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रविवार, 25 नवंबर 2012

पहली पेज थ्री पार्टी

मधुर भंडारकर की फिल्म पेज थ्री कई दफा देखी थी। तब मालूम नहीं था कि पेज थ्री का मतलब क्या होता है। अगर मतलब जो होता है वो है भी तो फिल्म का नाम पेज थ्री क्यों रखा गया, ये समझने में भी वक्त लगा। बहरहाल अब कुछ एक साल बीतने के बाद पेज थ्री और मधुर की फिल्म के नाम दोनों की गुत्थी सुलझ चुकी थी। बाकी बचा था तो पेज थ्री पार्टी को लाइव देखने का अवसर। सो ये भी बीते दिनों मिला। मौका था जानी-मानी पत्रकार और लेखिका तवलीन सिंह की नई किताब दरबार की पब्लिशिंग के जश्न का। दोपहर भर हमने व्यापार मेले में दो मुल्कों के बीच के प्यार को ढूंढा और शाम को पहुंचे नई दिल्ली के जाकिर हुसैन मार्ग पर बने आलीशान फाइव स्टार होटल ओबरॉय में। दिन भर धूल मिट्टी में भाग-दौड़ के बाद खस्ता हालत को देखकर एक बार को मन ने धिक्कारा भी कि पांच सितारा होटल में इस हालत में जाना ठीक नहीं। फिर सेल्फ रेस्पेक्ट ओर सादा जीवन उच्च विचार का पाठ याद आया और जैसे हैं वैसे ही होटल में दाखिल होने की हिम्मत बंधी। गेट पर पहुंचे तो ये लंबी-लंबी गाड़ियों के बीच अपनी 11 नंबर( पैदल) की सवारी के साथ होटल में एंट्री लेते वक्त भी काफी लज्जा महसूस हुई, लेकिन स्वाभिमान ने उस लज्जा को हावी नहीं होने दिया और हम पैदल ही अंदर दाखिल हो गए। गार्ड से नीलगिरी जाने का रास्ता पूछा और आगे बढ़ चले। नीलगिरी, होटल ओबरॉय में एक पार्टी हॉल का नाम है। उस तक पहुंचने में रास्ते में लगे चमकते हुए बोर्ड्स ने भी मदद की। जैसे नीलगिरी में पहुंचे तो इस देसी नाम को सिर्फ खुद तवलीन सिंह ही निभाती दिखीं, जिन्होंने सिल्क की नीली साड़ी पहनी हुई थी और हाथ में शराब का गिलास पकड़े हुए भी बेहद शालीनता से आने वाले लोगों से बात कर रही थी। य़े मेरे लिए उनसे मिलने का पहला मौका था। इतने सारे अंग्रेजी लोग और विदेशी संस्कृति के माहौल के बीच भी अपने भारतीयपन को बचाए हुए वह देसी और विदेशी का एक बेहतरीन फ्यूजन प्रस्तुत कर रहीं थी। दाखिल होने के बाद पहले तो समझ ही नहीं आया कि क्या किया जाए। यहां आमतौर पर होने वाले किताबों के विमोचन से एकदम अलग माहौल था। तवलीन सिहं ने खुद भी बातचीत के दौरान बताया कि यहां किताब का रिलीज नहीं है बल्कि जश्न है। फिर जश्न का दूसरा नाम है जाम। तो नीलगिरी में हर तरफ लाल और पीले पानी वाले जाम खूब दिखाई भी दे रहे थे। कई अजीबो-गरीब चेहरों के बीच शशि थरूर और फारुख शेख जैसे कुछ राजनीतिज्ञ चेहरे भी नजर आए तो रजत शर्मा जैसे मीडिया के कुछ ब़ड़े नाम भी। इन बड़े लोगों और बड़ी-बड़ी हस्तियों के बीच अचानक पहुंचे हम ( मैं और मेरा सहकर्मी) बेहद अजीब लग रहे थे। ऐसा हमें खुद को भी लग रहा था और कोई शक नही ंकि दूसरे भी हमारे बारे में ऐसा ही सोच रहे थे। हमारे मन में चलने वाले इतने सारे विचारों और भावों के बीच सिर्फ एक ही बात अच्छी हो रही थी कि हमें तवलीन जी से उनकी किताब के बारे में बात करने का पूरा मौका मिल रहा था और इस तरह कम से कम हमारा वहां आने का मकसद पूरा हो रहा था। हां एक मकसद जरूर अधूरा रह गया था। इसके अधूरा रह जाने की वजह भी यही थी कि वह मकसद वास्तव में मकसद बन ही नहीं पाया था और वह था पेज थ्री पार्टियों के असल अहसास को महसूस करने का। हम वहां से बिना पानी की एक बूंद पीए वापस लौट आए। ..... टू भी कंटीन्यूड टिल द सेकेंड पेज थ्री पार्टी

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

मैं लिखना चाहती हूँ

 (मेरे लिए जिंदगी में लिखना बहुत जरुरी है ..उतना ही जितना कि जीना- खाना-पीना
जिन दिनों नहीं लिख पाती वो दिन बेचैन होते हैं और रातें करवट करवट
लेकिन कई बार हमारे लिखने का विषय बिलकुल rigid  हो जाता है यानि हम एक ही दुनिया के इर्द गिर्द घूमते रहते है
सावन, साजन, मोहब्बत, मंजिले....ये कुछ ही सब कुछ नही हैं
अगर हम शब्दों को जोड़कर किसी बात को बेहतरी से कहने का हुनर रखते है
तो क्यों न कुछ ऐसा कहें जिससे एक दिशा मिले हमें भी पढने वाले को भी
कुछ ऐसा ही करने की कोशिश थी मगर फिर ये कविता बन गई ...)

मैं लिखना चाहती हूँ
कुछ ऐसे लेख जो जुड़े हो देश, दुनिया और समाज से
कुछ ऐसी कवितायेँ
जिनमे न हो बारिश, फूल, भवरे, रास्ते, मंजिले और तुम्हारा जिक्र
जिनमे हो भूख, तड़प, समानता, संघर्ष और क्रांति की बातें
..
..
.
आज भी जब में लिख रही हूँ कुछ
तो चाहती हूँ कि
लिखूं
एक मीडिया मुग़ल का अंत (रुपेर्द मर्डोक के अखबार न्यूज़ ऑफ़  द वर्ल्ड के  बारे में )
समाज सेवी अन्ना और अड़ियल सरकार के बीच चल रहा द्वन्द
कुछ कर नही सकती मगर कहूँ कुछ
उन बम धमाकों के बारे में जो आतंकियों के लिए थे
महज जन्मदिन के पटाखे
मगर उनसे बेडोल हो गई थी कई जिंदगियां
और भरा पूरा
हँसता खेलता
अपनी चमक से
सारी दुनिया को रोशन करता
एक शहर
मैं लिखना चाह रही हूँ बहुत दिनों से
पद्नाभ्स्वामी मंदिर के खजाने
और
उस खजाने को खोलने की याचिका डालने वाले
व्यक्ति की मौत से
पनपे अंधविश्वास
और अथाह दौलत
के इस्तेमाल के बारे में कुछ
जब पीने अखबार में देखी मर्लिन मुनरो की मूर्ति की तस्वीर
जिस पर टिकी हैं सारी दुनिया की निगाहें
और जिस ड्रेस के कारण ही
कहा जाता है कि
हो गया था उसका तलाक
हां मैं लिखना चाह रही थी बहुत कुछ इस महंगाई के मौसम
में टाटा के ३२ हजार का घर बनाने के प्रोजेक्ट के बारे में कुछ
देखो न
कितना कुछ था मेरे पास लिखने के लिए
और मैं बस लिखती रही
तुम्हे
तुम्हारे इन्तजार को
हर बार आने वाली इस सुखी सी बहार को

शनिवार, 25 सितंबर 2010

ताकि छोटा न हो शब्दों का आंचल

शब्दों से हमारा रिश्ता बहुत ख़ास होता है . लेकिन इस रिश्ते का महत्व तब तक एक रहस्य बना रहता है जब तक की कोई ऐसी परिस्थिति न आन पड़े कि  हमारे पास भावनाए हो और शब्द न मिले. वो एक अनमना सा पल जब अचानक शब्द गले तक पहुँच कर फिसल जाये जुबान तक आ ही न पाए. कितनी तकलीफ से भर जाता है मन ,  मन की बात कहने को जुबान व्याकुल सी हो जाती है लेकिन दिमाग है कि एक भूलभुलैया में खो जाता है . शब्दों की भुलभुलिया . जहाँ अपनी भावनाओ को सही शब्द दे पाना एक मुश्किल से भरा फैसला होता है.


ये बातें मैं किसी प्रेम प्रसंग या किसे कहानी के वश में होकर नही लिख रही हूँ, बल्कि पिछले कुछ दिनों से एक अखबार के दफ्तर में काम करते हुए, हुआ एक अनुभव है , जहाँ शब्दों के लिए शब्दों के ही बीच में हर रोज एक  जंग सी होती है. सभी के सुझाये गए शब्दों की अपनी एक वजह है. उनकी बोली, उनका परिवेश,उनकी पढाई .....और फिर हर शब्द के साथ काम करने वाली उनकी निजी सोच. मगर उस एक वक़्त जरुरत होती है हर तरह से फिट एक अदद शब्द की. शब्द मिलने के बाद उसकी लिखावट पर चर्चा. कहीं छोटा उ कही बड़ी ई. हालाँकि हर अखबार की अपनी एक स्टाइल शीट होती है लेकिन फिर भी हिंदी के अख़बारों में भाषा गत शुद्धता को लेकर बहुत सारा विरोधाभास है ....पढाई के दिनों में हमें अच्छी अंग्रेजी के लिए द हिन्दू पढने को कहा जाता था लेकिन वही हिंदी को लेकर हम अपनी अशुधता को दूर कर सके उसके लिए किसी एक भी अखबार का नाम ध्यान नही आता . ख़बरों की अपनी अलग पहचान के साथ अखबार या चैनल की पहचान उसकी भाषागत शैली के साथ भी जुडी है.मीडिया में हर बढ़ते दिन के साथ नए नए प्रयोग हो रहे है अलग तरह के कोलुम्न्स ले आउट लेकिन भाषा को लेकर सिर्फ एक निजी सोच और समझ  है वास्तव में सही क्या है इसका फैसला एक बड़ी बहस का बाद भी न निकले शायद. कुछ आगे बढ़कर कहीं कहीं तो हिंदी लिखने के साथ भी अजीब गरीब आसान नुस्खे अपनाये जा रहे है. एक तर्क ये होता है की वही लिखना है जो पाठक  को समझ में आये. लेकिन समझाने का ये कौन सा तरीका है की शब्द की बनावट ही अपने हिसाब से तय कर ली जाये. और फिर आम भाषा बोलचाल की भाषा और अखबार और चैनल की भाषा में कुछ तो फर्क होता है न . मुझे लगता है कि यंग इंडिया का मीडिया बनने से पहले शायद इंडिया का मीडिया बनना ज्यादा जरुरी है क्योंकि यंग इंडिया भी इंडिया को खोना नही चाहता वो अपने जुगाड़ करना अच्छे से जानता है उसके लिए इंडिया की भाषा, संस्कृति को idiotik  बनाना सही नही होगा.
शब्द भी बाकी चींजों कि तरह हमारी अनमोल धरोहर है उस एहसास से ही मन मायूस हो जाता है कि कहीं कोई शब्द खो गया है
प्रोयोगों के इस दौर में झांक के देखेंगे तो एक गहरी खाई है जिसमे बहुत सारे शब्द गिरा दिए गए है उन्हें वापिस लाने की कोशिश करनी चाहिए .............ये कोशिश कामयाब होना भी निहायत जरुरी है ताकि शब्दों के आंचल में हमेशा हमारी भावनाओ की बयाँ करने के लिए जगह रहे

शनिवार, 21 अगस्त 2010

पेड न्यूज - पत्रकारिता के फूल पर मंडराता भंवरा

फूल की महक और खुबसूरती की बात हो तो भंवरे का जिक्र भी आ ही जाता है। हाल-ए-पत्रकारिता भी कुछ ऐसा ही हो गया है। इसके आकार और सरोकार की चाशनी पर मंडराते पेड न्यूज रुपी भँवरे की मेहरबानी के चलते पत्रकारिता में मुद्दों की चर्चा के बजाए आजकल पत्रकारिता स्वयं में एक चर्चित विषय हो गया है। ताजा बात से शुरु करते हैं।
हाल ही में बिहार और झारखंड के पत्रकारों ने पेड न्यूज को रोकने की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप करने की गरज से एंटी पेड न्यूज फोरम का गठन किया है। ये संगठन पेड न्यूज के कारोबार पर नजर रखेगा और इस तरह की तमाम गतिविधियों को लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करेगा। संगठन में कोई भी पद नहीं रखा गया है। केवल एक कोर कमेटी होगी, जो सबसे सलाह-मशवरा करके काम करेगी। इस महीने की 28 तारीख को इस फोरम के तहत सम्मेलन भी किया जाएगा। इस सम्मेलन में देश के ऐसे पत्रकार भी शिरकत करेंगे जो पेड न्यूज की प्रणाली को पत्रकारिता पर कलंक मानते हैं।
अब से कुछ दिन पहले भी पत्रकारिता की पनाह में पलते पेड न्यूज की अवैध संपति पर हो हल्ला हुआ था। मौका था रामनाथ गोयनका अवार्ड समारोह। चर्चा हुई। पत्रकारों ने एक सुर में पेड न्यूज को पत्रकारिता के लिए घातक करार दिया। और फिर सब अपने-अपने घर लौट गए। पेड न्यूज जहां थी वहीं रही। ये बात भी ध्यान देने की है कि  प्रेस परिषद ने पेड न्यूज की जांच के लिए कमेटी भी गठित की थी जिसकी रिपोर्ट इसी वर्ष 26 अप्रैल को आनी थी लेकिन वह भी अब तक नहीं आई है। जब से यह मुद्दा उठा है तब से पत्रकार और मीडिया टाइकून अलग-अलग अवसरों पर इस विषय पर अपनी राय देते रहे हैं।

इसकी एक बानगी मैंने तमाम अवसरों पर दिए गए कुछ बयानों को खोज बीन कर तैयार की है-

पेड न्यूज सिर्फ वही नहीं, जो पैसे लेकर छापी जाती है। किसी विचारधारा के तहत लिखी गयी खबर भी पेड न्यूज जितनी ही गलत है।
आशुतोष,  मैनेजिंग एडीटर, आईबीनएन-7।

खराब अखबार निकालने का दोष मालिकों पर मढऩा ठीक नहीं है। पत्रकारों को ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिससे पाठकों में उसकी इमेज खराब हो। किसी भी कानून से ज्यादा जनता और पाठक की नजर हालात को सही करने में अपनी भूमिका निभा सकती है। कानून बन जाएगा तो पेड न्यूज का सिलसिला दूसरे रास्तों से शुरु हो जाएगा।
श्रवण गर्ग, दैनिक भास्कर।

मीडिया पर हमेशा से दबाव रहा है। जब हमने नवभारत टाइम्स में पशुपालन घोटाला की खबर छापी तो लालू यादव ने हमारे ऑफिस में आग लगवा दी थी। हमारा काम खबर छापना है, हमें हर हाल में इस काम को जारी रखना होगा। आज ही नहीं पहले भी मीडिया पूंजीपतियों के हाथों में रहा है। ऐसी भी घटनाएं हैं जब मालिकों से अलग हटकर चलने पर संपादकों (बीसी वर्गीज और एचके दुआ) को सड़कों पर ही बर्खास्त किया जाता रहा है।  अखबार का मालिक अखबार चलाने के लिए कहां से पैसा लाता है, सम्पादक को इससे कोई मतलब नहीं होता।
आलोक मेहता, संपादक, नई दुनिया।

कॉरपोरेट जगत को माइनस करके अखबार और चैनल नहीं चलाए जा सकते। हमारे एक चैनल ने एक कॉरपोरेट घराने के खिलाफ कैम्पेन चलाई। इसके नतीजे में उस कॉरपोरेट ने हमारे सभी नेटवर्क के चैनलों से अपने विज्ञापन वापिस ले लिए।
राजदीप सरदेसाई,  सीएनएन-आईबीएन।

सरोकारों का संसार सिमट रहा है या फिर सरोकार ही बदल गए हैं ये कहना मुश्किल है लेकिन पेड न्यूज पर चर्चा करने वाले इन सभी पत्रकारों की बात से जो निष्कर्ष निकलता जान पड़ता है वो यही है कि पत्रकारिता को पूंजी के बिना देखना अंसभव हैं । ऐसे में भला मीडिया उन सत्ततर प्रतिशत लोगों की बात क्यों करे, जो रोजाना पन्द्रह से बीस रुपए रोज पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर हैं। उन्हें मरते हुए किसान विज्ञापन नहीं देते। इसलिए मीडिया को कॉरपोरेट जगत के हितों की बात करनी ही होगी। इसे उनकी मजबूरी भी कहा जा सकता है और मनमानी भी। फैसला आप पर है। आप क्या कहेंगे?

ब्ला ब्ला ब्ला... आखिर ये बला क्या है????
साल 2009 के अप्रैल-मई महीने में पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव हुए। इन चुनावों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए प्रेस काउंसिल की तरफ से सरकारी अधिकारियों और प्रेस दोनों के लिए गाइडलाइन्स तय कर दी गई थी। लेकिन चुनावों के दौरान इसकी अनदेखी हुई।  जिसके परिणाम में एक नया ट्रेंड देखने को मिला। चुनाव में खड़े प्रत्याशियों का अपने प्रचार के लिए मीडिया कंपनियों को पैसे देकर खबर छपवाने का ट्रेंड। ऐसी खूब खबरें छपी जिनमें खबर कहीं थी ही नहीं, खबर के रूप में पूरा इश्तिहार था। इस नए ट्रेंड को मशहूरी मिली  पेड न्यूज के नाम से। यानि पैसे लेकर प्रकाशित की जाने वाली खबर। ये बात पिछले साल की है, विरोध भी पिछले साल से ही शुरू हो गया था और आज तक हो रहा है।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

बाइते का जाना और खबर का देर से आना

अपने व्यवहार और संस्कारों के ठीक उल्ट आज की पत्रकारिता से जुडऩे का नादान फैसला जब लिया था तब इस नादानी के पैमाने को मैं समझी नहीं थी। पढऩे, समझने और लिखने के बावजूद भी कुछ नादान सवाल गाहे-बगाहे मन में उठते रहते थे। ऐसा क्यों होता है, ये क्यों लिखा जाता है, वो तो कहीं छपा ही नहीं वगैर-वगैरह। मेरी मां जो सामाजिक शास्त्र की टीचर हैं, उनसे मैं अक्सर पूछा करती थी कि मम्मी असम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुुर, ये जो जगह हैं क्या यहां कभी कुछ नहीं होता। यहां की कोई खबर ही नहीं आती कभी। और फिर एक मासूम भ्रम मन में पाल लेती थी कि ये छोटे राज्य हैं। यहां सब कुछ ठीक ही रहता होगा। लेकिन आज अखबारों से जूझते हुए जब जनसत्ता के एक कॉलम पर नजर पड़ी तो मेरा भ्रम टूटा या कहूं कि चकनाचूर हुआ। क्योंकि टूटना तभी शुरू हो गया था जब पिछले दिनों मणिपुर में घट रही घटनाओं को हमारे अखबारों नें एक कॉलम की जगह दी और चैनलों ने शायद एक बुलेटिन में सिर्फ  शाॉट-बाईट ही चलाया। राहुल महाजन का उसकी दूसरी बीवी से झगड़ा और उसका विश्लेषण हमारे मीडिया और ऐसे मीडिया को टीआरपी देने वाले दर्शकों के लिए ज्यादा जरूरी था। मैं यहां दर्शकों का भी जिक्र कर रही हूं क्योंकि हमेशा सिर्फ मीडिया को ही कोसा जाता है लेकिन ऐसे घटिया स्तर के मीडिया को पालने-पोसने का काम तो ये दर्शक ही करते हैं न। जो देश के एक अहम हिस्से की घटनाओं को जानने में दिलचस्पी तक नहीं दिखाते और एक नाकुछ इंसान की शादी और तलाक को नजरे गड़ाकर देखते और कान खड़े करके सुनते हैं। खैर मीडिया भी मोटापा बढ़ाने वाली इस टीआरपी रूपी मलाई का मोह छोड़कर अपने दायित्वों को याद रखते हुए सेहतमंद दूध रूपी वास्तविक न्यूज दे तो शायद बेहतर हो। पर इस बीच जो बेहद दुख भरा लगा वो है इंफाल में दूरदर्शन के समाचार संपादक राबर्ट बाइते की मौत की खबर का मीडिया में उनके अंतिम सांस लिए जाने के 52 दिन बाद आना। अमिताभ बच्चन को अगर किसी सूदूर आईलैंड पर खांसी भी आ जाए तो बड़ी खबर हो जाती है। कुछ लोगों पर इतनी पैनी नजर और कुछ लोगों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिए जाना। कुछ शहरों में धूप निकलना भी खबर और कुछ राज्यों में तबाही मच जाना भी बात से नदारद। खबरों की दुनिया का ये विरोधाभास बेचैन कर देता है। सवाल सिर उठाते हैं और फिर जवाब कहीं देर से ही सही लेकिन छप सके किसी कॉलम में मिलते हैं। जैसे आज मिले और मैं लिखने की इस नाकाफी सी कोशिश को करने से खुद को रोक न सकी। और बाइते के संदभॆ में खास बात ये भी है कि वो खुद मीडिया से जुड़े थे न सिफॆ खानापूरती के लिए बल्कि उन परदों को उठाने के लिए जिनके पीछे से आता शोर तो सबको सुनाई देता है लेकिन कोई उन्हें उघाड़ कर ये देखने की कोशिश नहीं करता कि इस शोर की वजह क्या है। उनकी मौत से जो सन्नाटा पसरा है उसके बाद पीछे छूट गए उस शोर को सुनने का साहस अब कौन दिखाएगा? कब मीडिया में सरोकारों का दौर वापस आयेगा? कब?? ये सवालों का केवल एक सिरा है। पूरी की पूरी एक रस्सी पड़ी है जिसके दूसरे सिरे तक सिफॆ सवाल है सवाल।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

पत्रकार प्रहार और प्रतिरोध


मीडिया में तमाम विषयों को लेकर जितनी चर्चा होती है खुद मीडिया भी उतना ही चर्चित विषय है। लोकतंत्र का ऐसा चौथा स्तंभ है जिसे उखाडऩे के लिए तमाम प्रयास किए जाते हैं बिना ये सोचे कि इसके हटने पर जो छत गिरेगी उसमें कोई भी दब सकता है। प्रेस, प्रहार और प्रतिरोध की चिंगारियां गाहे-बगाहे भड़कती ही रहती है। सवाल उठते हैं कि क्या मीडिया को किसी लक्ष्मण रेखा की जरुरत है? क्या मीडिया के लिए भी कुछ सख्त मापदंड बनाए जाने चाहिए? इसी तरह के कई सवालों के बीच ये धुंधली तस्वीर उभरती है उस शख्स की जिसे पत्रकार कहा जाता है, जो मीडिया नामक संस्था का प्रहरी होता है। मीडिया की आजादी पर उठने वाले सवालों से इतर अब इतफाकन या प्रायोजित तरीके से एक पत्रकार की आजादी पर हमला किया जाने लगा है। सरकार और गैरकानूनी साजिश रचने वाले दोनों ही पत्रकार पर दबाव बनाते हैं और इन दबावों के बीच वह पत्रकार अपनी जगह किस तरह बनाए ये उसके लिए एक बड़ी चुनौती हो जाता है। सच को सामने लाने के लिए निकले पत्रकार पर हमले के कई हालिया संस्करण हैं जिन्होंने इस विषय को यहां सूचीबद्घ किया है।


मणिपुर के पत्रकार पिछले दिनो हड़ताल पर रहे और वहां दो दिनों तक कोई अखबार नहीं छपा। वजह थी कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी  से जुड़े आतंकवादी पत्रकारों को उनके खिलाफ खबर छापने पर जान से मारने की धमकी देते हैं। पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर में कम से कम 25 पत्रकारों की हत्या हुई और 30 से अधिक को आतंकवादियों को मदद देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। मणिपुर जैसे कई राज्यों में आतंकवादियों ने मीडिया को वास्तव में बंधक बना लिया है। असम में 20 और मणिपुर में पांच पत्रकारों की हत्या हुई, लेकिन किसी को भी इस संबंध में गिरफ्तार नहीं किया गया. आतंकवादियों के साथ ही राज्य प्रशासन भी मीडिया का उत्पीडऩ करता है।
महाराष्ट्र में 5 जुलाई को भारत बंद के दौरान नागपुर के वेरायटी चौक पर कवरेज के लिए गए मीडियाकर्मियों पर भी पुलिस द्वारा लाठीचार्ज  किया गया। 
लखनऊ में क्वीन्स ूबेटन की कवरेज में गए पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी की गई। लाइव कवरेज करने वाले पत्रकारों को रोका गया और जब पत्रकारों ने विरोध किया तो अधिकारियों ने अफरातफरी का माहौल बनाते हुए कई पत्रकारों को जबरिया पुलिस के वाहनों में बैठा लिया। इसके बाद यहां से करीब एक दर्जन पत्रकारों को बलपूर्वक वाहन मे ठूंसकर मोहनलालगंज थाने को भेज दिया गया। इसके अलावा बेटन के साथ चल रहे लोगों को भी चौराहे पर घण्टों धूप व उमस भरी गर्मी में रोके रखा गया।
नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज के साथ हाल ही में नंदीग्राम पुलिस ने ऐसा बरताव किया जैसे वह कोई आतंकवादी हों।
कश्मीर में जिस तरह से स्थानीय पत्रकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है उससे भी तमाम लोग वाकिफ हैं।
पत्रकार के प्रतिकार का एक छोटा सा हालिया नमूना ये भी है
सिरसा और फतेहाबाद में बाढग़्रस्त, इलाकों का जायजा लेने पहुंचे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा एक पत्रकार के सवाल पर बुरी तरह झल्ला गए और उसे पत्रकार काांफ्रेस से बाहर निकल जाने का हुक्म सुना दिया। पत्रकार ने मुख्यमंत्री हुड्डा से पूछा था कि केंद्र सरकार ने बाढ़ से बचाव के लिए हरयिाणा को 75 करोड़ रूपए दिए हैं, लेकिन अकेले रोहतक को ही 23 करोड़ रूपए क्यों दे दिए गए। राज्य के बाकी जिलों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों। पत्रकार का यह सवाल हुड्डा का नागवार लगा और उन्होंन झल्लाते हुए पहले तो उससे उसके अखबार का नाम पूछा और बाद में उसे बाहर निकल जाने कह दिया। ज्ञात रहे मुख्यमंत्री हुड्डा रोहतक से ताल्लुक रखते हैं।

सोमवार, 7 जून 2010

मीडिया इंस्टिट्यूट -हर मोड़ पर है मिलावटी माल की एक महंगी दूकान

मीडिया में आने के सपने और संघषॆ के बाद जो नया शौंक चढ़ा वो है मीडिया को पढ़ने का, पढे हुए को समझकर और अपनी बीती से मिलाकर कुछ लिखने का। इसी सिलसिलें में मीडिया के कुछ लोगों को खासकर उनके सफर को पढ़ा तो एक बात मुझे अपनी सी लगी वो है मीडिया में आने की उनकी कहानी। मेरा किस्सा भी कुछ ऐसा ही है और जितने लोगों को मीडिया में पढने की कोशिश करती हूँ उनका अनुभव भी कुछ वैसा ही नजर आया। घर से भागकर, घरवालों के खिलाफ जाकर,  घर पर बिना बताये, पिता जी से लड़कर, माँ को मनाकर..पत्रकारिता की पढाई करने की इजाजत अधिकतर लोगो को पूर्ण सहमति के रूप में नही मिली है। हर एक सफर पर एक खास खबर तैयार हो सकती है। सबके अपने-अपने अलग किस्से रहे है क्रांतियों के। घर से क्रांति करके निकले और समाज में क्रांति करने का सपना संजोया। फिर हुआ ये कि कदम वक़्त को नही समझ सके लेकिन क्रांति वक़्त की आंधी में कई कदम पीछे हो गई। लेकिन कदम जब बेलगाम, आगे बढे उबड़-खाबड़ रास्तों पर,  तो वो चिकनी सड़क का मोह न छोड़ सके। आखिर सब कुछ छोड़ कर आये एक व्यक्ति के पास अब कुछ और छोड़ने का विकल्प ही नही था। समाज समाज करते-करते बातें स्वयं से शुरू होकर स्वयं पर ख़त्म होने लगी। दरअसल संघर्ष जिंदगी की एक सच्चाई है लेकिन कई बार संघर्ष की इस कहानी में ट्विस्ट आ जाते है, बेहद घातक ट्विस्ट। जब सिस्टम की लाग-लपेट में आप के सपनो का लहू निकलने लगता है।
 सालों पहले की पत्रकारिता को छोड़ दें और सिफॆ आज की बात करें तों इस सफर की शुरुआत के लिए सबसे जमीनी आधार और बड़ी जरुरत है  वो होता है एक बढ़िया, नामचीन, रोजगार मुहैया करने वाला मीडिया संस्थान। इस तलाश में दिल्ली में तो आपको ज्यादा भटकना नहीं पड़ेगा। दिल वालों की दिल्ली में तो ऐसी दुकानों की कोई कमी नहीं है। चुनाव आपका है, विकल्प बहुत है।
आपसे साक्षात्कार में ये खूबसूरत सवाल पुछा जाना लाज़मी है कि आप पत्रकार क्यों बनना चाहते है। इस पर आपकी वजह चाहे आपकी ख़ूबसूरती हो, कड़क आवाज, आपका मिजाज या फिर लिखने की शमता लेकिन किसी भी सूरत में आपको ६ महीने में एंकर और रेडियो जॉकी बना ही दिया जायेगा। बड़ी कंपनी के ब्रांड की तरह यहां उस तरह का टैग तो नहीं लगा होता कि कंडीशनस एप्लाई, लेकिन जो कंडीशनस यहाँ एप्लाई की जाती हैं वो बस एक नोटों की एक मोटी गड्डी है। 
खैर व्यंग्य रूप में बहुत कुछ कहा जा सकता है क्योंकि मीडिया की पढाई किसी मजाक से कम नहीं रह गई है लेकिन जब बात छेड़ी है तो कुछ तथ्य जिकिरियाना जरुरी है

पत्रकारिता के कोर्से तीन तरह के संस्थान चला रहे है

एक जो सरकार के माध्यम से पोषित है

दुसरे जो नामी विश्विधाल्यों से मान्यता के नाम पर अपना स्कूल खोले हुए है


तीसरे वो जिन्हें खुद न्यूज़ चैनेल और अख़बारों ने खोला है। सबसे ज्यादा चलने वाली दुकान दरअसल यही है। यहाँ प्रोफशनल लोग पढाते है, पूरा माहौल होता है जिसमे आगे जाकर काम करना है। नाम तो वैसे दिल्ली विश्वविधालय का भी कम नहीं है लेकिन जहाँ तक पत्रकारिता की बात है तो ये ऊँची दुकान फीका पकवान वाली बात होगी

प्रिंट मीडिया , इलेक्ट्रोनिक मीडिया से लेकर फिल्म प्रोडक्शन जैसे विषय हिंदी के अध्यापक पढ़ा रहे है। हालाँकि अध्यापक अपने स्तर पर छात्रों को सम्बंधित जानकारी उपलब्ध करा भी दे तो ये उसकी निजी व्यावहारिकता होगी। लेकिन एक भाषा के टीचर से मीडिया पढवाना दोनों तरफ से शोषण करना है। जिस तेजी से मीडिया में बदलाव हो रहे है, हर एक साल पर कोर्से रिवाइस होने चाहिए। यहां तो पिछले कई सालों से आज़ादी के समय वाली पत्रकारिता पढाई जा रही है जबकि अब हम नई तरह की बेड़ियों में जकड़े जा चुके है। आज अगर जो लिखा है ये पहले कहीं पढ़ लिया होता तो अब ये लिखने की नौबत नहीं आती। खैर ये बेहद निजी भाव है। लेकिन अगर मीडिया एक उभरता करियर विकल्प बन रहा है और लोग उसमे आना चाहते है तो पढाई के स्तर पर भी बदलाव होना बहुत  जरुरी है। क्योंकि पत्रकार बेशक प्रधानमन्त्री नहीं होता लेकिन वो एक पत्रकार होता है जो अपने स्तर पर पूरी तरह आज़ाद होकर देश और दुनिया से जुड़े कई आयाम गढ़ सकता है। जब शिक्शा नितियों में सुधार की बात चल ही रही है तो ये सवाल उठाना और सबको दिखने वाले इश दृस्य को शब्दों के माध्यन से प्रतिबिंबित करना मुझे जरुरी लगा। शायद कोई माननीय पहुंच वाले व्यकित पढ़ ले और कुछ बदलाव हो सके.......




सोमवार, 25 जनवरी 2010

मीडिया में रण

बहुत शोर सुनते थे पहलु में दिल का /जो चीरा तो एक कतरा खून न निकला .........मीडिया में मीडिया के लिए मीडिया द्वारा मचे 'रण' का फलसफा भी कुछ ऐसा ही है । नही जानती कि फिल्म रण में क्या होगा ,पटकथा कितनी मजबूत होगी, क्लाइमैक्स कितना बेहतरीन लेकिन बेशक फिल्म को अच्छे खासे दर्शक मिल जायेंगे । आम दर्शक रूचि लें या न ले मीडिया वालें सारे लोग तो जरुर देखने जायेंगे । कोई हर्षवर्धन मालिक (अमिताभ बच्चन )से खुद को जोड़कर देखेगा तो कोई पूरब शास्त्री(रितेश देशमुख) में अपना अक्स पायेगा। और फिर वो मासूम दिल भी तो इस फिल्म के दर्शक होंगे जो मीडिया में आने का सपना पाले कभी इंडियन एक्सप्रेस के पन्ने पलटते है तो कभी विनोद दुआ और बरखा दत्त के प्रोग्राम टी वी पर एक ताकि लगाकर देखते है । रण में तो उनके सामान्य ज्ञान के लिए काफी मसाला है । मीडिया के अन्दर होने वाले रण तो फिल्म २६जनवरी को रिलीज़ हो जाएगी लेकिन एक रण और भी है मीडिया में आने के लिए लड़ा जाने वाला रण जिस पर फिल्म बेशक कोई न बनाये लेकिन निसंदेह ये चर्चा का विषय तो जरूर है ..चाहे वो चर्चा चोरी छुपे ही क्यों न हो होती जरुर है । मैं जरा खुले आम कर रही हूँ । इस चोथे इस्ताम्भ कि चारों दीवारों पर जैसे बाज़ार , पूँजी , सत्ता और एक अनकहे स्वार्थ के दरवाजे लगे है जो इन्हें खोल लेता है वो अन्दर जा सकता है और जिसके पास ऐसी चाबियाँ नही है उसके लिए मीडिया किसी जंतर मंतर या भूल भूलैया सरीखा ही है । एक रण ये भी है जो पत्रकारिता को पैत्रेकारिता के रूप में अपनाने पर मजबूर कर देता है । चलने से पहले ही गिरने का एहसास पैरों कि सारी ताकत को भस्म कर देता है । 'क्या करेंगी मीडिया में आकर दुनिया बदल लेंगी या समाज ? ऐसी मेरी हसरत कहाँ जनाब मैं तो खुद ही को बदलूंगी ।' अख़बारों में तमाम ख़बरें और इश्तिहार छपते है लेकिन किसी चैनल या पुब्लिकतिओन में भर्तियाँ हो रही है ये सुचना आपको मीडिया के किसी माध्यम में बमुश्किल ही मिलेगी । यहाँ सूत्र, सौर्स और संबंधों के आधार पर आपकी सेवाए तय की जाती है । फिर खुदी को भुलाकर खुद को बुलंद करने की जो रस शुरू होती है वो भी रण है । व्यवस्था की आलोचना करने वाला मीडिया खुद किस हद तक अव्यवस्थित है इसका तकाजा एडिटर्स गिल्ड से ज्यादा उन तमाम लोगों को होता है जो हर रोज अपना किया धरा पोथी पत्र हाथ में लेकर निकलते है और दफ्तार्रों के दरवाजे से एक प्रश्नचिन्ह साथ लेकर लौट आते है

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

हर शक्स यहाँ इतना परेशान क्यों है (२)

वो मैं ही थी जो इस सोच में थी कि हर शक्स यहाँ इतना परेशान क्यों है लेकिन देखिये वो भी मैं ही हूँ जो इस सवाल के जवाब कि एक किश्त यहाँ लिख रही हूँ ....सुनी पढ़ी बातों से नही बल्कि खुद अनुभव करके ...या कहूँ कि
"खुद परेशां होंके हम समझे हकीक़त फ़साने कि " हुआ यूँ कि नौकरी कि तलाश में भटकते हुए मैं एक न्यूज़ चैनल के दफ्तर पहुची ...चैनल का नाम न जाहिर करते हुए सिर्फ ये कहना काफी होगा कि जिस तरह मैं मीडिया मैं संघर्ष के दौर से गुजरती नयी प्राणी हूँ जो पत्रकार बनना चाहती है उसी तरह ये चैनल भी कुछ वक़्त पहले ही चोथे इस्तंभ में शुमार हुआ है .....तो मैं रिसेप्शन पर पहुंची और उसके बाद हुआ संवाद कुछ इस तरह रहा
रिसेप्शनिस्ट - क्या काम है ?
मैं -एच आर डिपार्टमेंट में जाना है
रिसेप्शनिस्ट- किससे मिलना है ?
मैं - यहाँ कोई जॉब ओपनिंग है क्या ?
रिसेप्शनिस्ट-हा है तो आप को किससे मिलना है
मैं -मुझे उन्ही से मिलना है जो नए लोगो का इन्तर्विएव(साक्षात्कार ) ले रहे है
रिसेप्शनिस्ट- मैडम आप अपना रिज्यूमे यहाँ दे दीजिये हम आपको अइसे किसी से
नही मिलवा सकते
मैं -सर मेरे पास कोई रेफरेंस नही है कृपा करके मुझे किसी से एच आर में मिलवा दीजिये ताकि मैं खुद अपना रिज्यूमे उन्हें दे सकू ...
रिसेप्शनिस्ट-आप ज्यादा परेशान हो रही है तो मैं आपको एक बात बताना चाहूँगा कि यहाँ हर रोज १०० -१५०
रिज्यूमे आते है हम सारे ऊपर पहुंचा देते है लेकिन होता उन्ही का है जिनका कुछ जुगाड़ होता है ...हमारी तरफ से आप निश्चिन्त रहो हम तो पहुंचा देंगे ..लेकिन आगे का भगवान् मालिक है ॥
मैं ------------------अब इसके बाद मैं क्या कहती है काफी कोशिशों के बाद भी मुझे किसी से मिलने नही दिया गया और मैं निराश खली हाथ वापस आ गई .....हाथ लगा तो बस ये कुछ शब्द...आज कि एक नयी पोस्ट ....
अब समझ में आता है कि हर शक्स यहाँ इतना परेशान क्यों है ....अगर मीडिया में काम करने वाले अनुभवी लोगो में से कोई भी मेरे इस अनुभव पर रौशनी दाल पाए तो मेरी निराशा के ज्वार को थोडा सहारा मिल जायेगा .........क्योंकि अपना तो कोई जुगाड़ नही है भाई ......कब तक चलेगी ये शीत लड़ाई .......

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

हर शक्स यहाँ परेशान क्यों है (१)

कभी कभी बातें तय नही होती तुरत फुरत ही मुह से कोई कसीदा निकल पड़ता है ......ऐसा ही एक कसीदा मेरी माँ के मुह से भी निकल पड़ा उस दौरान मैं मीडिया में संघर्ष के किस्से कह रही थी अचानक उनके मुह से निकला ...."पता नही कैसा महकमा है ये !" सुनकर पहले तो मुझे हंसी आई लेकिन फिर लगा कि ये विस्मय बोधक वाक्य मुझसे कुछ न कुछ तो जरुर लिखवा लेगा । यूँ तो बहुत कुछ है लिखने को यहाँ (मीडिया)मगर क्या कह दे और क्या न करें बयाँ , इसलिए सोच नही पा रही हूँ कि क्या लिखूं और क्या नहीं । अच्छी खासी नौकरी कर रहे लोग जब मुझ जैसे बेरोजगार से ये कहते है कि हम तो भैया नौकरी छोड़ने कि सोच रहे है ...फिर ये सवाल भी साथ ही दाग देते है कि "मोहतरमा आप क्यों आना चाहती है इस फील्ड में ? जवाब बेहद आसन मगर सवाल बेहद मुश्किल । आपके साथ हुआ है कभी ऐसा मेरे साथ हर उस बार होता है जब मुझसे ये सवाल पूछा जाता है । मैं परेशान हूँ यहाँ अपने सपनो कि जमीं तलाशने के लिए.. लेकिन जब यहाँ आकर देखती हूँ तो उन सपनो कि हकीकत के साथ जी रहे लोग किसी और हकीकत को अपनाने का सपना पाले हुए है । आज ही किसी से बात कर रही थी तो बातों बातों में उन्होंने मुझे बताया कि यहाँ का माहौल ऐसा इसलिए है कि एक डॉक्टर साडी उम्र डॉक्टर बनकर जी सकता है एक इन्जीनिएर को पता है कि वो एक इन्जीनेइर बनकर अपने परिवार को पालेगा लेकिन एक पत्रकार ताउम्र पत्रकारिता करते हुए जीवन में ज़िन्दगी को जुटा पायेगा ये बहुत विश्वस्निये
बयान नही हो सकता । और भी बहुत कुछ है कहने के लिए अभी तो सफ़र शुरू हुआ है न जाने क्या कुछ देखना और लिखना हो सकता है ......सफ़र जारी है ....संघर्ष भी ..और कलम भी

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...