंग कर सकता है या पेंटिंग के बारे में बात। वह इकट्ठे
दोनों काम नहीं कर सकता।“



“साधारण होना कितना मुश्किल है।“

“मेरा काम...मैंने अपनी जिंदगी दांव पर लगाई उसके लिए...और मेरा दिमाग करीब-करीब भटक चुका है।“


*********

- ईश्ववर के बारे में

 “मैं ईश्वर के बारे में बहुत सोचा करता हूं। वह जैसे बीतते सालों के साथ फीका पड़ता गया है। मुझे लगता है कि हमें इस दुनिया में ईश्वर के बारे में कोई फैसला नहीं करना चाहिए। यह ऐसा चित्र था, जिसे वह बना नहीं पाया। अगर आप कलाकार को पसंद करते हैं तो उसके खराब चित्र के लिए क्या कर सकते हैं। आप आलोचना नहीं करते, अपनी जुबान रोक लेते हैं। पर आपको बेहतर चीज की मांग करने का अधिकार है। हमें फैसला करने से पहले उसकी बनी बाकी चीजों को भी देखना चाहिए। दुनिया को शायद एक बुरे दिन बनाया गया। जब ईश्वर को सारी चीजें साफ नजर नहीं आ रही थी।“


-वेश्याओं के बारे में 


“मैं किसानों के चित्र बनाता हूं। इन चित्रों को देखकर मुझे लग रहा है
जैसे ये भी किसान हैं। देह की खेती करने वाली, धरती और देह एक ही तत्व के दो अलग-अलग रूप हैं, है ना और ये औरते मानव देह पर काम करती हैं, जिस पर काम किया जाना चाहिए ताकि उससे जीवन पैदा हो सके।“


- चित्रकारों के लिए

 “चित्रकारों को सीखना चाहिए कि किसी चीज को नहीं बल्कि उसकी मूल प्रकृति को पकड़ने का प्रयास करें। यदि आप एक घोड़े का चित्र बना रहे हैं तो सड़क पर देखा गया कोई घोड़ा नहीं होना चाहिए उसमें। उसकी तसवीर तो कैमरे से भी खींची जा सकती है। हमें उससे आगे जाना चाहिए। घोड़े का चित्र बनाते समय मौश्ये हमें जो चीज पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए वह है प्लेटो का घोड़ापन यानी घोड़े की बाहरी आत्मा। जब हम एक आदमी का चित्र बनाते हैं वह किसी आदमी का चित्र नहीं होना चाहिए जिसकी नाक पर मस्सा है। वह सारे आदमियों
की आत्मा और उनकी मूल प्रकृति का चित्र होना चाहिए।“

-कला के बारे में

 “कला नैतिकता से परे है, जैसे जीवन। मेरे हिसाब से किताबें या चित्र
अश्लील नहीं होते केवल घटिया किताबें और चित्र हो सकते हैं।“



-‌कलाकार की न‌िजी ज‌िंदगी के बारे में

”किसी भी समीक्षक को कलाकार की निजी जिंदगी उघाड़ने का कोई अधिकार नहीं, अगर उसका काम उत्कृष्ट है। कलाकार का काम और उसकी ‌न‌िजी ‌ज‌िंदगी जन्म देती स्त्री और बच्चे की तरह होते हैं। आप बच्चे को देख सकते हैं, पर स्त्री की कमीज उघाड़कर यह तो नहीं देख सकते कि उसमें खून लगा है या नहीं। यह ‌क‌ितना असंवेदनशील होगा।“

- विंसेंट वॉन गॉग, अपनी पेंटिंग के बारे में

”मेरे चित्र का पेट आंतों से भरा हुआ है। इसे देखते ही आप समझ सकते हैं ‌कि  इसके भीतर से टनों खाना गुजर चुका है।“



-विंसेंट वॉन गॉग कला की कीमत के बारे में


“क्या यह मतलब होता है कलाकार होने का-बेचना? मैं समझता था इसका मतलब ब‌िना कुछ पाए लगातार खोजने रहना होता है। मुझे पता है जब मैं कहता हूं मैं कलाकार हूं तो मैं कह रहा होता हूं किे मैं खोज रहा हूं। मैं पूरे ‌द‌िल से मेहनत कर रहा हूं।“


*******


“यह जरूरी है ‌कि एक स्त्री आपके ऊपर बयार की तरह बहे ता‌कि आप पुरुष बन सकें। “

‌-मिशेले की एक लाइन


“ऐसा कैसे ‌क‌िया जा सकता है कित इस धरती पर कोई भी स्त्री अकेली रहती हो।“
- मिशेले का एक वाक्य

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी के लड्डु खाकर पछता रही हूं मैं

इससे पहले भी जब कभी मैंने आजादी के दिन के बारे में कुछ लिखा है तो उन लड्डुओं का जिक्र जरूर किया है जो मैंने पूरे 12 साल हर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर खाएं हैं। बेशक मैं कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें कर लूं मगर एक सामान्य शख्स की तरह कुछ इंसानी कमजोरियां मेरे साथ भी  हैं। लड्डु उन्हीं कमजोरियों में से एक है।
इसलिए शायद पिछले इतने सालों में जब भी मैंने आजादी के सही मायने तलाशने और उनके बारे में संजीदगी से सोचने की कोशिश की तो लड्डु का स्वाद उस पर हावी हो गया। आप सोचेंगे मेरी जिंदगी के 12 साल बीते हुए तो  11 साल का वक्त निकल गया फिर.. 11 साल मैं क्या करती रही..दरअसल मेरी मां टीचर हैं तो मेरा स्कूल खत्म होने के बाद भी घर पर लड्डुओं का आना जारी रहा और इसलिए मुझ पर मेरी कमजोरी का हावी होना भी...
खैर
इस बार मैंने इस पर काबू किया है...बिल्कुल वैसे ही जैसे लड़कियां अपनी दूसरी तमाम कमजोरियों पर काबू करती रहती हैं न जाने कितनी बार....
लड्डु न खाने से पेट में जो स्पेस खाली छूटा है वहां एक सवाल घुड़मुड़-घुड़मुड़ कर रहा है। सवाल ये कि क्या ये दिन सच में इस तरह खुश होने का है कि स्कूलों में लड्डु बांटे जाएं। छतों पर पतंग उड़ाई जाए। फिल्म देखी जाए। बाहर घूमने जाया जाए। धानी और नांरगी रंग के कपड़े पहने जाएं। फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया जाए। रंगारंग कार्यक्रम किए जाएं...?
आज इतने सालों बाद आजादी पर सोचते हुए मैंने अपनी एक कमजोरी को तो पीछे छोड़ दिया है मगर दूसरी फितरत मेरे साथ है और वो है मेरा स्वार्थ। स्वार्थ ये कि यहां मैं पूरे देश या देशवासियों की नहीं सिर्फ अपने लिए आजादी के मायनों की बात करुंगी। जानती हूं कि 65 साल बाद इन बातों का रोना रोकर कुछ हासिल नहीं होगा, लेकिन मैं इतने सालों तक खाए गए लड्डुओं का पश्चाताप करना चाहती हूं।
तो कहानी कुछ इस तरह है कि किताबों और किस्सों से इतर जब मैंने इस बार आजादी को समझा तो देखा कि
इस डिप्लोमेटिक आजादी की वजह से ही आज मेरे पास मेरे गांव का नाम नहीं है। वो गांव जहां शहर की आपाधापी से दूर जाकर कुछ दिन मैं सुस्ता सकूं। कोई जमीन नहीं है जिसके खेतों में मैं गर्मियों की छुट्टी में जाकर लहलहा सकूं। पुरखों की विरासत नहीं है। वो गली कूचे नहीं है जहां मेरे  दादा-परदादा रहे और पले-बढ़े। और जहां जाकर मैं उनके अस्तित्व को महसूस कर सकूं। उन पर किस्से कहानियां औऱ कविताएं लिख सकूं। विभाजन की वो टीस क्या होती है वो इस बार पहली बार मुझे महसूस हुई। शायद कहीं दबी तो पड़ी थी पर लड्डुओं ने उसे उबरने नहीं दिया।
कहां की हो तुम...ये सवाल न जाने कितने सालों से हर वक्त हर मोड़ पर पीछा करता रहता है। ... औऱ मैं कुछ ठीक-ठीक नहीं बता पाती। क्यों..क्योंकि हम मुलतानी हैं। मुलतान के रहने वाले मुलतानी.. इतना कह भर देने से ही मेरे दोस्त मुझे रिफ्यूजी कह कर चिढ़ाने लगते औऱ एक कुंठा मेरे अंदर दाखिल होती और फिर हवा के रास्ते बाहर निकल जाती। मुझे लगता रिफ्यूजी होना एक मजबूरी है कोई इतनी बुरी बात नहीं जिस पर संजीदा हुआ जाए।
लेकिन आज मैं बेहद संजीदा हूं क्योंकि इस रिफ्यूजी होने ने मुझसे मेरा इतिहास छीन लिया और इसलिए मैं अपने भूगोल को आज तक नहीं समझ पाई औऱ न ही समझा पाई....
अब आप ही बताइए कि मेरी मां का जन्म उत्तरप्रदेश के एक कस्बा नुमा शहर खुर्जा में हुआ उनका बचपन पंजाब के अबोहर में बीता। मेरे पिता जयपुर में पले-बढ़े। देहरादून में पढ़े-लिखे। हरिद्नार में बसे। और मेरा जन्म हुआ बुलंदशहर में और मैं बचपन से रही हूं गाजियाबाद में..............अगर आप मेरे इस भूगोल को समझ सकें हों तो मुझे भी एक शब्द में इस सवाल का जवाब दीजिएगा कि "मैं कहां की हूं..."सिवाए इस जवाब के जो मैंने अभी कुछ बरस पहले ही देना सीखा है.." हिंदुस्तान"
मगर फिलहाल मैं खुद ही एक कोशिश करती हूं अपने असल भूगोल को समझने की...
मुलतान, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, चेनाब नदी के किनारे।
मुलतान, जिसे सूफी और संतों का शहर कहा जाता है।
मुलतान, जो बाबा फरीद के नाम से मशहूर पंजाबी के बेहद शुरुआती दौर के कवि फरीदुद्दीन गंजशकर का जन्मस्थान है।
मुलतान, जो सिर्फ एशिया ही नहीं दुनिया के कुछ एक सबसे पुराने शहरों में से एक है।
औऱ
मुलतान, वही शहर जो आजादी के नाम पर अपनी पहचान लुटा बैठा। और मुलतानी कहे जाने वाले इसके बाशिंदे भारत का रुख कर गुमनाम हो गए क्योंकि मुस्लिम बहुल होने के कारण मुलतान को पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया....।
ये ख्याल बहुत पाक नहीं लगते जो आज मन में यूं कुलाचे मार रहे हैं। क्योंकि इतना जानती हूं मैं कि उस वक्त ब्रिटिश रुल से आजाद होना ही सबसे बड़ी परिभाषा थी आजादी की..शायद रहनुमाओं  को ख्याल ही न आया हो किसी की पहचान और गांव घर के हमेशा के लिए दफन होने का।...मगर आज इन ख्यालों को रोकना नहीं चाहती मैं... बेशक नापाक ही सही लेकिन आज आजादी के इरादे मेरे मन में कुछ नेक नहीं लगते...आज मैं आजादी के इस दिन को बेदखल कर देना चाहती हूं अपनी जिंदगी से ...

सोमवार, 11 जून 2012

जिदंगी में एक दुनिया रहती है



दीवार में एक खिड़की रहती है-विनोद कुमार शुक्ल।


काश.. जिंदगी का होना.. जिदंगी में जिंदगी का होना भी होता। अजीब सी है न ये लाइन। लेकिन विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास दीवार में खिड़की रहती है ....पढ़ने के बाद... आपको धीरे धीरे इस तरह की अजीब लाइनें भी समझ आने लगती हैं... और साथ में समझ आने लगता है.. जिंदगी का एक नया चेहरा।


सच में समझ नहीं आता कि कहां उलझी है जिंदगी... ऐसी कितनी ख्वाहिशें हैं.. जिन्हें पूरा करने के दौरान खुद से ही मिलने का वक्त नहीं मिल पा रहा। खुद को पीछे छोड़कर कैसे आगे बढ़ रहे हैं हम। क्या ये आगे बढ़ना सही में वो आगे बढ़ना है जिस तरह हम आगे बढ़ना चाहते थे।


जानती हूं कि ये सारी बातें किसी भी वक्त.. कोई भी लिखने वाला इंसान लिख सकता है। मैं कुछ नया नहीं लिख रही। सही मायनों में कहूं तो ..बहुत ही घिसी पिटी बकवास लिख रही हूं।


लेकिन हमारी बहुत ही तमीजदार जिंदगी में इस तरह की एक बकवास की जगह होना भी जरूरी है। ये बकवास कई बार वजह दे देती है.. जिंदगी में.. जिंदगी को महसूस करने वाले कुछ पलों से मिलने की। ऐसे पल... जब बिन बात के हंसी आ जाती है ...और बिन बात के रोना। जब बिना पहचान के कोई मदद कर देता है और जान बूझकर किसी का परेशान करना भी अच्छा लगता है।




बीच में ही इम्तिहान आ जाने की वजह से कई दिन लग गए इस उपन्यास को पूरा पढ़ने में। आज.. अभी.. इसका आखिरी पन्ना पढ़कर पूरा किया इस उपन्यास को।


यकीन मानिए.. बड़ी तेज फीलिंग हो रही है कि काश एक ऐसी खिड़की मेरे पास भी होती.. जिसे जब चाहे लांघकर मैं अपने मन की दुनिया में जा सकती।


विनोद कुमार शुक्ल को पहली बार पढ़ा मैंने। काफी जगह लगा कि क्यों पढ़ रही हूं इस उपन्यास को मैं। न इसमें कोई हीरो टाइप का चरित्र है न कोई संघर्ष न कोई विशेष परिस्थिति..छोटे छोटे से कुछ ब्यौरे हैं बेहद छोटी छोटी बातों के। मगर इसका सार तब समझ आता है जब आप उपन्यास का आखिरी पन्ना पढ़ते हैं...पता चलता है कि


 जिंदगी में इस तरह की भी एक दुनिया रहती है जो दीवार की खिड़की से बाहर निकलकर ही दिख सकती है....ये दिखना दरवाजे से नहीं हो सकता...दरवाजा उस दुनिया में दाखिल ही नहीं होने देता कभी...




फिर वही ख्वाहिश कि काश ये  खिड़की मेरे घर की दीवार में भी होती
पर घर ही नहीं है
किराये का है तो खिड़की कैसे हो सकती है....

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...