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सोमवार, 11 जून 2012

जिदंगी में एक दुनिया रहती है



दीवार में एक खिड़की रहती है-विनोद कुमार शुक्ल।


काश.. जिंदगी का होना.. जिदंगी में जिंदगी का होना भी होता। अजीब सी है न ये लाइन। लेकिन विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास दीवार में खिड़की रहती है ....पढ़ने के बाद... आपको धीरे धीरे इस तरह की अजीब लाइनें भी समझ आने लगती हैं... और साथ में समझ आने लगता है.. जिंदगी का एक नया चेहरा।


सच में समझ नहीं आता कि कहां उलझी है जिंदगी... ऐसी कितनी ख्वाहिशें हैं.. जिन्हें पूरा करने के दौरान खुद से ही मिलने का वक्त नहीं मिल पा रहा। खुद को पीछे छोड़कर कैसे आगे बढ़ रहे हैं हम। क्या ये आगे बढ़ना सही में वो आगे बढ़ना है जिस तरह हम आगे बढ़ना चाहते थे।


जानती हूं कि ये सारी बातें किसी भी वक्त.. कोई भी लिखने वाला इंसान लिख सकता है। मैं कुछ नया नहीं लिख रही। सही मायनों में कहूं तो ..बहुत ही घिसी पिटी बकवास लिख रही हूं।


लेकिन हमारी बहुत ही तमीजदार जिंदगी में इस तरह की एक बकवास की जगह होना भी जरूरी है। ये बकवास कई बार वजह दे देती है.. जिंदगी में.. जिंदगी को महसूस करने वाले कुछ पलों से मिलने की। ऐसे पल... जब बिन बात के हंसी आ जाती है ...और बिन बात के रोना। जब बिना पहचान के कोई मदद कर देता है और जान बूझकर किसी का परेशान करना भी अच्छा लगता है।




बीच में ही इम्तिहान आ जाने की वजह से कई दिन लग गए इस उपन्यास को पूरा पढ़ने में। आज.. अभी.. इसका आखिरी पन्ना पढ़कर पूरा किया इस उपन्यास को।


यकीन मानिए.. बड़ी तेज फीलिंग हो रही है कि काश एक ऐसी खिड़की मेरे पास भी होती.. जिसे जब चाहे लांघकर मैं अपने मन की दुनिया में जा सकती।


विनोद कुमार शुक्ल को पहली बार पढ़ा मैंने। काफी जगह लगा कि क्यों पढ़ रही हूं इस उपन्यास को मैं। न इसमें कोई हीरो टाइप का चरित्र है न कोई संघर्ष न कोई विशेष परिस्थिति..छोटे छोटे से कुछ ब्यौरे हैं बेहद छोटी छोटी बातों के। मगर इसका सार तब समझ आता है जब आप उपन्यास का आखिरी पन्ना पढ़ते हैं...पता चलता है कि


 जिंदगी में इस तरह की भी एक दुनिया रहती है जो दीवार की खिड़की से बाहर निकलकर ही दिख सकती है....ये दिखना दरवाजे से नहीं हो सकता...दरवाजा उस दुनिया में दाखिल ही नहीं होने देता कभी...




फिर वही ख्वाहिश कि काश ये  खिड़की मेरे घर की दीवार में भी होती
पर घर ही नहीं है
किराये का है तो खिड़की कैसे हो सकती है....

बुधवार, 22 जून 2011

रात, चाँद और एक सवाल

सारा आसमान नीला था
मगर चाँद पर पड़ी थी
सफ़ेद बादलों की एक चादर
सब लोग सो गए
मगर रात बेचैन थी
चाँद चादर की ओट में से भी
बहुत कुछ कह रहा था
मगर रात खुले आम घूमते हुए
 भी खामोश थी
मैं एक टक चाँद को देखती
और एक पल रात को महसूस करती
ये वो समय था जब सारी कायनात शांत थी
पेड़ फूल  पत्ते कलियाँ
झील झरने सागर नदियाँ
सब
मगर मैंने सुना कि
रात और चाँद चीख चीख कर
बातें कर रहे हैं
चाँद है तो रात है
और
रात है तो चाँद है
मगर
चाँद वहां है
रात यहाँ है
ये कमबख्त खुदा कहाँ है





मंगलवार, 7 जून 2011

ये नामुराद शहर

सपनो की अपनी एक दुनिया होती है लेकिन
मधय्वार्गिये लोगों की  दुनिया में सपनो की दुनिया का नाम कुछ  शहरों से जुडा है
जैसे लोग हनीमून मनाने के लिए स्विट्जर्लैंड  जाने का सपना देखते है
गर्मिया बिताने के लिए शिमला, मंसूरी या नैनीताल जाने का 
सपना देखते है
जीवन के आखिरी पड़ाव पर चारों धामों की यात्रा करने का सपना देखते है
और
युवा एक नई, बेहतर, शानदार, सितारों सरीखी जिंदगी जीने के लिए मुंबई जाने का सपना देखते हैं
क्या सपनो की दुनिया सिर्फ मुंबई है ....?
मैं मुंबई में रहने वाली ऐसी आँखों को भी जानती हूँ  जिनमे घर वापस लौटने का सपना पलता है
घर जो लखीम पुर खीरी में है , घर जो उज्जन में है , घर जो चित्रकूट में है...घर जो रांची में है
एक तरफ से देखें तो  घर वापसी का ये सपना गलत है, भावुकता है 
या कमजोरी है
दूसरी तरफ से देखे तो ये सपना प्यार है , लगाव है , खिंचाव है 
या जरुरत है
सपने सिर्फ वही तो नही होते न जो शाहरुख़ खान  बनने के लिए देखे जाते हैं..सपने वो भी होते हैं जो गरमी में बिना बिजली के सोती माँ के लिए इन्वेर्टर लगाने के लिए देखे जातें है...जो पापा की झुकती कमर को अपने हाथों के सहारा देने के लिए देखे जाते हैं  इसलिए बहुत से ऐसे सपने हैं जिनका शहर मुंबई नही है नॉएडा  है , गाज़ियाबाद है,  कलकाता है, बिहार भी है और ऐसे ही बहुत से नामुराद शहर जहाँ इन लोगों का घर बसता है
इस सब की जद्दोजहद में सिर्फ एक सपना होता हैं घर वापसी का


विस्थापन एक बेहद पीड़ादायक शब्द है और भविष्य बनाने के लिए घर बार को छोड़कर दूर किसी दूसरे शहर में जा बसना विस्थापन सरीखी ही पीड़ा देता है.. हाँ ये पीड़ा पथरीली नही होती मखमली होती है मगर पीड़ा तो होती है न


मंगलवार, 24 मई 2011

पगडंडी


 झीलों के किसी शहर में
तुम्हारे साथ रहना
समुंदर के किनारे
नंगे पाँव हाथों में हाथ डाले घंटों टहलना
पहाड़ों की हसीं वादियों में
जोर से तुम्हारा नाम पुकारना
और कभी शाम ढले
फूलों के एक बगीचें में तुम्हारे साथ
बैठकर
घर लौटते पक्षियों को देखना
तुम्हारे लिए तुम्हारे साथ
प्रक्रति के इस हर एक रूप को साक्षी मानकर
मैं चाहती हूँ
तुम्हे प्रेम करना
पर क्या तुम...
क्या तुम चाहोगे ?
मेरे साथ इन बहारों के बीच
अचानक आ गए
पतझड़ में
किसी  पगडंडी पर चलना


शनिवार, 7 मई 2011

माँ

माँ
सोच में हूँ कि कैसे अलंकृत करूँ
इस व्यंजन को जिसका स्वर
मेरे पूरे जीवन का आधार है
घनी धूप  में पेड़ की छाया कहूँ
या अंधेरों में रौशनी का एहसास
अतुल्निये हो तुम माँ .....................
फ़िर किस से तुलना करूँ तुम्हारी
कौन है इस जग में तुम जितना ख़ास
असमंजस में पड़ जाती हूँ जब देखती हूँ
हर माँ में वही  जज्बा
वही  जज्बात
संघर्ष , समर्पण और सहनशक्ति की वो अद्भुत मिसाल
जीवन के हर मुश्किल दौर में उसकी दुआओं का साथ
देने को उसे क्या दूँ
उसकी ममता जितना अनमोल
कुछ नही है मेरे पास
हे इश्वर !!!!!!!!!!!!!हे अल्लाह
कबूल करना इतनी दरख्वास्त
जिस आँचल  के सायें में
पली बड़ी हूँ, उस झोली में खुशियाँ भर सकूँ
कर सकूँ कुछ तो रहमत तेरी
न कर सकूँ तो माँ को कभी कोई दुःख भी न
दूँ
न कर सकूँ तो कभी उसे मैं कोई दुःख न दूँ

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

रात चाँद मैं और रेल

रात, चाँद, मैं और रेल
रास्तों का शोर, सूनी पड़ी सड़कें, बेवफा नींद और तेरी यादों का खेल
भूल बैठी थी कि अब तक याद है मुझे
वो बात वो साथ 

वो अनकहे से रिश्ते की 
अनजाने ही बढती गई एक अमरबेल
रात, चाँद, मैं और रेल
ख्वाबों की जगह यादों ने ले ली है
एक कोने में जा खड़े हुए हैं ख्वाब
खुश है देखकर
रोतें रोते यूँ  

एक दूसरे से लिपटती यादों को
जैसे बरसों बाद मिली हों  मुझसे
आज ख़त्म हुई हो जेल
रात, चाँद, मैं और रेल
इन अंधेरों के बीच 
गलती से जला रह गया
पीली रौशनी वाला एक बल्ब
तुम हो जैसे
और मेरा किरदार टुब्लाईट जैसा
बुझ बुझ कर जलने वाला
कैसे हो सकता है
और
कैसे हो सकता था ये मेल
रात, चाँद, मैं और रेल

इस गाड़ी की एक पटरी  थी
जिससे ये उतर जाती तो
हादसा हो जाता है 
इस लड़की की एक परिपाटी है
जिस पर चलती है तो फासला हो जाता है
अब न उड़ान को तालों में बंद कर सकती हूँ
न कस सकती हूँ आसमान की ऊंचाई पर नकेल
रात, चाँद, मैं और रेल
अपनी सी, अनजानी सी रात.. खो गई
चाँद पर पड़ गया बादलों का पर्दा
गर्म चाय समोसे की आवाज ने बताया
सुबह हो गई
अब आगे का रास्ता सूना था
और सड़कों पर था  शोर
अब न रात है न चाँद न रेल 





शनिवार, 26 मार्च 2011

एक चुटकी चैन


कुछ दिन पहले किसी ने ये दुआ दी थी मुझे  'तुम्हारा  इंसानी रूप दुनिया की हर तीखी धूप में बचा रहे। यह रंग जो तुम्हारा अपना है हंसी का, खुशी का, बचपन का, रिश्ते का, बरकरार रहे हर उस हमले से जो मासूमियत पर होता ही है हर तरफ से।
काश कि यह सब जिस जमीन पर खडा होकर मैं कह रहा हूं उसको पूरा पूरा पढ पातीं तुम। हालांकि उससे भी फर्क यही पढता कि तुम रो देतीं।''
 हाँ मैं रो देती ...
अधूरे अहसास और अनकहे लफ्जो के इस मकडजाल के बीच सच  में मुश्किल तो है उस जमीन को पूरा पूरा पूरा पढ़ पाना जहाँ जज्बात सिर्फ जरुरत भर रह गए है..जहाँ प्रेम करने के लिए प्रेम नही किया जा रहा.. जहाँ हम सब एक दुसरे के लिए सिर्फ माध्यम बन गए है.
लेकिन क्या फर्क पड़ता है अगर मैं उस जमीन को न भी पढूं तो ...
कदम बढ़ाते ही तो पैरों के नीचे वही जमीन होती है
और बिना पढने की मोहलत लिए मुझे उस जमीन को समझ कर संभल कर कदम रखने के बारे में सोचना पड़ता है.
हाँ मुझ पर हमला होता है
जब मेरे मासूम सवालों को
मायूस कर देने वाले जवाब मिलते है
जब मेरे दिल में बैठकर कोई मेरे दिमाग को
परख रहा होता है
जब उम्र भर के लिए साथ हो जाने वाला कोई लम्हा
बरसो पुराना बीता पल बन जाता है
और जब
मेरी आँखों को पढ़ सकने वाला
कोई शख्स
ढेरों शब्दों को भी नही समझ पाता है 
ये निरी कोरी भावनाए है
हर किसी का  दिल बहता होगा इनमे
मेरा जरा सा डूब गया है
और इस डूबते से मन को तिनके की तरह इन शब्दों का सहारा मिल रहा है
और ये शब्द कम्भक्त नशा बन गए है शराब की तरह
जिस दिन न पीयू नींद नही आती
 जिस दिन न लिखूं चैन नही मिलता
और फिर इतनी सख्त जमीन पर चलने के बाद
एक चुटकी चैन तो चाहिए न ....




मंगलवार, 25 जनवरी 2011

लम्हा लम्हा तनहा तनहा अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ





लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
चाँद की चांदनी में खामोश रात
सूरज के उजाले में बेचैन दिन
वक़्त के सायें में सिसकते जज्बात
और साथ होकर भी जीना तेरे बिन
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
हवा के महकते झोंको
में उचटता सा मन
बादल गरजकर बारिशें लाकर
हर शय  को भिगोता सावन
और गीली गीली भीगी भीगी सी इस रुत में
सुखा रह जाता मेरा दामन
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
लम्बे रास्ते दूर मंजिल
चलने का शौंक
और
पहुँचने का हुनर भी
फिर मिलना दिलों जाँ को
तोड़ देने वाली एक थकान
महफ़िल से गुजरकर
वीरान सा एक मकाम
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
सांसो के एहसास से धड़कन की आवाज तक
कई मर्तबा तुझे खोकर
फिर से पाने की तारीख से आज तक
न जाने कितनी बार
मैंने खुद को तेरा होते हुए पाया है
और अब
जिंदगी का यूँ तुझे पराया कर जाना 
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

तन्हाई पर नहीं 'रजाई' पर लिखूं



 आज सोचा कि
जिंदगी की तन्हाई पर नही 
हर रात मुझे गुदगुदाता है जिसका अहसास 
अकेले से बिस्तर की उस रजाई पर लिखू 
उन बातों पर नहीं
जिनसे बेमानी हो गए थे रिश्ते 
उन मुलाकातों पर लिखूं 
जिन्होंने हर बार दे छोड़ी 
दोबारा मिलने की एक वजह
उन किस्सों को न फिर से आम करूँ आज 
जिन्होंने हर खास पल को बना दिया था खोखला
अब लिखूं वो कहानिया 
जिन्होंने राजा रानी की ख़त्म हो चुकी कहानी को भी 
आगे बढ़ाने का होंसला दिया 
करूँ कुछ ऐसा क़ि
चाँद शर्माए और शिद्दत भी शर्मिंदा हो जाए 
देश दुनिया से दूर किसी द्वीप पर '
कोई ताजमहल नहीं 
एक तस्वीर बन आऊं 
बस एक वो ही न जान पाए
उसकी बेकरारी का मुझ पर असर 
और सारी कायनात को खबर हो जाए
क्यूँ लिखूं मैं कुछ दिल पर
दिल की बातों पर 
या दिल के बारे में
आज जिक्र करना चाहिए मुझे धड़कन का 
जिसने दिल के हर बदलते रुख को दिया है 
आगे बढ़ने का रास्ता 
ख्वाइशों और खामोशियों पर जाने कितना कुछ लिखा गया है आज तलक 
आज सोचती हूँ लिखूं उन इशारों पर 
जिन्होंने हर बार किया था खबरदार 
दिल की बातों में बह जाने से
दिखाया था आईना कई बार 
मिलाया था 
मेरे ही अक्स में मेरी जिंदगी से जुड़े हर अफ़साने से
उसने नहीं लिखे थे कभी ख़त मुझे 
भेजे थे कुछ एस ऍम एस 
संक्षिप्त सन्देश सुविधा के तहत
आज रोक लूँ मैं किसी तरह खुद को 
न पढूं दोबारा से उन शब्दों को 
जिन्होंने हकीकत से रुसवा कर दिया मुझे 
आज याद करूँ उन इमारतों को
जहाँ बचपन में मैंने अनजाने ही लिख दीये थे 
दो नाम 
एक बेनाम प्रेम कहानी के
क्यों ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ?
सही सोचा है न मैंने 
जिंदगी की तन्हाई पर नहीं 
अकेले से बिस्तर की रजाई पर लिखूं



बुधवार, 5 जनवरी 2011

मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा.. ?





कितने दिन हो गए इस शहर में आये...आज भी हर शाम अलसाई सी है और हर सुबह ललचाई सी है. हालाँकि  इस शहर की  आबोहवा में खुद को तबसे ही शामिल कर लिया था जब दिल्ली से आ रही बस की खिड़की से मैंने वो बोर्ड देखा था. .. वेलकम टू लुधियाना सिटी . ये कोई  टूरिस्ट स्पोट नही था न ही कोई हिल स्टेशन, ये मेरी जिंदगी का पहला destination है ,  जहाँ मैंने अपने सपनो की तरफ अपना पहला कदम रखा था. शहर को जाना.. देखा.. जहाँ तक देख सकती थी, फिर लिखा भी.. उन बातों को जो चुभी जिन्हें महसूस किया. लेकिन लगा और लगातार लग रहा है कि शहर ने मुझे नही अपनाया. एक अजीब सा अकेलापन है यहाँ. हालाँकि अकेलापन अजीब ही होता है लेकिन मैं ये कहूँगी  कि ये अकेलापन अजीबोगरीब है. अजीब इसलिए कि अकेलेपन को दूर करने के जो उपाय है उन पर अमल नही हो पा रहा और जिन उपायों को अपनाने का मन है उन्हें खरीदने की पहुँच अभी नही जुटा पाई हूँ.
सार संक्षेप ये है कि यहाँ मन लग रहा है रम नही रहा. कुछ लोग यहाँ आकर लुधियानवी हो गए और मैं अब तक वो वजह नही जुटा पाई जिससे लुधियाना के कुछ लम्हे बटोर पाऊ अपनी यादों के लिए. नाम के साथ सरनेम जोड़ना तो दूर की बात है.
लोग अच्छे नहीं है जब ये सोचती हूँ तो लगता है क़ि मैं खुद भी तो बहुत बुरी सी हो गई हूँ शायद. और फिर किसी ने कहा क़ि पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा शायद इस शहर के साथ भी मेरी चाहतों का कुछ ऐसा ही सिलसिला  चल रहा है. मैं ही नहीं छू पाई हूँ यहाँ क़ि रूह को.. खैर आजकल तो धुंध भी बहुत है रूह को ढूँढ पाना फिर से एक मुश्किल भरा काम होगा. न जाने क्यों दिल चाहता है क़ि मैं उस रूह को न तलाश करू वो रूह खुद ब खुद मुझे दूंढ ले
 पहले से भी ज्यादा आलसी हो  गई हूँ यहाँ आकर ...............  

शनिवार, 1 जनवरी 2011

बीता साल- एक अलग शब्द, एक अनकहा अर्थ

बहुत सारा समय बीत गया
या सिर्फ एक साल ..
कविता सी रही जिंदगी
वक़्त से कदमताल करती हुई
या
उतार चढाव ने दी
एक अधूरी आखरी पंक्ति वाली
कहानी की  शक्ल
जिंदगी को
ख्वाबों को मिला खुला आसमान
या
अरमानो की आंधी में उड़ चले
मजबूर लम्हे और उलझे मसले तमाम 
बात कहकहो की बारात की
या
कुम्हलाया रहा सूरज जिस दिन
उस रात की बात
मामलात वो जिन्होंने तसव्वुर
को महका दिया
या
वो मशविरे जिन्होंने बेहद
मासूमियत से दगा दिया
बहुत सी शख्सियतें
और कुछ एक शख्स
या
महज एक बंदा खुदा का(माँ)
जिसने साल भर मिसाल बन
जीना आसान किया
जिसने हर साल, हर महीने, हर हफ्ते, हर दिन, हर पल को
अपने आंचल से छान
मुझे हर धूप से बचा लिया
फरवरी के महीने में भी जो खिले हुए फूलों से खरखराहट
सुनी थी मैंने
और जून की दोपहरी भी वो
जिसने पसीने को पहलूँ में छुपाने का लुत्फ़ दिया
एक अलग सा शब्द रहा वो साल जिसने
एक अनकहा अर्थ दिया

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

घर, शहर, दिल, दिल्ली और हम यानि मैं


अँधेरी रातों में चमचमाते चेहरे, भीड़ के बीच का एक शांत सा शोर, ठहर जाने की चाहत संजोये भागते दोड़ते लोग....पिछले तीन दिन मैं दिल्ली में थी. मैं दिल्ली की हूँ या दिल्ली मेरा शहर इस बात का फैसला अभी नही हो पाया है क्योंकि अक्सर आखिर में आकर चीजे रोजी रोटी से जुड़ जाती हैं ..जो मेरे लिए  दिल्ली में मुकम्मल नही हो  पाई...खैर एक महीने बारह दिन बाद वापस आकर अपने किराये की घर को दीवारों को महसूस कर, करीने से सजे बिस्तर को सलवटों से सराबोर कर न चाहते हुए भी अच्छा ही लगा...घर की बात, माँ के प्यार भरे हाथ और पापा के अचानक उमड़ पड़े दुलार की बात ही कुछ अलग होती है शायद..दूरिया प्यार बढा देती है ये बात भी प्रमाणिक होती नजर आने लगी है ..लेकिन कितनी अजीब बात है प्यार पाने और जताने के लिए उन्ही से दूर होना पड़ता है जिनसे दूर होने का सोचना भी कभी गवारा नही हुआ करता था...निरे बचपने से निकलकर नीरी समझदारी की बातें करना आसान नही होता....बताना कितना मुश्किल होता है ये अहसास कभी नही हुआ क्योंकि  माँ बाप दोस्त की तरह हमेशा कंधे और सर दोनों पर हाथ धरे रहे है ..छिपाना कितना मुश्किल होता है ये अब पता चला क्योंकि हर बात बताई नही जा सकती कुछ बात बताने लायक नही है और कुछ बता कर भी कुछ फायदा नही है...जिंदगी अपने से ही रंगों में रंगती जा रही है जहाँ मुझे हर रंग में मिलावट नजर आती है और सामने वाले को हर दृश्य सुनहरा प्रतीत हो रहा है...तीन सौ पैसठ दिन उस शहर में रहकर शब्दों का ऐसा आलोडन कभी नही रहा जैसा तीन दिनों के एक भाग दोड़ भरे सफ़र में हो रहा है .....जैसे तीन घंटे की एक पूरी फिल्म बन सकती है ..दिल्ली से लुधियाना की बस पर बैठने के वक़्त से न्यूज़ रूम में आकर ख़बरों से उलझने के दरम्यान कितनी ही बातें दिमाग में आती जाती रही ... जब छिपाया जाता है या यूँ कहूँ की बताया नही जाता है तो बहुत कुछ होता है कहने के लिए जिसे एक ख़ामोशी के साथ लिख देना ही बेहतर होता है .......पर क्या कीजे जब वक़्त कम हो और बात बड़ी औरत उलझी उलझी ...सब घर जाने की तयारी कर रहे है एक बजने वाला है मुझे  भी जाना है तबियत अब भी नासाज है ...बस घर पर ही ठीक रही थी घर की बात ही कुछ अलग है .......................हालाँकि घर अपना नही है किराये का है ...पर घर है 

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

खोल दो (पुरस्कृत कविता)


खोल दो का आग्रह
फिर मेरे सामने  है
क्योंकि अब वो मुझे
अपनी जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं
मेरी उड़ान मंजूर है उन्हें
मगर वो उसकी दिशा बदलना चाहते है
मेरी आहटों का जिक्र भी भाता है उन्हें
और मेरे कदम बढ़ाने पर भी वो ऐतराज जताते है
उनकी मीठी सी बातों में एक तीखा सा पन है
छलकती सी आँखें छल का दर्पण है
सब कुछ छिपा कर जाने क्या बताना चाहते हैं
मेरे जवान दिल में बैठे बचपने को
वो हर रोज बहकाना चाहते है
मेरी बातों की तफसील से मतलब नहीं उन्हें
मेरे बदन की तासीर को आजमाना चाहते हैं
जो नाम हिमानी है
उसमे वो क्या आग जलाएंगे
बर्फ की इस नदी को कितना पिघलायेंगे
बारिश तो ठीक है मगर
बाढ़ का कहर क्या वो सह पाएंगे
सवाल उनके भी हैं सवाल मेरे भी
मैं विश्वास करने में यकीं रखती हूँ
उनके सवालों में है शक के घेरे भी
देखें अब हम
भाग खड़े होंगे वो
या इन हालातों को सुलझाएंगे???


कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...