रविवार, 25 नवंबर 2012
पहली पेज थ्री पार्टी
मंगलवार, 19 जुलाई 2011
मैं लिखना चाहती हूँ
जिन दिनों नहीं लिख पाती वो दिन बेचैन होते हैं और रातें करवट करवट
लेकिन कई बार हमारे लिखने का विषय बिलकुल rigid हो जाता है यानि हम एक ही दुनिया के इर्द गिर्द घूमते रहते है
सावन, साजन, मोहब्बत, मंजिले....ये कुछ ही सब कुछ नही हैं
अगर हम शब्दों को जोड़कर किसी बात को बेहतरी से कहने का हुनर रखते है
तो क्यों न कुछ ऐसा कहें जिससे एक दिशा मिले हमें भी पढने वाले को भी
कुछ ऐसा ही करने की कोशिश थी मगर फिर ये कविता बन गई ...)
मैं लिखना चाहती हूँ
कुछ ऐसे लेख जो जुड़े हो देश, दुनिया और समाज से
कुछ ऐसी कवितायेँ
जिनमे न हो बारिश, फूल, भवरे, रास्ते, मंजिले और तुम्हारा जिक्र
जिनमे हो भूख, तड़प, समानता, संघर्ष और क्रांति की बातें
..
..
.
आज भी जब में लिख रही हूँ कुछ
तो चाहती हूँ कि
लिखूं
एक मीडिया मुग़ल का अंत (रुपेर्द मर्डोक के अखबार न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड के बारे में )
समाज सेवी अन्ना और अड़ियल सरकार के बीच चल रहा द्वन्द
कुछ कर नही सकती मगर कहूँ कुछ
उन बम धमाकों के बारे में जो आतंकियों के लिए थे
महज जन्मदिन के पटाखे
मगर उनसे बेडोल हो गई थी कई जिंदगियां
और भरा पूरा
हँसता खेलता
अपनी चमक से
सारी दुनिया को रोशन करता
एक शहर
मैं लिखना चाह रही हूँ बहुत दिनों से
पद्नाभ्स्वामी मंदिर के खजाने
और
उस खजाने को खोलने की याचिका डालने वाले
व्यक्ति की मौत से
पनपे अंधविश्वास
और अथाह दौलत
के इस्तेमाल के बारे में कुछ
जब पीने अखबार में देखी मर्लिन मुनरो की मूर्ति की तस्वीर
जिस पर टिकी हैं सारी दुनिया की निगाहें
और जिस ड्रेस के कारण ही
कहा जाता है कि
हो गया था उसका तलाक
हां मैं लिखना चाह रही थी बहुत कुछ इस महंगाई के मौसम
में टाटा के ३२ हजार का घर बनाने के प्रोजेक्ट के बारे में कुछ
देखो न
कितना कुछ था मेरे पास लिखने के लिए
और मैं बस लिखती रही
तुम्हे
तुम्हारे इन्तजार को
हर बार आने वाली इस सुखी सी बहार को
शनिवार, 25 सितंबर 2010
ताकि छोटा न हो शब्दों का आंचल
शनिवार, 21 अगस्त 2010
पेड न्यूज - पत्रकारिता के फूल पर मंडराता भंवरा
मंगलवार, 3 अगस्त 2010
बाइते का जाना और खबर का देर से आना
अपने व्यवहार और संस्कारों के ठीक उल्ट आज की पत्रकारिता से जुडऩे का नादान फैसला जब लिया था तब इस नादानी के पैमाने को मैं समझी नहीं थी। पढऩे, समझने और लिखने के बावजूद भी कुछ नादान सवाल गाहे-बगाहे मन में उठते रहते थे। ऐसा क्यों होता है, ये क्यों लिखा जाता है, वो तो कहीं छपा ही नहीं वगैर-वगैरह। मेरी मां जो सामाजिक शास्त्र की टीचर हैं, उनसे मैं अक्सर पूछा करती थी कि मम्मी असम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुुर, ये जो जगह हैं क्या यहां कभी कुछ नहीं होता। यहां की कोई खबर ही नहीं आती कभी। और फिर एक मासूम भ्रम मन में पाल लेती थी कि ये छोटे राज्य हैं। यहां सब कुछ ठीक ही रहता होगा। लेकिन आज अखबारों से जूझते हुए जब जनसत्ता के एक कॉलम पर नजर पड़ी तो मेरा भ्रम टूटा या कहूं कि चकनाचूर हुआ। क्योंकि टूटना तभी शुरू हो गया था जब पिछले दिनों मणिपुर में घट रही घटनाओं को हमारे अखबारों नें एक कॉलम की जगह दी और चैनलों ने शायद एक बुलेटिन में सिर्फ शाॉट-बाईट ही चलाया। राहुल महाजन का उसकी दूसरी बीवी से झगड़ा और उसका विश्लेषण हमारे मीडिया और ऐसे मीडिया को टीआरपी देने वाले दर्शकों के लिए ज्यादा जरूरी था। मैं यहां दर्शकों का भी जिक्र कर रही हूं क्योंकि हमेशा सिर्फ मीडिया को ही कोसा जाता है लेकिन ऐसे घटिया स्तर के मीडिया को पालने-पोसने का काम तो ये दर्शक ही करते हैं न। जो देश के एक अहम हिस्से की घटनाओं को जानने में दिलचस्पी तक नहीं दिखाते और एक नाकुछ इंसान की शादी और तलाक को नजरे गड़ाकर देखते और कान खड़े करके सुनते हैं। खैर मीडिया भी मोटापा बढ़ाने वाली इस टीआरपी रूपी मलाई का मोह छोड़कर अपने दायित्वों को याद रखते हुए सेहतमंद दूध रूपी वास्तविक न्यूज दे तो शायद बेहतर हो। पर इस बीच जो बेहद दुख भरा लगा वो है इंफाल में दूरदर्शन के समाचार संपादक राबर्ट बाइते की मौत की खबर का मीडिया में उनके अंतिम सांस लिए जाने के 52 दिन बाद आना। अमिताभ बच्चन को अगर किसी सूदूर आईलैंड पर खांसी भी आ जाए तो बड़ी खबर हो जाती है। कुछ लोगों पर इतनी पैनी नजर और कुछ लोगों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिए जाना। कुछ शहरों में धूप निकलना भी खबर और कुछ राज्यों में तबाही मच जाना भी बात से नदारद। खबरों की दुनिया का ये विरोधाभास बेचैन कर देता है। सवाल सिर उठाते हैं और फिर जवाब कहीं देर से ही सही लेकिन छप सके किसी कॉलम में मिलते हैं। जैसे आज मिले और मैं लिखने की इस नाकाफी सी कोशिश को करने से खुद को रोक न सकी। और बाइते के संदभॆ में खास बात ये भी है कि वो खुद मीडिया से जुड़े थे न सिफॆ खानापूरती के लिए बल्कि उन परदों को उठाने के लिए जिनके पीछे से आता शोर तो सबको सुनाई देता है लेकिन कोई उन्हें उघाड़ कर ये देखने की कोशिश नहीं करता कि इस शोर की वजह क्या है। उनकी मौत से जो सन्नाटा पसरा है उसके बाद पीछे छूट गए उस शोर को सुनने का साहस अब कौन दिखाएगा? कब मीडिया में सरोकारों का दौर वापस आयेगा? कब?? ये सवालों का केवल एक सिरा है। पूरी की पूरी एक रस्सी पड़ी है जिसके दूसरे सिरे तक सिफॆ सवाल है सवाल। गुरुवार, 15 जुलाई 2010
पत्रकार प्रहार और प्रतिरोध
मणिपुर के पत्रकार पिछले दिनो हड़ताल पर रहे और वहां दो दिनों तक कोई अखबार नहीं छपा। वजह थी कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े आतंकवादी पत्रकारों को उनके खिलाफ खबर छापने पर जान से मारने की धमकी देते हैं। पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर में कम से कम 25 पत्रकारों की हत्या हुई और 30 से अधिक को आतंकवादियों को मदद देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। मणिपुर जैसे कई राज्यों में आतंकवादियों ने मीडिया को वास्तव में बंधक बना लिया है। असम में 20 और मणिपुर में पांच पत्रकारों की हत्या हुई, लेकिन किसी को भी इस संबंध में गिरफ्तार नहीं किया गया. आतंकवादियों के साथ ही राज्य प्रशासन भी मीडिया का उत्पीडऩ करता है।
महाराष्ट्र में 5 जुलाई को भारत बंद के दौरान नागपुर के वेरायटी चौक पर कवरेज के लिए गए मीडियाकर्मियों पर भी पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया।
लखनऊ में क्वीन्स ूबेटन की कवरेज में गए पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी की गई। लाइव कवरेज करने वाले पत्रकारों को रोका गया और जब पत्रकारों ने विरोध किया तो अधिकारियों ने अफरातफरी का माहौल बनाते हुए कई पत्रकारों को जबरिया पुलिस के वाहनों में बैठा लिया। इसके बाद यहां से करीब एक दर्जन पत्रकारों को बलपूर्वक वाहन मे ठूंसकर मोहनलालगंज थाने को भेज दिया गया। इसके अलावा बेटन के साथ चल रहे लोगों को भी चौराहे पर घण्टों धूप व उमस भरी गर्मी में रोके रखा गया।
नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज के साथ हाल ही में नंदीग्राम पुलिस ने ऐसा बरताव किया जैसे वह कोई आतंकवादी हों।
कश्मीर में जिस तरह से स्थानीय पत्रकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है उससे भी तमाम लोग वाकिफ हैं।
पत्रकार के प्रतिकार का एक छोटा सा हालिया नमूना ये भी है
सिरसा और फतेहाबाद में बाढग़्रस्त, इलाकों का जायजा लेने पहुंचे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा एक पत्रकार के सवाल पर बुरी तरह झल्ला गए और उसे पत्रकार काांफ्रेस से बाहर निकल जाने का हुक्म सुना दिया। पत्रकार ने मुख्यमंत्री हुड्डा से पूछा था कि केंद्र सरकार ने बाढ़ से बचाव के लिए हरयिाणा को 75 करोड़ रूपए दिए हैं, लेकिन अकेले रोहतक को ही 23 करोड़ रूपए क्यों दे दिए गए। राज्य के बाकी जिलों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों। पत्रकार का यह सवाल हुड्डा का नागवार लगा और उन्होंन झल्लाते हुए पहले तो उससे उसके अखबार का नाम पूछा और बाद में उसे बाहर निकल जाने कह दिया। ज्ञात रहे मुख्यमंत्री हुड्डा रोहतक से ताल्लुक रखते हैं।
सोमवार, 7 जून 2010
मीडिया इंस्टिट्यूट -हर मोड़ पर है मिलावटी माल की एक महंगी दूकान
सालों पहले की पत्रकारिता को छोड़ दें और सिफॆ आज की बात करें तों इस सफर की शुरुआत के लिए सबसे जमीनी आधार और बड़ी जरुरत है वो होता है एक बढ़िया, नामचीन, रोजगार मुहैया करने वाला मीडिया संस्थान। इस तलाश में दिल्ली में तो आपको ज्यादा भटकना नहीं पड़ेगा। दिल वालों की दिल्ली में तो ऐसी दुकानों की कोई कमी नहीं है। चुनाव आपका है, विकल्प बहुत है।
आपसे साक्षात्कार में ये खूबसूरत सवाल पुछा जाना लाज़मी है कि आप पत्रकार क्यों बनना चाहते है। इस पर आपकी वजह चाहे आपकी ख़ूबसूरती हो, कड़क आवाज, आपका मिजाज या फिर लिखने की शमता लेकिन किसी भी सूरत में आपको ६ महीने में एंकर और रेडियो जॉकी बना ही दिया जायेगा। बड़ी कंपनी के ब्रांड की तरह यहां उस तरह का टैग तो नहीं लगा होता कि कंडीशनस एप्लाई, लेकिन जो कंडीशनस यहाँ एप्लाई की जाती हैं वो बस एक नोटों की एक मोटी गड्डी है।
खैर व्यंग्य रूप में बहुत कुछ कहा जा सकता है क्योंकि मीडिया की पढाई किसी मजाक से कम नहीं रह गई है लेकिन जब बात छेड़ी है तो कुछ तथ्य जिकिरियाना जरुरी है
पत्रकारिता के कोर्से तीन तरह के संस्थान चला रहे है
एक जो सरकार के माध्यम से पोषित है
दुसरे जो नामी विश्विधाल्यों से मान्यता के नाम पर अपना स्कूल खोले हुए है
तीसरे वो जिन्हें खुद न्यूज़ चैनेल और अख़बारों ने खोला है। सबसे ज्यादा चलने वाली दुकान दरअसल यही है। यहाँ प्रोफशनल लोग पढाते है, पूरा माहौल होता है जिसमे आगे जाकर काम करना है। नाम तो वैसे दिल्ली विश्वविधालय का भी कम नहीं है लेकिन जहाँ तक पत्रकारिता की बात है तो ये ऊँची दुकान फीका पकवान वाली बात होगी
प्रिंट मीडिया , इलेक्ट्रोनिक मीडिया से लेकर फिल्म प्रोडक्शन जैसे विषय हिंदी के अध्यापक पढ़ा रहे है। हालाँकि अध्यापक अपने स्तर पर छात्रों को सम्बंधित जानकारी उपलब्ध करा भी दे तो ये उसकी निजी व्यावहारिकता होगी। लेकिन एक भाषा के टीचर से मीडिया पढवाना दोनों तरफ से शोषण करना है। जिस तेजी से मीडिया में बदलाव हो रहे है, हर एक साल पर कोर्से रिवाइस होने चाहिए। यहां तो पिछले कई सालों से आज़ादी के समय वाली पत्रकारिता पढाई जा रही है जबकि अब हम नई तरह की बेड़ियों में जकड़े जा चुके है। आज अगर जो लिखा है ये पहले कहीं पढ़ लिया होता तो अब ये लिखने की नौबत नहीं आती। खैर ये बेहद निजी भाव है। लेकिन अगर मीडिया एक उभरता करियर विकल्प बन रहा है और लोग उसमे आना चाहते है तो पढाई के स्तर पर भी बदलाव होना बहुत जरुरी है। क्योंकि पत्रकार बेशक प्रधानमन्त्री नहीं होता लेकिन वो एक पत्रकार होता है जो अपने स्तर पर पूरी तरह आज़ाद होकर देश और दुनिया से जुड़े कई आयाम गढ़ सकता है। जब शिक्शा नितियों में सुधार की बात चल ही रही है तो ये सवाल उठाना और सबको दिखने वाले इश दृस्य को शब्दों के माध्यन से प्रतिबिंबित करना मुझे जरुरी लगा। शायद कोई माननीय पहुंच वाले व्यकित पढ़ ले और कुछ बदलाव हो सके.......
सोमवार, 25 जनवरी 2010
मीडिया में रण
बहुत शोर सुनते थे पहलु में दिल का /जो चीरा तो एक कतरा खून न निकला .........मीडिया में मीडिया के लिए मीडिया द्वारा मचे 'रण' का फलसफा भी कुछ ऐसा ही है । नही जानती कि फिल्म रण में क्या होगा ,पटकथा कितनी मजबूत होगी, क्लाइमैक्स कितना बेहतरीन लेकिन बेशक फिल्म को अच्छे खासे दर्शक मिल जायेंगे । आम दर्शक रूचि लें या न ले मीडिया वालें सारे लोग तो जरुर देखने जायेंगे । कोई हर्षवर्धन मालिक (अमिताभ बच्चन )से खुद को जोड़कर देखेगा तो कोई पूरब शास्त्री(रितेश देशमुख) में अपना अक्स पायेगा। और फिर वो मासूम दिल भी तो इस फिल्म के दर्शक होंगे जो मीडिया में आने का सपना पाले कभी इंडियन एक्सप्रेस के पन्ने पलटते है तो कभी विनोद दुआ और बरखा दत्त के प्रोग्राम टी वी पर एक ताकि लगाकर देखते है । रण में तो उनके सामान्य ज्ञान के लिए काफी मसाला है । मीडिया के अन्दर होने वाले रण तो फिल्म २६जनवरी को रिलीज़ हो जाएगी लेकिन एक रण और भी है मीडिया में आने के लिए लड़ा जाने वाला रण जिस पर फिल्म बेशक कोई न बनाये लेकिन निसंदेह ये चर्चा का विषय तो जरूर है ..चाहे वो चर्चा चोरी छुपे ही क्यों न हो होती जरुर है । मैं जरा खुले आम कर रही हूँ । इस चोथे इस्ताम्भ कि चारों दीवारों पर जैसे बाज़ार , पूँजी , सत्ता और एक अनकहे स्वार्थ के दरवाजे लगे है जो इन्हें खोल लेता है वो अन्दर जा सकता है और जिसके पास ऐसी चाबियाँ नही है उसके लिए मीडिया किसी जंतर मंतर या भूल भूलैया सरीखा ही है । एक रण ये भी है जो पत्रकारिता को पैत्रेकारिता के रूप में अपनाने पर मजबूर कर देता है । चलने से पहले ही गिरने का एहसास पैरों कि सारी ताकत को भस्म कर देता है । 'क्या करेंगी मीडिया में आकर दुनिया बदल लेंगी या समाज ? ऐसी मेरी हसरत कहाँ जनाब मैं तो खुद ही को बदलूंगी ।' अख़बारों में तमाम ख़बरें और इश्तिहार छपते है लेकिन किसी चैनल या पुब्लिकतिओन में भर्तियाँ हो रही है ये सुचना आपको मीडिया के किसी माध्यम में बमुश्किल ही मिलेगी । यहाँ सूत्र, सौर्स और संबंधों के आधार पर आपकी सेवाए तय की जाती है । फिर खुदी को भुलाकर खुद को बुलंद करने की जो रस शुरू होती है वो भी रण है । व्यवस्था की आलोचना करने वाला मीडिया खुद किस हद तक अव्यवस्थित है इसका तकाजा एडिटर्स गिल्ड से ज्यादा उन तमाम लोगों को होता है जो हर रोज अपना किया धरा पोथी पत्र हाथ में लेकर निकलते है और दफ्तार्रों के दरवाजे से एक प्रश्नचिन्ह साथ लेकर लौट आते है
गुरुवार, 14 जनवरी 2010
हर शक्स यहाँ इतना परेशान क्यों है (२)
"खुद परेशां होंके हम समझे हकीक़त फ़साने कि " हुआ यूँ कि नौकरी कि तलाश में भटकते हुए मैं एक न्यूज़ चैनल के दफ्तर पहुची ...चैनल का नाम न जाहिर करते हुए सिर्फ ये कहना काफी होगा कि जिस तरह मैं मीडिया मैं संघर्ष के दौर से गुजरती नयी प्राणी हूँ जो पत्रकार बनना चाहती है उसी तरह ये चैनल भी कुछ वक़्त पहले ही चोथे इस्तंभ में शुमार हुआ है .....तो मैं रिसेप्शन पर पहुंची और उसके बाद हुआ संवाद कुछ इस तरह रहा
रिसेप्शनिस्ट - क्या काम है ?
मैं -एच आर डिपार्टमेंट में जाना है
रिसेप्शनिस्ट- किससे मिलना है ?
मैं - यहाँ कोई जॉब ओपनिंग है क्या ?
रिसेप्शनिस्ट-हा है तो आप को किससे मिलना है
मैं -मुझे उन्ही से मिलना है जो नए लोगो का इन्तर्विएव(साक्षात्कार ) ले रहे है
रिसेप्शनिस्ट- मैडम आप अपना रिज्यूमे यहाँ दे दीजिये हम आपको अइसे किसी से
नही मिलवा सकते
मैं -सर मेरे पास कोई रेफरेंस नही है कृपा करके मुझे किसी से एच आर में मिलवा दीजिये ताकि मैं खुद अपना रिज्यूमे उन्हें दे सकू ...
रिसेप्शनिस्ट-आप ज्यादा परेशान हो रही है तो मैं आपको एक बात बताना चाहूँगा कि यहाँ हर रोज १०० -१५०
रिज्यूमे आते है हम सारे ऊपर पहुंचा देते है लेकिन होता उन्ही का है जिनका कुछ जुगाड़ होता है ...हमारी तरफ से आप निश्चिन्त रहो हम तो पहुंचा देंगे ..लेकिन आगे का भगवान् मालिक है ॥
मैं ------------------अब इसके बाद मैं क्या कहती है काफी कोशिशों के बाद भी मुझे किसी से मिलने नही दिया गया और मैं निराश खली हाथ वापस आ गई .....हाथ लगा तो बस ये कुछ शब्द...आज कि एक नयी पोस्ट ....
अब समझ में आता है कि हर शक्स यहाँ इतना परेशान क्यों है ....अगर मीडिया में काम करने वाले अनुभवी लोगो में से कोई भी मेरे इस अनुभव पर रौशनी दाल पाए तो मेरी निराशा के ज्वार को थोडा सहारा मिल जायेगा .........क्योंकि अपना तो कोई जुगाड़ नही है भाई ......कब तक चलेगी ये शीत लड़ाई .......
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
हर शक्स यहाँ परेशान क्यों है (१)
बयान नही हो सकता । और भी बहुत कुछ है कहने के लिए अभी तो सफ़र शुरू हुआ है न जाने क्या कुछ देखना और लिखना हो सकता है ......सफ़र जारी है ....संघर्ष भी ..और कलम भी
कमजोरी
उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...
-
1. तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएं पास आ गयी हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमट...
-
उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...
-
नींद खो गई है भूख सो गई है सिर्फ प्यास लग रही है उफ़ ! ये इश्क कांटे ही थे वो चमकीले कागज में लिपटे हुए हम माना किये गुलाब गिर गए...

