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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

भाषा पर डिप्लोमेसी क्यों भाई


अपनी जेब से दस रुपये का नोट निकालिए (नोट 50 या 100 का भी चल सकता है, लेकिन बढ़ती महंगाई में ज्यादा दिल क्यों दुखाएं) अब इस नोट पर ढूंढिए कि कितनी भाषाओं में दस रुपये लिखा है। हिंदी और अंग्रेजी में लिखा दस रुपये तो आपको तुरंत दिख जाएगा। मगर जरा गौर करेंगे तो बांयी तरफ 15 अन्य भाषाओं में भी दस रुपये लिखा होगा। 15 अन्य भाषाएं बोले तो असमी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत‌, तमिल, तेलुगु और उर्दू। बात की शुरुआत ही इस बात से करने का मकसद ये है कि इस बात पर मैंने भी हाल ही में गौर किया है कि इंडियन करंसी शायद अपने आप में इकलौती ऐसी करंसी है, जिस पर 17 भाषाएं लिखी हुई हैं। एक देश और 17 भाषाएं। इस विविधता को ही भारत की पहचान माना जाता है, बेशक अब इसमें बसने वाली एकता धीरे-धीरे टूट रही हो। जिस देश में इतने सारे अलग-अलग तरह के लोग हों वहां इतनी सारी भाषाओं का होना हैरान नहीं करता। हैरान करती हैं हिदीं दिवस जैसी तारीखें और इन तारीखों के कर्ता-धर्ता यानी हमारे रहनुमाओं के लगातार अंग्रेजी में गिगियाते भाषण और घोषणाएं। डिप्लोमेसी के मामले में भारत भी पाकिस्तान से कुछ कम पीछे नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान आतंकवाद जैसे खतरनाक और गंभीर मुद्दे पर भी डिप्लोमेसी की चाल चलकर खुद को शातिर समझता है औऱ भारत भाषा जैसे सरल से विषय को भी अपनी डिप्लोमेसी में लपेटकर अपनी विश्व की उभरती ताकत बनने वाली छवि को मटमैला कर देता है। जब जिस देश के संविधान में बाकायदा एक भाषा को अपनी राष्ट्र भाषा बना लिया गया है लोगों को हिंदी वासी के तौर पर पहचान दी गई है वहां बात-बात पर हर काम-काज में अंग्रेजी क्यों हावी हो रही है। मैं यहां ये सब इसलिए नहीं लिख रही कि मैं अंग्रेजी के खिलाफ हूं बल्कि मैं इसलिए लिख रही हूं क्योंकि मैं खिलाफ हूं ऐसी व्यवस्था के जहां कहा कुछ जाता है और किया कुछ औऱ जाता है। मैं खिलाफ हूं या शायद हर वो शख्स खिलाफ है इस दोगुली नीति के जो अपनी मूल पहचान से प्यार करता है औऱ चाहता है कि उसकी पहचान को उसी रूप में पहचान मिले जिस रूप में वो है। अमेरिका से लेकर चीन तक बोलचाल से लेकर कामकाज, यहां तक कि चीन में तो इंटरनेट विंडोज और तमाम सॉफ्टवेयर तक उनकी अपनी भाषा में बने हैं न अंग्रेजी न कोई और भाषा। मान लिया जाए कि भारत में सिर्फ हिंदी ही नहीं कई क्षेत्रीय भाषाएं हैं और कुछ प्रदेशों में लोग हिंदी को बिल्कुल नहीं समझते तो फिर मैं बात को यहीं खत्म करते हुए ये कहना चाहूंगी कि हिंदी दिवस मनाना या हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना बंद किया जाना चाहिए तुरंत प्रभाव से, क्योंकि हम भारत के युवा वही देखना चाहते हैं जो सच में है न कि वो जो कभी था ही नहीं और न ही कभी हो सकता है।
14 सितंबर 2012 

शनिवार, 25 सितंबर 2010

ताकि छोटा न हो शब्दों का आंचल

शब्दों से हमारा रिश्ता बहुत ख़ास होता है . लेकिन इस रिश्ते का महत्व तब तक एक रहस्य बना रहता है जब तक की कोई ऐसी परिस्थिति न आन पड़े कि  हमारे पास भावनाए हो और शब्द न मिले. वो एक अनमना सा पल जब अचानक शब्द गले तक पहुँच कर फिसल जाये जुबान तक आ ही न पाए. कितनी तकलीफ से भर जाता है मन ,  मन की बात कहने को जुबान व्याकुल सी हो जाती है लेकिन दिमाग है कि एक भूलभुलैया में खो जाता है . शब्दों की भुलभुलिया . जहाँ अपनी भावनाओ को सही शब्द दे पाना एक मुश्किल से भरा फैसला होता है.


ये बातें मैं किसी प्रेम प्रसंग या किसे कहानी के वश में होकर नही लिख रही हूँ, बल्कि पिछले कुछ दिनों से एक अखबार के दफ्तर में काम करते हुए, हुआ एक अनुभव है , जहाँ शब्दों के लिए शब्दों के ही बीच में हर रोज एक  जंग सी होती है. सभी के सुझाये गए शब्दों की अपनी एक वजह है. उनकी बोली, उनका परिवेश,उनकी पढाई .....और फिर हर शब्द के साथ काम करने वाली उनकी निजी सोच. मगर उस एक वक़्त जरुरत होती है हर तरह से फिट एक अदद शब्द की. शब्द मिलने के बाद उसकी लिखावट पर चर्चा. कहीं छोटा उ कही बड़ी ई. हालाँकि हर अखबार की अपनी एक स्टाइल शीट होती है लेकिन फिर भी हिंदी के अख़बारों में भाषा गत शुद्धता को लेकर बहुत सारा विरोधाभास है ....पढाई के दिनों में हमें अच्छी अंग्रेजी के लिए द हिन्दू पढने को कहा जाता था लेकिन वही हिंदी को लेकर हम अपनी अशुधता को दूर कर सके उसके लिए किसी एक भी अखबार का नाम ध्यान नही आता . ख़बरों की अपनी अलग पहचान के साथ अखबार या चैनल की पहचान उसकी भाषागत शैली के साथ भी जुडी है.मीडिया में हर बढ़ते दिन के साथ नए नए प्रयोग हो रहे है अलग तरह के कोलुम्न्स ले आउट लेकिन भाषा को लेकर सिर्फ एक निजी सोच और समझ  है वास्तव में सही क्या है इसका फैसला एक बड़ी बहस का बाद भी न निकले शायद. कुछ आगे बढ़कर कहीं कहीं तो हिंदी लिखने के साथ भी अजीब गरीब आसान नुस्खे अपनाये जा रहे है. एक तर्क ये होता है की वही लिखना है जो पाठक  को समझ में आये. लेकिन समझाने का ये कौन सा तरीका है की शब्द की बनावट ही अपने हिसाब से तय कर ली जाये. और फिर आम भाषा बोलचाल की भाषा और अखबार और चैनल की भाषा में कुछ तो फर्क होता है न . मुझे लगता है कि यंग इंडिया का मीडिया बनने से पहले शायद इंडिया का मीडिया बनना ज्यादा जरुरी है क्योंकि यंग इंडिया भी इंडिया को खोना नही चाहता वो अपने जुगाड़ करना अच्छे से जानता है उसके लिए इंडिया की भाषा, संस्कृति को idiotik  बनाना सही नही होगा.
शब्द भी बाकी चींजों कि तरह हमारी अनमोल धरोहर है उस एहसास से ही मन मायूस हो जाता है कि कहीं कोई शब्द खो गया है
प्रोयोगों के इस दौर में झांक के देखेंगे तो एक गहरी खाई है जिसमे बहुत सारे शब्द गिरा दिए गए है उन्हें वापिस लाने की कोशिश करनी चाहिए .............ये कोशिश कामयाब होना भी निहायत जरुरी है ताकि शब्दों के आंचल में हमेशा हमारी भावनाओ की बयाँ करने के लिए जगह रहे

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

अंग्रेजी से चल रहा है एक्स्ट्रा marrital affair

उसका आयोजन ख़बरों में छाया हुआ है. कहीं एक दिवस. कहीं सप्ताह .कहीं पूरा पखवाडा. कोई एक शब्द कह रहा है. कोई कई वाक्य, और कोई दे रहा है पूरा भाषण. १४ सितम्बर हिंदी दिवस है. हिंदी हमारी ये, हिंदी हमारी वो. हिंदी के लिए हमें ये करना चाहिए, हिंदी के लिए हमें वो करना चाहिए. 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे'. पूरा साल क्या होता है हम जानते है.
अभी कुछ दिन पहले जो हुआ वो बताती हूँ
एक बच्चे से बात कर रही थी मेरा सवाल हिंदी में था उसका जवाब अंग्रेजी में सवाल था , कौन सी क्लास में पढ़ते हो?  जवाब दिया फिफ्थ ए.
बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ? जवाब दिया 
आई वांट  बिकेम मैथ्स टीचर. 
सुनकर हंसी आ गई और साथ ही आई एक सोच भी. क्या पढ़ रहे है बच्चे ?? कैसे बढ़ रहे है बच्चे ?? न हिंदी बोलना चाहते है न अंग्रेजी बोल पाते है. उर्दू और संस्कृत की तो भनक तक नही है उन्हें. शायद ही वो जानते हो कि ये भी दो भाषाएँ है. बच्चे प्रेमचंद को नही जानते उनकी कहानी ईदगाह को पढ़ भी ले तो वो चीमटा  क्या होता है , ये ही नही समझ पाएंगे. वो नही समझ पाते जब उनसे कहा जाता है कि पुनजब में धान उगाया जाता है उन्हें बताना पड़ता है कि धान मेंस राईस होता है यानि चावल.
एक समय था जब हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद  करते थे अब बच्चों को हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करके बताना पड़ता है. वो अपने आस पास के शब्द ही नही समझते. उनकी सेब शब्द को सुनने समझने कि शक्ति उतनी नही है जितना वो एप्पल को समझते है. बच्चों की बात तो ये है कि वेह स्कूल में अंग्रेजी बोलने कि जबरदस्त बाध्यता से बंधे है और घर का देसी माहौल उन्हें उस सीखे पढ़े को उस तरह अप्लाई नही करने देता जिस तरह वो सीख रहे है. नतीजा टूटी फूटी अंग्रेजी और आधी अधूरी हिंदी.
अब अगर बात अपनी, यानि हर रोज हिंदी लिखने पढने वालों,  हिंदी की रोटी खाने वाले लोगों की करें तो सुकून और कम हो जाता है
हर दिन शब्दों में उलझना, उन्हें समझना.  एक अजनबी की तरह तमाम शब्दों से रोज मुलाकात होती है.  कुछ शब्द ऐसे जो समझ आते है लिखावट में नासमझी हो जाती है . कुछ लिखे देते है लेकिन वो शब्द कहीं सुने हुए नही लगते. हर दिन की  अलग कहानी है. 
आखिर इस कहानी की वजह क्या है,पढाई का कमजोर ढांचा या पढने में हमारी कमजोरी?????
एक वजह तो भाषा गत बाध्यता भी है हम अंग्रेजी से कुछ ज्यादा ही प्यार कर रहे है हिंदी से शादी हुई  और अब ये एक्स्ट्रा मरिटल अफ्फैर अंग्रेजी के साथ कुछ ज्यादा ही लम्बा हो रहा है और ज्यादा ही संजीदा भी. 
अब हम मनाते रहे हिंदी दिवस. हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाडा एक दिन जब ये हिंदी रूठ कर उन अग्रेजों के देश चली जाएगी तब शायद उसकी कीमत पता चलेगी.ये धमकी नही है न हीमैन धमकी देने की हैसियत रखती हूँ शायद क्योंकि मैंने भी अंग्रेजी सीखी है बोली है पढाई है पर इतना कहना काफी होगा की हिंदी भाषाओँ में मेरा पहला प्यार है.


कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...